अधिकारियों पर आपराधिक केस से पहले सरकार की मंजूरी जरूरी, MP में 295 अभियोजन स्वीकृतियां अब भी लंबित
पुलिस मुख्यालय ने सभी इकाइयों को जारी किए निर्देश, सरकारी कामकाज से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य
भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ उनके आधिकारिक कामकाज से जुड़े मामलों में आपराधिक कार्रवाई को लेकर पुलिस मुख्यालय ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अब ऐसे मामलों में, जहां किसी सरकारी अधिकारी पर उसके पद और सरकारी कर्तव्य का निर्वहन करते समय किए गए किसी कार्य को लेकर आपराधिक शिकायत की जाती है, वहां सीधे आपराधिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के बजाय संबंधित कानूनी प्रावधानों और अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया का पालन करना होगा।
पुलिस मुख्यालय के अपराध अनुसंधान विभाग (PHQ) की ओर से प्रदेश की पुलिस इकाइयों को इस संबंध में निर्देश दिए गए हैं। इसमें सरकारी अधिकारियों को प्राप्त कानूनी संरक्षण और अदालत द्वारा आपराधिक मामले में संज्ञान लेने से पहले आवश्यक अभियोजन स्वीकृति से संबंधित प्रावधानों का ध्यान रखने को कहा गया है।
इस निर्देश के बाद सरकारी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज होने वाली शिकायतों और उनके आधार पर आगे बढ़ने वाली आपराधिक कार्रवाई को लेकर पुलिस और जांच एजेंसियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी अधिकारी के खिलाफ कभी आपराधिक मामला दर्ज नहीं हो सकता। मुख्य सवाल यह होगा कि आरोपित कृत्य वास्तव में अधिकारी के official duty यानी आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़ा है या नहीं और संबंधित अधिकारी उस कानूनी संरक्षण के दायरे में आता है या नहीं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस मुख्यालय की सक्रियता
पुलिस मुख्यालय के निर्देशों में ग्वालियर खंडपीठ के एक आदेश का हवाला दिया गया है। उपलब्ध न्यायिक सामग्री से भी यह स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कई मामलों में इस बात पर विचार किया है कि सरकारी अधिकारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कथित अपराध में अभियोजन स्वीकृति कब आवश्यक होती है। BNSS की धारा 218 इसी विषय से संबंधित है और यह पुराने CrPC की धारा 197 के समान प्रावधान को आगे बढ़ाती है।
इस कानूनी व्यवस्था का मूल उद्देश्य यह है कि अधिकारी अपने वैधानिक और प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते समय हर निर्णय के बाद व्यक्तिगत आपराधिक मुकदमे के भय में काम न करें। साथ ही, इसका मतलब यह भी नहीं है कि सरकारी पद किसी अधिकारी को आपराधिक कानून से पूरी तरह बाहर कर देता है।
कानून ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। एक तरफ ईमानदारी से सरकारी काम करने वाले अधिकारियों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से सुरक्षा मिलती है, तो दूसरी तरफ यदि कोई कथित कृत्य उसके आधिकारिक दायित्व से बाहर है तो केवल सरकारी पद के आधार पर उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
क्या कहती है BNSS की धारा 218?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 218 का शीर्षक ही “Prosecution of Judges and public servants” है। इसके तहत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ, जो न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या ऐसा सरकारी लोक सेवक है जिसे सरकार की मंजूरी के बिना पद से हटाया नहीं जा सकता, यदि उसके आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करते हुए या ऐसा करने का दावा करते हुए किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, तो अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले संबंधित सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक हो सकती है।
राज्य के मामलों में सामान्यतः संबंधित राज्य सरकार की अभियोजन स्वीकृति का प्रश्न आता है। BNSS में यह भी व्यवस्था है कि स्वीकृति के अनुरोध पर सरकार को निर्धारित अवधि के भीतर निर्णय लेना होता है और कानून में 120 दिन की समयसीमा का प्रावधान भी दिया गया है।
इसलिए किसी शिकायत के सामने आते ही यह मान लेना सही नहीं होगा कि सरकारी अधिकारी के खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ सकता। पहले यह देखना जरूरी है कि अधिकारी कौन है, उसका पद क्या है, कथित घटना किस परिस्थिति में हुई और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित अपराध का संबंध उसके आधिकारिक कर्तव्य से कितना है।
राजपत्रित अधिकारी होने मात्र से हर मामले में सुरक्षा नहीं
अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के प्रावधान को लेकर एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। केवल Gazetted Officer होना ही हर परिस्थिति में अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता तय नहीं करता।
BNSS की धारा 218 का ढांचा अधिकारी की सेवा स्थिति और कथित अपराध के उसके आधिकारिक कर्तव्य से संबंध पर आधारित है। इसलिए यदि कोई अधिकारी ऐसा कार्य करता है जो उसके सरकारी पद की जिम्मेदारी निभाने के दौरान किया गया बताया जा रहा है, तो धारा 218 के तहत स्वीकृति का प्रश्न उठ सकता है। लेकिन यदि कथित कृत्य पूरी तरह निजी, व्यक्तिगत या आधिकारिक जिम्मेदारी से अलग है, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
यानी किसी शिकायत में केवल आरोपी का सरकारी अधिकारी होना पर्याप्त नहीं है। शिकायत में लगाए गए आरोप और अधिकारी के सरकारी कार्य के बीच वास्तविक संबंध की जांच आवश्यक होगी।
पुलिस के लिए भी प्रक्रिया का पालन जरूरी
पुलिस मुख्यालय के निर्देशों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस इकाइयां संबंधित कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखें। सरकारी अधिकारी के खिलाफ किसी शिकायत में जल्दबाजी में ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई जानी चाहिए जिससे बाद में अदालत में पूरा मामला ही कानूनी तकनीकी आधार पर चुनौती के घेरे में आ जाए।
इस तरह के मामलों में जांच एजेंसी को यह देखना होता है कि आरोप किस प्रकार के हैं और उनका संबंध सरकारी कार्य से किस स्तर तक है। यदि कानून के अनुसार अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है, तो अदालत द्वारा संज्ञान से पहले उसकी उपलब्धता महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाईकोर्ट के सामने भी ऐसे मामलों में यही सवाल उठता रहा है कि क्या आवश्यक स्वीकृति के बिना अदालत द्वारा संज्ञान लिया जा सकता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक हालिया आदेश में भी सरकारी अधिकारी द्वारा आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किए गए कथित कार्य के संदर्भ में BNSS की धारा 218 के संरक्षण का उल्लेख किया गया है।
दूसरी तरफ 295 मामलों में सरकार की मंजूरी लंबित
एक तरफ सरकार ने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया है, तो दूसरी तरफ मध्य प्रदेश में लोकायुक्त से जुड़े 295 मामलों में अभियोजन स्वीकृति लंबित होने की जानकारी सामने आई है।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच लोकायुक्त को बड़ी संख्या में शिकायतें प्राप्त हुईं। 1 जनवरी 2020 से 21 जून 2026 तक लोकायुक्त की शिकायत एवं जांच शाखा और तकनीकी शाखा में कुल 2,155 प्रकरणों में जांच पूरी होने की जानकारी दी गई। इसी अवधि में 1,318 प्रकरणों में विवेचना पूरी हुई और 1,302 मामलों में अभियोजन की अनुमति के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजे गए। इनमें से 958 मामलों में अभियोजन स्वीकृति मिलने की जानकारी दी गई है, जबकि वर्तमान में 295 मामले स्वीकृति के इंतजार में बताए गए हैं।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अभियोजन स्वीकृति आपराधिक न्याय प्रक्रिया का एक अहम चरण है। किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या अन्य संबंधित आरोपों में जांच पूरी होने के बाद जब मामला अभियोजन की स्थिति तक पहुंचता है, तब सक्षम सरकार से स्वीकृति की आवश्यकता पड़ सकती है।
किन विभागों के मामले सबसे ज्यादा लंबित?
लोकायुक्त से संबंधित उपलब्ध विभागवार आंकड़ों के अनुसार अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित मामलों में सबसे ज्यादा मामले नगरीय विकास एवं आवास विभाग से जुड़े बताए गए हैं। इस विभाग के 36 मामलों में स्वीकृति लंबित है।
इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के 15 मामले बताए गए हैं। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के 12 मामले तथा सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के 11 मामले अभियोजन स्वीकृति की प्रतीक्षा में हैं।
इसी तरह लोक निर्माण विभाग के 10, राजस्व विभाग के 6 और जल संसाधन विभाग के 5 मामले लंबित बताए गए हैं। उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के 5 तथा वन विभाग के भी 5 मामले शामिल हैं।
वहीं जनजातीय कार्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग के 4-4 मामले बताए गए हैं। सहकारिता विभाग, किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग, गृह विभाग (पुलिस) और वाणिज्यिक कर विभाग से जुड़े भी मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित बताए गए हैं।
इन आंकड़ों से यह सवाल भी उठता है कि अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया को किस तरह अधिक समयबद्ध बनाया जाए, ताकि न तो ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को अनावश्यक मुकदमों का सामना करना पड़े और न ही गंभीर आरोपों वाले मामलों में कार्रवाई अनिश्चित समय तक रुकी रहे।
स्वीकृति में देरी का असर जांच और न्याय दोनों पर
अभियोजन स्वीकृति में देरी का असर केवल आरोपी अधिकारी पर नहीं पड़ता। इसका प्रभाव उस शिकायतकर्ता या जांच एजेंसी पर भी पड़ता है, जिसने मामले में जांच के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की तैयारी की है।
यदि किसी मामले में जांच पूरी हो चुकी है और पर्याप्त सामग्री सामने आ चुकी है, लेकिन अभियोजन स्वीकृति लंबे समय तक लंबित रहती है, तो पूरा मामला आगे बढ़ने में समय लग सकता है। दूसरी ओर, यदि आरोप प्रथम दृष्टया ही आधिकारिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अधिकारी ने कानून के दायरे में काम किया है, तो अभियोजन स्वीकृति की व्यवस्था उसे अनावश्यक आपराधिक मुकदमे से बचाने के उद्देश्य को पूरा कर सकती है।
इसलिए इस व्यवस्था का संतुलित और पारदर्शी इस्तेमाल जरूरी माना जाता है।
क्या हर शिकायत पर पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी?
इस सवाल को लेकर भी भ्रम की स्थिति रहती है। BNSS की धारा 218 का मतलब यह नहीं है कि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ शिकायत मिलते ही पुलिस हर स्थिति में सरकार की अनुमति लेने के बाद ही जांच शुरू कर सकती है।
धारा 218 मुख्य रूप से अदालत द्वारा cognizance लेने के स्तर पर अभियोजन स्वीकृति से संबंधित है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि आरोपी व्यक्ति संबंधित श्रेणी का लोक सेवक हो और कथित अपराध उसके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किया गया हो।
इसलिए किसी मामले में FIR, जांच, चार्जशीट और अदालत द्वारा cognizance लेने के अलग-अलग कानूनी चरणों को एक ही मानना उचित नहीं होगा। प्रत्येक चरण पर लागू कानूनी प्रावधानों को अलग-अलग देखना होगा।
भ्रष्टाचार के मामलों में लोकायुक्त की भूमिका महत्वपूर्ण
मध्य प्रदेश में सरकारी अधिकारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में लोकायुक्त संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका है। लोकायुक्त संगठन के आधिकारिक पोर्टल पर अभियोजन स्वीकृति से जुड़े मामलों के लिए अलग जानकारी उपलब्ध कराई गई है।
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी मध्य प्रदेश लोकायुक्त के Special Police Establishment से संबंधित एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने इस संगठन को RTI Act के तहत “intelligence and security organisation” मानकर दी गई छूट को चुनौती से जुड़े मामले में बरकरार नहीं रखा और अभियोजन स्वीकृति से संबंधित जानकारी के अधिकार के प्रश्न पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
इससे यह मुद्दा भी सामने आता है कि अभियोजन स्वीकृति जैसी प्रक्रिया केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। इससे जुड़े रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया भी जवाबदेही के व्यापक सिद्धांतों से जुड़ते हैं।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
मध्य प्रदेश सरकार के सामने इस समय दो तरह की चुनौती दिखाई देती है। पहली चुनौती सरकारी अधिकारियों को उनके वैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान होने वाली अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा देने की है। दूसरी चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि अभियोजन स्वीकृति की व्यवस्था गंभीर भ्रष्टाचार या आपराधिक आरोपों वाले मामलों में कार्रवाई को अनिश्चितकाल तक रोकने का कारण न बने।
सरकारी अधिकारी प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उन्हें निर्णय लेने के लिए आवश्यक स्वतंत्रता मिलना जरूरी है। यदि हर प्रशासनिक निर्णय के बाद व्यक्तिगत आपराधिक शिकायत का डर बना रहे तो अधिकारी कई मामलों में निर्णय लेने से बच सकते हैं। इसका सीधा असर शासन व्यवस्था पर पड़ सकता है।
लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी अधिकारी को गंभीर आरोपों से स्थायी सुरक्षा देने के रूप में न हो। कानून का उद्देश्य सुरक्षा और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाना है।
अब निगाह सरकार के फैसलों पर
पुलिस मुख्यालय के निर्देशों के बाद अब प्रदेश की पुलिस इकाइयों को सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायतों में अधिक सावधानी बरतनी होगी। दूसरी तरफ लोकायुक्त के 295 लंबित मामलों के कारण सरकार के सामने अभियोजन स्वीकृति से जुड़े निर्णयों को लेकर भी सवाल बने रहेंगे।
सबसे अहम बात यह है कि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ शिकायत होने पर केवल उसका पद देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। यह देखना होगा कि कथित कृत्य किस परिस्थिति में हुआ, क्या वह अधिकारी के आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ा था, आरोपी किस कानूनी श्रेणी में आता है और संबंधित मामले में अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता है या नहीं।
BNSS की धारा 218 इसी कानूनी संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के कारण होने वाली अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई से संरक्षण देना है, लेकिन यह संरक्षण असीमित नहीं है। आरोप की प्रकृति और सरकारी कार्य से उसके वास्तविक संबंध की जांच हर मामले में महत्वपूर्ण रहेगी।
ऐसे में मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय का ताजा निर्देश और लोकायुक्त के 295 लंबित अभियोजन स्वीकृति वाले मामले दोनों एक ही बड़े सवाल की ओर इशारा करते हैं—सरकारी अधिकारियों को कानूनी संरक्षण देते हुए भ्रष्टाचार और गंभीर अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई को समयबद्ध और निष्पक्ष कैसे रखा जाए।
आने वाले समय में सरकार की ओर से लंबित अभियोजन स्वीकृति वाले मामलों पर लिए जाने वाले फैसले इस बहस को और महत्वपूर्ण बना सकते हैं। एक तरफ अधिकारियों के काम करने की स्वतंत्रता और दूसरी तरफ सार्वजनिक पद पर जवाबदेही—दोनों के बीच संतुलन ही इस पूरी व्यवस्था की असली कसौटी होगी।