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18 साल तक चला बिजली चोरी का मुकदमा, साक्ष्य के अभाव में आटा चक्की संचालक बरी;

18 साल तक चला बिजली चोरी का मुकदमा, साक्ष्य के अभाव में आटा चक्की संचालक बरी; कोर्ट में मोटर-केबल तक नहीं पेश कर सका विभाग

       आगरा। बिजली चोरी के आरोप में दर्ज एक मुकदमे का फैसला आने में करीब 18 साल लग गए। वर्ष 2008 में जिस मामले में विद्युत विभाग ने एक आटा चक्की संचालक के खिलाफ बिजली चोरी का आरोप लगाया था, उसी मामले में अब अदालत ने आरोपी को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। मामला आगरा के एत्मादपुर थाना क्षेत्र के कुबेरपुर गांव का है।

विशेष न्यायाधीश (आर्थिक अपराध) पवन कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने आरोपी मुकेश को दोषमुक्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए आवश्यक और विश्वसनीय साक्ष्य अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं कर सका। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, विभाग की ओर से छापेमारी के दौरान मोटर और केबल आदि बरामद किए जाने का दावा किया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान इन्हें अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। छापे की फोटो, वीडियोग्राफी और चेकिंग रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिजली चोरी के मुकदमों में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होता कि किसी परिसर में अनधिकृत तरीके से बिजली का इस्तेमाल पाया गया था। आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को अपने आरोपों को कानून के अनुसार साक्ष्यों के माध्यम से साबित करना होता है। इस मामले में अदालत के सामने अभियोजन के साक्ष्य और दस्तावेजों को लेकर कई महत्वपूर्ण कमियां सामने आईं।

वर्ष 2008 में दर्ज हुआ था मुकदमा

मामले की शुरुआत 30 अगस्त 2008 को हुई थी। अभियोजन की कहानी के मुताबिक, कुबेरपुर निवासी मुकेश की आटा चक्की का बिजली कनेक्शन बकाया बिल के कारण काट दिया गया था। विद्युत विभाग का आरोप था कि कनेक्शन कटने के बावजूद आटा चक्की का संचालन बंद नहीं हुआ।

विभाग को कथित तौर पर सूचना मिली कि मुकेश बिना वैध विद्युत कनेक्शन के आटा चक्की चला रहा है। इसके बाद विद्युत विभाग की टीम ने उसके परिसर में छापेमारी की।

अभियोजन के अनुसार, उस समय 6 हॉर्स पावर की मोटर के जरिए आटा चक्की संचालित की जा रही थी और बिजली के तार में कटिया डालकर बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा था।

छापेमारी के दौरान विभागीय टीम ने मोटर और केबल आदि बरामद करने का दावा किया था।

इसके बाद मामले को लेकर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

अवर अभियंता की तहरीर पर हुई कार्रवाई

मामले में विद्युत विभाग के अवर अभियंता सुरेश चंद वर्मा की ओर से पुलिस को तहरीर दी गई थी। तहरीर में आरोप लगाया गया था कि बकाया बिजली बिल के कारण कनेक्शन काटे जाने के बावजूद आरोपी ने बिजली का उपयोग जारी रखा।

रिपोर्ट के अनुसार, छापेमारी के दौरान उनके साथ उपखंड अधिकारी वाईएस राघव, राजेंद्र कुमार और अन्य विद्युत कर्मचारी मौजूद थे।

विभाग का दावा था कि मौके पर बिजली चोरी के लिए अनधिकृत कनेक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा था।

इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 138 के तहत मामला दर्ज किया गया।

यहां यह समझना जरूरी है कि धारा 138 सामान्य अर्थों में बिजली चोरी की हर स्थिति के लिए एक ही प्रावधान नहीं है। इस धारा का शीर्षक “Interference with meters or works of licensee” है और इसमें लाइसेंसी की विद्युत लाइन, मीटर या उपकरण से अनधिकृत रूप से कनेक्शन या पुनःकनेक्शन सहित कुछ विशेष कृत्यों को दंडनीय बनाया गया है।

क्या कहती है विद्युत अधिनियम की धारा 138?

विद्युत अधिनियम की धारा 138 के तहत यदि कोई व्यक्ति लाइसेंसी की विद्युत लाइन से मीटर, indicator या apparatus को अनधिकृत तरीके से जोड़ता या अलग करता है, अथवा ऐसी विद्युत लाइन या लाइसेंसी के अन्य कार्यों से अनधिकृत पुनःकनेक्शन करता है, तो यह अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

धारा में कुछ अन्य प्रकार के interference को भी शामिल किया गया है, जैसे लाइसेंसी की विद्युत व्यवस्था से अनधिकृत रूप से connection स्थापित करना या मीटर के कामकाज में जानबूझकर छेड़छाड़ करना। कानून में इसके लिए कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

हालांकि किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना और अदालत में अपराध साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। एफआईआर में लगाए गए आरोपों को मुकदमे के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी होती है।

इसी बिंदु ने आगरा के इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अदालत में केवल एक गवाह की गवाही

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने विभाग और पुलिस से जुड़े कई गवाहों का उल्लेख किया था। लेकिन प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अदालत में केवल शिकायतकर्ता अवर अभियंता सुरेश चंद वर्मा की गवाही दर्ज हुई।

यानी छापेमारी के दौरान मौजूद बताए गए अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की गवाही अदालत में उसी तरह सामने नहीं आई, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी को स्वतंत्र और प्रत्यक्ष साक्ष्य से जोड़ने में कठिनाई पैदा हुई।

किसी भी आपराधिक मुकदमे में गवाहों की संख्या ही सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं होती। असली सवाल यह होता है कि उपलब्ध गवाही घटना के महत्वपूर्ण तथ्यों को किस सीमा तक साबित करती है और क्या वह अन्य दस्तावेजी एवं भौतिक साक्ष्यों से पुष्ट होती है।

इस मामले में यही कड़ी कमजोर दिखाई दी।

बरामद मोटर और केबल कोर्ट में पेश नहीं हुए

मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण कमियों में से एक यह रही कि जिस मोटर और केबल आदि की बरामदगी का दावा छापेमारी के समय किया गया था, उन्हें अदालत में पेश नहीं किया जा सका।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि अभियोजन की कहानी में इन्हीं वस्तुओं का महत्वपूर्ण स्थान था।

यदि किसी परिसर से बिजली चोरी में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बरामद किए जाने का दावा किया जाता है, तो मुकदमे के दौरान उन वस्तुओं की पहचान, उनकी बरामदगी और घटना से उनका संबंध स्थापित करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस मामले में अदालत के सामने कथित रूप से बरामद मोटर और केबल प्रस्तुत नहीं किए गए।

इससे अभियोजन की उस कहानी को भौतिक साक्ष्य से जोड़ने में समस्या पैदा हुई, जिसके आधार पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई थी।

न फोटो पेश हुई, न वीडियोग्राफी

आज के दौर में किसी भी छापेमारी की कार्रवाई के दौरान फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग को महत्वपूर्ण corroborative evidence माना जा सकता है। हालांकि हर मामले में फोटो या वीडियो होना ही दोषसिद्धि की अनिवार्य शर्त नहीं है।

लेकिन इस मामले में जब अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों को लेकर भी कमी थी, तब छापेमारी की फोटो और वीडियोग्राफी का रिकॉर्ड पर नहीं आना अभियोजन के लिए एक और कमजोरी बन गया।

विभाग ने जिस स्थान पर बिजली चोरी पकड़े जाने का दावा किया था, वहां की स्थिति को दृश्य साक्ष्य के जरिए भी अदालत के सामने रखा जा सकता था। मगर रिपोर्ट के अनुसार ऐसा नहीं हो सका।

इससे अदालत के सामने मुख्य रूप से मौखिक गवाही और उपलब्ध दस्तावेज ही रह गए।

चेकिंग रिपोर्ट भी नहीं आई रिकॉर्ड पर

मामले में एक और महत्वपूर्ण दस्तावेज चेकिंग रिपोर्ट थी। लेकिन प्रकाशित विवरण के अनुसार यह रिपोर्ट भी अदालत में प्रस्तुत नहीं की गई।

किसी विद्युत जांच या छापेमारी में तैयार की गई रिपोर्ट में सामान्य तौर पर जांच की तारीख, स्थान, उपभोक्ता या परिसर का विवरण, कनेक्शन की स्थिति, मौके पर पाए गए उपकरण और अधिकारियों की कार्रवाई जैसी बातें दर्ज हो सकती हैं।

इसलिए यदि अभियोजन की पूरी कहानी किसी विशेष जांच पर आधारित हो और उसी जांच की रिपोर्ट अदालत में उपलब्ध न हो, तो मामले को साक्ष्य के स्तर पर कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

आगरा के इस मामले में भी यही स्थिति दिखाई दी।

18 साल बाद आया फैसला

इस मामले की सबसे बड़ी विशेषता मुकदमे की लंबी अवधि है।

घटना 30 अगस्त 2008 की बताई गई थी और आरोपी को अदालत से राहत वर्ष 2026 में मिली। यानी एक व्यक्ति को लगभग 18 वर्षों तक आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ा।

इस अवधि के दौरान आरोपी के जीवन पर मुकदमे का क्या प्रभाव पड़ा होगा, इसका पूरा आकलन केवल अदालत के आदेश से नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना जरूर है कि किसी आपराधिक मुकदमे का वर्षों तक लंबित रहना संबंधित व्यक्ति के लिए कानूनी और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर कठिन स्थिति पैदा कर सकता है।

इस मामले में अंततः अदालत के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण रहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से क्या अभियोजन अपने आरोप को आवश्यक कानूनी स्तर तक साबित कर पाया है।

अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया।

बरी होने का मतलब क्या है?

किसी आरोपी को अदालत द्वारा बरी किए जाने का सीधा अर्थ यह है कि उस मुकदमे में अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोप को दोषसिद्धि के लिए आवश्यक स्तर पर साबित नहीं कर सका।

इसका यह अर्थ अलग से नहीं निकाला जाना चाहिए कि अदालत ने हर उस घटना के बारे में कोई सार्वभौमिक निष्कर्ष दे दिया है जिसे अभियोजन ने आरोप के रूप में बताया था।

इस मामले में प्रकाशित रिपोर्ट से यही सामने आता है कि अभियोजन के पास आरोपों को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हो सके।

विशेष रूप से कथित बरामद मोटर और केबल का अदालत में पेश न होना, चेकिंग रिपोर्ट का रिकॉर्ड पर न आना तथा छापेमारी की फोटो और वीडियोग्राफी प्रस्तुत न किया जाना महत्वपूर्ण कमियां रहीं।

बिजली चोरी के मामलों में साक्ष्य क्यों महत्वपूर्ण है?

बिजली चोरी के मामलों में अक्सर कार्रवाई मौके की जांच से शुरू होती है। विभागीय अधिकारी किसी परिसर में पहुंचते हैं, कनेक्शन की स्थिति देखते हैं, मीटर या लाइन की जांच करते हैं और यदि अनधिकृत उपयोग पाया जाता है तो रिपोर्ट तैयार करते हैं।

लेकिन आपराधिक मुकदमे का अगला चरण अदालत में होता है।

यहां विभाग को अपनी जांच के महत्वपूर्ण पहलुओं को साक्ष्य के माध्यम से साबित करना पड़ता है। केवल प्राथमिकी में आरोप लिखे जाने से अपराध अपने आप साबित नहीं हो जाता।

मसलन, यदि विभाग का कहना है कि किसी व्यक्ति के परिसर में कटिया डालकर बिजली का उपयोग हो रहा था, तो मुकदमे में यह साबित करना जरूरी होगा कि वास्तव में ऐसी स्थिति मौजूद थी और आरोपी का उस कृत्य से कानूनी रूप से संबंध था।

साक्ष्य की प्रकृति मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है।

इसीलिए मौके पर तैयार दस्तावेज, बरामद वस्तुएं, संबंधित अधिकारियों की गवाही, जांच रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्य कई मामलों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

केवल विभागीय कार्रवाई काफी नहीं

बिजली विभाग के पास बिजली चोरी रोकने और अनधिकृत इस्तेमाल के खिलाफ कार्रवाई करने की वैधानिक शक्तियां हैं। लेकिन जब मामला आपराधिक अदालत तक पहुंचता है तो अभियोजन को न्यायालयीन प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है।

विभागीय अधिकारी द्वारा की गई जांच और आपराधिक अदालत में उसकी सिद्धि, दोनों अलग चरण हैं।

एक जांच अधिकारी या विभागीय अधिकारी यह दावा कर सकता है कि उसने मौके पर बिजली चोरी पकड़ी। लेकिन अदालत में उस दावे को कानून के अनुसार साबित करने के लिए उपलब्ध साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़ते हैं।

आगरा के इस मामले में अभियोजन द्वारा बताए गए कई महत्वपूर्ण साक्ष्य अदालत के रिकॉर्ड पर नहीं आ सके।

यही वजह रही कि करीब 18 वर्ष पुराने मुकदमे का अंत आरोपी की बरी होने के साथ हुआ।

इस फैसले से क्या संदेश निकलता है?

यह फैसला केवल एक बिजली चोरी के मामले का परिणाम नहीं है। यह आपराधिक मुकदमों में evidence management और जांच की गुणवत्ता के महत्व को भी सामने लाता है।

किसी मामले में कार्रवाई करने के बाद उसकी पूरी evidentiary chain को सुरक्षित रखना जरूरी होता है।

यदि मौके से कोई वस्तु बरामद की गई है तो उसकी बरामदगी का दस्तावेजीकरण, सुरक्षित रखे जाने की प्रक्रिया और अदालत में उसका प्रस्तुतिकरण महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसी प्रकार यदि छापेमारी के दौरान फोटो या वीडियो बनाया गया है तो उसे उचित तरीके से रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाना मामले को अधिक स्पष्ट कर सकता है।

चेकिंग रिपोर्ट जैसे दस्तावेज भी केवल विभागीय फाइल में रह जाने के बजाय जरूरत पड़ने पर न्यायिक प्रक्रिया में प्रस्तुत किए जाने चाहिए।

आरोपी का 18 साल बाद मिला राहत का अधिकार

मुकेश के लिए यह फैसला लंबे समय तक चले मुकदमे का अंत है। वर्ष 2008 में दर्ज मामले में उन्हें 2026 में अदालत से बरी किया गया।

मामले की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि अभियोजन ने बिजली चोरी का आरोप लगाया था, लेकिन अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकी।

आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि किसी व्यक्ति को अपराधी तभी माना जा सकता है जब अभियोजन कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोप साबित करे।

इस मामले में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों में जो कमियां सामने आईं, उन्होंने आरोप को दोषसिद्धि तक पहुंचने नहीं दिया।

बिजली विभाग के लिए भी सीख

ऐसे मामलों में केवल छापेमारी करना ही पर्याप्त नहीं है। कार्रवाई के बाद मुकदमे की तैयारी और साक्ष्यों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि मौके पर विभागीय टीम ने मोटर और केबल बरामद किए हैं, तो उन्हें नियमानुसार सुरक्षित रखना और अदालत में प्रस्तुत करना आवश्यक हो सकता है। इसी तरह चेकिंग रिपोर्ट, मौके की स्थिति, गवाहों की गवाही और उपलब्ध फोटो-वीडियो को रिकॉर्ड में उचित तरीके से लाना अभियोजन को मजबूत कर सकता है।

आगरा के इस मुकदमे में रिपोर्ट के अनुसार यही कड़ियां कमजोर रहीं।

निष्कर्ष: आरोप से ज्यादा जरूरी है उसे साबित करना

आगरा का यह 18 साल पुराना मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी बात सामने लाता है—किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना और अदालत में उस आरोप को साबित करना दो अलग-अलग बातें हैं।

विद्युत विभाग ने वर्ष 2008 में मुकेश पर कनेक्शन कटने के बाद भी आटा चक्की चलाने और अनधिकृत तरीके से बिजली इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था। विभाग ने छापेमारी और मोटर-केबल की बरामदगी का दावा भी किया।

लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान कथित रूप से बरामद मोटर और केबल अदालत में पेश नहीं हो सके। छापे की फोटो और वीडियोग्राफी रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई और चेकिंग रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की गई। अभियोजन की ओर से बताए गए कई गवाहों के बजाय केवल शिकायतकर्ता अवर अभियंता की गवाही दर्ज हुई।

नतीजा यह हुआ कि करीब 18 वर्षों तक चले इस मुकदमे में अदालत ने आरोपी मुकेश को बरी कर दिया।

इस मामले की सबसे बड़ी सीख यही है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपों की गंभीरता जितनी महत्वपूर्ण है, उन्हें साबित करने के लिए विश्वसनीय, उचित और अदालत में स्वीकार्य साक्ष्य उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

बिजली चोरी रोकना विद्युत विभाग की जिम्मेदारी है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाता है तो जांच से लेकर अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत करने तक हर चरण कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होना आवश्यक है। इसी प्रक्रिया में यदि महत्वपूर्ण कड़ियां टूट जाएं, तो वर्षों पुराना मुकदमा भी अंततः अभियोजन के पक्ष में परिणाम नहीं दे सकता।