पत्नी खुद छोड़े घर तो भी पति देगा खर्च! पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, मां-बेटी को मिलेगा गुजारा भत्ता
वैवाहिक विवादों में अक्सर पति-पत्नी के बीच यह सवाल उठता है कि यदि पत्नी खुद पति का घर छोड़कर अलग रहने लगे तो क्या वह पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है? पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ इस आधार पर कि पत्नी ने वैवाहिक घर छोड़ दिया, पति भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।
अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए माना कि पत्नी के पास अलग रहने का उचित कारण था। उसके पास अपने भरण-पोषण के लिए पर्याप्त साधन या संपत्ति भी नहीं थी। दूसरी ओर, पति की आर्थिक स्थिति बेहतर पाई गई। इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने बठिंडा परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बेटी को पांच-पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए इस आदेश को बरकरार रखा।
15 दिसंबर 2022 के आदेश को दी गई थी चुनौती
मामला बठिंडा परिवार न्यायालय से शुरू हुआ था। परिवार न्यायालय ने 15 दिसंबर 2022 को पत्नी और बेटी के पक्ष में भरण-पोषण का आदेश पारित किया था। इसके खिलाफ पति जगजीत सिंह ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दाखिल की।
फैमिली कोर्ट ने पत्नी और बेटी को पांच-पांच हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था। यह राशि पत्नी और बेटी द्वारा दायर याचिका की तारीख यानी 18 सितंबर 2015 से देय मानी गई थी।
बेटी के लिए यह भरण-पोषण उसकी शादी होने तक और पत्नी के लिए उसकी पात्रता रहने तक देने का आदेश दिया गया था।
पति ने इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसका मुख्य तर्क था कि पत्नी ने स्वयं वैवाहिक घर छोड़ा है। इसलिए उसके अनुसार उसे पत्नी और बेटी के भरण-पोषण का जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
पत्नी ने लगाए थे गंभीर आरोप
मामले में पत्नी ने पति और ससुराल पक्ष पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उसका कहना था कि शादी के बाद से ही उसे कम दहेज लाने को लेकर परेशान किया जाता था।
पत्नी के मुताबिक, वैवाहिक जीवन के दौरान उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने पति पर शराब और नशीले पदार्थों का सेवन करने का आरोप भी लगाया। इसके साथ ही मारपीट किए जाने की बात भी कही गई।
पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ने के बाद परिवार और समाज के स्तर पर मामले को सुलझाने की कोशिश की गई। पंचायतें भी हुईं। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद दोनों के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ।
पत्नी का कहना था कि आखिरकार उसके साथ मारपीट की गई और उसे बेटी के साथ वैवाहिक घर से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद उसके सामने अपने और बेटी के जीवन-यापन की समस्या खड़ी हो गई।
हालांकि पति ने पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों से इनकार किया।
पति का दावा- पत्नी ने अपनी मर्जी से छोड़ा घर
पति की ओर से अदालत के सामने यह दलील रखी गई कि पत्नी ने खुद वैवाहिक घर छोड़ा था। उसके अनुसार पत्नी के पास अलग रहने का कोई उचित कारण नहीं था।
पति ने यह भी कहा कि वह आज भी अपनी पत्नी और बेटी को अपने साथ रखने के लिए तैयार है। उसने अदालत के सामने यह दावा किया कि वह दोनों का भरण-पोषण करने के लिए भी तैयार है।
इसलिए पति की ओर से यह तर्क दिया गया कि जब पत्नी स्वयं पति से अलग रह रही है तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।
मामले में हाई कोर्ट को इसी विवादित सवाल पर विचार करना था कि क्या पत्नी का अलग रहना वास्तव में उसकी अपनी इच्छा का परिणाम था या इसके पीछे कोई ऐसा कारण था जिसे कानून की नजर में उचित माना जा सकता है।
हाई कोर्ट ने पंचायतों के तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का अध्ययन किया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि पति ने स्वयं स्वीकार किया था कि पत्नी पंचायत के हस्तक्षेप के बाद दो बार उसके साथ रह चुकी थी।
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह संकेत मिलता था कि पति-पत्नी के बीच विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ था। उनके वैवाहिक जीवन में पहले भी मतभेद इतने गंभीर हो चुके थे कि पंचायत को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
यदि पत्नी केवल अपनी इच्छा से पति का घर छोड़कर चली गई होती और वैवाहिक जीवन में कोई विवाद नहीं होता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। लेकिन इस मामले में पंचायतों का हस्तक्षेप और पत्नी का पहले पति के साथ वापस जाकर रहना मामले की परिस्थितियों को अलग तस्वीर देता था।
हाई कोर्ट ने इन्हीं तथ्यों को समग्र रूप से देखा।
अदालत ने माना- पत्नी का अलग रहना बिना कारण नहीं
हाई कोर्ट ने पाया कि पत्नी के बयान से यह साबित नहीं हुआ कि उसने बिना किसी वजह के वैवाहिक घर छोड़ा था।
अदालत के सामने ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं था जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पत्नी केवल अपनी इच्छा से पति से अलग रह रही थी और उसके पास अलग रहने का कोई उचित कारण नहीं था।
इसके विपरीत, रिकॉर्ड में ऐसे तथ्य मौजूद थे जो वैवाहिक विवाद की ओर संकेत करते थे।
अदालत ने इस बात को भी महत्व दिया कि पत्नी के पास अपना मकान नहीं था। उसके पास अपने जीवन-यापन के लिए पर्याप्त आर्थिक साधन या संपत्ति भी नहीं थी।
ऐसी स्थिति में पत्नी के लिए अलग रहकर अपना और बेटी का खर्च उठाना आसान नहीं था।
पत्नी के पास आय का साधन नहीं, पति आर्थिक रूप से सक्षम
भरण-पोषण के मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि पति-पत्नी अलग रह रहे हैं। यह भी महत्वपूर्ण होता है कि जिस पक्ष द्वारा भरण-पोषण मांगा जा रहा है, उसके पास अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं या नहीं।
इस मामले में हाई कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि पत्नी के पास अपने भरण-पोषण का कोई पर्याप्त साधन नहीं था।
दूसरी ओर पति की आर्थिक स्थिति बेहतर थी। मामले में बेटी की गवाही भी अदालत के सामने आई, जिसमें परिवार की आर्थिक स्थिति और घरेलू सुविधाओं का उल्लेख किया गया।
बेटी के मुताबिक परिवार के पास बड़ा मकान था। घर में दो एसी, फ्रिज, कूलर और अन्य घरेलू सुविधाएं थीं। परिवार के पास वाहन और कृषि संबंधी उपकरण भी मौजूद थे।
इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने पति को आर्थिक रूप से सक्षम माना।
बेटी की गवाही ने भी अहम भूमिका निभाई
इस मामले में बेटी की गवाही भी महत्वपूर्ण रही। उसने परिवार की आर्थिक स्थिति से जुड़े कई तथ्य अदालत के सामने रखे।
बेटी ने बताया कि परिवार के पास बड़ा मकान और कई घरेलू सुविधाएं थीं। इसके अलावा वाहन और कृषि उपकरण भी परिवार के पास थे।
इन तथ्यों से अदालत को पति की आर्थिक क्षमता का अंदाजा लगाने में मदद मिली।
दूसरी तरफ पत्नी के पास अपना घर या पर्याप्त संपत्ति नहीं थी। ऐसे में दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति में अंतर दिखाई दिया।
हाई कोर्ट ने इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए माना कि पत्नी और बेटी अपने भरण-पोषण के लिए स्वयं पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं हैं, जबकि पति उन्हें आर्थिक सहायता देने की स्थिति में है।
सिर्फ घर छोड़ना भरण-पोषण खत्म करने का आधार नहीं
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि पत्नी द्वारा वैवाहिक घर छोड़ने को अदालत ने अकेले निर्णायक तथ्य नहीं माना।
कई वैवाहिक मामलों में पति यह तर्क देता है कि पत्नी खुद घर छोड़कर चली गई, इसलिए अब वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। लेकिन अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं होता कि पत्नी घर से गई या नहीं।
अदालत यह भी देखती है कि वह किन परिस्थितियों में घर से अलग हुई।
यदि पत्नी के पास पति से अलग रहने का उचित कारण है और उसके पास अपना गुजारा करने के पर्याप्त साधन नहीं हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार पति को भरण-पोषण देना पड़ सकता है।
यही बात इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार बनी।
पति का कहना था- पत्नी को साथ रखने के लिए तैयार हूं
पति ने अदालत में यह भी कहा कि वह पत्नी और बेटी को अपने साथ रखने के लिए तैयार है। उसका कहना था कि वह उनका भरण-पोषण करने से इनकार नहीं कर रहा है, लेकिन पत्नी खुद उसके साथ नहीं रहना चाहती।
यह दलील भी अदालत के सामने थी।
लेकिन अदालत ने मामले के सभी तथ्यों को एक साथ देखने के बाद पाया कि पति यह साबित करने में सफल नहीं हुआ कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है।
सिर्फ यह कहना कि पति पत्नी को वापस घर में रखने के लिए तैयार है, पर्याप्त नहीं था। अदालत को यह भी देखना था कि पत्नी के अलग रहने की परिस्थितियां क्या थीं और क्या उसके पास ऐसा करने का उचित कारण मौजूद था।
18 सितंबर 2015 से देना होगा भरण-पोषण
परिवार न्यायालय ने भरण-पोषण का आदेश उस तारीख से लागू किया था जिस दिन पत्नी और बेटी ने याचिका दायर की थी।
याचिका 18 सितंबर 2015 को दाखिल की गई थी। फैमिली कोर्ट ने इसी तारीख से पत्नी और बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
इसका अर्थ यह था कि अदालत द्वारा निर्धारित राशि केवल आदेश पारित होने के बाद से ही नहीं, बल्कि याचिका दाखिल किए जाने की तारीख से देय मानी गई।
पत्नी और बेटी दोनों के लिए पांच-पांच हजार रुपये प्रतिमाह की राशि निर्धारित की गई थी।
बेटी के मामले में यह राशि उसकी शादी होने तक और पत्नी के मामले में उसकी पात्रता तक जारी रखने का निर्देश दिया गया था।
हाई कोर्ट ने क्यों नहीं बदला फैमिली कोर्ट का आदेश?
डिविजन बेंच ने मामले की परिस्थितियों का परीक्षण करने के बाद माना कि परिवार न्यायालय के निष्कर्ष में कोई ऐसी स्पष्ट गलती नहीं थी, जिसके आधार पर हाई कोर्ट को उसके आदेश में हस्तक्षेप करना चाहिए।
अदालत ने पाया कि पति यह साबित करने में पूरी तरह सफल नहीं हुआ कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के वैवाहिक घर छोड़ा था।
इसके अलावा पत्नी की आर्थिक स्थिति और पति की आर्थिक क्षमता के बीच भी स्पष्ट अंतर था।
ऐसे में हाई कोर्ट ने माना कि परिवार न्यायालय का आदेश तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उचित था।
पत्नी का अलग रहना हमेशा गलत नहीं माना जा सकता
यह फैसला एक व्यापक कानूनी सिद्धांत की ओर भी ध्यान खींचता है। पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर अलग रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्नी गलत है।
कई बार वैवाहिक संबंधों में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं जिनमें पत्नी के लिए उसी घर में रहना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में अदालत को आरोपों और बचाव दोनों पक्षों की बात सुनकर वास्तविक स्थिति समझनी होती है।
इसलिए भरण-पोषण के मामलों में प्रत्येक केस को उसके अपने तथ्यों के आधार पर देखा जाता है।
इस मामले में हाई कोर्ट ने भी यही दृष्टिकोण अपनाया और पत्नी के अलग रहने को अनुचित नहीं माना।
मां के साथ बेटी का भरण-पोषण भी महत्वपूर्ण
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू बेटी का भरण-पोषण है।
पति-पत्नी के बीच विवाद चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, बच्चे की जरूरतें उससे अलग होती हैं। बच्चे की शिक्षा, भोजन, कपड़े, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत होती है।
यदि बच्चा मां के साथ रह रहा है और पिता आर्थिक रूप से सक्षम है, तो परिस्थितियों के अनुसार पिता पर बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
यही वजह है कि अदालत ने बेटी के लिए भी पांच हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को बरकरार रखा।
फैसले का मतलब यह नहीं कि हर मामले में पत्नी को भरण-पोषण मिलेगा
हाई कोर्ट के इस फैसले को लेकर एक बात समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी पत्नी बिना कारण पति का घर छोड़ दे और हर परिस्थिति में उसे भरण-पोषण मिलना तय हो जाएगा।
भरण-पोषण से जुड़े मामलों में अदालत परिस्थितियों का मूल्यांकन करती है। पत्नी के पास आय का साधन है या नहीं, अलग रहने का कारण क्या है, पति की आर्थिक स्थिति कैसी है और बच्चे की जरूरतें क्या हैं—इन सभी पहलुओं को देखा जा सकता है।
इसलिए इस फैसले का वास्तविक संदेश यह है कि पत्नी के अलग रहने को केवल इस आधार पर गलत नहीं माना जा सकता कि उसने स्वयं घर छोड़ा था।
यदि परिस्थितियां यह दिखाती हैं कि अलग रहना उचित था, तो पति केवल इस आधार पर भरण-पोषण से बच नहीं सकता।
पति की अपील हुई खारिज
पूरे मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस अलका सरीन और जस्टिस हरप्रीत कौर जीवन की खंडपीठ ने पति जगजीत सिंह की अपील में कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया।
अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य पत्नी के अलग रहने को उचित ठहराते हैं। पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के वैवाहिक घर से अलग हुई थी।
इसलिए हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
पति की अपील खारिज कर दी गई और पत्नी तथा बेटी के लिए निर्धारित पांच-पांच हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण का आदेश बरकरार रहा।
फैसले से निकलने वाली बड़ी बात
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण के अधिकार को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पत्नी का अलग रहना अपने आप में उसके भरण-पोषण के अधिकार को खत्म नहीं करता।
मामले में पत्नी के पास पर्याप्त आर्थिक साधन नहीं थे। उसके पास अपना मकान या ऐसी संपत्ति नहीं थी जिससे वह अपना और बेटी का खर्च उठा सके। दूसरी ओर पति की आर्थिक स्थिति बेहतर थी। रिकॉर्ड में पंचायतों के हस्तक्षेप और वैवाहिक विवाद से जुड़े तथ्य भी सामने आए।
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने पत्नी के अलग रहने को उचित माना।
इस फैसले का सबसे अहम संदेश यही है कि भरण-पोषण के मामलों में अदालत केवल यह नहीं देखती कि पत्नी ने पति का घर छोड़ा था या नहीं, बल्कि यह भी देखती है कि उसने घर क्यों छोड़ा और उसके सामने परिस्थितियां क्या थीं।
यही वजह है कि इस मामले में पति की अपील खारिज हुई और मां-बेटी को मिलने वाला भरण-पोषण बरकरार रखा गया।