महिला से गाली-गलौज, मारपीट और अपमान के मामले में दोषी को 2 साल की सजा, विशेष एससी/एसटी अदालत ने लगाया ₹5 हजार का जुर्माना
उरई में विशेष एससी/एसटी न्यायालय का फैसला, वर्ष 2023 में दर्ज हुआ था मुकदमा; गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को ठहराया गया दोषी
उरई। कोंच कोतवाली क्षेत्र के बिरगुवां बुजुर्ग गांव में महिला के साथ गाली-गलौज, मारपीट और अपमानित करने के मामले में विशेष एससी/एसटी न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने मामले में अभियुक्त भूपेंद्र कुमार दुबे को दोषी करार देते हुए दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने उस पर पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
यह मामला वर्ष 2023 का है, जब बिरगुवां बुजुर्ग गांव निवासी महिला सुमित्रा ने पुलिस को तहरीर देकर गांव के ही भूपेंद्र कुमार दुबे पर गाली-गलौज करने, मारपीट करने और अपमानित करने के आरोप लगाए थे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।
मामले की विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया। इसके बाद अदालत में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से वादी समेत अन्य गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद विशेष न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी माना और सजा सुनाई।
वर्ष 2023 में पुलिस को दी गई थी तहरीर
मामले की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई थी। बिरगुवां बुजुर्ग गांव की रहने वाली सुमित्रा ने कोंच कोतवाली पुलिस को तहरीर देकर आरोप लगाया था कि गांव के निवासी भूपेंद्र कुमार दुबे ने उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की तथा उन्हें अपमानित किया।
ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी विवाद कई बार मामूली कहासुनी से शुरू होकर गंभीर रूप ले लेते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के साथ जातिसूचक अपमान, सामाजिक रूप से अपमानित करने या जाति के आधार पर दुर्व्यवहार का आरोप सामने आता है तो मामला सामान्य विवाद तक सीमित नहीं रहता। ऐसे मामलों में कानून अलग से सुरक्षा प्रदान करता है।
सुमित्रा की शिकायत के बाद पुलिस ने मामले को दर्ज किया और विवेचना की प्रक्रिया शुरू की। पुलिस की जांच के दौरान घटना से जुड़े तथ्यों, गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों को सामने लाने का प्रयास किया गया।
एससी/एसटी एक्ट के तहत भी हुई कार्रवाई
पुलिस ने मामले में एससी/एसटी एक्ट समेत अन्य संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की थी। SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को उन अपराधों से सुरक्षा देना है, जिनमें उनकी जातिगत पहचान के कारण उनके साथ अत्याचार, अपमान या भेदभाव किया जाता है।
इस कानून के तहत कई ऐसे कृत्यों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है जो किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को उसकी सामाजिक और जातिगत पहचान के कारण अपमानित या प्रताड़ित करने से जुड़े होते हैं।
हालांकि किसी मामले में केवल आरोप लग जाना ही दोष सिद्ध होने के लिए पर्याप्त नहीं होता। अदालत को अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर यह देखना होता है कि आरोप कानून के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं या नहीं। यही कारण है कि मुकदमे के दौरान गवाहों के बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विवेचना के बाद न्यायालय में दाखिल किया गया आरोप पत्र
प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की विवेचना की। विवेचना के दौरान पुलिस ने घटना से संबंधित तथ्यों को जुटाया और गवाहों के बयान दर्ज किए। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया।
आरोप पत्र दाखिल होने के बाद न्यायालय ने मामले को सुनवाई के लिए लिया। अभियोजन पक्ष को आरोपों को साबित करने का अवसर दिया गया, जबकि अभियुक्त को अपने बचाव में पक्ष रखने का अधिकार मिला।
आपराधिक न्याय व्यवस्था में यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति को केवल एफआईआर या आरोप पत्र के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। दोष सिद्ध होने के लिए अभियोजन को अदालत के समक्ष पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं।
गवाहों के बयान बने सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से वादी और अन्य गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। गवाहों के बयान किसी आपराधिक मुकदमे में महत्वपूर्ण साक्ष्य माने जाते हैं, विशेष रूप से तब जब वे घटना के प्रत्यक्षदर्शी हों या घटना से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य अदालत के सामने रखते हों।
अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत गवाहों के बयान के आधार पर न्यायालय ने मामले के तथ्यों को समझने का प्रयास किया। दूसरी ओर बचाव पक्ष को भी आरोपों का विरोध करने और अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला।
अदालत में केवल मौखिक आरोपों के आधार पर फैसला नहीं किया जाता। न्यायालय उपलब्ध समस्त साक्ष्यों को कानून के निर्धारित मानकों पर परखता है। इसी प्रक्रिया के बाद यह तय किया जाता है कि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे साबित कर पाया है या नहीं।
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद आया फैसला
मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष अपनी-अपनी दलीलें रखी गईं। दोनों पक्षों की बहस सुनने तथा उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद विशेष न्यायालय ने अभियुक्त भूपेंद्र कुमार दुबे को दोषी पाया।
इसके बाद विशेष न्यायाधीश सुरेश चंद्र गुप्ता ने अभियुक्त को दो वर्ष के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।
अदालत के इस निर्णय के बाद मामले की न्यायिक प्रक्रिया के उस चरण का अंत हुआ, जो वर्ष 2023 में पुलिस को दी गई शिकायत से शुरू हुआ था।
सश्रम कारावास का क्या होता है मतलब?
न्यायालय द्वारा दी गई सजा में सश्रम कारावास (Rigorous Imprisonment) का विशेष महत्व होता है। साधारण कारावास की तुलना में सश्रम कारावास में कैदी को जेल नियमों के अनुसार श्रम करना पड़ सकता है।
किसी अभियुक्त को सजा सुनाते समय अदालत अपराध की प्रकृति, मामले के तथ्य, उपलब्ध साक्ष्य और कानून में निर्धारित प्रावधानों को ध्यान में रखती है। इस मामले में न्यायालय ने दो वर्ष के सश्रम कारावास के साथ पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
अर्थदंड नहीं जमा करने पर क्या होगा?
न्यायालय द्वारा लगाया गया अर्थदंड भी सजा का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यदि अदालत के आदेश के अनुसार निर्धारित अर्थदंड जमा नहीं किया जाता तो न्यायालय के आदेश में निर्धारित अतिरिक्त कारावास का प्रावधान लागू हो सकता है।
इसलिए किसी मामले में केवल जेल की अवधि ही नहीं, बल्कि अर्थदंड से संबंधित अदालत के आदेश को भी ध्यान से देखा जाता है।
एससी/एसटी मामलों में विशेष अदालत की भूमिका
एससी/एसटी एक्ट के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य ऐसे मामलों की सुनवाई को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाना और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया को मजबूत करना है।
ऐसे मामलों में आरोप सामान्य आपराधिक घटना से आगे बढ़कर सामाजिक रूप से संवेदनशील पहलुओं से भी जुड़े हो सकते हैं। इसलिए अदालत के समक्ष प्रस्तुत प्रत्येक तथ्य और साक्ष्य का महत्व बढ़ जाता है।
हालांकि विशेष अदालत होने का अर्थ यह नहीं है कि अभियुक्त के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि अभियोजन को आरोप सिद्ध करने होते हैं और अभियुक्त को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त रहता है।
महिला के सम्मान और गरिमा से जुड़े मामलों में कानून की भूमिका
महिला के साथ गाली-गलौज, मारपीट या सार्वजनिक अथवा सामाजिक रूप से अपमानित करने की घटना केवल व्यक्तिगत विवाद का विषय नहीं होती। परिस्थितियों के आधार पर ऐसे कृत्य विभिन्न आपराधिक कानूनों के तहत अपराध बन सकते हैं।
यदि घटना में जातिगत अपमान या अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य को उसकी जाति के कारण निशाना बनाने का तत्व मौजूद हो, तो एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।
इसलिए किसी भी घटना में कानून की सही धाराओं का निर्धारण जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।
अदालत का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
इस मामले में अदालत का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लगभग तीन वर्ष पहले दर्ज हुए मामले में न्यायिक प्रक्रिया के बाद दोष सिद्ध हुआ और अभियुक्त को कारावास तथा अर्थदंड की सजा मिली।
आपराधिक मामलों में प्राथमिकी से लेकर विवेचना, आरोप पत्र, गवाहों के बयान, साक्ष्यों की जांच और अंतिम बहस तक कई चरण होते हैं। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद अदालत किसी निष्कर्ष पर पहुंचती है।
इस मामले में भी पुलिस द्वारा विवेचना पूरी कर आरोप पत्र दाखिल किया गया। इसके बाद न्यायालय में अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान हुए और दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुनाया गया।
न्यायालय में साक्ष्य की अहमियत
किसी भी आपराधिक मुकदमे का परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि अदालत के सामने किस प्रकार के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए और उनकी विश्वसनीयता कितनी है।
गवाहों के बयान, दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल से जुड़े तथ्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य—मामले की प्रकृति के अनुसार इनका महत्व हो सकता है।
अदालत इन साक्ष्यों को अलग-अलग नहीं बल्कि पूरे मामले के संदर्भ में देखती है। यदि साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं और अभियोजन की कहानी को विश्वसनीय बनाते हैं तो उनका प्रभाव मुकदमे के परिणाम पर पड़ सकता है।
शिकायत से सजा तक पहुंचा मामला
बिरगुवां बुजुर्ग की सुमित्रा के मामले में भी घटनाक्रम शिकायत से शुरू हुआ। वर्ष 2023 में पुलिस को तहरीर दी गई। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की, विवेचना की और इसके बाद आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
अदालत में मुकदमा चला। वादी और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अभियोजन तथा बचाव पक्ष ने अपनी दलीलें रखीं। अंततः विशेष न्यायाधीश सुरेश चंद्र गुप्ता ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त भूपेंद्र कुमार दुबे को दोषी करार दिया।
अदालत ने दोष सिद्ध होने के बाद दो वर्ष के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।
कानूनी प्रक्रिया में पीड़ित और अभियुक्त दोनों के अधिकार महत्वपूर्ण
किसी भी आपराधिक मामले में न्याय का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं होता, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से सत्य और कानून के अनुरूप निर्णय तक पहुंचना भी होता है।
पीड़ित को अपनी शिकायत दर्ज कराने, जांच में सहयोग करने और न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अधिकार है। वहीं अभियुक्त को भी कानूनी प्रतिनिधित्व, साक्ष्यों का विरोध करने और अपना बचाव प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त है।
इसी संतुलित प्रक्रिया के माध्यम से अदालत यह तय करती है कि आरोप साबित हुए हैं या नहीं।
निष्कर्ष
कोंच कोतवाली क्षेत्र के बिरगुवां बुजुर्ग गांव में महिला के साथ गाली-गलौज, मारपीट और अपमानित करने के मामले में विशेष एससी/एसटी न्यायालय का फैसला सामने आया है। वर्ष 2023 में दर्ज इस मामले में पुलिस ने जांच के बाद आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था।
सुनवाई के दौरान वादी और अन्य गवाहों के बयान दर्ज हुए तथा दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने भूपेंद्र कुमार दुबे को दोषी ठहराया। विशेष न्यायाधीश सुरेश चंद्र गुप्ता ने उन्हें दो वर्ष के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।
यह फैसला एक बार फिर यह बताता है कि किसी आपराधिक घटना में केवल शिकायत दर्ज होना अंतिम परिणाम नहीं होता। पुलिस विवेचना, साक्ष्य संकलन, गवाहों की गवाही और न्यायालय में होने वाली सुनवाई के बाद ही दोष या निर्दोषता का अंतिम न्यायिक निर्धारण किया जाता है। विशेष रूप से एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में अदालत कानून के प्रावधानों और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करती है।