रिटायरमेंट के बाद भी जारी रह सकती है अनुशासनात्मक कार्रवाई, अगर सर्विस रूल्स में है प्रावधान: मद्रास हाईकोर्ट का अहम फैसला
किसी कर्मचारी के खिलाफ नौकरी के दौरान शुरू हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई केवल इस वजह से खत्म नहीं हो जाती कि कर्मचारी बाद में रिटायर हो गया है। यदि संबंधित सेवा नियम नियोक्ता को ऐसी कार्रवाई जारी रखने की अनुमति देते हैं, तो सेवानिवृत्ति के बाद भी कार्यवाही को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है। मद्रास हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने एक एसोसिएट प्रोफेसर से जुड़े मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की बेंच ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कब शुरू हुई थी और उस समय लागू सेवा नियम क्या कहते थे। यदि कार्रवाई कर्मचारी के रिटायर होने से पहले शुरू हो चुकी थी और नियम नियोक्ता को उसे जारी रखने का अधिकार देते हैं, तो केवल रिटायरमेंट को आधार बनाकर पूरी कार्यवाही को अमान्य नहीं कहा जा सकता।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोर्ट ने एक तरफ कर्मचारी के सेवानिवृत्ति के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई जारी रखने के अधिकार को देखा, वहीं दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और उचित प्रक्रिया का पालन होना जरूरी है।
क्या था पूरा मामला?
मामला श्री परमाकल्याणी कॉलेज के केमिस्ट्री विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत एक शिक्षक से जुड़ा था। उनके खिलाफ कॉलेज प्रबंधन ने 30 अगस्त 2011 को आरोपों का मेमोरेंडम जारी किया था।
प्रोफेसर पर आरोप गंभीर प्रकृति के थे। शिकायतों में कहा गया था कि उन्होंने कुछ छात्राओं के साथ कथित तौर पर यौन रंगत वाली टिप्पणियां कीं और अनुचित व्यवहार किया। आरोप यह भी था कि वह छात्राओं से ऐसे सवाल पूछते थे जिनका उनकी पढ़ाई से कोई संबंध नहीं था।
इसके अलावा, कुछ छात्राओं को कथित तौर पर कक्षा के बाहर खड़ा करके अपमानित करने तथा बदले की भावना से कुछ विद्यार्थियों को जानबूझकर फेल करने के आरोप भी लगाए गए थे।
मामले में यह आरोप भी सामने आया कि प्रोफेसर ने कुछ विद्यार्थियों की आर्थिक मदद की थी और बाद में पैसे वापस करने के लिए उन्हें एक लॉज में मिलने के लिए कहा। शिकायतों में उनकी बातचीत में कथित तौर पर दोहरे अर्थ वाले और यौन प्रकृति के संवाद का भी उल्लेख किया गया था।
इन आरोपों को कॉलेज प्रबंधन ने गंभीरता से लिया और निर्धारित प्रक्रिया के तहत विभागीय जांच शुरू की।
जांच में प्रोफेसर को मिला अपना पक्ष रखने का मौका
मामले की सुनवाई के दौरान कॉलेज की ओर से यह दलील दी गई कि प्रोफेसर को जांच के प्रत्येक चरण में अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया था।
एक स्वतंत्र जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था। जांच के दौरान प्रोफेसर को आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ संबंधित साक्ष्यों पर अपना पक्ष रखने का अवसर मिला। उन्हें छात्राओं से जिरह करने की अनुमति भी दी गई थी।
जांच पूरी होने के बाद आरोपों को साबित माना गया। इसके आधार पर प्रोफेसर के खिलाफ अनुशासनात्मक दंड लगाया गया और उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के पद से असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर डिमोट कर दिया गया।
प्रोफेसर ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सिंगल जज के आदेश के बाद मामला आगे बढ़ा
प्रोफेसर द्वारा दायर रिट याचिका पर सिंगल जज ने कॉलेज प्रबंधन द्वारा 29 अक्टूबर 2011 को सौंपे गए प्रस्ताव पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि निर्णय लेने से पहले प्रोफेसर को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर प्रोफेसर ने रिट अपील दाखिल की। इस बीच रीजनल जॉइंट डायरेक्टर ने भी मामले में लगाए गए दंड को मंजूरी दे दी।
इसके बाद प्रोफेसर ने इस मंजूरी को भी चुनौती दी। मामला अंततः हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के सामने पहुंचा।
‘विशाखा गाइडलाइंस’ का भी दिया गया हवाला
प्रोफेसर की ओर से हाईकोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया कि उनके खिलाफ हुई जांच उस समय लागू विशाखा गाइडलाइंस के अनुरूप नहीं थी।
दलील दी गई कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों की जांच के लिए उचित शिकायत समिति का गठन किया जाना चाहिए था। ऐसी समिति में महिला अध्यक्ष, पर्याप्त संख्या में महिला सदस्य और एक स्वतंत्र सदस्य/ऑब्जर्वर का होना जरूरी था।
प्रोफेसर का कहना था कि चूंकि उनके खिलाफ आरोप छात्राओं से संबंधित थे, इसलिए केवल सामान्य विभागीय जांच के आधार पर दंड नहीं दिया जा सकता था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा- यह मुद्दा पहले क्यों नहीं उठाया गया?
डिविजन बेंच ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि ‘विशाखा गाइडलाइंस’ के पालन का सवाल सिंगल जज के सामने उचित समय पर नहीं उठाया गया था।
कोर्ट ने यह भी देखा कि प्रोफेसर ने अपनी पिछली रिट याचिका में भी इस आधार को नहीं उठाया था।
अदालत के अनुसार, यदि किसी कर्मचारी को लगता है कि जांच की मूल प्रक्रिया ही गलत थी, तो उसे यह आपत्ति उचित समय पर उठानी चाहिए। बाद के चरण में नया आधार लेकर पूरी कार्यवाही को चुनौती देना हमेशा स्वीकार्य नहीं हो सकता।
बेंच ने यह भी पाया कि इस मामले में स्वतंत्र जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था और प्रोफेसर को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया गया था। जांच रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण किया गया था और ऐसा कोई स्पष्ट कारण नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि जांच अधिकारी का निष्कर्ष मनमाना, विकृत या बिना साक्ष्य के था।
सबसे अहम सवाल- रिटायरमेंट के बाद क्या कॉलेज कार्रवाई जारी रख सकता है?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यही था।
प्रोफेसर की ओर से तर्क दिया गया कि जब कर्मचारी निर्धारित आयु पूरी करके रिटायर हो जाता है, तो नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सेवा संबंध समाप्त हो जाता है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद नियोक्ता के पास दंड देने की शक्ति नहीं बचती।
इसके समर्थन में कई न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया। इनमें एस. एंडियानन बनाम जॉइंट रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज और देव प्रकाश तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूशनल सर्विस बोर्ड जैसे फैसले शामिल थे।
इन निर्णयों के आधार पर यह तर्क रखा गया कि सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्रवाई तभी जारी रह सकती है, जब संबंधित कानून, सेवा नियम या उपनियम नियोक्ता को ऐसी शक्ति प्रदान करते हों।
प्रोफेसर की ओर से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम नवीन कुमार सिन्हा मामले का भी हवाला दिया गया। इसमें रिटायरमेंट के बाद शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को अमान्य माना गया था।
मद्रास हाईकोर्ट ने दोनों परिस्थितियों में अंतर बताया
डिविजन बेंच ने नवीन कुमार सिन्हा के मामले को मौजूदा मामले से अलग माना।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतर बताया कि नवीन कुमार सिन्हा के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद शुरू हुई थी, जबकि वर्तमान मामले में प्रोफेसर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई उनकी सेवानिवृत्ति से काफी पहले शुरू हो चुकी थी।
मौजूदा मामले में आरोपों का मेमोरेंडम रिटायरमेंट से लगभग तीन साल पहले जारी किया गया था और प्रस्तावित दंड की प्रक्रिया भी उनके रिटायर होने से पहले ही शुरू हो चुकी थी।
यही अंतर इस मामले में निर्णायक साबित हुआ।
अर्थात कोर्ट ने यह नहीं कहा कि हर रिटायर्ड कर्मचारी के खिलाफ किसी भी समय विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है। बल्कि निर्णय का मूल आधार यह था कि नौकरी के दौरान शुरू की गई कार्रवाई को जारी रखने की शक्ति संबंधित सेवा नियमों में मौजूद होनी चाहिए।
तमिलनाडु प्राइवेट कॉलेज कानून का महत्व
कॉलेज प्रबंधन की ओर से तमिलनाडु प्राइवेट कॉलेज (रेगुलेशन) एक्ट, 1976 का भी हवाला दिया गया।
प्रबंधन ने कहा कि कानून के तहत निजी कॉलेजों में नियुक्त शिक्षकों पर निर्धारित आचार संहिता लागू होती है। कानून में दंड के खिलाफ अपील और आगे की कानूनी प्रक्रिया का भी प्रावधान है।
कोर्ट ने पाया कि इस कानून के तहत दंड के खिलाफ धारा 20 में अपील का प्रावधान है। इसके बाद धारा 21 के तहत दूसरी अपील का रास्ता भी उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त सरकार के समक्ष पुनरीक्षण का विकल्प भी मौजूद था।
इसके बावजूद प्रोफेसर ने इन वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे रिट याचिका का रास्ता चुना।
कोर्ट ने वैकल्पिक उपाय को भी माना महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी कानून के तहत किसी व्यक्ति को अपील या अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध कराया गया हो, तो सामान्य तौर पर उस वैकल्पिक उपाय का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अदालत ने इस मामले में यह भी माना कि प्रोफेसर को उपलब्ध वैधानिक उपायों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने उनका इस्तेमाल नहीं किया।
इसलिए कोर्ट ने माना कि उन्होंने जानबूझकर वैकल्पिक अपील की प्रक्रिया का सहारा नहीं लिया और सीधे रिट याचिका दाखिल की।
फैसला क्या निकला?
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने प्रोफेसर की रिट अपील को खारिज कर दिया।
कोर्ट के फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि रिटायरमेंट अपने आप में पहले से शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को समाप्त नहीं करता।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी को किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना ही पड़ेगा। हर मामले में यह देखना होगा कि संबंधित सेवा नियम क्या कहते हैं, कार्रवाई कब शुरू हुई, जांच किस प्रकार की गई और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला या नहीं।
कर्मचारियों और नियोक्ताओं के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?
यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ उन संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण है जहां सेवा नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है।
कर्मचारियों के लिए संदेश साफ है कि यदि विभागीय जांच के दौरान उन्हें प्रक्रिया में कोई गंभीर कानूनी कमी दिखाई देती है, तो उस आपत्ति को उचित समय पर उठाना जरूरी है। बाद में नए आधार पर पूरी कार्रवाई को चुनौती देने में परेशानी हो सकती है।
दूसरी तरफ नियोक्ताओं के लिए भी यह फैसला एक सीमा तय करता है। वे केवल रिटायरमेंट का हवाला देकर या उसके बाद मनमाने तरीके से पुरानी कार्रवाई जारी नहीं रख सकते। उन्हें संबंधित सेवा नियमों और लागू कानून में मौजूद अधिकार का आधार दिखाना होगा।
इस मामले में कार्रवाई रिटायरमेंट से पहले शुरू हुई थी, स्वतंत्र जांच हुई थी, प्रोफेसर को अपना पक्ष रखने का मौका मिला था और लागू कानून में अनुशासनात्मक दंड तथा अपील की व्यवस्था मौजूद थी। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रोफेसर की चुनौती को स्वीकार नहीं किया।
निष्कर्ष
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला सेवा कानून से जुड़े मामलों में एक अहम बात को दोहराता है—किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति और अनुशासनात्मक कार्यवाही के बीच संबंध केवल रिटायरमेंट की तारीख देखकर तय नहीं किया जा सकता।
सबसे पहले यह देखना होगा कि कार्रवाई कब शुरू हुई थी और उस समय लागू नियम नियोक्ता को क्या अधिकार देते थे। यदि कर्मचारी के सेवाकाल में ही आरोप तय कर दिए गए थे और विभागीय जांच विधि के अनुसार शुरू हो चुकी थी, तो केवल बाद में रिटायर हो जाने से कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
साथ ही, कर्मचारी को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर देना भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए इस फैसले का व्यापक संदेश यही है कि सेवानिवृत्ति अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए स्वतः सुरक्षा-कवच नहीं है, लेकिन नियोक्ता की शक्ति भी असीमित नहीं है। लागू कानून और सेवा नियम ही तय करेंगे कि रिटायरमेंट के बाद कार्रवाई किस सीमा तक जारी रह सकती है।