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डल झील की जीवनधारा शाहकुल को अतिक्रमण से मिलेगी मुक्ति? हाई कोर्ट ने प्रशासन को दिया 7 दिन का मौका

डल झील की जीवनधारा शाहकुल को अतिक्रमण से मिलेगी मुक्ति? हाई कोर्ट ने प्रशासन को दिया 7 दिन का मौका

       जम्मू-कश्मीर की प्रसिद्ध डल झील केवल पर्यटन का केंद्र ही नहीं है, बल्कि श्रीनगर की प्राकृतिक और ऐतिहासिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस झील की जल व्यवस्था को बनाए रखने वाली कई छोटी-बड़ी जलधाराओं का अपना अलग महत्व रहा है। इन्हीं में से एक ऐतिहासिक जलधारा शाहकुल है, जिसे स्थानीय स्तर पर गुप्त गंगा के नाम से भी जाना जाता है। समय के साथ अतिक्रमण और अन्य मानवीय हस्तक्षेप के कारण इस ऐतिहासिक जलधारा का स्वरूप प्रभावित हुआ है।

अब जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने शाहकुल को अतिक्रमण से मुक्त कराने और उसके पुनरुद्धार को लेकर प्रशासन को एक बार फिर सक्रिय होने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल अतिक्रमण की पहचान कर लेना पर्याप्त नहीं है। जमीन पर वास्तविक कार्रवाई भी दिखाई देनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ताशी रबस्तान और न्यायमूर्ति राजनेश ओसवाल की खंडपीठ ने शाहकुल के जीर्णोद्धार से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए डिवीजनल कमिश्नर, कश्मीर को अतिक्रमण हटाने के लिए नए सिरे से अभियान चलाने और संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों का जमीन पर अधिकार होने का दावा है, उनके दावों की जांच कानून के अनुसार की जाएगी। इसके लिए प्रभावित पक्षों को सक्षम प्राधिकारी के सामने अपना दावा प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है।

लंबे समय से अदालत की निगरानी में है मामला

शाहकुल की बहाली का मामला अचानक अदालत के सामने नहीं आया है। यह विषय पहले से ही न्यायिक निगरानी में रहा है। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह बात भी दर्ज की कि मामले में पहले कई आदेश पारित किए जा चुके हैं और अदालत लगातार इसकी निगरानी करती रही है।

अदालत के सामने मुख्य चिंता यह रही कि आदेशों और प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद शाहकुल को अतिक्रमण से मुक्त कराने की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।

जनहित याचिका में शाहकुल के जीर्णोद्धार और उसके मूल स्वरूप को बहाल करने की मांग की गई है। याचिका में यह मुद्दा केवल किसी एक जमीन या संपत्ति के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक जलधारा और उससे जुड़ी पर्यावरणीय व्यवस्था के संरक्षण से भी संबंधित है।

अदालत ने इसी व्यापक पहलू को ध्यान में रखते हुए प्रशासन से वास्तविक और प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा की है।

निशानदेही हुई, लेकिन अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रशासन ने शाहकुल से संबंधित अतिक्रमणों की निशानदेही कर ली है। यानी किन स्थानों पर अतिक्रमण है, इसकी पहचान की जा चुकी है।

लेकिन समस्या यह है कि निशानदेही के बाद अगला कदम नहीं उठाया गया।

अतिक्रमण की पहचान करना किसी भी अतिक्रमण हटाओ अभियान का पहला चरण माना जा सकता है। इसके बाद संबंधित व्यक्तियों को कानून के अनुसार नोटिस, उनके दावों की जांच और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद वास्तविक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाती है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि इस मामले में पहचान की प्रक्रिया तो हुई, लेकिन जमीन पर अतिक्रमण हटाने की प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दी।

इसी स्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने प्रशासन को नए सिरे से अभियान चलाने का निर्देश दिया है।

झील संरक्षण प्राधिकरण ने भी दाखिल की रिपोर्ट

मामले की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (J&K Lakes Conservation and Management Authority) की ओर से भी रिपोर्ट अदालत के सामने रखी गई।

यह रिपोर्ट अदालत के 22 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में दाखिल की गई थी। इसमें शाहकुल की बहाली के लिए प्रस्तावित उपायों की जानकारी दी गई।

इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक स्तर पर शाहकुल के संरक्षण और पुनरुद्धार को लेकर योजना तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन हाई कोर्ट अब यह देखना चाहता है कि योजना और रिपोर्ट केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका क्रियान्वयन भी हो।

यही वजह है कि अदालत ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों की भूमिका को स्पष्ट किया है।

निजी पक्षों ने भी जमीन पर जताया अधिकार

मामले की सुनवाई के दौरान कुछ निजी पक्षों की ओर से जमीन पर अपने अधिकार का दावा किया गया। उनका कहना था कि यदि उन्हें जमीन से बेदखल किया जाना है तो उससे पहले उनके दावे और अधिकारों को सुना जाना चाहिए।

यह पक्ष कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है। किसी भी जमीन से किसी व्यक्ति को हटाने से पहले यह देखना आवश्यक होता है कि वह व्यक्ति किस आधार पर उस जमीन पर कब्जे या अधिकार का दावा कर रहा है।

यदि किसी व्यक्ति के पास वैध दस्तावेज या कानूनन मान्य अधिकार है, तो उसका परीक्षण संबंधित राजस्व प्राधिकारी द्वारा किया जाना आवश्यक है। दूसरी ओर, यदि जांच में कब्जा अवैध पाया जाता है तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने प्रभावित पक्षों को अपने दावे रखने का अवसर दिया है।

सरकार ने अदालत को क्या भरोसा दिया?

सरकार की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता मोहसिन कादरी ने अदालत को बताया कि सरकार शाहकुल की बहाली और अतिक्रमण हटाने के लिए अदालत के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है।

सरकार का यह रुख सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि अदालत ने पहले के आदेशों के बावजूद अपेक्षित प्रगति नहीं होने पर मामले में सख्ती दिखाई।

अब प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वह एक तरफ शाहकुल को अतिक्रमण से मुक्त कराने की कार्रवाई करे और दूसरी तरफ जमीन पर अधिकार का दावा करने वाले लोगों के कानूनी अधिकारों की भी जांच सुनिश्चित करे।

हाई कोर्ट ने तय की कार्रवाई की रूपरेखा

हाई कोर्ट ने इस मामले में केवल सामान्य निर्देश जारी नहीं किए हैं, बल्कि कार्रवाई की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की है।

अदालत के निर्देश के अनुसार डिवीजनल कमिश्नर, कश्मीर को अभियान का समन्वय करना होगा। इसके लिए जम्मू-कश्मीर झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण तथा अन्य संबंधित विभागों को साथ लेकर कार्रवाई की जाएगी।

इसका उद्देश्य अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल स्थापित करके अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।

ऐसे मामलों में राजस्व विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि जमीन की सीमा, रिकॉर्ड और स्वामित्व से जुड़े विवादों की जांच राजस्व अभिलेखों के आधार पर की जाती है।

इसलिए अदालत ने जमीन के अधिकार से संबंधित दावों की जांच के लिए राजस्व प्राधिकरण को भी प्रक्रिया में शामिल किया है।

प्रभावित लोगों को मिला सात दिन का अवसर

हाई कोर्ट ने उन लोगों के लिए भी रास्ता खुला रखा है जो शाहकुल से संबंधित जमीन पर अपना वैध अधिकार होने का दावा करते हैं।

अदालत के निर्देश के अनुसार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से प्रभावित व्यक्ति सात दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी के सामने अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं।

यह समय सीमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने एक ओर प्रशासन को कार्रवाई के लिए कहा है, वहीं दूसरी ओर संबंधित व्यक्तियों को अपनी बात रखने का अवसर भी दिया है।

दावे की अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित प्राधिकारी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकेगा।

इस तरह अदालत ने प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण और प्रभावित पक्षों के कानूनी अधिकारों के बीच प्रक्रिया संबंधी संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।

सात दिन के बाद क्या होगा?

हाई कोर्ट के निर्देश के अनुसार दावा प्रस्तुत करने के लिए निर्धारित सात दिन की अवधि समाप्त होने के बाद यदि किसी व्यक्ति का दावा कानूनन टिकाऊ नहीं पाया जाता है और कब्जा अतिक्रमण की श्रेणी में आता है, तो संबंधित प्रशासन कानून के अनुसार उसे हटाने की कार्रवाई आगे बढ़ा सकता है।

इसके बाद शाहकुल की बहाली का काम भी आगे बढ़ाया जाना है।

यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि अदालत ने किसी व्यक्ति के निजी दावे को स्वतः अवैध घोषित नहीं किया है। बल्कि राजस्व प्राधिकरण को अधिकारों से जुड़े दावों की जांच करने का निर्देश दिया गया है।

अर्थात आगे की प्रक्रिया रिकॉर्ड, दस्तावेज और लागू कानून के आधार पर पूरी की जानी है।

शाहकुल की बहाली क्यों महत्वपूर्ण है?

शाहकुल को केवल एक सामान्य जलधारा के रूप में देखना उसके महत्व को सीमित कर देगा। इसका संबंध डल झील की जल व्यवस्था और श्रीनगर के ऐतिहासिक जल तंत्र से बताया जाता है।

पुराने समय में कश्मीर में जलधाराओं, झीलों और नहरों का स्थानीय जीवन से गहरा संबंध था। ये जल स्रोत सिंचाई, जल निकासी और पर्यावरणीय संतुलन के लिए उपयोगी रहे हैं।

शहरी विस्तार के साथ जब प्राकृतिक जलधाराओं के आसपास निर्माण बढ़ता है, तो उनके प्रवाह में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इससे जल निकासी की व्यवस्था प्रभावित होने के साथ-साथ जलभराव और प्रदूषण जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।

इसीलिए जलधाराओं का संरक्षण केवल पुराने इतिहास को बचाने का विषय नहीं है। इसका संबंध वर्तमान पर्यावरणीय व्यवस्था से भी है।

अतिक्रमण का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं

जलधारा पर अतिक्रमण को केवल भूमि विवाद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जब किसी प्राकृतिक जलमार्ग की चौड़ाई कम होती है या उसके प्रवाह में रुकावट आती है तो इसका प्रभाव आसपास के पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।

जल का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होने से निकासी की समस्या पैदा हो सकती है। पानी का ठहराव बढ़ सकता है और जल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

डल झील जैसे संवेदनशील जल निकाय के संदर्भ में यह विषय और महत्वपूर्ण हो जाता है। झील से जुड़ी जलधाराओं का संरक्षण उसकी पारिस्थितिकी से भी जुड़ा हुआ है।

इसी कारण शाहकुल की बहाली का मामला पर्यावरणीय संरक्षण, ऐतिहासिक विरासत और प्रशासनिक जवाबदेही—तीनों पहलुओं को जोड़ता है।

केवल अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा

हाई कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अतिक्रमण हटाने की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को कानूनी और पारदर्शी तरीके से पूरा करने की होगी।

सबसे पहले राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन की स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इसके बाद जिन स्थानों पर अतिक्रमण की पहचान हुई है, वहां संबंधित पक्षों के दावों की जांच करनी होगी।

जहां वैध अधिकार नहीं पाया जाए, वहां कानून के अनुसार अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करनी होगी। इसके बाद शाहकुल के मूल प्रवाह और स्वरूप की बहाली के लिए संबंधित विभागों को काम करना होगा।

यदि इन सभी चरणों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पूरा किया जाता है तो शाहकुल के पुनरुद्धार की दिशा में ठोस प्रगति हो सकती है।

अदालत की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को

हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित की है।

इस तारीख तक प्रशासन को अदालत के निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई करनी होगी। विशेष रूप से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया, जमीन से जुड़े दावों की जांच और शाहकुल की बहाली के लिए उठाए गए कदम अदालत की निगरानी में महत्वपूर्ण रहेंगे।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस बार अदालत के निर्देशों को जमीन पर किस तरह लागू करता है।

आदेश के बाद प्रशासन की असली परीक्षा

शाहकुल के मामले में हाई कोर्ट के ताजा निर्देशों ने प्रशासन के सामने कार्रवाई की स्पष्ट समय-सीमा और जिम्मेदारी तय कर दी है। सात दिनों का दावा अवसर पूरा होने के बाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा और अगली सुनवाई में अदालत को प्रगति से अवगत कराया जा सकता है।

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत पहले ही कई बार इस विषय की निगरानी कर चुकी है। इसलिए अब केवल रिपोर्ट या कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर वास्तविक स्थिति में बदलाव दिखाई देना अपेक्षित है।

शाहकुल की बहाली केवल एक ऐतिहासिक जलधारा को बचाने का प्रयास नहीं है। यह श्रीनगर की पुरानी जल व्यवस्था, डल झील के पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

यदि अतिक्रमण की पहचान के बाद कानून के अनुसार कार्रवाई पूरी होती है और जलधारा का प्राकृतिक प्रवाह बहाल किया जाता है, तो यह संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। फिलहाल निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई और 13 अक्टूबर 2026 को होने वाली हाई कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।