IndianLawNotes.com

सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण को राहत देने से किया इनकार, NSE की पूर्व MD-CEO पर चलेगा मुकदमा

सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण को राहत देने से किया इनकार, NSE की पूर्व MD-CEO पर चलेगा मुकदमा

नई दिल्ली: नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) चित्रा रामकृष्ण को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें हाई कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने खुद को ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं मानते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि जिन महत्वपूर्ण कानूनी और तथ्यात्मक सवालों को चित्रा रामकृष्ण ने उठाया है, उन्हें ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं हुई है। वहीं, यह भी महत्वपूर्ण है कि कोर्ट ने इस स्तर पर उनके दोष या निर्दोष होने पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

मामला आखिर है क्या?

पूरा मामला NSE से जुड़े चर्चित को-लोकेशन प्रकरण और NSE की तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी व्यवस्था से संबंधित है। चित्रा रामकृष्ण वर्ष 2013 से 2016 तक NSE की MD और CEO थीं। इससे पहले वह NSE की Joint Managing Director भी रह चुकी थीं। दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने 2 दिसंबर 2016 को अपने पद से इस्तीफा दिया था।

CBI ने NSE से जुड़े मामलों की जांच के दौरान आरोप लगाया कि एक्सचेंज की को-लोकेशन व्यवस्था में कुछ ब्रोकरों को कथित रूप से अनुचित लाभ पहुंचाया गया। जांच में NSE के सर्वर और ट्रेडिंग डेटा तक पहुंच से संबंधित गंभीर आरोप सामने आए।

CBI की चार्जशीट में चित्रा रामकृष्ण और NSE के तत्कालीन Group Operating Officer एवं MD के सलाहकार आनंद सुब्रमण्यम को आरोपी बनाया गया था। जांच एजेंसी का आरोप था कि NSE में चित्रा रामकृष्ण के कार्यकाल के दौरान कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में नियमों का उल्लंघन हुआ और कुछ व्यक्तियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

सबसे बड़ा कानूनी सवाल—क्या चित्रा रामकृष्ण ‘पब्लिक सर्वेंट’ थीं?

मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यही है।

चित्रा रामकृष्ण की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में तर्क दिया गया था कि NSE एक निजी कंपनी है। उसका स्वामित्व सरकार के पास नहीं है और वह एक व्यावसायिक संस्था के रूप में काम करती है। इसलिए उसके MD और CEO को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ‘public servant’ नहीं माना जा सकता।

उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि निजी कंपनी में काम करने वाले व्यक्ति को केवल इसलिए सरकारी कर्मचारी या ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं माना जा सकता कि उसकी संस्था किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र में काम करती है या सरकारी नियामक के नियंत्रण में है।

दूसरी ओर, CBI और केंद्र की ओर से दलील दी गई कि किसी व्यक्ति को ‘पब्लिक सर्वेंट’ मानने के लिए केवल यह देखना जरूरी नहीं है कि उसका नियोक्ता सरकारी संस्था है या नहीं। यह भी देखना होगा कि वह व्यक्ति किस प्रकार की सार्वजनिक जिम्मेदारी निभा रहा था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा था?

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीजन बेंच ने 9 जुलाई 2026 को चित्रा रामकृष्ण की याचिका खारिज कर दी थी।

हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 2(b) और 2(c)(viii) की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के ‘public servant’ होने के सवाल में यह देखना महत्वपूर्ण है कि वह किस प्रकार का ‘public duty’ निभाता है।

धारा 2(c)(viii) के तहत ऐसा व्यक्ति ‘public servant’ की परिभाषा में आ सकता है जो ऐसा पद धारण करता है जिसके आधार पर उसे सार्वजनिक कर्तव्य निभाने का अधिकार या जिम्मेदारी प्राप्त होती है।

हाई कोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति को इस प्रावधान के तहत देखने के लिए दो बातें महत्वपूर्ण हैं—पहली, व्यक्ति किसी ‘office’ पर हो और दूसरी, उस पद के कारण वह ‘public duty’ करने के लिए अधिकृत या बाध्य हो।

NSE को सामान्य निजी कंपनी से अलग क्यों माना गया?

दिल्ली हाई कोर्ट ने NSE के कामकाज की प्रकृति पर भी विस्तार से विचार किया।

NSE एक Recognised Stock Exchange है और Securities Contracts (Regulation) Act के तहत इसकी मान्यता और नियामकीय व्यवस्था जुड़ी हुई है। हाई कोर्ट ने कहा कि स्टॉक एक्सचेंज का काम केवल सामान्य व्यावसायिक गतिविधि तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय वित्तीय बाजार और निवेशकों से सीधे जुड़ा हुआ है।

अदालत ने NSE के Memorandum of Association में दर्ज उद्देश्यों का भी उल्लेख किया। इसमें प्रतिभूतियों में लेन-देन को ‘public interest’ में सुविधाजनक बनाने, निवेशकों की सुरक्षा और बाजार में पारदर्शिता जैसे उद्देश्यों का उल्लेख है।

हाई कोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि NSE द्वारा किए जाने वाले कार्यों में सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण तत्व मौजूद है और NSE ‘public duty’ का निर्वहन करता है।

जुलाई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के एक अन्य फैसले में भी NSE को सूचना का अधिकार अधिनियम के संदर्भ में ‘public authority’ मानने के प्रश्न पर विचार किया गया था। अदालत ने NSE के नियामकीय ढांचे और सरकारी नियंत्रण से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की।

MD और CEO की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

चित्रा रामकृष्ण की ओर से यह भी तर्क दिया गया था कि भले ही NSE कुछ सार्वजनिक कार्य करता हो, लेकिन इससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि उसकी MD और CEO व्यक्तिगत रूप से ‘public duty’ निभा रही थीं।

हाई कोर्ट ने इस तर्क को इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि चित्रा रामकृष्ण NSE की MD और CEO थीं और इसलिए उनके पद की वास्तविक जिम्मेदारियों तथा उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को मामले के तथ्यों के संदर्भ में देखा जाना आवश्यक है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि उनके द्वारा NSE के आंतरिक प्रबंधन में किए गए कार्यों और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों के बीच वास्तविक संबंध क्या था, यह साक्ष्य का विषय है। ऐसे मिश्रित प्रश्नों का अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।

यही कारण है कि हाई कोर्ट ने इस स्तर पर चार्जशीट को रद्द करने से इनकार किया।

मामला आनंद सुब्रमण्यम तक कैसे पहुंचा?

इस मामले में आनंद सुब्रमण्यम की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वह NSE में Group Operating Officer और MD के सलाहकार के रूप में कार्यरत थे।

CBI ने आरोप लगाया कि चित्रा रामकृष्ण ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति और उनकी भूमिका से संबंधित कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। चार्जशीट में उनके पदनाम और पारिश्रमिक में कथित तौर पर बार-बार बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया।

CBI का आरोप था कि इन फैसलों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और चित्रा रामकृष्ण ने अपने पद का कथित रूप से दुरुपयोग किया।

हालांकि, इन आरोपों का अंतिम निर्धारण ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होना है। किसी चार्जशीट में लगाए गए आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं होते।

‘योगी’ वाला रहस्य भी रहा चर्चा में

चित्रा रामकृष्ण से जुड़े इस मामले का सबसे चर्चित पहलू एक कथित रहस्यमयी ‘योगी’ से संबंधित था।

जांच के दौरान सामने आया कि चित्रा रामकृष्ण ने कथित तौर पर एक ऐसे रहस्यमयी आध्यात्मिक व्यक्ति से ईमेल के माध्यम से संपर्क की बात कही थी, जिससे वह महत्वपूर्ण पेशेवर फैसलों के संबंध में सलाह लेती थीं।

मीडिया में इस व्यक्ति को ‘योगी’ के नाम से चर्चा मिली। बाद में CBI ने आरोप लगाया कि जिस व्यक्ति को वह रहस्यमयी योगी समझती थीं, वह वास्तव में आनंद सुब्रमण्यम ही था।

यह मामला सामने आने के बाद NSE के प्रशासनिक निर्णयों, नियुक्तियों और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर व्यापक सवाल उठे।

हालांकि, इस पहलू से जुड़े आरोपों और निष्कर्षों को भी न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम रूप दिया जाना है।

CBI ने कब गिरफ्तार किया था?

CBI ने चित्रा रामकृष्ण को 6 मार्च 2022 को गिरफ्तार किया था। इससे पहले SEBI ने भी NSE से जुड़े मामले में जांच की थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, CBI ने 21 अप्रैल 2022 को चित्रा रामकृष्ण और आनंद सुब्रमण्यम के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत आरोपों का उल्लेख किया गया था।

CBI के अनुसार, जांच में को-लोकेशन सुविधा से जुड़े कथित अनियमितताओं के साथ-साथ NSE के भीतर नियुक्ति और प्रशासनिक निर्णयों की भी जांच की गई।

NSE ने अभियोजन की मंजूरी दी, लेकिन महत्वपूर्ण शर्त के साथ

इस मामले में एक दिलचस्प कानूनी पहलू NSE द्वारा दी गई अभियोजन की मंजूरी भी है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले में दर्ज है कि NSE के बोर्ड ने चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ अभियोजन के लिए मंजूरी दी थी। लेकिन साथ ही बोर्ड ने यह स्पष्ट किया था कि इस मंजूरी को NSE द्वारा यह स्वीकार करना नहीं माना जाए कि उसके अधिकारी ‘public servants’ हैं या NSE स्वयं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में आता है।

बाद में भी इसी प्रकार की शर्त के साथ दूसरी sanction order जारी की गई।

चित्रा रामकृष्ण की ओर से इसी आधार पर अभियोजन की मंजूरी की वैधता पर सवाल उठाया गया था। हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे का अंतिम निर्धारण भी साक्ष्यों और कानून के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जा सकता है।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या असर होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार किए जाने का तत्काल प्रभाव यह है कि चित्रा रामकृष्ण की उस चुनौती के आधार पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं होगी।

लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है।

अदालत के सामने इस चरण में मुख्य सवाल यह था कि क्या हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करके कोई ऐसी कानूनी गलती की थी जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा हस्तक्षेप आवश्यक नहीं माना।

हाई कोर्ट पहले ही कह चुका है कि ‘public servant’ होने से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का परीक्षण ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि उसकी टिप्पणियां ट्रायल कोर्ट के निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।

इसलिए अब मामले की आगे की दिशा ट्रायल कोर्ट में होने वाली कार्यवाही और वहां पेश किए जाने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।

कानूनी रूप से क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

चित्रा रामकृष्ण का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ‘public servant’ की कानूनी अवधारणा को निजी क्षेत्र में काम करने वाली लेकिन सार्वजनिक महत्व के कार्य करने वाली संस्थाओं के संदर्भ में देखा जा रहा है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में ‘public servant’ की परिभाषा केवल पारंपरिक सरकारी कर्मचारी तक सीमित नहीं है। धारा 2(c) में विभिन्न श्रेणियों को शामिल किया गया है। इस मामले में विशेष रूप से धारा 2(c)(viii) और ‘public duty’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है।

यदि किसी निजी संस्था की गतिविधियां व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ी हों, तो उसके वरिष्ठ पदाधिकारी की कानूनी स्थिति क्या होगी—यह प्रश्न केवल NSE तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव अन्य विनियमित और सार्वजनिक महत्व वाले क्षेत्रों में कार्यरत संस्थाओं से जुड़े मामलों की कानूनी बहस पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, इस मामले में अंतिम निर्णय अभी ट्रायल के स्तर पर होना बाकी है। इसलिए वर्तमान स्थिति को आरोप, कानूनी विवाद और न्यायिक परीक्षण के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि दोषसिद्धि के रूप में।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने NSE की पूर्व MD और CEO चित्रा रामकृष्ण की उस चुनौती में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत खुद को ‘public servant’ मानने और उनके खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई को चुनौती दी थी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने जुलाई 2026 में कहा था कि NSE सार्वजनिक महत्व का कार्य करता है और चित्रा रामकृष्ण के पद तथा उनके कथित कार्यों से जुड़े कई सवालों का अंतिम निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल में किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप न किए जाने के बाद अब मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। ‘पब्लिक सर्वेंट’ की कानूनी स्थिति, NSE की सार्वजनिक भूमिका और चित्रा रामकृष्ण द्वारा लिए गए कथित निर्णयों के संबंध में अंतिम निष्कर्ष ट्रायल कोर्ट द्वारा कानून और साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाने हैं।

महत्वपूर्ण बात: अभी तक उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोपों को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों में भी अंतिम तथ्यात्मक निर्धारण के लिए ट्रायल की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है।