IndianLawNotes.com

दिल्ली PG हादसा: 7 मौतों के बाद हाईकोर्ट सख्त, सभी PG की होगी सुरक्षा जांच; MCD के 5 अफसर निलंबित

दिल्ली PG हादसा: 7 मौतों के बाद हाईकोर्ट सख्त, सभी PG की होगी सुरक्षा जांच; MCD के 5 अफसर निलंबित

       राजधानी दिल्ली में पीजी की इमारत ढहने से हुए दर्दनाक हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। हादसे के बाद करीब 27 घंटे तक लगातार चले बचाव और राहत अभियान के बाद सोमवार शाम मलबा हटाने का काम पूरा कर लिया गया। इस दौरान मलबे से कुल 12 लोगों को बाहर निकाला गया। इनमें पांच छात्रों समेत सात लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि पांच घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अस्पताल में भर्ती घायलों में तीन की हालत गंभीर बताई जा रही है।

हादसे के बाद जहां एक ओर पीड़ित परिवारों में मातम का माहौल है, वहीं दूसरी ओर राजधानी में पीजी भवनों की सुरक्षा व्यवस्था, अवैध निर्माण और संबंधित सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने हादसे को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पीजी मालिक को जिम्मेदार ठहराकर दिल्ली सरकार अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस तरह की घटनाओं में सिर्फ भवन मालिक की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं है। भवन की मंजूरी, निर्माण नियमों का पालन, निरीक्षण और सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए जिम्मेदार सरकारी एजेंसियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

पीजी मालिक पत्नी और बेटे समेत गिरफ्तार

हादसे के बाद पुलिस ने पीजी के मालिक हरिराम गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया है। उसके साथ उसकी पत्नी और बेटे को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई के बीच अब यह जांच की जा रही है कि पीजी भवन का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ था और क्या इसमें निर्धारित भवन नियमों का पालन किया गया था।

हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि भवन में किसी तरह की निर्माण संबंधी अनियमितता या सुरक्षा संबंधी कमी थी, तो संबंधित विभागों के निरीक्षण के दौरान वह सामने क्यों नहीं आई। यदि भवन में स्वीकृत मानकों के विपरीत निर्माण किया गया था, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

इन्हीं सवालों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने पूरे मामले में उच्चस्तरीय जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा- सिर्फ मालिक को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं

पीजी हादसे से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और नगर निगम की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि किसी भी हादसे के बाद केवल संपत्ति के मालिक को जिम्मेदार ठहराने से सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि भवन निर्माण की अनुमति, भवन नियमों का पालन, निरीक्षण और सुरक्षा से जुड़े मामलों में कई सरकारी संस्थाओं की भूमिका होती है। ऐसे में यदि किसी भवन में अवैध निर्माण हुआ या वह सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता था, तो यह भी देखा जाना जरूरी है कि संबंधित अधिकारियों ने समय रहते क्या कदम उठाए।

हाईकोर्ट ने नगर निगम को पूरे मामले में उच्चस्तरीय जांच करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो उनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी अदालत को दी जानी चाहिए।

दिल्ली के सभी PG की होगी सुरक्षा जांच

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में संचालित सभी पीजी भवनों की सुरक्षा व्यवस्था की जांच करने के निर्देश दिए हैं। अदालत का यह आदेश हादसे के बाद बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि दिल्ली में बड़ी संख्या में छात्र और नौकरीपेशा युवा पीजी में रहते हैं।

अदालत ने कहा है कि पीजी भवनों की जांच केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। भवनों की वास्तविक स्थिति, निर्माण की वैधता और वहां रहने वाले लोगों की संख्या जैसे पहलुओं को भी जांच में शामिल किया जाना चाहिए।

नगर निगम से यह जानकारी भी मांगी गई है कि पीजी भवनों को किस प्रकार की मंजूरियां दी गई हैं, किन भवनों में भवन नियमों का उल्लंघन हुआ है और इन भवनों में कितने छात्र या अन्य लोग रह रहे हैं।

अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि यदि जांच के दौरान किसी भवन में अवैध निर्माण पाया जाता है तो केवल भवन मालिक के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। यह भी देखा जाएगा कि संबंधित अधिकारियों ने उस अवैध निर्माण को रोकने या उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए क्या कदम उठाए थे।

डीयू के छात्रावासों का भी मांगा ब्योरा

पीजी में रहने वाले बड़ी संख्या में छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कॉलेजों में पढ़ते हैं। हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय से सरकारी छात्रावासों का विवरण भी मांगा है।

अदालत के सामने यह सवाल भी है कि यदि विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों के पास पर्याप्त छात्रावास की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो बड़ी संख्या में छात्रों को निजी पीजी और किराए के भवनों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में इन निजी भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, एमसीडी, दिल्ली पुलिस और मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करते हुए 10 दिन के भीतर जवाब मांगा है।

इससे साफ है कि अदालत इस मामले को केवल एक इमारत गिरने की घटना के रूप में नहीं देख रही, बल्कि दिल्ली में भवन सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े व्यापक मुद्दे के तौर पर इसकी जांच कर रही है।

पांच अधिकारियों पर गिरी गाज

हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम ने अपने पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। इनमें दक्षिण जोन के उपायुक्त राकेश कुमार, अधीक्षण अभियंता रणवीर सिंह, भवन विभाग के कार्यकारी अभियंता ललित गोयल, सहायक अभियंता सुनील चौहान और कनिष्ठ अभियंता आशीष कुमार शामिल हैं।

एमसीडी के अनुसार, इन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई लंबित रहने तक निलंबन जारी रहेगा।

अधिकारियों के निलंबन के बाद एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि भवन सुरक्षा से जुड़े निरीक्षण और कार्रवाई की जिम्मेदारी निभाने वाली व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि किसी भवन की स्थिति पहले से खराब थी या उसमें नियमों का उल्लंघन किया गया था, तो संबंधित विभागों को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली।

यही कारण है कि हादसे के बाद सिर्फ एक भवन की जांच के बजाय पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

आज से खतरनाक इमारतों पर चलेगा बुलडोजर

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद नगर निगम ने खतरनाक घोषित की गई इमारतों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। मंगलवार से ऐसी इमारतों को गिराने की कार्रवाई शुरू की जाएगी। बताया गया है कि 51 इमारतों को ध्वस्त किया जाना है।

इन इमारतों को पहले से खतरनाक घोषित किया जा चुका है। ऐसे में हादसे के बाद निगम के सामने चुनौती यह है कि इन भवनों पर कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि वास्तव में जोखिम वाली इमारतों को चिन्हित कर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में पुराने और कमजोर भवनों की संख्या काफी अधिक है। कई इलाकों में मकान आपस में सटे हुए हैं और उनमें लगातार अतिरिक्त निर्माण होता रहता है। ऐसे में किसी एक भवन की संरचनात्मक कमजोरी आसपास के लोगों के लिए भी खतरा बन सकती है।

भवन सुरक्षा सर्वेक्षण पर भी सवाल

इस हादसे ने एमसीडी के भवन सुरक्षा सर्वेक्षण की प्रक्रिया को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल राजधानी में 30,66,188 मकानों का सर्वे किया गया। इनमें से केवल 51 भवनों को खतरनाक पाया गया।

सबसे अधिक 19 खतरनाक भवन करोलबाग जोन में पाए गए हैं।

हालांकि सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर किए जाने वाले सर्वेक्षण में भवनों की वास्तविक संरचनात्मक स्थिति का आकलन किस स्तर पर किया जाता है। यदि किसी भवन की जांच केवल बाहरी स्थिति देखकर की जाती है, तो उसकी अंदरूनी संरचनात्मक कमजोरी सामने आना मुश्किल हो सकता है।

जानकारों का कहना है कि केवल दीवारों में दिखाई देने वाली दरार या भवन के झुकाव को देखकर किसी इमारत की सुरक्षा का अंतिम निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। भवन की नींव, कॉलम, बीम, स्लैब और अन्य संरचनात्मक हिस्सों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।

यदि किसी भवन में वर्षों से अनधिकृत तरीके से अतिरिक्त मंजिलें या कमरे बनाए गए हों, तो इससे भवन पर भार बढ़ सकता है। ऐसे मामलों में सिर्फ दृश्य निरीक्षण पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

दिल्ली में अवैध निर्माण भी बड़ी चुनौती

दिल्ली में अवैध और अनधिकृत निर्माण लंबे समय से प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों और जानकारों के अनुसार राजधानी के करीब 75 लाख आवासों में से केवल लगभग 1.25 लाख के पास स्वीकृत लेआउट प्लान होने की बात सामने आती है।

यह आंकड़ा दिल्ली में भवन नियमन की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। बड़ी संख्या में भवन ऐसे क्षेत्रों में मौजूद हैं जहां समय के साथ मूल निर्माण में बदलाव किए गए हैं। कई मकानों में अतिरिक्त कमरे, मंजिलें या अन्य संरचनाएं बनाई जाती रही हैं।

ऐसे निर्माण के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियमों का उल्लंघन होने के बावजूद संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

वर्ष 2007 के दिल्ली विशेष अधिनियम जैसे कानूनी प्रावधानों के कारण भी लंबे समय से कई तरह के निर्माणों पर कार्रवाई को लेकर जटिल स्थिति बनी रही है। इसके चलते अनधिकृत निर्माण और अनियोजित विस्तार की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है।

सोशल मीडिया पर हादसे के वीडियो को लेकर भी चिंता

सुनवाई के दौरान हादसे के बाद सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे वीडियो को लेकर भी चिंता जताई गई। केंद्र, एमसीडी और दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां हर संभव कदम उठा रही हैं।

उन्होंने घायल लोगों या मलबे में फंसे लोगों के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि किसी त्रासदी को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए।

अदालत ने भी इस पहलू पर विचार करने की बात कही। हादसे के दौरान राहत एवं बचाव कार्य में जुटी एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना होती है। ऐसे समय में अफवाहों और अपुष्ट सूचनाओं के प्रसार से स्थिति और जटिल हो सकती है।

दूसरी बार बिल्डिंग हादसे में उपायुक्त पर कार्रवाई

एमसीडी में किसी भवन हादसे के बाद उपायुक्त स्तर के अधिकारी पर कार्रवाई का यह पहला मामला नहीं है। वर्ष 2008 में न्यू उस्मानपुर-सीलमपुर भवन हादसे के बाद शाहदरा जोन के तत्कालीन उपायुक्त एके सिंह को निलंबित किया गया था।

अब दिल्ली के इस पीजी हादसे के बाद दक्षिण जोन के उपायुक्त राकेश कुमार के निलंबन ने एक बार फिर अधिकारियों की जवाबदेही का मुद्दा सामने ला दिया है।

हालांकि किसी अधिकारी का निलंबन अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। विभागीय जांच के बाद ही यह तय होगा कि संबंधित अधिकारियों की वास्तविक भूमिका क्या थी और उनकी ओर से किसी स्तर पर लापरवाही हुई या नहीं।

हादसे ने कई पुराने सवाल फिर खड़े किए

दिल्ली का यह हादसा केवल सात लोगों की मौत की खबर नहीं है। इसने राजधानी में भवन सुरक्षा, पीजी व्यवस्था, अवैध निर्माण और सरकारी निगरानी से जुड़े कई पुराने सवाल फिर सामने ला दिए हैं।

पीजी में रहने वाले छात्र और नौकरीपेशा लोग अक्सर ऐसी इमारतों में रहते हैं जहां कम जगह में अधिक लोगों को रखा जाता है। यदि भवन की क्षमता से अधिक लोगों को रखा जाए या बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त कमरे बनाए जाएं, तो किसी आपात स्थिति में खतरा कई गुना बढ़ सकता है।

ऐसे में केवल हादसे के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि पीजी भवनों का नियमित और वास्तविक सुरक्षा ऑडिट हो। भवन की क्षमता के अनुसार ही लोगों को रहने की अनुमति दी जाए। अग्नि सुरक्षा, निकासी मार्ग, संरचनात्मक मजबूती और बिजली व्यवस्था जैसे पहलुओं की भी समय-समय पर जांच हो।

अब जांच से तय होगी जिम्मेदारी

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद आने वाले दिनों में इस मामले की जांच का दायरा और बढ़ने की संभावना है। पुलिस की जांच में जहां पीजी मालिक और उसके परिवार के सदस्यों की भूमिका देखी जाएगी, वहीं एमसीडी और अन्य संबंधित विभागों की जिम्मेदारी भी जांच के केंद्र में रहेगी।

अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो उनकी जवाबदेही तय करनी होगी। यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

हादसे में जान गंवाने वाले सात लोगों के परिवारों के लिए कोई भी कार्रवाई उनके अपनों को वापस नहीं ला सकती। लेकिन यदि जांच निष्पक्ष तरीके से होती है और भवन सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों को दूर किया जाता है, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

दिल्ली में हजारों छात्र और युवा निजी पीजी में रहते हैं। उनके लिए सुरक्षित भवन केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि जीवन और सुरक्षा का सवाल है। इसलिए इस हादसे के बाद होने वाली कार्रवाई का महत्व सिर्फ एक इमारत तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट की निगरानी में होने वाली जांच और सभी पीजी के सुरक्षा ऑडिट से यह तय होगा कि प्रशासन इस हादसे से वास्तव में कितना सबक लेता है और राजधानी में भवन सुरक्षा व्यवस्था को कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है।