ब्रेकअप के बाद गर्लफ्रेंड से गिफ्ट के पैसे मांगने कोर्ट पहुंचे TCI Express CEO, अदालत ने कहा—प्यार में दिए उपहार वापस नहीं होते
रिश्तों में जब प्यार होता है तो लोग एक-दूसरे के लिए बहुत कुछ करते हैं। महंगे उपहार देना, विदेश यात्राओं पर खर्च करना या जरूरत के समय आर्थिक मदद करना भी कई रिश्तों में सामान्य बात मानी जाती है। लेकिन जब रिश्ता टूट जाता है, तो कभी-कभी यही खर्च विवाद का कारण बन जाते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला सिंगापुर की अदालत के सामने आया, जहां भारतीय मूल के एक कारोबारी ने अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड से रिश्ते के दौरान किए गए भारी-भरकम खर्च की रकम वापस मांगने की कोशिश की।
मामले में भारतीय लॉजिस्टिक्स कंपनी TCI Express के CEO और Managing Director चंद्र अग्रवाल ने अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड फेलिसिया ली के खिलाफ कानूनी दावा किया। उनका कहना था कि रिश्ते के दौरान उन्होंने फेलिसिया पर जो रकम खर्च की थी, उसमें कुछ रकम उपहार नहीं बल्कि कर्ज के रूप में दी गई थी। इसलिए ब्रेकअप के बाद उन्हें वह पैसा वापस मिलना चाहिए।
लेकिन अदालत ने उनके दावे को स्वीकार नहीं किया। सिंगापुर की अदालत ने माना कि उपलब्ध परिस्थितियों से यह साबित नहीं होता कि कथित रकम वास्तव में ऋण के रूप में दी गई थी। अदालत के अनुसार, रिश्ते के दौरान किए गए अनेक खर्च और दिए गए उपहार स्वेच्छा से किए गए थे। बाद में रिश्ता खत्म होने के कारण उन्हें कर्ज बताकर वापस मांगना उचित नहीं माना जा सकता।
सितंबर 2022 से दिसंबर 2023 तक चला रिश्ता
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार चंद्र अग्रवाल और फेलिसिया ली की मुलाकात वर्ष 2019 में हुई थी। हालांकि दोनों का रोमांटिक रिश्ता सितंबर 2022 में शुरू हुआ और दिसंबर 2023 तक चला।
रिश्ते के दौरान दोनों के बीच कई तरह के आर्थिक लेन-देन और खर्च हुए। चंद्र अग्रवाल की ओर से दावा किया गया कि उन्होंने फेलिसिया के लिए काफी बड़ी रकम खर्च की थी। बाद में जब दोनों के बीच संबंध खराब हुए और दिसंबर 2023 में रिश्ता समाप्त हो गया, तो इन खर्चों को लेकर विवाद शुरू हो गया।
मार्च 2024 में चंद्र अग्रवाल ने फेलिसिया के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दावा किया कि रिश्ते के दौरान दी गई कुछ रकम और सुविधाएं वास्तव में ऐसे भुगतान थे जिन्हें वापस किया जाना था।
यहीं से यह मामला एक निजी रिश्ते से निकलकर कानूनी विवाद में बदल गया।
महंगे ब्रांड के गिफ्ट भी विवाद का हिस्सा बने
मामले में महंगे ब्रांड के सामान का भी उल्लेख किया गया। रिपोर्टों के अनुसार, रिश्ते के दौरान फेलिसिया को Prada और Dior जैसे लक्जरी ब्रांड के सामान दिए गए थे।
चंद्र अग्रवाल का पक्ष यह था कि उन्होंने फेलिसिया पर काफी पैसा खर्च किया था और बाद में इस रकम की वापसी की मांग की। दूसरी ओर, फेलिसिया ने इन दावों का विरोध किया और कहा कि उन्हें दिए गए सामान या किए गए खर्च को कर्ज नहीं माना जा सकता।
अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही था कि क्या वास्तव में इन पैसों को ऋण के रूप में दिया गया था या फिर वे रिश्ते के दौरान स्वेच्छा से किए गए खर्च और उपहार थे।
क्रेडिट कार्ड से करीब 19 करोड़ रुपये खर्च करने का दावा
चंद्र अग्रवाल की ओर से अदालत में किए गए दावों में काफी बड़ी रकम का उल्लेख किया गया। उनके अनुसार, उन्होंने फेलिसिया को अपने American Express कार्ड का इस्तेमाल करने की सुविधा दी थी।
दावे के मुताबिक, कार्ड से करीब 19 करोड़ रुपये के खर्च हुए। इसके अलावा विदेश यात्राओं पर लगभग 12 करोड़ रुपये खर्च करने की बात भी सामने आई।
इसके साथ ही फेलिसिया के फ्लैट से संबंधित लगभग 16 लाख रुपये तथा Stanford-NUS Executive Program की फीस के रूप में करीब 28 लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया।
इन रकमों को लेकर चंद्र अग्रवाल का कहना था कि कम से कम कुछ भुगतान ऐसे थे जिन्हें बाद में वापस किया जाना था। लेकिन अदालत ने पूरे मामले को देखते हुए इन दावों को उस रूप में स्वीकार नहीं किया, जैसा कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश किया गया था।
दो और बड़ी रकम के दावे भी साबित नहीं हो सके
मामले में केवल उपहार और यात्राओं का खर्च ही विवाद का विषय नहीं था। चंद्र अग्रवाल ने दो अन्य बड़ी रकमों को लेकर भी दावा किया था।
उनका कहना था कि उन्होंने फेलिसिया को उसके पुराने नियोक्ता से जुड़े कर्ज को चुकाने के लिए पैसा उधार दिया था। इस दावे के समर्थन में एक हस्तलिखित समझौता भी अदालत के सामने पेश किया गया।
लेकिन फेलिसिया ने उस कथित समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। ऐसे में अदालत के सामने यह साबित करना महत्वपूर्ण था कि क्या वास्तव में दोनों के बीच ऐसा कोई वैध ऋण समझौता हुआ था।
अदालत को इस दावे के संबंध में पर्याप्त आधार नहीं मिला कि दोनों के बीच स्पष्ट रूप से ऐसा लेन-देन हुआ था, जिसे कानूनी तौर पर ऋण माना जा सके।
हस्तलिखित समझौते पर भी उठे सवाल
चंद्र अग्रवाल की ओर से पेश किया गया हस्तलिखित समझौता मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य था। लेकिन फेलिसिया ने कथित तौर पर इस दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर होने से ही इनकार कर दिया।
ऐसी स्थिति में केवल एक दस्तावेज अदालत में पेश कर देना पर्याप्त नहीं था। यह भी स्थापित करना जरूरी था कि दस्तावेज वास्तविक है, उसमें दर्ज शर्तों पर दोनों पक्ष सहमत थे और संबंधित रकम वास्तव में ऋण के रूप में दी गई थी।
अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की परिस्थितियों का मूल्यांकन किया। अंततः चंद्र अग्रवाल अपने दावे को उस स्तर तक साबित नहीं कर पाए, जिससे फेलिसिया पर रकम वापस करने की कानूनी जिम्मेदारी डाली जा सके।
‘जो चाहिए, ले लो’ वाली बात भी सामने आई
मामले की सुनवाई के दौरान American Express कार्ड के इस्तेमाल को लेकर भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।
अदालत को बताया गया कि चंद्र अग्रवाल ने फेलिसिया को अपने American Express कार्ड का एक्सेस दिया था। कथित तौर पर उन्होंने उसे कहा था कि उसे जो चाहिए, वह ले सकती है।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे अदालत के सामने यह सवाल आया कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी इच्छा से दूसरे व्यक्ति को खर्च करने की सुविधा दी है, तो बाद में क्या वह उन सभी खर्चों को ऋण बताकर वापस मांग सकता है?
मामले में यह भी बताया गया कि जब फेलिसिया ने कथित तौर पर खर्च की गई रकम वापस करने की बात पूछी, तो चंद्र की ओर से यह कहा गया था कि पैसे लौटाने की जरूरत नहीं है और वह कोई ‘money-lender’ नहीं हैं।
यदि किसी लेन-देन के समय वापसी की स्पष्ट शर्त नहीं थी, तो बाद में उसे ऋण के रूप में साबित करना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है। अदालत के सामने यही परिस्थिति इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बनी।
कोर्ट ने कहा—उपहार अपनी मर्जी से दिए गए थे
मामले की सुनवाई सीनियर जज ली सेउ कन ने की। लिखित फैसले में अदालत ने रिश्ते के दौरान किए गए खर्च और उपहारों की प्रकृति पर विचार किया।
अदालत के मुताबिक, चंद्र अग्रवाल ने कई उपहार अपनी इच्छा से दिए थे। उस समय दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उनके व्यवहार से यह संकेत मिलता था कि ये खर्च रिश्ते का हिस्सा थे, न कि भविष्य में वापस लिए जाने वाले ऋण।
यानी अदालत ने यह नहीं माना कि केवल रिश्ता खत्म हो जाने से पहले दिए गए महंगे उपहार स्वतः कर्ज बन जाते हैं।
यह फैसला निजी रिश्तों में आर्थिक लेन-देन को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने लाता है—क्या किसी व्यक्ति द्वारा प्रेम संबंध के दौरान स्वेच्छा से किया गया खर्च बाद में रिश्ता टूटने पर वापस मांगा जा सकता है?
इस मामले में अदालत का जवाब चंद्र अग्रवाल के पक्ष में नहीं रहा।
प्यार में खर्च किया पैसा और कानूनी कर्ज—दो अलग बातें
इस पूरे विवाद को समझने के लिए उपहार और ऋण के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने साथी को मोबाइल, कपड़े, आभूषण, यात्रा या अन्य महंगी वस्तुएं देता है, तो सामान्य परिस्थितियों में उसे उपहार माना जा सकता है। वहीं यदि कोई रकम इस स्पष्ट समझ के साथ दी जाती है कि उसे निश्चित समय या शर्त के अनुसार वापस करना होगा, तो वह ऋण का स्वरूप ले सकती है।
कानूनी विवाद में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होता कि पैसा मैंने दिया था। यह भी साबित करना पड़ता है कि पैसा किस उद्देश्य से दिया गया था और क्या उसे वापस करने की बाध्यता थी।
चंद्र अग्रवाल के मामले में अदालत को यही अंतर महत्वपूर्ण लगा। रिश्ते के दौरान किए गए खर्चों को बाद में केवल ब्रेकअप के आधार पर कर्ज मानना अदालत को उचित नहीं लगा।
रिश्ते के दौरान दूसरे संबंधों का भी उल्लेख
अदालत के सामने रिश्ते की निजी परिस्थितियों से जुड़ी कुछ अन्य बातें भी आईं। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने यह पाया कि फेलिसिया के साथ संबंध में रहने के दौरान चंद्र अग्रवाल के अन्य महिलाओं के साथ भी शारीरिक संबंध थे।
यह तथ्य सीधे तौर पर उपहारों की कानूनी प्रकृति तय करने वाला अकेला आधार नहीं था, लेकिन इससे रिश्ते की समग्र परिस्थितियों पर अदालत के सामने तस्वीर स्पष्ट हुई।
जज ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि रिश्ते के दौरान चंद्र अग्रवाल फेलिसिया के प्रति काफी आकर्षित थे और उस समय उन्होंने अपनी इच्छा से उसके लिए खर्च किया था। बाद में रिश्ता टूटने के बाद परिस्थितियां बदल गईं और उन्हीं खर्चों को लेकर विवाद अदालत तक पहुंच गया।
ब्रेकअप के बाद बदला खर्चों को देखने का नजरिया
इस मामले की सबसे दिलचस्प बात यही है कि रिश्ते के दौरान जो खर्च सामान्य और स्वैच्छिक दिखाई दे रहे थे, वही ब्रेकअप के बाद कानूनी विवाद का आधार बन गए।
किसी रिश्ते में रहते हुए महंगा उपहार देना या साथी के लिए यात्रा, शिक्षा अथवा दूसरी जरूरतों पर खर्च करना एक निजी निर्णय हो सकता है। लेकिन जब दोनों के बीच संबंध समाप्त हो जाएं, तो पुरानी आर्थिक मदद को अलग नजरिए से देखने की स्थिति पैदा हो सकती है।
अदालत ने हालांकि भावनात्मक पहलू के बजाय कानूनी साक्ष्यों पर ध्यान दिया। सवाल यह नहीं था कि किसका दिल टूटा या रिश्ता क्यों खत्म हुआ। मुख्य सवाल यह था कि क्या फेलिसिया पर उन पैसों को वापस करने की कानूनी जिम्मेदारी थी।
अदालत को इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला।
CEO को नहीं मिली कानूनी सफलता
अंततः चंद्र अग्रवाल की याचिका खारिज हो गई और वह अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड से कथित खर्च की रकम की वसूली नहीं कर सके।
इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी रिश्ते के दौरान किए गए हर खर्च को बाद में ऋण नहीं माना जा सकता। यदि पैसा वास्तव में उधार दिया गया है, तो उसके लिए स्पष्ट समझौता, भुगतान का उद्देश्य, वापसी की शर्त और अन्य विश्वसनीय साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
दूसरी ओर, यदि पैसा या सामान किसी व्यक्ति ने अपनी इच्छा से उपहार के तौर पर दिया है, तो बाद में केवल रिश्ता समाप्त होने के कारण उसकी कीमत वापस मांगना कानूनी रूप से आसान नहीं होता।
इस मामले से आम लोगों के लिए क्या सीख मिलती है?
यह मामला केवल एक हाई-प्रोफाइल ब्रेकअप की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक व्यावहारिक कानूनी सबक भी छिपा है।
रिश्तों में बड़ी रकम का लेन-देन करते समय यह स्पष्ट होना चाहिए कि पैसा Gift है या Loan। यदि पैसा उधार दिया जा रहा है, तो लिखित दस्तावेज, बैंक ट्रांसफर का स्पष्ट विवरण और repayment terms जैसे साक्ष्य भविष्य में विवाद होने पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
वहीं किसी को महंगे उपहार देने के बाद रिश्ता खराब होने पर यह मान लेना कि उसकी पूरी कीमत वापस मिल जाएगी, सही कानूनी धारणा नहीं है।
चंद्र अग्रवाल और फेलिसिया ली का मामला इसी अंतर को सामने लाता है। रिश्ते के दौरान स्वेच्छा से किया गया खर्च और कानूनी रूप से वसूल किया जा सकने वाला ऋण एक ही चीज नहीं हैं।
ब्रेकअप के बाद मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन अदालत ने अंततः रिश्ते के दौरान दिए गए उपहारों और खर्चों को उस तरह का ऋण नहीं माना, जिसकी वापसी का आदेश दिया जा सके। इस तरह करोड़ों रुपये के खर्च का दावा करने वाले CEO को अदालत से राहत नहीं मिली और मामला उनके पक्ष में समाप्त नहीं हुआ।