अनुकंपा नियुक्ति में 5% कोटा और Objective Test वैध, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; मृतक पुलिसकर्मियों के आश्रितों को क्यों देना होगा टेस्ट?
उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में सेवाकाल के दौरान जान गंवाने वाले कर्मचारियों के आश्रितों को मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पुलिस विभाग में अनुकंपा नियुक्ति के लिए निर्धारित 5 प्रतिशत की अधिकतम सीमा और जरूरत पड़ने पर अभ्यर्थियों से लिए जाने वाले Objective Type Test को वैध माना है। अदालत ने इन प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।
इस फैसले का सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है जो सेवाकाल में मृत पुलिसकर्मियों के आश्रित होने के आधार पर सरकारी नौकरी पाने के लिए आवेदन करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक पैदा हुई आर्थिक कठिनाई से राहत देना है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इस आधार पर सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिए सामान्य भर्ती प्रक्रिया और दूसरे अभ्यर्थियों के अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने की। कोर्ट के सामने अजय सिंह यादव सहित 25 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल कुल नौ याचिकाएं थीं। सभी याचिकाकर्ता सेवाकाल में मृत पुलिस कर्मचारियों के आश्रित थे और अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर रहे थे।
क्या था पूरा विवाद?
विवाद उत्तर प्रदेश उप-निरीक्षक एवं निरीक्षक (सिविल पुलिस) सेवा नियमावली, 2015 के नियम 5(1) में जोड़ी गई टिप्पणी से जुड़ा था। इस प्रावधान के तहत अनुकंपा नियुक्ति के लिए उपलब्ध अवसरों पर एक सीमा निर्धारित की गई है।
नियम के अनुसार, प्रत्येक वर्ष सीधी भर्ती के माध्यम से भरे जाने वाले पदों में से अधिकतम पांच प्रतिशत पद ही अनुकंपा नियुक्ति के आश्रित वर्ग के लिए रखे जा सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति इसी सीमा को लेकर थी। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति सेवाकाल में मृत पुलिस कर्मचारी का आश्रित है और वह अनुकंपा नियुक्ति की निर्धारित शर्तें पूरी करता है, तो केवल पांच प्रतिशत की सीमा के कारण उसकी नियुक्ति को रोका नहीं जाना चाहिए।
याचियों की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि वर्ष 1974 की उत्तर प्रदेश सेवाकाल में मृत सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली में ऐसी पांच प्रतिशत सीमा का प्रावधान नहीं था। इसलिए बाद में लाई गई यह सीमा अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य को प्रभावित करती है।
Objective Test को लेकर भी उठे सवाल
मामले में केवल पांच प्रतिशत कोटा ही विवाद का विषय नहीं था। याचिकाकर्ताओं ने Objective Type Test की शर्त पर भी सवाल उठाया।
नियमों के अनुसार यदि अनुकंपा नियुक्ति की आश्रित श्रेणी में आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक हो जाती है, तो अभ्यर्थियों के चयन के लिए Objective Type Test कराया जा सकता है।
इसके अलावा, अभ्यर्थी को इस टेस्ट में शामिल होने का केवल एक अवसर मिलता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य सरकारी भर्ती से अलग व्यवस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से बचाना है। ऐसे में प्रतियोगी परीक्षा या Objective Test जैसी शर्त लगाना अनुकंपा नियुक्ति के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
याचियों की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि जब कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, तब आश्रित को प्रतियोगिता में उतारना और उसके लिए परीक्षा की शर्त रखना किस हद तक उचित है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और संबंधित प्रावधानों को वैध माना।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में पूर्व के अंकुर गौतम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में अदालत पहले ही इस तरह की सीमा की वैधता पर विचार कर चुकी थी।
अदालत ने माना था कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए पदों की संख्या पर सीमा लगाना अपने आप में मनमाना या भेदभावपूर्ण नहीं है। इसके पीछे एक तार्किक आधार है।
सरकारी सेवाओं में बड़ी संख्या में पद होते हैं और उन पदों पर नियुक्ति का सामान्य तरीका खुली प्रतियोगिता और निर्धारित भर्ती प्रक्रिया है। यदि बड़ी संख्या में पद केवल अनुकंपा नियुक्ति के माध्यम से भर दिए जाएं, तो उन अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं जो सामान्य भर्ती प्रक्रिया के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करना चाहते हैं।
यही संतुलन बनाए रखने के लिए पांच प्रतिशत की सीमा को उचित माना गया।
अनुकंपा नियुक्ति कोई सामान्य भर्ती नहीं, लेकिन असीमित अधिकार भी नहीं
अनुकंपा नियुक्ति की प्रकृति को समझना इस फैसले के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
सरकारी नौकरी में सामान्य रूप से नियुक्ति योग्यता, निर्धारित भर्ती प्रक्रिया और प्रतियोगिता के आधार पर होती है। लेकिन जब किसी सरकारी कर्मचारी की सेवाकाल में मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार के सामने अचानक आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
ऐसी असाधारण परिस्थिति में सरकार मृत कर्मचारी के आश्रित को कुछ शर्तों के अधीन नौकरी देने की व्यवस्था करती है। यही अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य है।
लेकिन अदालतों ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति को सरकारी नौकरी पाने का सामान्य या स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता।
इसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को संकट की स्थिति से उबारना है, न कि परिवार के किसी सदस्य को बिना किसी सीमा के सरकारी नौकरी प्रदान करना।
इसी वजह से सरकार अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्रता, उपलब्ध पदों, विभागीय नियमों और चयन की प्रक्रिया से जुड़ी शर्तें निर्धारित कर सकती है, बशर्ते वे संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरें।
पांच प्रतिशत सीमा क्यों जरूरी मानी गई?
कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल यह था कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए पांच प्रतिशत की सीमा क्या मनमानी है?
अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सरकारी पद सीमित होते हैं। यदि किसी विभाग में सभी रिक्तियों को अनुकंपा नियुक्ति से भरने की अनुमति दे दी जाए तो सामान्य भर्ती के लिए उपलब्ध पदों की संख्या कम हो सकती है।
इससे उन लाखों अभ्यर्थियों के अधिकार और अवसर प्रभावित हो सकते हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से सरकारी सेवा में प्रवेश करने की तैयारी करते हैं।
इसलिए अनुकंपा नियुक्ति और खुली भर्ती के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
पांच प्रतिशत की अधिकतम सीमा इसी संतुलन का एक माध्यम है। अदालत ने इसे ऐसा प्रतिबंध नहीं माना जिससे अनुकंपा नियुक्ति का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता हो।
ज्यादा आवेदन आने पर टेस्ट क्यों?
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू Objective Test है।
मान लीजिए किसी वर्ष अनुकंपा नियुक्ति के लिए उपलब्ध पदों की संख्या सीमित है, लेकिन पात्र आश्रितों के आवेदन उससे कहीं अधिक आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में विभाग के सामने यह सवाल खड़ा होगा कि उपलब्ध पदों पर किसे नियुक्त किया जाए।
यदि चयन का कोई पारदर्शी आधार नहीं होगा तो विवाद की संभावना बढ़ सकती है।
यही कारण है कि नियमों में Objective Type Test का प्रावधान किया गया है।
हाई कोर्ट ने माना कि यदि आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक है तो किसी वस्तुनिष्ठ चयन प्रक्रिया के जरिए उम्मीदवारों का चयन करना अपने आप में अनुचित नहीं कहा जा सकता।
इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी है। चयन प्रक्रिया जितनी स्पष्ट और मापने योग्य होगी, मनमानी, पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोपों की संभावना उतनी ही कम होगी।
क्या Objective Test अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य के खिलाफ है?
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलील यही थी कि अनुकंपा नियुक्ति आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार को सहायता देने के लिए होती है। ऐसे में अभ्यर्थी को टेस्ट में बैठाना इस व्यवस्था की भावना के विपरीत है।
लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया।
यह समझना जरूरी है कि Objective Test हर स्थिति में अनुकंपा नियुक्ति को सामान्य प्रतियोगी भर्ती में बदलने के लिए नहीं है। यह स्थिति उस समय सामने आती है जब आश्रित श्रेणी में आवेदन उपलब्ध पदों से अधिक हो जाते हैं।
ऐसी स्थिति में विभाग को सीमित पदों के लिए पात्र अभ्यर्थियों के बीच चयन करना पड़ता है।
यदि बिना किसी चयन मानदंड के सभी आवेदकों को नियुक्त करना संभव नहीं है, तो एक वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया अपनाना तार्किक हो सकता है।
यही बात अदालत के फैसले में महत्वपूर्ण रही।
एक अभ्यर्थी को सिर्फ एक मौका क्यों?
नियमों में Objective Type Test के लिए अभ्यर्थी को केवल एक अवसर दिए जाने का प्रावधान भी चुनौती के दायरे में आया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से इसे कठोर बताया गया। उनका तर्क था कि किसी उम्मीदवार के भविष्य का फैसला केवल एक टेस्ट के आधार पर नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब वह अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर रहा हो।
लेकिन नियमों को समग्र रूप से देखते हुए अदालत ने इसमें ऐसा कोई असंवैधानिक तत्व नहीं पाया जिसके आधार पर पूरी व्यवस्था को रद्द किया जा सके।
सरकार द्वारा बनाई गई चयन प्रक्रिया में एक निश्चित नियम होना जरूरी है। यदि हर अभ्यर्थी को बार-बार अवसर दिया जाए तो चयन प्रक्रिया अनिश्चित हो सकती है और उपलब्ध पदों को भरने में भी देरी हो सकती है।
हालांकि किसी भी चयन प्रक्रिया की तरह यहां भी यह महत्वपूर्ण रहेगा कि टेस्ट नियमों के अनुरूप, पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से कराया जाए।
अनुच्छेद 14, 15, 16 और 309 का क्या संबंध है?
याचिकाकर्ताओं ने संबंधित प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 309 के विपरीत बताया था।
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की बात करता है। अनुच्छेद 15 कुछ आधारों पर भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में अवसर की समानता से संबंधित है।
दूसरी ओर, अनुच्छेद 309 सरकारी सेवाओं में नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित नियम बनाने की संवैधानिक शक्ति से जुड़ा है।
इस मामले में मूल सवाल यह था कि क्या सरकार अनुकंपा नियुक्ति के लिए ऐसी सीमा और चयन प्रक्रिया निर्धारित कर सकती है जो सामान्य भर्ती से अलग हो।
हाई कोर्ट ने संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक नहीं माना। अदालत के दृष्टिकोण में पांच प्रतिशत सीमा और जरूरत पड़ने पर Objective Test के पीछे एक तर्कसंगत आधार मौजूद है।
सामान्य अभ्यर्थियों के अधिकार भी महत्वपूर्ण
इस फैसले को केवल मृत पुलिसकर्मियों के आश्रितों के अधिकार के नजरिए से देखना अधूरा होगा।
सरकारी नौकरी पाने के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं। इसलिए सरकारी पदों के आवंटन में यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि सामान्य भर्ती के उम्मीदवारों के अवसर पूरी तरह खत्म न हो जाएं।
अनुकंपा नियुक्ति एक विशेष परिस्थिति में दी जाने वाली राहत है। इसका उद्देश्य सामान्य भर्ती व्यवस्था का स्थान लेना नहीं है।
यही वजह है कि अदालत ने पांच प्रतिशत सीमा को संतुलन बनाने वाला प्रावधान माना।
एक ओर मृत कर्मचारी के परिवार को राहत देने का उद्देश्य है, वहीं दूसरी ओर सरकारी नौकरियों में समान अवसर का संवैधानिक सिद्धांत भी है।
भाई-भतीजावाद के आरोपों से बचने में मददगार
कोर्ट ने Objective Test को लेकर एक और व्यावहारिक पहलू पर ध्यान दिया।
जब किसी सीमित संख्या में पदों के लिए पात्र उम्मीदवारों की संख्या अधिक हो जाती है तो यदि चयन के लिए स्पष्ट प्रक्रिया नहीं होगी, तो विभागीय अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लग सकते हैं।
कौन उम्मीदवार अधिक योग्य है, किसे पहले नियुक्त किया जाए और किस आधार पर किसी को मौका दिया जाए—इन सवालों को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।
Objective Test जैसी वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया इस तरह के विवादों को कम करने में मदद कर सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल टेस्ट होने से हर विवाद अपने आप समाप्त हो जाएगा। परीक्षा का आयोजन, प्रश्नों की प्रकृति, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।
फैसले का पुलिसकर्मियों के आश्रितों पर असर
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद सेवाकाल में मृत पुलिसकर्मियों के आश्रितों के लिए अनुकंपा नियुक्ति का दावा पहले की तरह संबंधित नियमों के अधीन रहेगा।
यदि उपलब्ध पद पांच प्रतिशत की सीमा के भीतर हैं और पात्र आवेदकों की संख्या निर्धारित रिक्तियों से अधिक नहीं है तो स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन जब आवेदन उपलब्ध पदों से अधिक होंगे, तब निर्धारित चयन प्रक्रिया और Objective Test महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इसलिए केवल यह तथ्य कि आवेदक मृत पुलिसकर्मी का आश्रित है, अपने आप में नियुक्ति का पूर्ण और असीमित अधिकार पैदा नहीं करता।
उसे लागू नियमों, पात्रता और उपलब्ध पदों की व्यवस्था का पालन करना होगा।
फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला सरकारी सेवाओं में अनुकंपा नियुक्ति और समान अवसर के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने एक तरफ मृत कर्मचारी के परिवार को मिलने वाली विशेष राहत की व्यवस्था को स्वीकार किया, तो दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट किया कि इस विशेष व्यवस्था की अपनी सीमाएं हो सकती हैं।
पांच प्रतिशत की सीमा का उद्देश्य सामान्य भर्ती के अवसरों की रक्षा करना है। वहीं Objective Test का उद्देश्य सीमित पदों के लिए अधिक संख्या में आने वाले आवेदकों के बीच एक वस्तुनिष्ठ चयन प्रक्रिया उपलब्ध कराना है।
इस तरह अदालत ने अनुकंपा नियुक्ति को न तो पूरी तरह सामान्य भर्ती के समान माना और न ही इसे ऐसा पूर्ण अधिकार माना जिसे किसी भी प्रशासनिक सीमा से बाहर रखा जा सके।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले का सार यही है कि अनुकंपा नियुक्ति एक विशेष राहत है, लेकिन यह असीमित सरकारी नौकरी का अधिकार नहीं है।
सेवाकाल में मृत पुलिसकर्मी के आश्रितों के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के तहत नियुक्ति का अवसर उपलब्ध रह सकता है, लेकिन पदों की संख्या सीमित हो सकती है। उत्तर प्रदेश उप-निरीक्षक एवं निरीक्षक (सिविल पुलिस) सेवा नियमावली, 2015 के तहत सीधी भर्ती से भरे जाने वाले पदों में अधिकतम पांच प्रतिशत पद अनुकंपा नियुक्ति के आश्रित वर्ग के लिए निर्धारित किए जाने को हाई कोर्ट ने वैध माना है।
इसी तरह, यदि पात्र आश्रितों के आवेदन उपलब्ध रिक्तियों से अधिक हो जाते हैं तो Objective Type Test के जरिए चयन करने की व्यवस्था को भी अदालत ने अनुचित नहीं माना।
फैसले का एक बड़ा संदेश यह है कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना जरूर है, लेकिन इस व्यवस्था को लागू करते समय सरकारी सेवा में समान अवसर और पारदर्शी चयन के सिद्धांतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यानी मृत कर्मचारी के आश्रितों के प्रति संवेदनशीलता और सरकारी नौकरियों में निष्पक्षता—दोनों के बीच संतुलन बनाना ही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कानूनी आवश्यकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने इस फैसले में इसी संतुलन को आधार बनाते हुए पांच प्रतिशत सीमा और जरूरत पड़ने पर Objective Test की व्यवस्था को बरकरार रखा है।