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बॉम्बे हाईकोर्ट: भेदभाव पर अदालत सख्त, कहा- भारत चांद पर पहुंचा

बॉम्बे हाईकोर्ट: भेदभाव पर अदालत सख्त, कहा- भारत चांद पर पहुंचा, लेकिन समाज में आज भी जाति व्यवस्था की बुराई

       बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाथ से मैला ढोने और खतरनाक सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारत ने विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं और चांद तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की है, लेकिन इसके बावजूद समाज की एक कड़वी सच्चाई यह है कि जातिगत भेदभाव और उससे जुड़ी सामाजिक बुराइयां आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। इन सामाजिक परिस्थितियों के कारण आज भी कुछ लोगों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो उनकी मानवीय गरिमा और सम्मान के बिल्कुल विपरीत हैं।

अदालत की यह टिप्पणी केवल एक सरकारी नीति को रद्द करने तक सीमित नहीं रही। पीठ ने साफ किया कि किसी व्यक्ति की मृत्यु अगर कानून के दायरे में आने वाली खतरनाक सफाई के दौरान होती है, तो उसके परिवार को मिलने वाले मुआवजे के अधिकार को इस आधार पर अलग नहीं किया जा सकता कि मृतक किसी निजी संस्था के लिए काम कर रहा था या सरकारी व्यवस्था से जुड़ा था।

बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति पर सवाल उठाया, जिसके तहत खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिजनों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी सोसाइटियों और नियोक्ताओं पर डाल दी गई थी। अदालत ने इस व्यवस्था को कानून और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना और संबंधित प्रावधान को रद्द कर दिया।

मुआवजे की जिम्मेदारी पहले सरकार की होगी

अदालत ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि जिन श्रमिकों की मृत्यु कानून के तहत प्रतिबंधित खतरनाक सफाई के दौरान हुई है, उनके आश्रितों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार निभाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार यदि उचित समझे तो बाद में संबंधित निजी संस्था, सोसाइटी या नियोक्ता से उस रकम की वसूली कर सकती है। यानी पीड़ित परिवार को मुआवजा पाने के लिए पहले निजी संस्था के साथ विवाद या भुगतान की प्रक्रिया में उलझने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

यह निर्देश उन परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिनके घर में कमाने वाले व्यक्ति की सफाई के दौरान मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में परिवार अचानक आर्थिक संकट में पहुंच जाता है। यदि मुआवजा पाने की प्रक्रिया भी लंबे विवाद में फंस जाए तो पीड़ित परिवार की मुश्किल और बढ़ जाती है।

हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए सरकार की जिम्मेदारी को प्राथमिक माना। अदालत का संदेश स्पष्ट है कि कानून द्वारा निर्धारित अधिकार का लाभ पीड़ित परिवार तक समय पर पहुंचना चाहिए।

छह महीने में होगी मृतकों की पहचान

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि सरकार छह महीने के भीतर उन सभी व्यक्तियों की पहचान करे, जिनकी मृत्यु 2013 के मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम के दायरे में आने वाली खतरनाक सफाई के दौरान हुई है।

इस निर्देश का उद्देश्य केवल भविष्य में होने वाली घटनाओं पर ध्यान देना नहीं है, बल्कि उन मामलों को भी सामने लाना है जिनमें पहले ऐसी मौतें हुई हैं और मृतकों के परिवारों को निर्धारित मुआवजा नहीं मिल पाया है।

पहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रत्येक मृतक व्यक्ति के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। इसका अर्थ है कि सरकार को केवल कागजी रिकॉर्ड पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे मामलों की वास्तविक पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया को गंभीरता से पूरा करना होगा।

अदालत का यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खतरनाक सफाई से जुड़ी मौतों के मामलों में कई बार मृतक के परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर होते हैं। ऐसे परिवारों के लिए सरकारी तंत्र तक पहुंच बनाना आसान नहीं होता। इसलिए पहचान और मुआवजे की प्रक्रिया को प्रभावी बनाना भी न्याय का ही एक हिस्सा है।

निजी और सरकारी श्रमिक में अंतर क्यों नहीं किया जा सकता?

अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों में से एक यह था कि क्या मुआवजे के अधिकार में इस आधार पर अंतर किया जा सकता है कि मृतक सरकारी व्यवस्था के तहत काम कर रहा था या किसी निजी संस्था अथवा नियोक्ता के लिए।

पीठ ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि 2013 का संबंधित कानून सार्वजनिक और निजी नियोक्ताओं के बीच इस प्रकार का भेदभाव नहीं करता।

अगर कानून का उद्देश्य ही खतरनाक सफाई की प्रथा को समाप्त करना और उससे प्रभावित लोगों की गरिमा तथा अधिकारों की रक्षा करना है, तो केवल नियोक्ता की प्रकृति के आधार पर मृतक के परिवार के अधिकार को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति के प्रावधान को इसी आधार पर खारिज किया, जिसके माध्यम से निजी व्यक्तियों और संस्थाओं पर मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी डालने की कोशिश की गई थी।

हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ माना। संविधान में समानता का अधिकार सभी नागरिकों को समान कानूनी संरक्षण प्रदान करने की बुनियादी गारंटी देता है। अदालत ने इसी संवैधानिक सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कहा कि कानून की सुरक्षा और उसके तहत मिलने वाले लाभ में इस प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता।

मानव गरिमा का सवाल

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल 30 लाख रुपये का मुआवजा नहीं है। इसके पीछे मानव गरिमा का व्यापक सवाल जुड़ा हुआ है।

हाथ से मैला ढोने की प्रथा और बिना पर्याप्त सुरक्षा के सीवर, सेप्टिक टैंक अथवा अन्य खतरनाक स्थानों की सफाई करवाना लंबे समय से गंभीर सामाजिक और मानवीय समस्या माना जाता रहा है। आधुनिक तकनीक के दौर में भी यदि किसी व्यक्ति को अपनी जान जोखिम में डालकर ऐसी सफाई करनी पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

अदालत ने इसी विरोधाभास को अपनी टिप्पणी के माध्यम से सामने रखा। एक तरफ भारत अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है और दूसरी तरफ समाज का एक हिस्सा ऐसी परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर है, जहां उसकी जान तक चली जाती है।

पीठ ने इसी स्थिति को रेखांकित करते हुए कहा कि 21वीं सदी में अंतरिक्ष के क्षेत्र में देश की उपलब्धियों के बावजूद जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुप्रथाओं का बने रहना एक कड़वी सच्चाई है।

यह टिप्पणी भारतीय समाज में मौजूद उस असमानता की ओर ध्यान दिलाती है, जिसमें कुछ पेशे आज भी सामाजिक और जातिगत पहचान से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। अदालत का संदेश यह है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी या आर्थिक प्रगति नहीं है। जब तक समाज के कमजोर वर्गों को सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक विकास की तस्वीर अधूरी रहेगी।

कानून का उद्देश्य केवल कागज पर नहीं रहना चाहिए

2013 में बनाए गए कानून का उद्देश्य ही मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी अमानवीय प्रथा को रोकना और उससे जुड़े लोगों के पुनर्वास तथा सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। लेकिन किसी भी कानून की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि उसका लाभ जमीन पर रहने वाले व्यक्ति तक कितना पहुंचता है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश इसी अंतर को भरने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

यदि किसी श्रमिक की मौत खतरनाक सफाई के दौरान हो जाती है, तो उसके परिवार के सामने कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। एक तरफ परिवार का सदस्य चला जाता है, दूसरी तरफ आय का स्रोत खत्म हो जाता है। कई मामलों में परिवार को बच्चों की शिक्षा, भोजन, आवास और अन्य जरूरी खर्चों की चिंता सताने लगती है।

ऐसी परिस्थिति में मुआवजा केवल आर्थिक सहायता नहीं होता। यह राज्य की उस जिम्मेदारी का हिस्सा है, जिसके तहत वह पीड़ित परिवार को तत्काल राहत उपलब्ध कराता है।

अदालत ने इसी कारण सरकार को पहले मुआवजा देने और उसके बाद जिम्मेदार निजी संस्था या नियोक्ता से रकम वसूलने का रास्ता बताया है। इससे पीड़ित परिवार और निजी संस्था के बीच मुआवजे को लेकर लंबी कानूनी या प्रशासनिक लड़ाई की स्थिति को कम किया जा सकता है।

जातिगत भेदभाव पर अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट की टिप्पणी का एक बड़ा हिस्सा जातिगत भेदभाव से जुड़ा है। अदालत ने यह संकेत दिया कि खतरनाक सफाई जैसे कामों को केवल रोजगार या श्रम के सामान्य मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके साथ सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक भेदभाव के प्रश्न भी जुड़े हैं।

समाज में यदि किसी विशेष वर्ग के लोग पीढ़ियों से एक ही प्रकार के अपमानजनक और जोखिम भरे काम से जुड़े रहने के लिए मजबूर होते हैं, तो केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामाजिक सोच में बदलाव, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून का सख्त पालन भी जरूरी है।

अदालत ने भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए इसी विरोधाभास को सामने रखा। देश तकनीकी रूप से कितनी भी ऊंचाई हासिल कर ले, लेकिन यदि किसी नागरिक को अपनी जान जोखिम में डालकर ऐसी सफाई करनी पड़ती है जो उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है, तो यह गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है।

मुआवजे का अधिकार नियोक्ता की पहचान पर निर्भर नहीं

इस फैसले से निकलने वाला महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत यह है कि पीड़ित के अधिकार को केवल इसलिए कमजोर नहीं किया जा सकता क्योंकि वह किसी निजी संस्था के माध्यम से काम कर रहा था।

यदि खतरनाक सफाई के दौरान कानून के दायरे में आने वाली मृत्यु हुई है, तो मृतक के आश्रितों को कानून के तहत मिलने वाला मुआवजा मिलना चाहिए। सरकार और निजी संस्था के बीच जिम्मेदारी का विवाद पीड़ित परिवार के अधिकार के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए।

अदालत ने जिस नीति को रद्द किया है, उसका प्रभाव इसी स्तर पर महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश जाता है कि कल्याणकारी कानूनों को लागू करते समय प्रशासन को ऐसी शर्तें नहीं लगानी चाहिए जो कानून के मूल उद्देश्य को कमजोर कर दें।

छह महीने की समयसीमा भी महत्वपूर्ण

सरकार को छह महीने में मृतकों की पहचान करने का निर्देश देना भी आदेश का अहम हिस्सा है। अक्सर सरकारी योजनाओं और कानूनी अधिकारों में सबसे बड़ी समस्या पात्र लोगों की पहचान और रिकॉर्ड के अभाव की होती है।

यदि मृतक श्रमिकों का सही रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है, तो उनके परिवारों तक मुआवजा पहुंचाना कठिन हो जाता है। इसलिए अदालत ने पहचान की प्रक्रिया के लिए निश्चित समयसीमा तय की है।

अब राज्य सरकार के सामने यह जिम्मेदारी है कि वह संबंधित विभागों, स्थानीय निकायों और उपलब्ध रिकॉर्ड के माध्यम से ऐसे मामलों की पहचान करे और पात्र आश्रितों तक मुआवजे की राशि पहुंचाए।

यह प्रक्रिया केवल आंकड़े जुटाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रत्येक मामले में यह भी सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि मृतक के वास्तविक आश्रित की पहचान हो और उन्हें निर्धारित सहायता समय पर मिले।

फैसला समाज के लिए भी बड़ा संदेश

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला केवल महाराष्ट्र सरकार की नीति से जुड़े विवाद का निपटारा नहीं करता, बल्कि समाज के सामने एक व्यापक सवाल भी रखता है।

क्या विकास का अर्थ केवल नई तकनीक, बड़ी इमारतें, अंतरिक्ष अभियान और आर्थिक प्रगति है? या फिर विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति किस सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी रहा है?

अदालत की टिप्पणी इसी दूसरे पक्ष की ओर ध्यान आकर्षित करती है।

एक ऐसे समय में जब भारत अंतरिक्ष और तकनीक के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है, यह जरूरी है कि सामाजिक न्याय के मोर्चे पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाए। किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि या आर्थिक स्थिति के कारण ऐसा काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जिसमें उसकी जान और गरिमा दोनों खतरे में हों।

सरकार और प्रशासन की जवाबदेही

अदालत के आदेश के बाद महाराष्ट्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे छह महीने की समयसीमा में पहचान की प्रक्रिया पूरी करनी होगी और पात्र मृतकों के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा उपलब्ध कराना होगा।

साथ ही, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कानून का प्रभावी पालन हो। केवल दुर्घटना के बाद मुआवजा देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान यह है कि किसी व्यक्ति को ऐसी खतरनाक सफाई में बिना पर्याप्त सुरक्षा और वैकल्पिक व्यवस्था के उतरना ही न पड़े।

इस दृष्टि से हाईकोर्ट का आदेश राहत देने के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारी की याद भी दिलाता है।

निष्कर्ष

बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय समाज के सामने एक गंभीर आईना रखती है। भारत ने चांद तक पहुंचने की उपलब्धि हासिल की है, लेकिन सामाजिक न्याय और मानव गरिमा के सवाल अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

खतरनाक सफाई के दौरान किसी श्रमिक की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं है। उसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जिम्मेदारी, सामाजिक असमानता और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े कई सवाल होते हैं।

अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द करके स्पष्ट कर दिया है कि पीड़ित परिवार के अधिकार को निजी या सरकारी नियोक्ता के आधार पर अलग-अलग नहीं किया जा सकता। सरकार को पहले मुआवजा देना होगा और यदि किसी निजी संस्था या नियोक्ता की जिम्मेदारी बनती है, तो बाद में उससे राशि की वसूली की जा सकती है।

छह महीने के भीतर ऐसे मृतकों की पहचान और प्रत्येक आश्रित को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश इस मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है।

इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि किसी देश की प्रगति का मूल्यांकन केवल उसकी तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रगति तब होगी, जब समाज का कोई भी व्यक्ति जाति, गरीबी या सामाजिक स्थिति के कारण अपनी जान और गरिमा को खतरे में डालने वाले काम के लिए मजबूर न हो।

भारत का चांद तक पहुंचना निश्चित रूप से गौरव की बात है, लेकिन धरती पर हर नागरिक को सम्मान और सुरक्षा के साथ जीने का अधिकार मिलना भी उतना ही जरूरी है। बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी इसी बुनियादी संवैधानिक और मानवीय विचार को सामने रखती है।