धरती पर ‘महाप्रलय’ आ जाए तो कहां बचेंगे इंसान? वैज्ञानिकों ने बताए ये 7 देश, जानिए क्यों माने गए सबसे सुरक्षित
धरती पर महाप्रलय की कल्पना इंसान सदियों से करता आया है। कभी समुद्र के बढ़ते जलस्तर को लेकर चिंता जताई जाती है, कभी बड़े भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट को लेकर, तो कभी परमाणु युद्ध या किसी विशाल एस्टेरॉयड के धरती से टकराने की आशंका को लेकर। सवाल यह है कि अगर कभी ऐसी वैश्विक आपदा आ जाए, जिसका असर दुनिया के अधिकांश हिस्सों पर पड़े, तो क्या इंसान पूरी तरह खत्म हो जाएगा? या फिर धरती पर कुछ ऐसे स्थान बचेंगे, जहां मानव सभ्यता दोबारा खड़ी हो सके?
इस सवाल का कोई निश्चित जवाब तो नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों ने अलग-अलग परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर कुछ देशों की पहचान जरूर की है, जहां अत्यंत कठिन वैश्विक संकट के दौरान इंसानों के बचे रहने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है।
इन अध्ययनों में खास तौर पर ऐसे देशों को देखा गया जहां भोजन का स्थानीय उत्पादन, ऊर्जा के संसाधन, भौगोलिक स्थिति, स्वास्थ्य व्यवस्था, बुनियादी ढांचा और राजनीतिक स्थिरता जैसी चीजें मौजूद हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस सूची में ज्यादातर छोटे या द्वीपीय देश शामिल हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर जिन सात देशों को सबसे कठिन वैश्विक परिस्थितियों में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में माना गया है, उनमें न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड, वानुअतु और सोलोमन आइलैंड शामिल हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ये देश किसी भी तरह की महाप्रलय से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। इन देशों की स्थिति भी आपदा की प्रकृति, उसकी अवधि और वैश्विक सप्लाई सिस्टम के टूटने पर निर्भर करेगी।
आखिर वैज्ञानिकों ने इन देशों को ही क्यों चुना?
साल 2021 में ‘Sustainability’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात पर विचार किया गया कि अगर वैश्विक स्तर पर कोई बड़ा संकट आता है तो कौन से देश अपनी सामाजिक और तकनीकी व्यवस्था को लंबे समय तक बनाए रखने में अपेक्षाकृत सक्षम हो सकते हैं।
अध्ययन में नोट्रे डेम यूनिवर्सिटी के ND-GAIN Index जैसे आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। यह इंडेक्स अलग-अलग देशों की जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता और उससे निपटने की क्षमता को मापता है।
लेकिन केवल जलवायु अनुकूलन को ही आधार नहीं बनाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि संकट की स्थिति में किसी देश के पास भोजन पैदा करने की कितनी क्षमता है, ऊर्जा कहां से आती है, उसकी औद्योगिक क्षमता कैसी है, भौगोलिक स्थिति कितनी अनुकूल है और बाहरी दुनिया से उसकी निर्भरता कितनी है।
इन्हीं मानकों के आधार पर पांच देशों को विशेष रूप से मजबूत माना गया—न्यूजीलैंड, आइसलैंड, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड।
इसके बाद एक अन्य अध्ययन में परमाणु युद्ध, बड़े ज्वालामुखी विस्फोट या एस्टेरॉयड जैसी घटनाओं के बाद पैदा होने वाली ऐसी स्थिति पर ध्यान दिया गया जिसमें वातावरण में भारी मात्रा में धूल और कालिख पहुंच जाए और सूर्य की रोशनी धरती तक बहुत कम पहुंचे।
ऐसी परिस्थिति को आम तौर पर ‘न्यूक्लियर विंटर’ जैसी स्थिति से समझा जाता है।
1. न्यूजीलैंड—दुनिया से अलग-थलग होना बन सकता है सबसे बड़ा फायदा
वैज्ञानिक अध्ययनों में न्यूजीलैंड का नाम सबसे प्रमुखता से सामने आता है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह दुनिया के प्रमुख आबादी केंद्रों से काफी दूर स्थित एक द्वीपीय देश है।
अगर वैश्विक संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय परिवहन व्यवस्था बाधित होती है, तो न्यूजीलैंड की भौगोलिक दूरी एक तरह से सुरक्षा कवच का काम कर सकती है।
देश में खेती और पशुपालन की अच्छी क्षमता है। डेयरी उद्योग भी बेहद महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर भोजन और ऊर्जा के कुछ स्रोत उपलब्ध होने के कारण पूरी तरह बाहरी दुनिया पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम की जा सकती है।
लेकिन न्यूजीलैंड को पूरी तरह सुरक्षित समझना भी गलती होगी।
देश की औद्योगिक क्षमता सीमित है और आधुनिक कृषि के लिए मशीनरी, ईंधन, कीटनाशक, कल-पुर्जे और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की जरूरत होती है। इनमें से कई चीजें विदेशों से आती हैं।
यानी अगर वैश्विक व्यापार पूरी तरह ठप हो जाए तो न्यूजीलैंड के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
फिर भी, संकट की स्थिति में स्थानीय खाद्य उत्पादन की क्षमता इसे दूसरे कई देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में रख सकती है।
2. ऑस्ट्रेलिया—न्यूक्लियर विंटर की स्थिति में सबसे मजबूत
दूसरे अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया बेहद मजबूत देश के रूप में सामने आया। खासकर उस स्थिति में जब किसी बड़े युद्ध, ज्वालामुखी विस्फोट या एस्टेरॉयड के कारण सूर्य की रोशनी काफी कम हो जाए।
शोधकर्ताओं ने कई द्वीपीय देशों की तुलना करते हुए देखा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कौन से देश अपनी आबादी के लिए पर्याप्त भोजन पैदा कर सकते हैं।
सबसे खराब माने गए परिदृश्य में केवल कुछ देश ही प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 2,200 किलो कैलोरी से ज्यादा भोजन पैदा करने की क्षमता बनाए रख पाए। इनमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आइसलैंड, वानुअतु और सोलोमन आइलैंड शामिल थे।
इनमें ऑस्ट्रेलिया सबसे आगे रहा।
ऑस्ट्रेलिया के पास विशाल कृषि क्षेत्र, पशुपालन की बड़ी क्षमता, प्राकृतिक संसाधन, मजबूत बुनियादी ढांचा और अपेक्षाकृत विकसित स्वास्थ्य व्यवस्था है।
इसके अलावा उसके पास भोजन का बड़ा भंडार भी है। यही वजह है कि किसी बड़े वैश्विक संकट में भी देश अपनी आबादी को भोजन उपलब्ध कराने की बेहतर स्थिति में हो सकता है।
हालांकि यहां भी एक बड़ी समस्या है। ऑस्ट्रेलिया का बड़ा भूभाग कृषि योग्य फसल भूमि नहीं है। इसके कई हिस्से घास के मैदान या शुष्क क्षेत्र हैं।
इसके अलावा आधुनिक कृषि व्यवस्था ईंधन, मशीनरी और उर्वरकों पर निर्भर है। अगर अंतरराष्ट्रीय व्यापार लंबे समय तक बंद हो जाए तो यह निर्भरता परेशानी पैदा कर सकती है।
3. आइसलैंड—ऊर्जा के मामले में मजबूत
आइसलैंड भी इस सूची में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति और ऊर्जा संसाधन हैं।
देश में भू-तापीय और जलविद्युत ऊर्जा की बड़ी क्षमता है। इसका मतलब है कि बिजली उत्पादन के लिए इसे पूरी तरह बाहरी देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
आइसलैंड का समुद्र भी उसके लिए महत्वपूर्ण संसाधन है। मछली पकड़ने का उद्योग लंबे समय से उसकी अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है।
लेकिन आइसलैंड की सबसे बड़ी कमजोरी उसका छोटा आकार और सीमित कृषि क्षेत्र है। अगर लंबे समय तक वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हो जाए तो भोजन, मशीनरी और अन्य जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।
फिर भी ऊर्जा आत्मनिर्भरता और द्वीपीय स्थिति उसे संकट के समय कुछ फायदे देती है।
4. यूनाइटेड किंगडम—बड़ी अर्थव्यवस्था और मजबूत संस्थागत ढांचा
यूनाइटेड किंगडम भी उन देशों में शामिल किया गया है जिनमें किसी वैश्विक संकट के दौरान सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की अपेक्षाकृत बेहतर क्षमता हो सकती है।
ब्रिटेन के पास विकसित स्वास्थ्य व्यवस्था, मजबूत संस्थाएं, परिवहन नेटवर्क, औद्योगिक क्षमता और कृषि क्षेत्र है।
लेकिन इसकी एक बड़ी कमजोरी आयात पर निर्भरता है। देश की खाद्य और ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा वैश्विक व्यापार व्यवस्था से जुड़ा है।
अगर समुद्री परिवहन, ईंधन आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार लंबे समय तक बाधित हो जाए तो ब्रिटेन के सामने गंभीर चुनौती आ सकती है।
इसलिए उसकी मजबूती सिर्फ कृषि से नहीं, बल्कि संस्थागत और तकनीकी क्षमता से जुड़ी है।
5. आयरलैंड—छोटा देश, लेकिन कृषि क्षमता मजबूत
आयरलैंड को भी संकट के समय अपेक्षाकृत अनुकूल देशों में रखा गया है। इसका प्रमुख कारण उसकी कृषि और पशुपालन क्षमता है।
आयरलैंड की अर्थव्यवस्था में कृषि और खाद्य उत्पादन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हरे-भरे चरागाह और पशुपालन देश की बड़ी ताकत हैं।
अगर वैश्विक व्यापार में बड़ी रुकावट आती है तो स्थानीय खाद्य उत्पादन किसी देश की सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में से एक बन जाता है।
हालांकि आयरलैंड भी आधुनिक कृषि के लिए मशीनरी, ईंधन और अन्य बाहरी संसाधनों पर निर्भर है। इसलिए पूरी तरह आत्मनिर्भर रहना उसके लिए भी आसान नहीं होगा।
6. वानुअतु—छोटा द्वीपीय देश, लेकिन स्थानीय संसाधनों का फायदा
प्रशांत महासागर में स्थित वानुअतु इस सूची में शायद सबसे कम चर्चित नाम है। यह कई छोटे द्वीपों से मिलकर बना देश है।
कठिन वैश्विक परिस्थितियों में इसका फायदा इसकी छोटी आबादी और स्थानीय खाद्य संसाधन हो सकते हैं। समुद्र से मछली और जमीन से स्थानीय कृषि उत्पादन लोगों को कुछ हद तक भोजन उपलब्ध करा सकता है।
लेकिन दूसरी ओर वानुअतु प्राकृतिक आपदाओं से खुद भी प्रभावित होता है। चक्रवात, समुद्र के बढ़ते स्तर और अन्य जलवायु संबंधी खतरे यहां बड़ी चुनौती हैं।
इसलिए इसे ‘सुरक्षित देश’ कहना सही नहीं होगा। वैज्ञानिक अध्ययन केवल यह बताते हैं कि कुछ विशेष वैश्विक परिस्थितियों में यहां मानव आबादी के जीवित रहने की क्षमता अन्य स्थानों की तुलना में बेहतर हो सकती है।
7. सोलोमन आइलैंड—समुद्र और स्थानीय खाद्य संसाधन महत्वपूर्ण
सोलोमन आइलैंड भी प्रशांत महासागर में स्थित एक द्वीपीय देश है। इसकी अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका में स्थानीय कृषि तथा समुद्री संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
किसी वैश्विक संकट में जब अंतरराष्ट्रीय खाद्य आपूर्ति बाधित हो सकती है, तब स्थानीय स्तर पर भोजन पैदा करने और मछली पकड़ने की क्षमता महत्वपूर्ण बन जाती है।
यही कारण है कि न्यूक्लियर विंटर जैसे मॉडल में सोलोमन आइलैंड का नाम उन देशों में आया जो बेहद कठिन परिस्थितियों में भी कुछ मात्रा में खाद्य उत्पादन जारी रख सकते हैं।
हालांकि छोटे द्वीपीय देशों की अपनी कमजोरियां भी हैं। चिकित्सा सुविधाएं, आधुनिक मशीनरी, ईंधन और औद्योगिक सामान के लिए उन्हें बाहरी दुनिया पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
महाप्रलय में सबसे बड़ी चुनौती भोजन नहीं, पूरी व्यवस्था हो सकती है
इन अध्ययनों से एक बेहद महत्वपूर्ण बात सामने आती है। किसी वैश्विक आपदा में सिर्फ जमीन या भोजन होना पर्याप्त नहीं होगा।
आज की दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। किसान खेत में फसल उगाता है, लेकिन ट्रैक्टर के लिए ईंधन चाहिए। सिंचाई के लिए बिजली चाहिए। मशीन खराब होने पर स्पेयर पार्ट चाहिए। खाद और कीटनाशक चाहिए। तैयार भोजन को बाजार तक पहुंचाने के लिए सड़क और परिवहन चाहिए।
यानी आधुनिक सभ्यता कई परतों पर निर्भर करती है।
अगर किसी बड़ी आपदा में अंतरराष्ट्रीय व्यापार बंद हो जाए तो सबसे पहले पेट्रोलियम, मशीनरी, उर्वरक, दवाइयां और औद्योगिक सामान की कमी महसूस हो सकती है।
न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे कृषि-संपन्न देश भी इससे पूरी तरह अछूते नहीं रहेंगे।
न्यूजीलैंड की कहानी इस जोखिम को अच्छी तरह समझाती है
न्यूजीलैंड को अक्सर इस तरह की सूची में सबसे मजबूत देशों में रखा जाता है। लेकिन विशेषज्ञों ने खुद चेतावनी दी है कि इसे लेकर झूठा भरोसा खतरनाक हो सकता है।
देश में डीजल, मशीनों के पुर्जे और कई कृषि इनपुट बाहर से आते हैं। अगर इनकी आपूर्ति अचानक बंद हो जाए तो खेती की मौजूदा क्षमता को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
न्यूजीलैंड की एकमात्र बड़ी तेल रिफाइनरी के बंद होने के बाद देश को रिफाइंड ईंधन के लिए आयात पर और अधिक निर्भर होना पड़ा है।
इससे यह बात साफ होती है कि किसी देश की वास्तविक मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितनी जमीन या कितना भोजन है। सवाल यह भी है कि संकट के दौरान उसकी उत्पादन व्यवस्था कितने समय तक चल सकती है।
क्या भारत भी ऐसी स्थिति में सुरक्षित रह सकता है?
इन अध्ययनों में भारत को इन सात देशों की सूची में शामिल नहीं किया गया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत में किसी वैश्विक आपदा के समय जीवित रहने की कोई संभावना नहीं होगी।
भारत के पास विशाल कृषि क्षेत्र, बड़ी जनसंख्या, विविध जलवायु, समुद्री तट, नदियां और विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधन हैं। देश के कई हिस्सों में स्थानीय स्तर पर भोजन का उत्पादन संभव है।
लेकिन भारत की सबसे बड़ी चुनौती उसकी विशाल आबादी होगी।
अगर वैश्विक आपदा लंबे समय तक बनी रहती है तो इतने बड़े पैमाने पर लोगों के लिए भोजन, पानी, ऊर्जा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है।
यही कारण है कि किसी भी देश की ‘सुरक्षित’ स्थिति को उसकी आबादी, संसाधनों और आत्मनिर्भरता के साथ जोड़कर देखना जरूरी है।
क्या सचमुच धरती की महाप्रलय से इंसान बच सकता है?
वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए ये सात देश किसी काल्पनिक ‘सेफ जोन’ की तरह नहीं हैं। ये अध्ययन संभावित परिस्थितियों के मॉडल पर आधारित हैं।
अगर समुद्र का जलस्तर बढ़ता है तो परिणाम अलग होंगे। अगर परमाणु युद्ध होता है तो परिस्थितियां अलग होंगी। अगर विशाल ज्वालामुखी विस्फोट होता है तो उसका प्रभाव अलग होगा। और अगर कोई विशाल एस्टेरॉयड धरती से टकराता है तो स्थिति पूरी तरह अलग हो सकती है।
इसलिए किसी एक देश को हर तरह की आपदा से सुरक्षित बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
फिर भी इन अध्ययनों की अहमियत इसलिए है क्योंकि ये हमें एक बड़ा सवाल सोचने पर मजबूर करते हैं—आधुनिक सभ्यता वास्तव में कितनी आत्मनिर्भर है?
आज दुनिया का एक देश दूसरे देश से पेट्रोल लेता है, तीसरे देश से मशीनरी, चौथे से खाद और पांचवें से दवाइयां। यह वैश्विक व्यवस्था सामान्य समय में बेहद प्रभावी है, लेकिन किसी बड़े संकट में यही परस्पर निर्भरता कमजोरी भी बन सकती है।
आखिर सबसे सुरक्षित कौन?
अगर अलग-अलग अध्ययनों के निष्कर्षों को एक साथ देखा जाए तो न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया सबसे मजबूत दावेदार दिखाई देते हैं। न्यूजीलैंड की ताकत उसकी भौगोलिक अलगाव, कृषि और ऊर्जा क्षमता में है, जबकि ऑस्ट्रेलिया के पास विशाल संसाधन, खाद्य उत्पादन, बुनियादी ढांचा और रणनीतिक क्षमता है।
आइसलैंड ऊर्जा के मामले में मजबूत है। आयरलैंड कृषि के कारण बेहतर स्थिति में है। ब्रिटेन के पास मजबूत संस्थागत और तकनीकी व्यवस्था है। वहीं वानुअतु और सोलोमन आइलैंड जैसे छोटे द्वीपीय देशों को स्थानीय खाद्य और समुद्री संसाधनों से फायदा मिल सकता है।
लेकिन अंतिम सच यही है कि महाप्रलय की स्थिति में कोई भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
वैज्ञानिकों की ये सूची भविष्य की गारंटी नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों को समझने का एक प्रयास है। इससे यह भी पता चलता है कि आने वाले समय में किसी देश की असली ताकत सिर्फ उसकी सेना या अर्थव्यवस्था नहीं होगी। संकट के समय भोजन, पानी, ऊर्जा, स्वास्थ्य व्यवस्था, स्थानीय उत्पादन और सामाजिक स्थिरता ही सबसे बड़ी पूंजी साबित हो सकती है।
शायद यही इस पूरे अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश है—दुनिया खत्म होने की कल्पना से ज्यादा जरूरी यह समझना है कि दुनिया को बचाए रखने के लिए आज हमें कितना आत्मनिर्भर और तैयार होना चाहिए।