पांच दिवसीय बैंकिंग की मांग पर बैंककर्मियों की हड़ताल, झांसी की 238 शाखाओं में ठप रहा कामकाज
बैंक यूनियनों के आह्वान पर एक दिनी हड़ताल, करीब 800 करोड़ रुपये के कारोबार के प्रभावित होने का दावा
झांसी। सप्ताह में पांच दिन बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की मांग को लेकर शुक्रवार को बैंक कर्मचारियों ने एक दिन की हड़ताल की। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के बैनर तले आयोजित इस हड़ताल में सरकारी बैंकों के साथ कई निजी बैंक कर्मचारियों ने भी हिस्सा लिया। हड़ताल के चलते जिले की बड़ी संख्या में बैंक शाखाओं में सामान्य बैंकिंग सेवाएं प्रभावित रहीं। यूनियन नेताओं के अनुसार, झांसी जनपद की करीब 238 बैंक शाखाओं में कामकाज पूरी तरह ठप रहा।
बैंक कर्मचारियों के काम पर नहीं आने का सीधा असर ग्राहकों और बैंकिंग कारोबार पर दिखाई दिया। शाखाओं में लेनदेन, चेक जमा करने, भुगतान, बैंकिंग संबंधी अन्य कार्यों सहित कई सेवाएं प्रभावित हुईं। हड़ताल के कारण बड़ी संख्या में चेक क्लियरिंग प्रक्रिया में अटकने की बात भी सामने आई है। यूनियन नेताओं ने दावा किया कि एक दिन की हड़ताल से झांसी में करीब 800 करोड़ रुपये का बैंकिंग कारोबार प्रभावित हुआ।
हड़ताल को लेकर बैंक यूनियनों का कहना है कि पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है। बैंक कर्मचारियों का तर्क है कि सप्ताह में पांच दिन काम करने की व्यवस्था कई क्षेत्रों में पहले से लागू है और बैंकिंग क्षेत्र में भी इसे लागू करने का प्रस्ताव पहले ही सामने आ चुका है। इसके बावजूद इस दिशा में निर्णय लंबित है।
सेंट्रल बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय पर जुटे बैंककर्मी
हड़ताल के दौरान बैंक कर्मचारियों ने ग्वालियर रोड स्थित सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के क्षेत्रीय कार्यालय पर एकत्र होकर प्रदर्शन किया। अलग-अलग बैंक यूनियनों से जुड़े कर्मचारी यहां पहुंचे और अपनी मांगों के समर्थन में नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान बैंककर्मियों ने सरकार की नीतियों पर नाराजगी जताई और पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की मांग दोहराई।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि बैंकिंग क्षेत्र में काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ग्राहकों की संख्या, डिजिटल बैंकिंग से जुड़ी जिम्मेदारियां, विभिन्न सरकारी योजनाओं का संचालन, लक्ष्य आधारित कार्य और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों के कारण कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ा है। ऐसे में सप्ताह में छह दिन बैंक खोलने की व्यवस्था को बदलने की जरूरत है।
यूनियन नेताओं ने कहा कि बैंक कर्मचारियों को सप्ताह में दो दिन अवकाश मिलने से न केवल उन्हें राहत मिलेगी, बल्कि काम के दौरान उनकी कार्यक्षमता और उत्पादकता भी बेहतर हो सकती है। कर्मचारियों का मानना है कि लगातार काम के दबाव के बीच पर्याप्त साप्ताहिक अवकाश मिलना जरूरी है।
दो साल पहले हुआ था समझौता, फिर भी लागू नहीं हुई व्यवस्था
बैंक यूनियनों के अनुसार पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था की मांग केवल कर्मचारियों की वर्तमान मांग नहीं है, बल्कि इस दिशा में पहले से सहमति बन चुकी है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के पदाधिकारियों ने बताया कि करीब दो साल पहले इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) और बैंक प्रबंधन के बीच समझौता हुआ था।
इस समझौते में पांच दिन बैंकिंग व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव शामिल था। इसके तहत सोमवार से शुक्रवार तक बैंकिंग कार्य करने और प्रतिदिन करीब 40 मिनट अतिरिक्त काम करने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी। कर्मचारियों का कहना है कि इस व्यवस्था से सप्ताह के कुल कार्य समय को संतुलित किया जा सकता है और शनिवार को बैंक बंद रखने का रास्ता भी साफ हो सकता है।
यूनियन नेताओं का आरोप है कि समझौते के बावजूद सरकार की ओर से इसे लागू करने में टालमटोल की जा रही है। इसी वजह से बैंक कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।
प्रदर्शन के दौरान संयोजक अशोक कुमार महावर ने कहा कि बैंक कर्मचारियों ने पहले भी इस मुद्दे को लेकर अपनी बात रखी है। उनका कहना था कि जब बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े पक्षों के बीच इस संबंध में समझौता हो चुका है तो इसे लागू करने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।
उनके मुताबिक कर्मचारी अपनी मांग को लेकर लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन मांग पूरी नहीं होने के कारण आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
बैंकिंग का काम लगातार तनावपूर्ण होने का दावा
प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र में काम अब पहले की तुलना में कहीं अधिक दबाव वाला हो गया है। बैंक कर्मचारियों को नियमित बैंकिंग कार्य के साथ-साथ कई अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं।
ग्राहकों की बढ़ती अपेक्षाएं, ऑनलाइन और डिजिटल बैंकिंग से संबंधित समस्याओं का समाधान, बैंकिंग नियमों के अनुपालन की जिम्मेदारी तथा विभिन्न योजनाओं और अभियानों से संबंधित काम कर्मचारियों के दैनिक कार्य का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त आराम और पारिवारिक समय मिलना जरूरी है।
बैंक यूनियनों ने पांच दिवसीय बैंकिंग को कर्मचारियों के हित के साथ-साथ बैंकिंग व्यवस्था के लिए भी उपयोगी बताया। उनका कहना है कि यदि कर्मचारियों को शनिवार और रविवार लगातार दो दिन अवकाश मिलता है तो वे मानसिक रूप से अधिक तरोताजा रहेंगे और अगले कार्य सप्ताह में बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे।
वक्ताओं ने कहा कि बैंकिंग कार्य स्वभाव से ही जिम्मेदारी और समयबद्धता वाला काम है। छोटी सी गलती भी ग्राहक के आर्थिक हित को प्रभावित कर सकती है। इसलिए कर्मचारियों के लिए पर्याप्त आराम और तनावमुक्त वातावरण जरूरी है।
हड़ताल से चेक क्लियरिंग और लेनदेन पर असर
एक दिन की हड़ताल का असर बैंकिंग व्यवस्था के कई हिस्सों पर दिखाई दिया। शाखाओं में सामान्य कामकाज बाधित होने के कारण ग्राहकों को बैंक संबंधी कार्यों के लिए इंतजार करना पड़ा। चेक जमा करने और उनके निस्तारण की प्रक्रिया पर भी असर पड़ा।
यूनियन नेताओं ने दावा किया कि करोड़ों रुपये के चेक क्लियरिंग हाउस में अटक गए। हालांकि डिजिटल बैंकिंग और एटीएम जैसी सेवाएं कई स्थानों पर उपलब्ध रहीं, लेकिन शाखा स्तर पर होने वाले कार्यों के प्रभावित होने से ग्राहकों को परेशानी हुई।
व्यापारियों और ऐसे ग्राहकों को विशेष दिक्कत का सामना करना पड़ा जिन्हें चेक संबंधी काम, बैंक ड्राफ्ट, नकद लेनदेन या अन्य शाखा आधारित सेवाओं की आवश्यकता थी। बैंक कर्मचारियों के वापस काम पर लौटने के बाद लंबित काम निपटाने में अतिरिक्त समय लगने की संभावना भी जताई गई।
यूनियन नेताओं ने इसी आधार पर दावा किया कि हड़ताल से झांसी में करीब 800 करोड़ रुपये का बैंकिंग कारोबार प्रभावित हुआ। यह आंकड़ा यूनियन की ओर से बताया गया है।
निजी बैंकों में हड़ताल का असर पूरी तरह एक जैसा नहीं रहा
हड़ताल के दौरान जहां कई बैंक शाखाओं में कामकाज प्रभावित हुआ, वहीं कुछ निजी बैंक शाखाओं में इसका असर सीमित दिखाई दिया। शहर की एसबीआई, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, यस बैंक और आईडीएफसी बैंक की कुछ शाखाओं में सामान्य कामकाज चलता रहा।
इन शाखाओं में बैंकिंग गतिविधियां जारी रहीं। यूनियन नेताओं की ओर से काम बंद कराने के लिए कुछ स्थानों पर पहुंचने की बात भी सामने आई, लेकिन संबंधित शाखाओं में कामकाज पूरी तरह बंद नहीं हुआ।
हालांकि यूनियन पदाधिकारियों का कहना था कि निजी क्षेत्र के इन बैंकों की सभी शाखाओं में स्थिति एक जैसी नहीं रही और कुछ अन्य शाखाओं में भी हड़ताल का असर पड़ा। यूनियन नेताओं ने कुल मिलाकर हड़ताल को सफल बताया।
इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि पांच दिवसीय बैंकिंग को लेकर बैंकिंग क्षेत्र में आंदोलन का असर बैंक-दर-बैंक और शाखा-दर-शाखा अलग-अलग रहा।
कर्मचारियों ने आगे के आंदोलन की चेतावनी दी
एक दिन की हड़ताल के दौरान बैंक यूनियनों ने साफ कर दिया कि यदि उनकी मांग पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रदर्शन के दौरान नेताओं ने 28, 29 और 30 सितंबर को दोबारा अखिल भारतीय हड़ताल किए जाने का अल्टीमेटम दिया।
यूनियन नेताओं का कहना है कि पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था को लेकर कर्मचारियों में लगातार असंतोष बढ़ रहा है। यदि सरकार ने इस दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाया तो आने वाले दिनों में आंदोलन और व्यापक हो सकता है।
हालांकि लगातार तीन दिन की प्रस्तावित हड़ताल का अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उससे पहले सरकार और बैंकिंग क्षेत्र के संबंधित पक्षों के बीच बातचीत में क्या प्रगति होती है।
बैंकिंग सेवाओं पर निर्भर ग्राहकों की बढ़ सकती है परेशानी
बैंक कर्मचारियों की हड़ताल का सबसे प्रत्यक्ष असर आम ग्राहकों पर पड़ता है। खासकर ऐसे ग्राहक जो डिजिटल बैंकिंग का इस्तेमाल नहीं करते या जिनका काम शाखा में जाकर ही पूरा हो सकता है, उन्हें हड़ताल के दौरान परेशानी उठानी पड़ती है।
पेंशन, सरकारी भुगतान, चेक संबंधी कार्य, नकद जमा और निकासी, बैंक खाते से जुड़े दस्तावेजी कार्य तथा अन्य शाखा आधारित सेवाओं के लिए ग्राहकों को बैंक खुलने का इंतजार करना पड़ता है।
व्यापारियों के लिए भी बैंकिंग सेवाओं का नियमित संचालन महत्वपूर्ण है। बड़ी रकम का भुगतान, चेक क्लियरेंस और बैंक से संबंधित अन्य कार्य प्रभावित होने पर व्यापारिक गतिविधियों की गति धीमी पड़ सकती है।
यही कारण है कि बैंक यूनियनों की हड़ताल का प्रभाव केवल बैंक कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर सीधे बैंक ग्राहकों, कारोबारियों और बैंकिंग लेनदेन पर दिखाई देता है।
पांच दिवसीय बैंकिंग क्यों चाहते हैं कर्मचारी?
बैंक कर्मचारियों की मुख्य मांग सप्ताह में पांच दिन बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की है। वर्तमान व्यवस्था में अधिकांश बैंक शाखाएं सोमवार से शनिवार तक कार्य करती हैं, हालांकि कई शनिवार अवकाश के होते हैं। कर्मचारी चाहते हैं कि बैंकिंग कार्य सप्ताह के केवल पांच दिनों में सीमित किया जाए।
यूनियन का तर्क है कि यदि सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना निर्धारित समय में कुछ अतिरिक्त कार्य कराया जाए तो सप्ताह के कुल कार्य घंटों को संतुलित किया जा सकता है। इससे शनिवार और रविवार लगातार अवकाश के रूप में मिल सकते हैं।
कर्मचारियों का मानना है कि लगातार दो दिन अवकाश मिलने से वे व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से पूरा कर पाएंगे। इससे मानसिक तनाव कम होगा और कार्यस्थल पर कर्मचारियों की उत्पादकता भी बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, बैंकिंग सेवाओं के नियमित संचालन के लिए ग्राहकों की जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। पांच दिवसीय बैंकिंग लागू होने की स्थिति में डिजिटल बैंकिंग, एटीएम, मोबाइल बैंकिंग और अन्य वैकल्पिक सेवाओं की भूमिका और बढ़ सकती है।
अब सरकार के रुख पर नजर
झांसी में हुई एक दिन की हड़ताल ने एक बार फिर पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था की मांग को चर्चा में ला दिया है। बैंक कर्मचारी संगठनों ने अपना पक्ष मजबूती से रखा है और सरकार पर पूर्व में हुए समझौते को लागू करने का दबाव बनाया है।
हड़ताल के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि सरकार और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े संगठन इस मांग पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि बातचीत के जरिए समाधान निकलता है तो प्रस्तावित अगली अखिल भारतीय हड़ताल को टाला जा सकता है। लेकिन यदि मांग पर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई तो सितंबर के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित आंदोलन का असर देशभर की बैंकिंग सेवाओं पर पड़ सकता है।
फिलहाल झांसी में हुई हड़ताल ने यह जरूर दिखा दिया है कि पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था को लेकर बैंक कर्मचारियों के बीच असंतोष गंभीर है। कर्मचारियों ने एक दिन काम बंद रखकर अपनी मांग सरकार तक पहुंचाई है और अब आगे की रणनीति के लिए 28, 29 और 30 सितंबर की तारीखों का अल्टीमेटम दिया है।
प्रदर्शन के दौरान अध्यक्षता मनोज यादव और आशीष तिवारी ने की। इस मौके पर उप संयोजक जितेंद्र अग्रवाल, संजीव लिटोरिया, जेके गुप्ता, धर्मेंद्र यादव, यशपाल सिंह, मनीष प्रजापति, अमित साहू, दीपेश माहौर और अविनाश चौबे सहित बड़ी संख्या में बैंक कर्मचारी मौजूद रहे।
आने वाले दिनों में सरकार और बैंक यूनियनों के बीच बातचीत इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी। कर्मचारियों की मांग है कि लंबे समय से लंबित पांच दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था को अब और टाला न जाए, जबकि बैंकिंग सेवाओं पर निर्भर ग्राहकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह रहेगी कि भविष्य में होने वाले आंदोलन से सामान्य बैंकिंग व्यवस्था कितनी प्रभावित होती है।