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70 हजार रुपये की रिश्वत मांगने वाले रेलवे अधिकारी को चार साल की सजा, 35 हजार रुपये लेते रंगे हाथ पकड़ा गया था

70 हजार रुपये की रिश्वत मांगने वाले रेलवे अधिकारी को चार साल की सजा, 35 हजार रुपये लेते रंगे हाथ पकड़ा गया था

         रिश्वतखोरी के एक मामले में सीबीआई न्यायालय, गाजियाबाद ने रेलवे के तत्कालीन वरिष्ठ अनुभाग अभियंता (विद्युत) सुख देव शर्मा को दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामला आगरा से जुड़ा है, जहां रेलवे के एक अधिकारी पर निजी कंपनी के पांच ट्रेलरों/वाहनों को रेलवे ट्रैक पार कराने की अनुमति देने के बदले 70 हजार रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।

सीबीआई की कार्रवाई के बाद सामने आए इस मामले में जांच एजेंसी ने आरोपी अधिकारी को रिश्वत की पहली किश्त के रूप में 35 हजार रुपये लेते हुए गिरफ्तार किया था। मामला वर्ष 2016 का है और करीब एक दशक तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।

अदालत का यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जहां सरकारी पद पर बैठे अधिकारी से किसी काम को कराने के लिए अवैध धन की मांग किए जाने के आरोप सामने आते हैं। इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि रेलवे ट्रैक पार कराने की अनुमति के लिए उससे रिश्वत मांगी जा रही थी। शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की और ट्रैप कार्रवाई को अंजाम दिया।

पांच वाहनों को रेलवे ट्रैक पार कराने के लिए मांगी गई थी रिश्वत

मामले के अनुसार, सुख देव शर्मा उस समय रेलवे के वरिष्ठ अनुभाग अभियंता (विद्युत), कर्षण वितरण (टीआरडी), मुख्यालय, वरिष्ठ मंडल विद्युत अभियंता कार्यालय, आगरा कैंट, आगरा में तैनात थे।

आरोप था कि मुंबई स्थित एक निजी कंपनी के पांच ट्रेलरों या वाहनों को रेल गेट पथौली, आगरा से रेलवे ट्रैक पार कराने की अनुमति देने के बदले शिकायतकर्ता से 70 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की गई थी।

रेलवे से जुड़े कार्यों में विभिन्न प्रकार की तकनीकी और प्रशासनिक अनुमति की आवश्यकता होती है। आरोप के मुताबिक, इसी प्रक्रिया से जुड़े काम को आगे बढ़ाने के लिए आरोपी अधिकारी ने शिकायतकर्ता से अवैध रकम की मांग की।

शिकायतकर्ता ने मामले की जानकारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को दी। शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने आरोपों की प्रारंभिक जांच की और इसके बाद आरोपी अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया।

1 जनवरी 2016 को दर्ज हुआ था मामला

सीबीआई ने 1 जनवरी 2016 को सुख देव शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए शिकायतकर्ता से 70 हजार रुपये की रिश्वत मांगी।

मामले में यह भी आरोप था कि रिश्वत की पूरी रकम एक साथ न लेकर पहली किश्त के रूप में 35 हजार रुपये देने की बात हुई थी। शिकायत के आधार पर सीबीआई ने आरोपी को पकड़ने के लिए ट्रैप की योजना बनाई।

जांच एजेंसी की कार्रवाई का उद्देश्य यह पता लगाना था कि आरोपी वास्तव में रिश्वत की मांग कर रहा है या नहीं और यदि मांग की पुष्टि होती है तो उसे रिश्वत स्वीकार करते समय पकड़ा जा सके।

35 हजार रुपये लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया

सीबीआई ने 1 जनवरी 2016 को ही ट्रैप कार्रवाई की। आरोप के अनुसार, इस दौरान आरोपी सुख देव शर्मा ने शिकायतकर्ता से वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त 35 हजार रुपये की रिश्वत की पहली किश्त की मांग की और उसे स्वीकार किया।

रिश्वत की रकम स्वीकार किए जाने के बाद सीबीआई की टीम ने आरोपी को पकड़ लिया। इस कार्रवाई के बाद मामले की विस्तृत जांच शुरू की गई।

ट्रैप कार्रवाई भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसियों द्वारा अपनाई जाने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। शिकायतकर्ता की ओर से रिश्वत की मांग की शिकायत मिलने के बाद एजेंसी साक्ष्यों को सुरक्षित करने और आरोपी को कथित तौर पर रिश्वत स्वीकार करते हुए पकड़ने की कार्रवाई करती है।

इस मामले में भी सीबीआई ने शिकायत के आधार पर ट्रैप कार्रवाई की और आरोपी अधिकारी को 35 हजार रुपये की रकम स्वीकार करते हुए गिरफ्तार किया।

गिरफ्तारी के बाद शुरू हुई विस्तृत जांच

ट्रैप कार्रवाई के बाद सीबीआई ने मामले से संबंधित दस्तावेजों, परिस्थितियों और आरोपों की जांच की। जांच का मुख्य बिंदु यह था कि क्या आरोपी अधिकारी ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए शिकायतकर्ता से रिश्वत की मांग की थी और क्या उसने वास्तव में रिश्वत की रकम स्वीकार की।

जांच के दौरान मामले से जुड़े दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों को एकत्र किया गया। सीबीआई ने अपनी जांच पूरी करने के बाद आरोपी के खिलाफ अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया।

आरोप-पत्र दाखिल होने के साथ ही मामला न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गया।

23 फरवरी 2016 को दाखिल हुआ आरोप-पत्र

सीबीआई ने जांच पूरी करने के बाद 23 फरवरी 2016 को आरोपी सुख देव शर्मा के विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया।

आरोप-पत्र में जांच एजेंसी ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों और जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों को अदालत के समक्ष रखा। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई।

21 मार्च 2016 को आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए। आरोप तय होने के बाद मामले में नियमित ट्रायल शुरू हुआ। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्य अदालत के सामने प्रस्तुत किए और मामले से जुड़े तथ्यों को साबित करने का प्रयास किया।

लगभग एक दशक बाद आया फैसला

यह मामला वर्ष 2016 में दर्ज हुआ था। उस समय ट्रैप कार्रवाई के जरिए आरोपी अधिकारी को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद जांच, आरोप-पत्र, आरोप तय होने और ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

अब 10 सितंबर 2026 को सीबीआई न्यायालय, गाजियाबाद ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए सुख देव शर्मा को दोषी ठहराया।

अदालत ने आरोपी को चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा उस पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

इस तरह शिकायत दर्ज होने से लेकर अदालत के फैसले तक इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया लगभग दस वर्षों तक चली।

अदालत के फैसले में रिश्वत मामले की पूरी प्रक्रिया सामने आई

मामले की घटनाक्रम को देखा जाए तो इसकी शुरुआत शिकायत से हुई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि रेलवे से जुड़े काम के लिए उससे 70 हजार रुपये की रिश्वत मांगी जा रही है।

इसके बाद सीबीआई ने मामला दर्ज किया और ट्रैप की कार्रवाई की। आरोप के अनुसार पहली किश्त के रूप में 35 हजार रुपये दिए जाने थे। सीबीआई ने कार्रवाई करते हुए आरोपी को कथित तौर पर रिश्वत स्वीकार करते हुए पकड़ लिया।

इसके बाद जांच पूरी की गई और 23 फरवरी 2016 को आरोप-पत्र दाखिल किया गया। 21 मार्च 2016 को आरोप तय किए गए। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 10 सितंबर 2026 को अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

सरकारी पद और रिश्वत का मामला

भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सरकारी पद पर बैठे अधिकारी की भूमिका विशेष महत्व रखती है। सरकारी कर्मचारी को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार करना होता है। यदि किसी काम को करने या कराने के बदले अवैध रकम की मांग किए जाने का आरोप सामने आता है, तो वह मामला जांच और न्यायिक परीक्षण के दायरे में आता है।

इस मामले में भी आरोप रेलवे के एक अधिकारी पर लगाया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार पांच वाहनों को रेलवे ट्रैक पार कराने की अनुमति के लिए रिश्वत की मांग की गई थी।

अदालत में विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों का परीक्षण किया गया। इसके बाद अदालत ने आरोपी को दोषी माना और सजा सुनाई।

70 हजार की मांग, पहली किश्त 35 हजार

इस मामले का एक प्रमुख पहलू रिश्वत की रकम है। शिकायत के अनुसार कुल 70 हजार रुपये की मांग की गई थी। पहली किश्त के रूप में 35 हजार रुपये दिए जाने थे।

सीबीआई की ट्रैप कार्रवाई इसी पहली किश्त को लेकर की गई थी। आरोपी के कथित तौर पर 35 हजार रुपये स्वीकार करने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

मामले में यह पहलू भी महत्वपूर्ण रहा कि शिकायतकर्ता ने पहले ही सीबीआई को रिश्वत की मांग के संबंध में जानकारी दी थी। इसके बाद जांच एजेंसी ने कार्रवाई की।

सीबीआई की कार्रवाई के बाद पहुंचा मामला अदालत तक

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो देश में भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामलों की जांच करता है। जब किसी केंद्रीय सरकारी विभाग या उससे संबंधित अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं और मामला सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो एजेंसी जांच कर सकती है।

इस मामले में भी सीबीआई ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया, ट्रैप कार्रवाई की, आरोपी को गिरफ्तार किया और जांच के बाद अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया।

अदालत में किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है। इस मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद सीबीआई न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार दिया।

फैसले के बाद चार साल की सजा

10 सितंबर 2026 को सुनाए गए फैसले में सीबीआई न्यायालय, गाजियाबाद ने सुख देव शर्मा को दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें चार वर्ष के कारावास की सजा दी और 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।

मामले की शुरुआत 1 जनवरी 2016 को दर्ज एफआईआर से हुई थी। उसी दिन सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई करते हुए आरोपी को 35 हजार रुपये की कथित रिश्वत स्वीकार करते हुए गिरफ्तार किया था।

इसके बाद 23 फरवरी 2016 को आरोप-पत्र दाखिल हुआ और 21 मार्च 2016 को आरोप तय किए गए। लंबे समय तक चले ट्रायल के बाद अदालत ने अब अपना फैसला सुनाया है।

रिश्वत के मामलों में ट्रैप कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण होती है?

रिश्वत के मामलों में ट्रैप कार्रवाई जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाने का माध्यम होती है। जब कोई व्यक्ति सरकारी अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगे जाने की शिकायत करता है, तो जांच एजेंसी शिकायत की जांच करने के बाद आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकती है।

ट्रैप का उद्देश्य कथित रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने की घटना से संबंधित साक्ष्यों को अदालत के सामने रखना होता है। इसके बाद अदालत पूरे मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करती है।

सुख देव शर्मा के मामले में भी सीबीआई ने शिकायत मिलने के बाद ट्रैप कार्रवाई की थी। आरोप के अनुसार 35 हजार रुपये की पहली किश्त स्वीकार करते समय आरोपी को गिरफ्तार किया गया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का एक और मामला

सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों और न्यायालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। किसी सरकारी काम के लिए रिश्वत मांगने के आरोप की जांच कानून के अनुसार की जाती है और यदि अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित करने में सफल रहता है तो अदालत कानून के अनुसार सजा निर्धारित करती है।

सुख देव शर्मा से जुड़े इस मामले में भी शिकायत से शुरू हुई प्रक्रिया एफआईआर, ट्रैप कार्रवाई, गिरफ्तारी, जांच, आरोप-पत्र और ट्रायल से गुजरते हुए अदालत के फैसले तक पहुंची।

सीबीआई न्यायालय, गाजियाबाद के फैसले के अनुसार आरोपी को अब चार वर्ष के कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा भुगतनी होगी।

पूरे मामले की टाइमलाइन

1 जनवरी 2016: सीबीआई ने सुख देव शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज किया और ट्रैप कार्रवाई की।

1 जनवरी 2016: आरोपी को 35 हजार रुपये की कथित रिश्वत की पहली किश्त स्वीकार करते हुए पकड़ा गया।

23 फरवरी 2016: सीबीआई ने जांच पूरी करने के बाद अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया।

21 मार्च 2016: आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए।

10 सितंबर 2026: सीबीआई न्यायालय, गाजियाबाद ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कारावास और 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।

इस मामले में शिकायत से लेकर अंतिम फैसले तक करीब दस वर्ष का समय लगा। अदालत के फैसले ने यह स्पष्ट किया कि रिश्वत के आरोप में दर्ज मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर अदालत अंततः मामले का निर्णय करती है।