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गुंडा एक्ट निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया जिला बदर का आदेश

गुंडा एक्ट निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया जिला बदर का आदेश

दो पुराने मामलों और बीट सूचना के आधार पर बनाया गया था गुंडा, हाईकोर्ट ने कहा- दोषमुक्त व्यक्ति के खिलाफ उसी मुकदमे को आधार नहीं बनाया जा सकता

         इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि इस कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को परेशान करने या उनके उत्पीड़न के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि गुंडा एक्ट एक शक्तिशाली कानून है और इसका इस्तेमाल केवल ऐसे स्पष्ट मामलों में किया जाना चाहिए, जहां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए वास्तव में इसकी आवश्यकता हो।

अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों से यह संकेत मिलता है कि गुंडा एक्ट लागू करते समय आवश्यक सावधानी और विवेक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। न्यायालय ने गोंडा निवासी जाहिद अली को गुंडा घोषित करने और छह महीने के लिए जिले से निष्कासित करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही मामले में आयुक्त द्वारा पारित आदेश को भी अदालत ने रद्द कर दिया।

यह फैसला न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने सुनाया। अदालत ने मामले की परिस्थितियों और प्रशासन द्वारा कार्रवाई के लिए बनाए गए आधारों की जांच करते हुए पाया कि जिन तथ्यों के आधार पर जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई की गई, वे कानून की कसौटी पर पर्याप्त नहीं थे।

जिलाधिकारी ने धारा 3(1) के तहत की थी कार्रवाई

मामले में जिलाधिकारी ने 11 मई को उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 की धारा 3(1) के तहत कार्रवाई करते हुए जाहिद अली को गुंडा घोषित किया था। इसके साथ ही उन्हें छह माह के लिए जिले से निष्कासित करने का आदेश भी दिया गया था।

प्रशासन की कार्रवाई के पीछे मुख्य रूप से दो आपराधिक मामलों और एक पुलिस बीट सूचना रिपोर्ट का उल्लेख किया गया था। प्रशासन की ओर से इन तथ्यों को जाहिद अली के आपराधिक आचरण के समर्थन में प्रस्तुत किया गया।

जाहिद अली ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका पक्ष था कि प्रशासन ने जिन मामलों को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया है, उनमें से एक मामले में उन्हें पहले ही अदालत से दोषमुक्त किया जा चुका है। दूसरे मामले और गुंडा एक्ट की कार्रवाई के बीच भी काफी लंबा अंतराल है। इसके अलावा पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट को भी उनके खिलाफ कार्रवाई का वैध और पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान प्रशासन द्वारा रखे गए रिकॉर्ड और कार्रवाई के आधारों की बारीकी से जांच की।

2010 का मुकदमा पहले ही हो चुका था खत्म

अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य वर्ष 2010 में दर्ज मुकदमे को लेकर सामने आया। प्रशासन ने इस मुकदमे को भी जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई के आधारों में शामिल किया था।

लेकिन न्यायालय ने पाया कि इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गोंडा ने वर्ष 2017 में ही जाहिद अली को बरी कर दिया था।

यानी जिस आपराधिक मामले को प्रशासन ने जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई में आधार बनाया, उसमें संबंधित व्यक्ति को कई वर्ष पहले ही न्यायालय से दोषमुक्त किया जा चुका था।

हाईकोर्ट ने इसी बिंदु पर प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले में अदालत दोषमुक्त कर चुकी हो, उसी मुकदमे को बाद में उसके खिलाफ इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, मानो वह अपराध उसके आपराधिक चरित्र का प्रमाण हो।

यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक आरोप लगना और किसी अपराध में न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया जाना दोनों अलग-अलग बातें हैं।

बरी होने के बाद उसी मुकदमे को आधार बनाना उचित नहीं

आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जब तक आरोप न्यायालय में साबित न हो जाए, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जाता। यदि अदालत किसी आरोपी को बरी कर देती है तो उस मुकदमे के आधार पर उसके आपराधिक चरित्र को स्थापित करने का प्रयास गंभीर कानूनी प्रश्न खड़ा कर सकता है।

हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए कहा कि 2010 के मामले में जाहिद अली को 2017 में ही बरी किया जा चुका था। इसलिए उस मुकदमे को गुंडा एक्ट की कार्रवाई का आधार बनाना उचित नहीं था।

अदालत की इस टिप्पणी से प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश जाता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ निरोधात्मक या प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करते समय रिकॉर्ड में मौजूद पुराने मुकदमों को केवल संख्या बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि उन मामलों का अंतिम परिणाम क्या हुआ और उनका वर्तमान कार्रवाई से वास्तविक संबंध है या नहीं।

2020 के मुकदमे और 2026 की कार्रवाई के बीच छह साल का अंतर

प्रशासन द्वारा जाहिद अली के खिलाफ दूसरा आधार वर्ष 2020 का आपराधिक मामला था। हाईकोर्ट ने इस मामले पर भी विचार किया।

न्यायालय ने ध्यान दिया कि 2020 के मामले और वर्ष 2026 में जाहिद अली को गुंडा घोषित करने की कार्रवाई के बीच लगभग छह वर्ष का अंतर था।

अदालत के अनुसार इतने लंबे अंतराल के बाद केवल उस पुराने मामले के आधार पर किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी मानने के लिए आवश्यक तर्कसंगत संबंध स्थापित नहीं होता।

यहां अदालत ने केवल मुकदमे की मौजूदगी को पर्याप्त नहीं माना, बल्कि उसके समय और वर्तमान कार्रवाई के बीच संबंध को भी महत्वपूर्ण माना।

गुंडा एक्ट जैसी कार्रवाई किसी व्यक्ति की स्वतंत्र आवाजाही और सामान्य जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। इसलिए प्रशासन को यह दिखाना होता है कि संबंधित व्यक्ति का वर्तमान आचरण सार्वजनिक व्यवस्था के लिए वास्तविक खतरा पैदा कर रहा है और कानून के तहत कार्रवाई आवश्यक है।

सिर्फ वर्षों पुराने एक मामले का उल्लेख कर देने से यह निष्कर्ष स्वतः नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आदतन अपराधी है।

एक मुकदमा किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं बनाता

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि महज वर्ष 2020 के एक आपराधिक मामले में संलिप्तता के आधार पर किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता।

‘आदतन अपराधी’ यानी habitual offender की अवधारणा का संबंध किसी व्यक्ति के लगातार और बार-बार आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहने से है। केवल एक घटना या एक मुकदमे के आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना कानून की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

इसलिए जब प्रशासन किसी व्यक्ति के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई करता है तो उसे उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह स्पष्ट करना होता है कि संबंधित व्यक्ति का आचरण वास्तव में उस स्तर का है, जिसके कारण सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

अदालत ने इसी कसौटी पर प्रशासन की कार्रवाई को परखा और पाया कि जाहिद अली के मामले में आवश्यक आधार पर्याप्त नहीं थे।

बीट सूचना रिपोर्ट को भी पर्याप्त आधार नहीं माना

मामले में पुलिस की ओर से तैयार की गई बीट सूचना रिपोर्ट भी प्रशासन की कार्रवाई का एक आधार थी। हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट को भी पर्याप्त नहीं माना।

अदालत ने पाया कि बीट सूचना के आधार पर जाहिद अली के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था। इतना ही नहीं, उस सूचना के संबंध में उन्हें सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया था।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी रिपोर्ट को आधार बनाकर किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

यहां प्राकृतिक न्याय का मूल अर्थ यही है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कोई गंभीर कार्रवाई की जा रही है, उसे आरोप या सामग्री की जानकारी देकर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाए।

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?

प्राकृतिक न्याय प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ निर्णय मनमाने ढंग से न लिया जाए।

सामान्य तौर पर इसके दो महत्वपूर्ण पहलू माने जाते हैं। पहला, किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों या सामग्री के संबंध में उचित जानकारी मिले। दूसरा, उसे अपना पक्ष रखने और संबंधित सामग्री का जवाब देने का अवसर मिले।

गुंडा एक्ट के मामलों में यह सिद्धांत और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि किसी व्यक्ति को जिला बदर करने का आदेश उसके सामान्य जीवन, परिवार, रोजगार और आवागमन पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।

इसलिए केवल किसी पुलिस रिपोर्ट या अप्रमाणित सूचना को आधार बनाकर कठोर कार्रवाई करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।

आयुक्त के आदेश पर भी उठे सवाल

जिलाधिकारी के आदेश के खिलाफ आगे की प्रक्रिया में मामला आयुक्त के समक्ष भी गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि आयुक्त के आदेश में भी उसी दोषमुक्त मुकदमे को लंबित मामलों की तरह शामिल किया गया था।

अदालत ने इसे विवेक के अभाव का उदाहरण माना।

न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह रिकॉर्ड में उपलब्ध प्रत्येक तथ्य की स्वतंत्र रूप से जांच करे। यदि किसी मामले का अंतिम परिणाम पहले ही सामने आ चुका है और आरोपी उसमें बरी हो चुका है, तो उसे लंबित मुकदमे की तरह दिखाना निर्णय प्रक्रिया की गंभीर कमजोरी हो सकती है।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर आयुक्त के आदेश को भी कायम नहीं रखा।

गुंडा एक्ट शक्तिशाली कानून, इस्तेमाल में सावधानी जरूरी

हाईकोर्ट ने गुंडा एक्ट की प्रकृति को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह एक शक्तिशाली कानून है और इसका इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए।

ऐसे कानूनों का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखना और समाज में गंभीर रूप से अशांति पैदा करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कर दिया जाए जिसके विरुद्ध पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री मौजूद न हो।

अदालत ने संकेत दिया कि इस प्रकार के मामलों से यह पता चलता है कि कानून लागू करने में आवश्यक सतर्कता नहीं बरती जा रही है।

यह टिप्पणी प्रशासनिक अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निरोधात्मक कानूनों में अधिकारों का इस्तेमाल करते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होता है।

जिला बदर की कार्रवाई का व्यक्ति पर गंभीर असर

किसी व्यक्ति को छह महीने के लिए जिले से बाहर करने का आदेश सामान्य प्रशासनिक आदेश नहीं होता। इसका सीधा प्रभाव संबंधित व्यक्ति के दैनिक जीवन पर पड़ सकता है।

यदि व्यक्ति का घर, परिवार, रोजगार, व्यवसाय या सामाजिक जीवन उसी जिले में है तो जिला बदर का आदेश उसके लिए गंभीर परेशानी पैदा कर सकता है।

इसी कारण ऐसे आदेशों को कानून के अनुरूप ठोस आधार पर ही पारित किया जाना आवश्यक है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होता है कि कार्रवाई क्यों जरूरी है और संबंधित व्यक्ति की मौजूदगी से सार्वजनिक व्यवस्था को किस प्रकार खतरा है।

जाहिद अली के मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि प्रशासन द्वारा इस्तेमाल किए गए आधार इस कठोर कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

हाईकोर्ट ने दोनों आदेश निरस्त किए

मामले के समग्र तथ्यों को देखते हुए न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने जाहिद अली को गुंडा घोषित करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त कर दिया।

इसके साथ ही छह महीने के लिए जिले से निष्कासन का आदेश भी समाप्त हो गया। आयुक्त द्वारा पारित आदेश को भी हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।

इस तरह याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट से राहत मिली और प्रशासन द्वारा की गई गुंडा एक्ट की कार्रवाई न्यायिक जांच में टिक नहीं सकी।

फैसले से प्रशासन को क्या संदेश?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई करते समय केवल पुराने मुकदमों की सूची तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है।

प्रशासन को यह देखना होगा कि—

  • संबंधित मुकदमे का अंतिम परिणाम क्या हुआ;
  • क्या आरोपी उस मामले में दोषी साबित हुआ या बरी हो गया;
  • पुराने मामले और वर्तमान कार्रवाई के बीच कितना अंतर है;
  • क्या वर्तमान समय में व्यक्ति की गतिविधियां वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं;
  • पुलिस की रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय और प्रमाणित है;
  • और क्या संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया गया है।

यदि इन बुनियादी पहलुओं की अनदेखी की जाती है तो प्रशासनिक आदेश न्यायिक समीक्षा में निरस्त हो सकता है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का यह फैसला गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देता है। अदालत ने साफ किया है कि कठोर कानून का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति के खिलाफ पुराने आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड उपलब्ध है।

जाहिद अली के मामले में वर्ष 2010 के मुकदमे में उन्हें 2017 में ही बरी किया जा चुका था। इसके बावजूद उस मुकदमे को गुंडा एक्ट की कार्रवाई के आधार में शामिल किया गया। वहीं वर्ष 2020 के मामले और वर्ष 2026 में की गई कार्रवाई के बीच करीब छह वर्ष का अंतर था। अदालत को दोनों के बीच ऐसा तर्कसंगत संबंध नहीं मिला, जिससे याचिकाकर्ता को आदतन अपराधी माना जा सके।

पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट को भी अदालत ने पर्याप्त आधार नहीं माना, क्योंकि उस सूचना पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था और जाहिद अली को उस सामग्री के संबंध में प्रभावी सुनवाई का अवसर भी नहीं मिला था।

हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए जिलाधिकारी और आयुक्त के आदेश निरस्त कर दिए। साथ ही अदालत ने गुंडा एक्ट जैसे शक्तिशाली कानून के इस्तेमाल में आवश्यक सावधानी बरतने पर जोर दिया।

फैसले का व्यापक संदेश यही है कि सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिए कानून का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन कानून की शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाली कार्रवाई ठोस तथ्यों, प्रासंगिक साक्ष्यों और निष्पक्ष प्रक्रिया पर आधारित होनी चाहिए। केवल पुराने या समाप्त हो चुके मुकदमों तथा अप्रमाणित पुलिस सूचनाओं के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा घोषित करना कानून के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।

न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी एक स्पष्ट स्मरण है कि गुंडा एक्ट अपराध नियंत्रण का साधन है, निर्दोष नागरिकों के उत्पीड़न का हथियार नहीं।