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लापता बच्चों से लेकर अवैध गोद लेने तक: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच देश में बढ़ी चिंता, जानिए क्या है पूरा मामला

लापता बच्चों से लेकर अवैध गोद लेने तक: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच देश में बढ़ी चिंता, जानिए क्या है पूरा मामला

हर दिन सैकड़ों बच्चों के लापता होने के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब; CARA ने पुलिस, अस्पताल और बाल संरक्षण से जुड़े अधिकारियों को किया जागरूक

       देश में बच्चों के लापता होने और उनके बाद मानव तस्करी, यौन शोषण, जबरन मजदूरी तथा अवैध तरीके से गोद दिए जाने की आशंकाओं ने एक बार फिर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। बच्चों की सुरक्षा से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार तथा सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

इसी बीच महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) ने भी अवैध गोद लेने की घटनाओं को रोकने और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से जागरूकता कार्यशाला आयोजित की। दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में पुलिस, अस्पताल, स्वास्थ्य विभाग, बाल कल्याण समितियों और आंगनवाड़ी व्यवस्था से जुड़े करीब 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

इस पूरे घटनाक्रम ने बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अहम सवाल सामने खड़े कर दिए हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चे लापता क्यों हो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि उनके लापता होने के बाद सरकारी तंत्र कितनी तेजी से सक्रिय होता है। शिकायत दर्ज करने में देरी, अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय की कमी और बच्चों की पहचान व तलाश की प्रक्रिया में होने वाली लापरवाही कई बार स्थिति को और गंभीर बना सकती है।

हर दिन औसतन 269 बच्चों के लापता होने का आंकड़ा

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश में इस वर्ष 98,375 बच्चे लापता हुए। इस आंकड़े को प्रतिदिन के औसत में देखें तो लगभग 269 बच्चे हर दिन लापता हुए।

यह आंकड़ा अपने आप में बेहद गंभीर है। इनमें 76.8 प्रतिशत लड़कियां थीं। इसी अवधि में बच्चों से जुड़े अपहरण के 96,079 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 76,761 बच्चे शामिल थे।

आंकड़ों को केवल संख्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रत्येक संख्या के पीछे एक बच्चा, एक परिवार और उससे जुड़ी उम्मीदें होती हैं। किसी बच्चे के अचानक गायब हो जाने के बाद परिवार जिस मानसिक परेशानी से गुजरता है, उसका अंदाजा केवल आंकड़ों से नहीं लगाया जा सकता।

माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि उनका बच्चा कहां है और वह सुरक्षित है या नहीं। इसी कारण बच्चों की गुमशुदगी की शिकायत मिलने के बाद शुरुआती समय में पुलिस और प्रशासन की सक्रियता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

बच्चे के लापता होने के बाद शुरुआती समय क्यों महत्वपूर्ण है?

किसी बच्चे के लापता होने के बाद शुरुआती घंटे जांच के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। समय बीतने के साथ बच्चा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। यदि उसके साथ कोई आपराधिक घटना हुई है तो अपराधी उसे छिपाने या दूसरे स्थान पर पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं।

यही वजह है कि बच्चों के लापता होने के मामलों में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी इसी चिंता को सामने रखा गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई बार बच्चों के गायब होने की शिकायत को तत्काल उस गंभीरता के साथ नहीं लिया जाता, जिस गंभीरता की जरूरत होती है। यदि शिकायत दर्ज करने और जांच शुरू करने में अनावश्यक देरी होती है तो बच्चे की तलाश मुश्किल हो सकती है।

गुमशुदगी की शिकायत और आपराधिक जांच का सवाल

बच्चे के लापता होने के बाद पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। याचिका में यह मुद्दा उठाया गया है कि कई मामलों में बच्चे के गायब होने की सूचना को केवल गुमशुदगी के रूप में दर्ज करने से जांच की गति प्रभावित हो सकती है।

हालांकि प्रत्येक गुमशुदगी के पीछे अपराध होना जरूरी नहीं है, लेकिन बच्चों के मामले में पुलिस को संभावित अपराध की आशंका को ध्यान में रखते हुए जांच करनी होती है।

बच्चा स्वयं अपनी सुरक्षा के लिए वयस्क की तरह निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। इसलिए जब कोई बच्चा अचानक घर, स्कूल या किसी अन्य स्थान से गायब होता है तो उसके साथ किसी आपराधिक घटना की संभावना को भी गंभीरता से देखना जरूरी होता है।

यही वह बिंदु है जहां पुलिस व्यवस्था की संवेदनशीलता और तत्परता सबसे अधिक मायने रखती है।

लापता बच्चे मानव तस्करी के खतरे में

बच्चों के गायब होने के बाद सबसे बड़ी चिंताओं में से एक मानव तस्करी है। अपराधी बच्चों को उनके परिवार और परिचित वातावरण से दूर ले जाकर अलग-अलग तरह के शोषण में धकेल सकते हैं।

मानव तस्करी का नेटवर्क कई बार एक स्थान तक सीमित नहीं रहता। बच्चे को एक शहर से दूसरे शहर या दूसरे राज्य तक ले जाया जा सकता है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होती है।

लापता बच्चों को यौन शोषण, जबरन मजदूरी और अन्य प्रकार के शोषण का भी खतरा हो सकता है। इसके अलावा कुछ मामलों में बच्चों को अवैध तरीके से दूसरे लोगों को सौंपने या गोद देने की कोशिश की जा सकती है।

यही कारण है कि लापता बच्चे का मामला केवल एक परिवार की गुमशुदगी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह बाल सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी चुनौती बन सकता है।

अवैध गोद लेने की समस्या क्या है?

बच्चे को गोद लेना कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित और उपयुक्त पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना है।

लेकिन जब किसी बच्चे को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से बाहर जाकर किसी व्यक्ति या परिवार को सौंप दिया जाता है तो कई गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

अवैध गोद लेने की स्थिति में बच्चे की वास्तविक पहचान, उसके जैविक माता-पिता, उसके अधिकार और भविष्य की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इससे यह भी पता लगाना कठिन हो सकता है कि बच्चा वास्तव में किस परिस्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति के पास पहुंचा।

सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब किसी लापता बच्चे को अवैध तरीके से किसी दूसरे परिवार को सौंपने की कोशिश की जाए। ऐसे मामलों में बच्चा एक आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा बन सकता है।

CARA की कार्यशाला में क्यों दिया गया जागरूकता पर जोर?

इसी गंभीर चुनौती को देखते हुए CARA ने दिल्ली में जागरूकता कार्यशाला आयोजित की। इसमें लगभग 200 प्रतिभागियों को शामिल किया गया।

कार्यशाला में पुलिस, अस्पतालों, स्वास्थ्य विभाग, बाल कल्याण समितियों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को शामिल करना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका कारण यह है कि बच्चे की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है।

कई बार किसी बच्चे से संबंधित महत्वपूर्ण सूचना सबसे पहले अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या बाल संरक्षण व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति को मिल सकती है।

यदि इन सभी संस्थाओं के बीच समय पर सूचना का आदान-प्रदान हो तो किसी लापता या संकट में फंसे बच्चे तक जल्दी पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।

अस्पतालों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

अवैध गोद लेने के मामलों में अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों की भूमिका पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। बच्चे के जन्म से संबंधित रिकॉर्ड, माता-पिता की पहचान और अन्य दस्तावेज महत्वपूर्ण होते हैं।

यदि किसी नवजात या बच्चे के संबंध में पहचान संबंधी दस्तावेजों में गड़बड़ी होती है या उसे संदिग्ध तरीके से किसी अन्य व्यक्ति के हवाले किया जाता है तो शुरुआती स्तर पर ही ऐसे मामलों की पहचान की जा सकती है।

इसलिए अस्पतालों के कर्मचारियों को भी यह समझना आवश्यक है कि संदिग्ध परिस्थितियों में बच्चे से संबंधित जानकारी को किस अधिकारी या संस्था तक पहुंचाया जाना चाहिए।

बाल कल्याण समितियों की जिम्मेदारी

बाल कल्याण समितियां भी बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जब कोई बच्चा परिवार से अलग मिलता है या संरक्षण की आवश्यकता में होता है तो उसकी स्थिति का आकलन करना और उसके सर्वोत्तम हित में निर्णय लेना जरूरी होता है।

बच्चे को किसी ऐसे व्यक्ति के हवाले कर देना जो उसके बारे में पर्याप्त जानकारी या कानूनी अधिकार साबित न कर सके, गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।

इसलिए बच्चों से जुड़े मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति बच्चे को अपने साथ रखने का दावा कर रहा है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि बच्चे की पहचान, पारिवारिक पृष्ठभूमि और कानूनी स्थिति स्पष्ट हो।

सुप्रीम कोर्ट में उठी व्यवस्था की कमियों की बात

बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर याचिका में पुलिस और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं।

याचिका में यह चिंता व्यक्त की गई है कि बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करने में देरी से जांच प्रभावित होती है। यदि शुरुआती स्तर पर ही प्रभावी कार्रवाई न हो तो बच्चे को खोजने में मुश्किल बढ़ सकती है।

अदालत द्वारा केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि मामला केवल किसी एक राज्य या एक घटना तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि देश में बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी व्यापक व्यवस्था पर ध्यान दिया जा रहा है।

अब संबंधित सरकारों और अधिकारियों की ओर से अदालत के समक्ष क्या जवाब दिया जाता है, यह आगे की न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगा।

बच्चों की सुरक्षा में तकनीक की भूमिका

आज के दौर में तकनीक बच्चों की तलाश में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लापता बच्चे की फोटो, पहचान और अन्य जरूरी जानकारी विभिन्न डिजिटल माध्यमों के जरिए संबंधित एजेंसियों तक तेजी से पहुंचाई जा सकती है।

रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, एयरपोर्ट और सार्वजनिक स्थानों पर लगे CCTV कैमरे भी जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब पुलिस और संबंधित एजेंसियां समय पर कार्रवाई करें।

यदि घटना की जानकारी ही देर से दर्ज होती है तो उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों का इस्तेमाल भी कठिन हो सकता है।

परिवारों को भी रहना होगा सतर्क

बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। परिवारों को भी अपने स्तर पर सावधानी बरतनी चाहिए।

माता-पिता को बच्चों को यह समझाना चाहिए कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ कहीं न जाएं और किसी भी असामान्य स्थिति में तुरंत परिवार या भरोसेमंद व्यक्ति को जानकारी दें।

छोटे बच्चों के लिए माता-पिता का मोबाइल नंबर, घर का पता और आपात स्थिति में संपर्क किए जाने वाले व्यक्ति की जानकारी याद करवाना उपयोगी हो सकता है।

बच्चे के स्कूल आने-जाने, ऑनलाइन गतिविधियों और नए लोगों से संपर्क को लेकर भी अभिभावकों को उम्र के अनुसार सतर्क रहना चाहिए।

ऑनलाइन दुनिया से भी जुड़ा है बाल सुरक्षा का खतरा

बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा अब केवल घर, स्कूल और सड़क तक सीमित नहीं है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऑनलाइन संपर्क भी एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।

अपरिचित लोग सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से बच्चों से संपर्क बनाने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में समझाना भी जरूरी है।

अभिभावकों को बच्चों के साथ ऐसा भरोसेमंद संबंध बनाना चाहिए कि यदि उन्हें ऑनलाइन कोई संदिग्ध संदेश या संपर्क मिले तो वे डरने के बजाय तुरंत परिवार को बता सकें।

कानून के साथ जागरूकता भी जरूरी

बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। कानून का प्रभाव तभी दिखाई देगा जब पुलिस, प्रशासन, अस्पताल, बाल कल्याण संस्थाएं और आम नागरिक अपनी भूमिका को समझें।

CARA की ओर से आयोजित जागरूकता कार्यशाला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा सकता है। इसमें अलग-अलग विभागों के लोगों को एक मंच पर लाने का उद्देश्य भी यही है कि बच्चे से जुड़े मामले को अलग-अलग विभागों की समस्या मानने के बजाय सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए।

एक बच्चे की तलाश में पूरा सिस्टम सक्रिय होना चाहिए

किसी बच्चे के लापता होने के बाद परिवार को थाने, अस्पताल, प्रशासन और अन्य कार्यालयों के चक्कर लगाने के बजाय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें संबंधित विभाग खुद आपस में समन्वय करके काम करें।

बच्चे की फोटो और पहचान संबंधी जानकारी तुरंत साझा हो, CCTV फुटेज की जांच हो, संभावित रास्तों और स्थानों पर तलाश की जाए तथा संदिग्ध गतिविधियों की जांच की जाए—ये सभी कदम समय पर उठाए जाना महत्वपूर्ण हो सकता है।

यदि किसी बच्चे के अवैध तरीके से दूसरे व्यक्ति के पास पहुंचने की आशंका हो तो बाल संरक्षण व्यवस्था को भी तत्काल सक्रिय किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से क्या उम्मीद?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्यों से जवाब मांगे जाने के बाद उम्मीद की जा रही है कि बच्चों के लापता होने से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्रवाई, शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार होगा।

अदालत के सामने सरकारों द्वारा रखी जाने वाली जानकारी से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि देश में लापता बच्चों को खोजने के लिए वर्तमान में कौन-कौन से तंत्र काम कर रहे हैं और उनमें कहां सुधार की जरूरत है।

यह मामला केवल कानूनी बहस का विषय नहीं है। इसके पीछे हजारों परिवारों की चिंता और बच्चों की सुरक्षा का सवाल जुड़ा हुआ है।

निष्कर्ष

देश में बच्चों के लापता होने के आंकड़े और उनसे जुड़े अपराधों की आशंकाएं निश्चित रूप से चिंता पैदा करने वाली हैं। वर्ष 2024 में 98,375 बच्चों के लापता होने का आंकड़ा बताता है कि समस्या कितनी बड़ी है। इनमें बड़ी संख्या लड़कियों की होना भी अलग चिंता का विषय है।

लापता बच्चों को समय पर खोजने में देरी होने पर मानव तस्करी, यौन शोषण, जबरन मजदूरी और अवैध गोद लेने जैसे अपराधों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में बच्चे के गायब होने की सूचना मिलते ही पुलिस और संबंधित एजेंसियों का सक्रिय होना बेहद जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किए जाने तथा CARA द्वारा पुलिस, अस्पताल, स्वास्थ्य विभाग और बाल संरक्षण से जुड़े लोगों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने से यह स्पष्ट है कि बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा गंभीरता से लिया जा रहा है।

लेकिन असली चुनौती जागरूकता से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने की है। किसी बच्चे के लापता होने की सूचना को सामान्य शिकायत मानकर टालने के बजाय हर मामले को संवेदनशीलता और तत्परता से देखना होगा।

एक बच्चा केवल एक परिवार का सदस्य नहीं है, बल्कि देश का भविष्य है। उसके अधिकार, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा करना सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, बाल संरक्षण संस्थाओं और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।

सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे के लापता होने के बाद समय बर्बाद न हो। जितनी जल्दी व्यवस्था सक्रिय होगी, बच्चे तक सुरक्षित पहुंचने और उसे संभावित अपराध से बचाने की संभावना उतनी ही मजबूत होगी। अवैध गोद लेने के खिलाफ कानून और जागरूकता दोनों जरूरी हैं, लेकिन इनसे भी ज्यादा जरूरी है ऐसा मजबूत तंत्र जिसमें किसी बच्चे की गुमशुदगी को छोटी घटना समझने की गुंजाइश न हो।