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लोन चुकाने के बाद भी SBI ने नहीं लौटाए प्रॉपर्टी के असली कागजात, बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाया ₹5,000 रोजाना मुआवजा

लोन चुकाने के बाद भी SBI ने नहीं लौटाए प्रॉपर्टी के असली कागजात, बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाया ₹5,000 रोजाना मुआवजा

       मुंबई: अगर आपने बैंक से लिया हुआ प्रॉपर्टी लोन पूरी तरह चुका दिया है और बैंक के पास आपकी संपत्ति के मूल दस्तावेज जमा हैं, तो उन्हें वापस लेना आपका महत्वपूर्ण अधिकार है। ऐसे में यदि बैंक की लापरवाही के कारण आपके ओरिजिनल प्रॉपर्टी दस्तावेज खो जाएं, तो इसका असर केवल कागजों तक सीमित नहीं रहता। संपत्ति बेचने, उसका हस्तांतरण करने, मालिकाना हक साबित करने और दूसरी कानूनी प्रक्रियाओं में भी गंभीर परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।

ऐसे ही एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक यानी SBI को कड़ी फटकार लगाते हुए प्रभावित फर्म के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने बैंक को प्रतिदिन 5,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। यह राशि उस समय से लागू होगी, जब से बैंक पर दस्तावेज लौटाने की जिम्मेदारी बनती थी और तब तक जारी रहेगी, जब तक बैंक अदालत के निर्देश के मुताबिक जरूरी दस्तावेज और प्रमाण तैयार करके संबंधित फर्म को उपलब्ध नहीं करा देता।

यह फैसला केवल एक बैंक और एक फर्म के बीच विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह उन सभी बैंक ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने लोन के बदले अपनी संपत्ति के मूल दस्तावेज बैंक के पास जमा किए हैं।

1979 में लिया गया था बैंक से लोन

यह पूरा मामला इन वोग क्रिएशन्स नाम की फर्म से जुड़ा है। फर्म ने वर्ष 1979 में भारतीय स्टेट बैंक की दादर कमर्शियल ब्रांच से लोन लिया था। बैंक से ऋण प्राप्त करने के लिए फर्म ने अपनी कुछ संपत्तियों से जुड़े मूल दस्तावेज बैंक के पास गिरवी रखे थे।

इन दस्तावेजों में मुंबई के प्रभादेवी इलाके में स्थित दो कमर्शियल यूनिट्स से संबंधित कागजात के अलावा पनवेल में स्थित एक प्लॉट से जुड़े दस्तावेज भी शामिल थे।

बैंक के पास रखे गए दस्तावेजों में ओरिजिनल लीज डीड, शेयर सर्टिफिकेट्स और एग्रीमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण कागजात शामिल थे। किसी संपत्ति के मालिकाना हक और उसके वैध हस्तांतरण के लिए ऐसे मूल दस्तावेजों का महत्व काफी अधिक होता है।

फर्म ने कई वर्षों तक बैंक के साथ ऋण संबंध बनाए रखे और अंततः 28 अगस्त 2003 को पूरा लोन चुका दिया। लोन का भुगतान पूरा होने के बाद SBI ने फर्म को नो ड्यूज सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया।

यानी बैंक और ग्राहक के बीच ऋण संबंध समाप्त हो चुका था और सामान्य स्थिति में बैंक को गिरवी रखे गए मूल दस्तावेज ग्राहक को वापस कर देने चाहिए थे।

लेकिन यहां से विवाद शुरू हुआ।

कर्ज चुकाने के बाद भी नहीं मिले मूल दस्तावेज

लोन पूरी तरह चुका दिए जाने के बावजूद फर्म को अपने मूल प्रॉपर्टी दस्तावेज वापस नहीं मिले। लंबे समय तक यह मामला सामने नहीं आया। बाद में जब फर्म ने अपनी संपत्तियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की और संबंधित मूल कागजात की आवश्यकता पड़ी, तब उसने SBI से दस्तावेज मांगे।

इसी दौरान बैंक की ओर से यह बताया गया कि उसके पास रखे गए मूल दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं हैं।

बैंक ने स्वीकार किया कि दस्तावेज उसकी कस्टडी में रहते हुए खो गए थे।

फर्म के लिए यह स्थिति बेहद परेशानी वाली थी। जिस संपत्ति के मूल कागजात बैंक के भरोसे पर उसके पास जमा किए गए थे, वही दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं थे। परिणामस्वरूप संपत्ति के संबंध में आगे की प्रक्रिया प्रभावित होने लगी।

फर्म का कहना था कि मूल दस्तावेज न होने की वजह से संपत्ति को बेचने में गंभीर कठिनाई पैदा हो रही थी। इसके अलावा स्टांप ड्यूटी और मालिकाना हक से जुड़े मामलों में भी दस्तावेजों की कमी समस्या बन रही थी।

बैंक ने 15 साल की देरी का दिया तर्क

SBI ने अपने बचाव में यह तर्क दिया कि लोन वर्ष 2003 में चुका दिया गया था, जबकि फर्म ने लगभग 15 साल बाद दस्तावेजों की मांग की।

बैंक की ओर से यह भी कहा गया कि इस दौरान संबंधित बैंक शाखा दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुकी थी और स्टाफ में भी बदलाव हो गया था। ऐसे में पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेजों को लेकर कठिनाई पैदा होना बैंक के अनुसार एक व्यावहारिक समस्या थी।

लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने साफ किया कि बैंक के अंदर शाखा का स्थान बदलना या कर्मचारियों का तबादला होना बैंक की आंतरिक व्यवस्था का हिस्सा है। ग्राहक को उसकी वजह से होने वाली परेशानी का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

दूसरे शब्दों में, बैंक की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था ग्राहक के अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती।

बैंकिंग लोकपाल तक पहुंचा मामला

मूल दस्तावेज नहीं मिलने के बाद फर्म ने पहले बैंकिंग लोकपाल के समक्ष अपनी शिकायत रखी।

मामले पर विचार करने के बाद बैंकिंग लोकपाल ने SBI को फर्म को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का सुझाव दिया।

बैंक ने इस राशि को फर्म के खाते में ट्रांसफर भी कर दिया। लेकिन फर्म इससे संतुष्ट नहीं हुई।

फर्म का तर्क था कि समस्या केवल एक निश्चित रकम के भुगतान से खत्म नहीं हो सकती। उसके मूल दस्तावेज बैंक की कस्टडी में थे और उनके खो जाने से संपत्ति के इस्तेमाल और बिक्री पर वास्तविक प्रभाव पड़ा था।

इसके बाद फर्म ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने बैंक की जिम्मेदारी पर क्या कहा?

मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखाद की डिवीजन बेंच ने की।

अदालत ने मामले में SBI की ओर से दिए गए तर्कों पर गंभीरता से विचार किया और स्पष्ट किया कि जब ग्राहक ने बैंक का पूरा कर्ज चुका दिया है, तब बैंक के पास ग्राहक के मूल दस्तावेज अपने पास रखने का कोई उचित आधार नहीं बचता।

लोन की सुरक्षा के तौर पर जो दस्तावेज बैंक के पास रखे गए थे, उनका उद्देश्य ऋण की सुरक्षा था। जब ऋण पूरी तरह चुकता हो गया, तो उस सुरक्षा का आधार भी समाप्त हो गया।

ऐसे में दस्तावेजों को ग्राहक को वापस करना बैंक की जिम्मेदारी थी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक की शाखा बदलने, रिकॉर्ड के स्थानांतरण या कर्मचारियों के बदलने जैसी परिस्थितियां ग्राहक के अधिकारों पर असर नहीं डाल सकतीं।

अगर बैंक के रिकॉर्ड प्रबंधन में कोई कमी है तो उसका समाधान बैंक को खुद करना होगा।

RBI के 2023 के सर्कुलर का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में भारतीय रिजर्व बैंक के 13 सितंबर 2023 के सर्कुलर का भी उल्लेख किया।

इसमें लोन की पूरी अदायगी या सेटलमेंट के बाद बैंक द्वारा संपत्ति से संबंधित मूल दस्तावेज लौटाने के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

निर्देशों के मुताबिक, बैंक को लोन चुकता होने के बाद निर्धारित अवधि के भीतर संबंधित मूल दस्तावेज वापस करने होते हैं। यदि बैंक की गलती के कारण दस्तावेज लौटाने में देरी होती है तो ग्राहक को प्रतिदिन 5,000 रुपये की दर से मुआवजा देना पड़ सकता है।

यही व्यवस्था इस मामले में भी महत्वपूर्ण बन गई।

अदालत ने माना कि बैंक की जिम्मेदारी केवल यह कह देने से खत्म नहीं हो जाती कि दस्तावेज पुराने हैं या शाखा बदल चुकी है। ग्राहक ने जब अपनी संपत्ति के मूल दस्तावेज बैंक को सौंपे थे, तब बैंक उनके सुरक्षित रखरखाव के लिए जिम्मेदार था।

₹5,000 प्रतिदिन के हिसाब से देना होगा मुआवजा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने SBI को प्रभावित फर्म के पक्ष में प्रतिदिन 5,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

यह मुआवजा 1 दिसंबर 2023 से लागू होगा और उस समय तक जारी रहेगा, जब तक बैंक अदालत के निर्देश के अनुसार आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी नहीं कर देता।

अदालत ने बैंक को केवल आर्थिक मुआवजा देने तक सीमित नहीं रखा। उसे संबंधित दस्तावेजों के स्थान पर जरूरी प्रमाण तैयार करने की प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी।

इसमें प्रमाणित प्रतियां, हलफनामे और इंडेम्निटी बॉन्ड जैसे दस्तावेज तैयार करना शामिल है, ताकि फर्म को अपनी संपत्ति से जुड़े अधिकारों के संबंध में भविष्य में अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

पहले दिए गए 1 लाख रुपये भी होंगे एडजस्ट

बैंकिंग लोकपाल के निर्देश के बाद SBI ने फर्म के खाते में पहले ही 1 लाख रुपये जमा कर दिए थे।

हाईकोर्ट ने इस राशि को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया। अदालत ने निर्देश दिया कि पहले से भुगतान की गई यह रकम अब कुल मुआवजे की राशि में समायोजित की जाएगी।

इसका मतलब यह है कि SBI को पहले से दिए गए 1 लाख रुपये के अतिरिक्त, अदालत के आदेश के अनुसार बनने वाली कुल मुआवजा राशि का शेष हिस्सा देना होगा।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बैंक की ओर से पहले किया गया भुगतान मामले को पूरी तरह समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।

12 सप्ताह में पूरी करनी होगी प्रक्रिया

अदालत ने SBI को इस मामले में कार्रवाई पूरी करने के लिए 12 सप्ताह की समय सीमा भी निर्धारित की है।

बैंक को इस अवधि के भीतर आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करनी होगी और फर्म को वे प्रमाण उपलब्ध कराने होंगे जिनकी जरूरत उसकी संपत्तियों के संबंध में हो सकती है।

यह समय सीमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल पुराने दस्तावेजों के खो जाने का नहीं है। उन दस्तावेजों के अभाव में संपत्ति से जुड़े कारोबारी और कानूनी काम प्रभावित हो रहे थे।

यदि बैंक के पास मूल दस्तावेज नहीं हैं तो उसे वैकल्पिक दस्तावेज तैयार करने के लिए संबंधित रिकॉर्ड, प्राधिकरण और कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करना होगा।

ग्राहकों के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम बैंक ग्राहकों के लिए है।

प्रॉपर्टी लोन लेते समय बैंक अक्सर संपत्ति के मूल दस्तावेज अपने पास रखता है। ग्राहक यह मानकर दस्तावेज बैंक को सौंपता है कि वे सुरक्षित रहेंगे और लोन समाप्त होने के बाद उसे वापस कर दिए जाएंगे।

लेकिन यदि बैंक की लापरवाही से ये दस्तावेज खो जाते हैं, तो ग्राहक के लिए स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।

मूल दस्तावेजों के बिना संपत्ति बेचने, ट्रांसफर करने, पुनः गिरवी रखने या मालिकाना हक से जुड़े कई कामों में अतिरिक्त कानूनी प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए लोन चुकाने के बाद ग्राहकों को बैंक से अपने सभी मूल दस्तावेजों की वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए और प्राप्त दस्तावेजों की सूची का मिलान भी कर लेना चाहिए।

बैंक की जिम्मेदारी केवल पैसा देने तक सीमित नहीं

इस मामले में हाईकोर्ट की सख्ती का एक बड़ा संदेश यह है कि बैंक और ग्राहक के बीच संबंध केवल वित्तीय लेन-देन तक सीमित नहीं होते।

जब ग्राहक अपनी संपत्ति के मूल दस्तावेज बैंक के पास जमा करता है, तो बैंक पर उन दस्तावेजों की सुरक्षित कस्टडी की जिम्मेदारी आती है। लोन पूरा होने के बाद उन दस्तावेजों को सही स्थिति में वापस करना भी बैंक की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

यदि बैंक के रिकॉर्ड में कोई कमी है, शाखा स्थानांतरित हो गई है या कर्मचारियों में बदलाव हुआ है, तो ये सभी बैंक के आंतरिक मामले हैं।

ग्राहक को इसका नुकसान नहीं उठाना चाहिए।

फैसला एक बड़ी चेतावनी भी

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला बैंकिंग संस्थानों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। प्रॉपर्टी से जुड़े मूल दस्तावेज किसी ग्राहक के लिए बेहद मूल्यवान होते हैं। उन्हें सामान्य रिकॉर्ड की तरह नहीं देखा जा सकता।

दस्तावेज खो जाने के बाद केवल एक निश्चित रकम देकर मामले को खत्म कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता, खासकर तब जब उसके कारण ग्राहक को संपत्ति के इस्तेमाल या बिक्री में वास्तविक नुकसान हो रहा हो।

इस मामले में प्रतिदिन 5,000 रुपये का मुआवजा तय किया जाना इसी गंभीरता को दर्शाता है।

दूसरी ओर, बैंक ग्राहकों के लिए भी यह मामला एक व्यावहारिक सीख देता है। लोन की अंतिम किस्त चुकाने के बाद केवल नो ड्यूज सर्टिफिकेट लेना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि बैंक के पास जमा किए गए सभी मूल दस्तावेज वापस मिल गए हैं।

कुल मिलाकर, इन वोग क्रिएशन्स और SBI से जुड़े इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बैंक की जवाबदेही को स्पष्ट करते हुए यह संदेश दिया है कि ग्राहक की संपत्ति के मूल दस्तावेज बैंक की कस्टडी में हैं तो उनकी सुरक्षा और समय पर वापसी बैंक की जिम्मेदारी है।

बैंक की शाखा बदल जाए, कर्मचारी बदल जाएं या रिकॉर्ड पुराने हो जाएं—इनमें से कोई भी कारण ग्राहक के अधिकारों को कमजोर नहीं कर सकता।

अब SBI को अदालत द्वारा तय 12 सप्ताह की अवधि में आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी और तब तक 5,000 रुपये प्रतिदिन की दर से मुआवजे की देनदारी भी जारी रहेगी। पहले दिए गए 1 लाख रुपये को इस राशि में समायोजित किया जाएगा।

यह फैसला उन लाखों बैंक ग्राहकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है, जिनकी संपत्ति के मूल कागजात किसी बैंक या वित्तीय संस्था के पास लोन की सुरक्षा के तौर पर जमा हैं। कर्ज चुकाने के बाद दस्तावेज लौटाना बैंक की महज औपचारिकता नहीं, बल्कि ग्राहक के अधिकार से जुड़ी जिम्मेदारी है।