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तलाक-ए-हसन पर गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, भारत में प्रतिबंधित नहीं; असम के नए कानून के तहत कराना होगा पंजीकरण

तलाक-ए-हसन पर गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, भारत में प्रतिबंधित नहीं; असम के नए कानून के तहत कराना होगा पंजीकरण

2016 में हुई थी शादी, 2018 में पत्नी अलग हुई; पति ने मार्च, अप्रैल और मई 2026 में तीन बार तलाक का उच्चारण किया, हाईकोर्ट ने पुराने कानून के तहत पंजीकरण से किया इनकार

गुवाहाटी। मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि वर्तमान समय में तलाक-ए-हसन भारत में प्रतिबंधित तलाक का रूप नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि असम में ऐसे तलाक का पंजीकरण अब पुराने कानून के तहत नहीं कराया जा सकता। इसके लिए राज्य में लागू नए कानून का पालन करना होगा।

न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की अदालत ने एक मुस्लिम व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे संबंधित Marriage and Divorce Registrar के समक्ष जाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि असम में मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण से संबंधित वर्ष 1935 का पुराना कानून निरस्त हो चुका है। उसके तहत बनाए गए प्राधिकरण और पद भी समाप्त किए जा चुके हैं। इसलिए पुराने प्राधिकरण को तलाकनामा दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा अपनाए गए तलाक-ए-हसन को ऐसा तरीका माना, जो वर्तमान में देश में प्रतिबंधित नहीं है। इसलिए अदालत ने उसे Assam Compulsory Registration of Muslim Marriages and Divorces Act, 2024 के तहत संबंधित रजिस्ट्रार के पास तलाक के पंजीकरण के लिए जाने की छूट दी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक ऐसे मुस्लिम दंपती से जुड़ा है, जिनका विवाह वर्ष 2016 में हुआ था। याचिकाकर्ता पति के अनुसार, शादी के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए। बाद में वैवाहिक संबंधों में तनाव बढ़ता गया और वर्ष 2018 में पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर अपने मायके चली गई

पति का दावा था कि उसने पत्नी को वापस लाने और वैवाहिक संबंध सुधारने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन इन प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला। दोनों के बीच लंबे समय तक साथ रहना संभव नहीं हो पाया।

याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वैवाहिक विवाद के समाधान के लिए सुलह की कोशिशें की गईं, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हुई। इसके बाद उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अपनाने का निर्णय लिया।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने 22 मार्च 2026, 26 अप्रैल 2026 और 27 मई 2026 को अलग-अलग तारीखों पर तलाक का उच्चारण किया। इसके बाद उसने तलाक से संबंधित दस्तावेज तैयार कराकर संबंधित प्राधिकरण के समक्ष पंजीकरण कराने का प्रयास किया।

तीन अलग-अलग मौकों पर तलाक का उच्चारण

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया है। याचिकाकर्ता ने एक ही दिन तीन बार तलाक कहने के बजाय अलग-अलग तारीखों पर तलाक का उच्चारण किया।

पहला उच्चारण 22 मार्च 2026 को, दूसरा 26 अप्रैल 2026 को और तीसरा 27 मई 2026 को किया गया। अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से यह बताया गया कि उसने यह प्रक्रिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार अपनाई और प्रत्येक चरण के बीच आवश्यक समय रखा गया।

तीसरे उच्चारण के बाद पति ने तलाक के पंजीकरण के लिए संबंधित प्राधिकरण का रुख किया। लेकिन उस समय समस्या यह सामने आई कि जिस पुराने कानून के तहत संबंधित प्राधिकरण काम करता था, वह अब प्रभावी नहीं था।

यही विवाद बाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट तक पहुंचा।

पुराने 1935 के कानून के कारण पैदा हुई समस्या

मामले की सुनवाई के दौरान असम सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण से संबंधित 1935 का पुराना कानून निरस्त किया जा चुका है

पुराने कानून के तहत कुछ पद और प्राधिकरण बनाए गए थे, जिनके माध्यम से मुस्लिम विवाह और तलाक के दस्तावेजों का पंजीकरण किया जाता था। लेकिन कानून समाप्त होने के बाद उन पदों और प्राधिकरणों की वैधानिक स्थिति भी खत्म हो गई।

इस कारण हाईकोर्ट ने पुराने बारपेटा प्राधिकरण को तलाकनामा पंजीकृत करने का आदेश देने से इनकार कर दिया।

अदालत के सामने यह स्थिति साफ थी कि याचिकाकर्ता जिस प्राधिकरण से अपने तलाकनामा का पंजीकरण कराना चाहता था, वह अब पुराने कानून के तहत वैधानिक रूप से कार्य नहीं कर रहा था।

इसलिए हाईकोर्ट ने समस्या का समाधान नए कानून के माध्यम से करने का रास्ता बताया।

हाईकोर्ट ने क्या कहा तलाक-ए-हसन के बारे में?

मामले में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी अदालत की यही रही कि याचिकाकर्ता द्वारा अपनाया गया तलाक-ए-हसन वर्तमान में भारत में प्रतिबंधित नहीं है

अदालत ने अपने आदेश में इसे तलाक का एक वैध रूप बताते हुए कहा कि देश में फिलहाल इस पर कोई प्रतिबंध लागू नहीं है। हालांकि, अदालत का यह निष्कर्ष मुख्य रूप से इस बात से जुड़ा था कि संबंधित तलाक का तरीका अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है।

इसका मतलब यह नहीं है कि तलाक से जुड़े हर विवाद का समाधान केवल तलाक का उच्चारण कर देने से हो जाता है। यदि पत्नी तलाक की वैधता या प्रक्रिया को चुनौती देना चाहती है तो उसके लिए कानूनी रास्ता खुला रहेगा।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यह स्पष्ट किया कि पत्नी को उचित मंच पर इस तलाक को चुनौती देने की स्वतंत्रता रहेगी।

तलाक-ए-हसन क्या होता है?

मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के अलग-अलग तरीके बताए जाते हैं। तलाक-ए-हसन उनमें से एक पारंपरिक तरीका है।

इसमें पति एक ही समय पर तीन बार तलाक बोलने के बजाय अलग-अलग समय पर तलाक का उच्चारण करता है। सामान्य रूप से तीन अलग-अलग तुहरों यानी ऐसी अवधियों में उच्चारण की व्यवस्था बताई जाती है, जिनके बीच पुनर्विचार और सुलह की गुंजाइश रहती है।

यही पहलू इसे तलाक-ए-बिद्दत या तत्काल तीन तलाक से अलग करता है।

2017 में सुप्रीम कोर्ट ने Shayara Bano v. Union of India मामले में तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक ठहराया था। इसके बाद संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया, जिसमें तत्काल और एक साथ तलाक की घोषणा को लेकर अलग कानूनी व्यवस्था की गई।

लेकिन वर्तमान गुवाहाटी हाईकोर्ट मामले में सवाल तत्काल तीन तलाक का नहीं, बल्कि तलाक-ए-हसन के माध्यम से अलग-अलग समय पर तलाक के उच्चारण और उसके पंजीकरण का था।

असम के नए कानून के तहत होगा पंजीकरण

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अब Assam Compulsory Registration of Muslim Marriages and Divorces Act, 2024 के तहत संबंधित क्षेत्र के Marriage and Divorce Registrar के पास जाना होगा।

असम सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इस कानून को Assam Act No. XXXII of 2024 के रूप में दर्ज किया गया है।

नए कानून के तहत मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया को वैधानिक ढांचे में रखा गया है। यही कारण है कि हाईकोर्ट ने पुराने कानून के तहत बनाए गए प्राधिकरण को निर्देश देने के बजाय नए कानून के तहत निर्धारित अधिकारी के समक्ष जाने का रास्ता अपनाया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रजिस्ट्रार केवल आवेदन देखकर सीधे पंजीकरण नहीं कर देगा। उसे कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करना होगा।

रजिस्ट्रार पहले करेगा पहचान और तलाक के दावे की जांच

नए कानून की धारा 12 इस मामले में महत्वपूर्ण है। अदालत ने बताया कि तलाक के पंजीकरण का आवेदन मिलने पर संबंधित रजिस्ट्रार को यह संतुष्ट होना होगा कि जिस व्यक्ति ने तलाक देने का दावा किया है, वास्तव में तलाक उसी व्यक्ति ने प्रभावी किया है या नहीं।

इसके साथ ही रजिस्ट्रार को आवेदन करने वाले व्यक्ति की पहचान भी सत्यापित करनी होगी।

यदि रजिस्ट्रार आवश्यक शर्तों से संतुष्ट होता है तो कानून के अनुसार तलाक की प्रविष्टि तलाक रजिस्टर में की जा सकती है। संबंधित पक्षों की उपस्थिति और हस्ताक्षर से जुड़ी प्रक्रिया भी कानून में निर्धारित है।

इसका मतलब यह है कि हाईकोर्ट ने सीधे यह आदेश नहीं दिया कि याचिकाकर्ता का तलाक तुरंत रजिस्टर कर दिया जाए। अदालत ने केवल यह रास्ता बताया कि वह नए कानून के तहत सक्षम अधिकारी के पास आवेदन करे और रजिस्ट्रार कानून के अनुसार निर्णय ले।

रजिस्ट्रार ने पंजीकरण से इनकार किया तो क्या होगा?

इस मामले में हाईकोर्ट ने उपभोक्ता या प्रशासनिक स्तर की तरह एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता भी स्पष्ट किया है।

यदि संबंधित Marriage and Divorce Registrar तलाक का पंजीकरण करने से इनकार करता है तो याचिकाकर्ता को 2024 के कानून की धारा 17 के तहत अपील करने का अधिकार होगा।

इससे स्पष्ट है कि रजिस्ट्रार का फैसला अंतिम और चुनौती से परे नहीं होगा। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके आवेदन को कानून के विपरीत खारिज किया गया है तो वह निर्धारित अपीलीय व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकता है।

पत्नी की गैरमौजूदगी पर भी कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण संकेत

मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू पत्नी की अदालत में गैरमौजूदगी रहा।

रिकॉर्ड के अनुसार, पत्नी को सुनवाई के संबंध में नोटिस भेजे गए थे, लेकिन वह अदालत के सामने उपस्थित नहीं हुई। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने यह नहीं माना कि उसकी गैरमौजूदगी के कारण उसके कानूनी अधिकार समाप्त हो गए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी यदि तलाक-ए-हसन को चुनौती देना चाहती है तो वह उचित कानूनी मंच के सामने चुनौती दे सकती है।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पंजीकरण की प्रक्रिया और तलाक की वैधता को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। पंजीकरण का उद्देश्य वैधानिक रिकॉर्ड तैयार करना है, जबकि तलाक की वैधता को चुनौती देने का अधिकार परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार अलग प्रश्न हो सकता है।

क्या हाईकोर्ट ने पत्नी के खिलाफ एकतरफा तलाक को अंतिम मान लिया?

इस फैसले को समझते समय इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत ने पत्नी के अधिकार समाप्त करने वाला कोई व्यापक आदेश नहीं दिया।

हाईकोर्ट ने केवल यह कहा कि तलाक-ए-हसन भारत में वर्तमान में प्रतिबंधित नहीं है और याचिकाकर्ता को नए असम कानून के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

अदालत ने यह भी सुरक्षित रखा कि पत्नी उचित मंच पर इस तलाक को चुनौती दे सकती है।

इसलिए फैसले को इस रूप में देखना अधिक सही होगा कि अदालत ने तलाक-ए-हसन के वर्तमान कानूनी दर्जे और पंजीकरण की प्रक्रिया पर स्थिति स्पष्ट की है, न कि हर तलाक-ए-हसन मामले को बिना किसी जांच के अंतिम मान्यता दे दी है।

नए कानून ने क्यों बदली पूरी प्रक्रिया?

असम में मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण से जुड़ी पुरानी व्यवस्था में बदलाव के बाद नए कानून के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

पुराना कानून समाप्त होने के कारण उससे जुड़े पुराने पद और प्राधिकरण भी समाप्त हो गए। इसलिए ऐसे मामलों में पुराने रिकॉर्ड या पुराने अधिकारियों से पंजीकरण कराने की मांग कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं रह सकती।

गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह फैसला इसी संक्रमण की स्थिति को स्पष्ट करता है। एक तरफ व्यक्तिगत कानून के तहत अपनाई गई तलाक की प्रक्रिया का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ राज्य द्वारा बनाए गए पंजीकरण कानून का पालन करना आवश्यक है।

यानी तलाक की प्रक्रिया और उसके वैधानिक पंजीकरण की प्रक्रिया दो अलग कानूनी पहलू हैं।

फैसले का व्यापक महत्व

गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह फैसला मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने व्यक्तिगत कानून और राज्य के पंजीकरण कानून के बीच संबंध को स्पष्ट किया है।

फैसले से यह संकेत मिलता है कि किसी पारंपरिक व्यक्तिगत कानून के तहत किया गया तलाक यदि वर्तमान कानून में प्रतिबंधित नहीं है, तब भी उसके दस्तावेजी और प्रशासनिक रिकॉर्ड के लिए राज्य के लागू कानून का पालन करना पड़ सकता है।

असम के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1935 की पुरानी व्यवस्था के स्थान पर 2024 का नया कानून लागू है।

इससे उन लोगों के लिए भी स्थिति स्पष्ट होती है जो पुराने प्राधिकरण के पास विवाह या तलाक के दस्तावेजों के पंजीकरण की कोशिश कर रहे हैं।

तलाक-ए-हसन और तीन तलाक में अंतर समझना जरूरी

सोशल मीडिया और सामान्य चर्चाओं में तलाक के अलग-अलग रूपों को कई बार एक ही समझ लिया जाता है। लेकिन कानूनी चर्चा में यह अंतर महत्वपूर्ण है।

तलाक-ए-बिद्दत, जिसे आम बोलचाल में तीन तलाक कहा जाता है, में एक ही समय पर तलाक की घोषणा करने की बात आती है। सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले और बाद के 2019 कानून ने इस तरह के तत्काल तीन तलाक को अलग कानूनी स्थिति दी।

वहीं तलाक-ए-हसन में तलाक का उच्चारण अलग-अलग समय पर किया जाता है और प्रक्रिया में पुनर्विचार तथा सुलह की संभावना का तत्व मौजूद रहता है।

गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने भी यही अंतर महत्वपूर्ण था। अदालत ने वर्तमान मामले में तलाक-ए-हसन को प्रतिबंधित रूप नहीं माना।

आगे क्या होगा?

अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण संबंधित Marriage and Divorce Registrar के सामने होगा। याचिकाकर्ता को 2024 के कानून के तहत आवेदन करना होगा। इसके बाद रजिस्ट्रार को दस्तावेजों, तलाक के दावे और याचिकाकर्ता की पहचान से संबंधित आवश्यक जांच करनी होगी।

यदि कानून की शर्तें पूरी होती हैं तो तलाक का पंजीकरण किया जा सकता है। यदि आवेदन खारिज होता है तो याचिकाकर्ता धारा 17 के तहत अपील का रास्ता अपना सकता है।

दूसरी ओर, पत्नी के पास भी उचित कानूनी मंच पर तलाक को चुनौती देने का विकल्प खुला है।

अदालत का फैसला क्या संदेश देता है?

गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस फैसले से तीन बातें साफ होती हैं। पहली, तलाक-ए-हसन को वर्तमान में भारत में प्रतिबंधित नहीं माना गया है। दूसरी, असम में ऐसे तलाक के पंजीकरण के लिए अब 1935 के पुराने कानून पर निर्भर नहीं किया जा सकता। तीसरी, पंजीकरण के लिए 2024 के असम कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।

इस मामले में अदालत ने पुराने बारपेटा प्राधिकरण को तलाकनामा दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया, क्योंकि संबंधित पुराना कानून और उसके तहत बने पद समाप्त हो चुके हैं। इसके बजाय याचिकाकर्ता को नए कानून के तहत संबंधित रजिस्ट्रार के पास जाने को कहा गया।

इस फैसले का महत्व केवल एक दंपती के विवाद तक सीमित नहीं है। यह उन मामलों के लिए भी दिशा बताता है जहां मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत तलाक की प्रक्रिया और राज्य के वैधानिक पंजीकरण नियम एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने तलाक-ए-हसन को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए भी पत्नी के कानूनी अधिकारों को खत्म नहीं किया। यदि पत्नी को लगता है कि तलाक कानून के अनुरूप नहीं हुआ है या उसके अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो उसके लिए उचित कानूनी मंच पर चुनौती का रास्ता खुला है।

इस तरह यह फैसला व्यक्तिगत कानून, विवाह-विच्छेद और वैधानिक पंजीकरण के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश माना जा सकता है। आने वाले समय में इस तरह के मामलों में 2024 के असम कानून की धारा 12 और धारा 17 की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी।