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21 करोड़ रुपये की अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का भंडाफोड़: कानपुर से फर्जी कंपनी के 3 मास्टरमाइंड गिरफ्तार,

21 करोड़ रुपये की अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का भंडाफोड़: कानपुर से फर्जी कंपनी के 3 मास्टरमाइंड गिरफ्तार, APK और फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म से बिछाया था जाल

ग्वालियर। ट्रेडिंग में कम समय में बड़ा मुनाफा कमाने का लालच देकर लोगों को अपने जाल में फंसाने वाले एक बड़े साइबर ठगी गिरोह का राज्य साइबर पुलिस जोन ग्वालियर ने भंडाफोड़ किया है। पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह ने फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म, APK फाइल, बैंक खातों और विदेशी IP एड्रेस का इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया। मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश के कानपुर और आसपास के इलाकों में दबिश देकर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी एक फर्जी कंपनी की आड़ में साइबर फ्रॉड का नेटवर्क चला रहे थे। कंपनी के नाम पर बैंक में करंट अकाउंट खुलवाया गया था और इसी खाते का इस्तेमाल कथित तौर पर ठगी की रकम को इधर-उधर करने के लिए किया जा रहा था।

इस पूरे मामले की शुरुआत एक ऐसे शिकायत आवेदन से हुई, जिसमें ट्रेडिंग के जरिए भारी मुनाफा दिलाने का भरोसा देकर 21 करोड़ 5 लाख 92 हजार रुपये की कथित ठगी किए जाने का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता सीए अशोक विजयवर्गीय ने पुलिस को बताया कि उन्हें ट्रेडिंग के नाम पर निवेश के लिए प्रेरित किया गया और बाद में बड़ी रकम की धोखाधड़ी सामने आई।

मामला सामने आने के बाद पुलिस ने तकनीकी जांच शुरू की। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, साइबर ठगी के नेटवर्क से जुड़े कई डिजिटल और बैंकिंग सुराग सामने आते गए।

ट्रेडिंग के नाम पर शुरू हुआ खेल

साइबर ठगी करने वाले गिरोह आम तौर पर लोगों को कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का सपना दिखाकर अपने जाल में फंसाते हैं। इस मामले में भी पुलिस के अनुसार निवेश और ट्रेडिंग में अत्यधिक लाभ का लालच दिया गया।

आरोपियों ने ऐसा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार किया था, जिसे देखकर पहली नजर में किसी वास्तविक ट्रेडिंग वेबसाइट या एप्लीकेशन जैसा भ्रम पैदा हो सकता था। निवेश करने वाले व्यक्ति को उसके खाते में रकम बढ़ती हुई दिखाई जाती थी।

फर्जी प्लेटफॉर्म पर निवेश की गई रकम और कथित मुनाफे का ग्राफ दिखाई देता था। इससे निवेशक को यह भरोसा होता था कि उसका पैसा वास्तव में ट्रेडिंग में लगा हुआ है और उस पर लगातार लाभ हो रहा है।

जब स्क्रीन पर रकम बढ़ती दिखाई देती है तो निवेशक के मन में भरोसा और लालच दोनों बढ़ते हैं। पुलिस के अनुसार इसी मनोवैज्ञानिक तरीके का फायदा उठाकर आरोपियों ने लोगों से और अधिक रकम जमा कराई।

असलियत में दिखाई देने वाला मुनाफा कथित तौर पर केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर तैयार किया गया आंकड़ा था।

फर्जी वेबसाइट ने पैदा किया मुनाफे का भ्रम

साइबर पुलिस की तकनीकी जांच में एक फर्जी वेब पेज का पता चला। इस पेज पर निवेश की गई राशि के साथ कथित लाभ-हानि का ग्राफ प्रदर्शित किया जाता था।

निवेशक जब अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर रकम बढ़ती देखता था तो उसे लगता था कि ट्रेडिंग सही तरीके से चल रही है।

यही साइबर ठगों की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

किसी व्यक्ति को शुरुआत में छोटी रकम निवेश करने के लिए कहा जाता है। इसके बाद स्क्रीन पर लाभ दिखने लगता है। निवेशक को लगता है कि उसे वास्तव में फायदा हो रहा है और वह ज्यादा रकम लगाने लगता है।

जांच एजेंसियां पहले भी साइबर ठगी के कई मामलों में ऐसे फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सामने आने की बात कह चुकी हैं। इस मामले में भी पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि प्लेटफॉर्म को किसने तैयार किया, सर्वर कहां से संचालित हो रहा था और इसमें कितने लोगों की भूमिका थी।

विदेशी IP एड्रेस से चलाया जा रहा था नेटवर्क

मामले की तकनीकी जांच में पुलिस को एक और महत्वपूर्ण जानकारी मिली। पुलिस के अनुसार फर्जी वेबसाइट को विदेशी IP एड्रेस के माध्यम से नियंत्रित किया जा रहा था।

साइबर अपराधियों के लिए विदेशी सर्वर या IP एड्रेस का इस्तेमाल जांच एजेंसियों के सामने चुनौती पैदा कर सकता है। इससे वास्तविक ऑपरेटर की पहचान और उसके स्थान तक पहुंचने में समय लग सकता है।

हालांकि डिजिटल तकनीक के जरिए पुलिस ने इस मामले में ईमेल आईडी, बैंकिंग लेनदेन, डिजिटल डिवाइस और अन्य तकनीकी जानकारियों को जोड़कर जांच आगे बढ़ाई।

पुलिस का कहना है कि इन डिजिटल सुरागों ने जांच को कानपुर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कानपुर में बनाई गई थी फर्जी कंपनी

जांच के दौरान पुलिस के सामने कथित तौर पर ‘ब्रिकनोवा बिल्डकोन प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी का नाम आया।

पुलिस के अनुसार आरोपियों ने इस कंपनी की आड़ में बैंक में करंट अकाउंट खुलवाया था। इसी खाते में साइबर ठगी से जुड़ी रकम आने और उसके बाद अलग-अलग खातों में भेजे जाने के संकेत मिले हैं।

यह तरीका साइबर अपराध के मामलों में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। ठगी करने वाला गिरोह सीधे अपने नाम से बैंक खाते का इस्तेमाल करने के बजाय किसी कंपनी, फर्म या दूसरे व्यक्ति के नाम पर खाता खुलवाकर उसमें पैसा प्राप्त कर सकता है।

इसके बाद रकम कई खातों में ट्रांसफर की जाती है। इस तरह पैसों की वास्तविक दिशा को छिपाने की कोशिश की जाती है।

पुलिस अब इस कंपनी की स्थापना, उसके बैंक खाते, दस्तावेजों और उससे जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच कर रही है।

APK फाइल से बैंक खातों को किया जा रहा था नियंत्रित

इस मामले की जांच में APK फाइल का इस्तेमाल भी सामने आया है।

पुलिस के मुताबिक, गिरोह का खाता संचालक APK फाइल की मदद से अलग-अलग राज्यों में मौजूद बैंक खातों को दूर बैठकर संचालित करता था।

APK एंड्रॉयड एप्लीकेशन पैकेज से संबंधित फाइल होती है। सामान्य तौर पर एंड्रॉयड मोबाइल में एप्लीकेशन इंस्टॉल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यदि किसी संदिग्ध या अनधिकृत स्रोत से प्राप्त APK को मोबाइल में इंस्टॉल किया जाए तो वह सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है।

साइबर अपराधी कई बार ऐसी फाइलों के माध्यम से लोगों के मोबाइल या डिजिटल सिस्टम तक पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं।

इस मामले में पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि APK किसने तैयार की थी, इसे किस तरह इस्तेमाल किया जाता था और इसके जरिए किन-किन बैंक खातों या डिजिटल संसाधनों तक पहुंच बनाई गई।

शिकायतकर्ता की रकम की पहली लेयर भी मिली

पुलिस जांच में गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े बैंक खाते में शिकायतकर्ता की रकम का भी ट्रांजैक्शन सामने आने की बात कही गई है।

पुलिस के अनुसार शिकायतकर्ता के 25 लाख रुपये की पहली लेयर का लेनदेन गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े खाते में मिला है।

यह जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण सुराग माना जा रहा है, क्योंकि साइबर ठगी के मामलों में रकम एक खाते से दूसरे खाते में भेजी जाती है। इसे आम तौर पर मनी ट्रेल यानी धनराशि के लेनदेन की कड़ी के रूप में देखा जाता है।

एक खाते में पैसा आने के बाद उसे कई अन्य खातों में भेज दिया जाता है। इसलिए जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण होता है कि शिकायतकर्ता से निकली रकम आखिर किन-किन खातों में पहुंची।

पांच राज्यों में करीब 1.37 करोड़ रुपये के लेनदेन का दावा

राज्य साइबर पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों से जुड़े बैंक खाते से देश के पांच राज्यों के सात स्थानों पर हुई करीब 1 करोड़ 37 लाख रुपये की साइबर ठगी की रकम का लेनदेन पाया गया है।

इससे पुलिस को आशंका है कि मामला केवल एक शिकायतकर्ता तक सीमित नहीं हो सकता।

अलग-अलग राज्यों से जुड़े लेनदेन मिलने के बाद अब जांच का दायरा बढ़ गया है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क से कितने बैंक खाते जुड़े थे और किन-किन राज्यों में लोगों को निशाना बनाया गया।

साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस नेटवर्क के पीछे कितने लोग काम कर रहे थे और गिरफ्तार किए गए तीन आरोपियों की वास्तविक भूमिका क्या थी।

तीन आरोपियों की गिरफ्तारी

तकनीकी साक्ष्यों और डिजिटल जांच के आधार पर राज्य साइबर पुलिस जोन ग्वालियर की टीम ने कानपुर में दबिश दी।

पुलिस के अनुसार इस कार्रवाई में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है।

गिरफ्तार आरोपियों में अलोक गुप्ता, उम्र 20 वर्ष, सौरभ सोनकर, उम्र 27 वर्ष और रंजीत, उम्र 32 वर्ष शामिल हैं।

पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार अलोक गुप्ता कानपुर नगर के कल्याणपुर क्षेत्र का निवासी है। सौरभ सोनकर भी कानपुर नगर क्षेत्र का रहने वाला बताया गया है, जबकि रंजीत का संबंध उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद से बताया गया है।

पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें न्यायालय के समक्ष पेश करने की प्रक्रिया शुरू की है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। अदालत में दोष सिद्ध होने तक किसी भी आरोपी को कानूनी रूप से दोषी नहीं माना जा सकता।

पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं तीन आरोपी

पुलिस के मुताबिक इस मामले में कार्रवाई की यह पहली गिरफ्तारी नहीं है। इससे पहले भी तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अब तीन और संदिग्धों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस इस पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में लगी है।

जांच एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि पहले गिरफ्तार किए गए आरोपियों और हाल में पकड़े गए आरोपियों के बीच किस प्रकार का संपर्क था।

इसके अलावा बैंक खाते, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी, डिजिटल डिवाइस और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर नेटवर्क के दूसरे सदस्यों की पहचान की जा रही है।

पुलिस टीम ने डिजिटल साक्ष्यों को बनाया आधार

इस कार्रवाई में साइबर पुलिस ने तकनीकी जांच को प्रमुख आधार बनाया।

निरीक्षक मुकेश कुमार नरोलिया, उप निरीक्षक शैलेन्द्र राठौर और आरक्षक पुष्पेन्द्र यादव की टीम ने डिजिटल साक्ष्यों और ईमेल आईडी से मिली जानकारी का विश्लेषण किया।

साइबर अपराध के मामलों में केवल आरोपी की पहचान करना पर्याप्त नहीं होता। पुलिस को यह भी साबित करना होता है कि संबंधित डिजिटल डिवाइस, बैंक खाते, मोबाइल नंबर, वेबसाइट और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक संसाधन आपस में कैसे जुड़े हैं।

इसी वजह से पुलिस की जांच में बैंकिंग ट्रांजैक्शन और डिजिटल फुटप्रिंट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

पुलिस रिमांड में खुल सकते हैं कई राज

पुलिस आरोपियों को न्यायालय के सामने पेश कर पुलिस रिमांड लेने की तैयारी में है।

रिमांड के दौरान जांच टीम आरोपियों से ठगी की रकम, बैंक खातों, फर्जी कंपनी, वेबसाइट, APK फाइल और अन्य डिजिटल संसाधनों के बारे में पूछताछ कर सकती है।

पुलिस का मुख्य उद्देश्य कथित तौर पर ठगी की शेष रकम का पता लगाना और उसे बरामद करना है।

इसके साथ ही यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म किसने बनाया था और इसे चलाने के लिए तकनीकी सहायता कौन उपलब्ध करा रहा था।

यदि जांच में दूसरे लोगों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

कैसे बचें फर्जी ट्रेडिंग के जाल से?

यह मामला आम लोगों के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है। ऑनलाइन ट्रेडिंग और निवेश के नाम पर आने वाले ऑफर को बिना जांचे स्वीकार करना भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।

यदि कोई व्यक्ति बहुत कम समय में असामान्य रूप से ज्यादा मुनाफे की गारंटी देता है तो सावधान रहने की जरूरत है।

सिर्फ किसी वेबसाइट या मोबाइल एप्लीकेशन पर बढ़ती हुई रकम देखकर यह मान लेना सही नहीं है कि वास्तव में पैसा शेयर बाजार या किसी अन्य ट्रेडिंग गतिविधि में निवेश किया जा रहा है।

कई फर्जी प्लेटफॉर्म पर स्क्रीन के अंदर नकली मुनाफा दिखाया जा सकता है। असली समस्या तब सामने आती है जब निवेशक अपनी रकम वापस निकालने की कोशिश करता है।

कई मामलों में पहले अतिरिक्त टैक्स, प्रोसेसिंग फीस, सिक्योरिटी फीस या अन्य शुल्क के नाम पर और पैसा जमा कराया जाता है। इसके बाद भी रकम वापस नहीं मिलती।

अचानक बड़ी रकम निवेश करने से बचें

ऑनलाइन निवेश करते समय सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि किसी अजनबी व्यक्ति के कहने पर बड़ी रकम बैंक खाते में ट्रांसफर न की जाए।

किसी भी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता, कंपनी का विवरण और संबंधित वित्तीय संस्थाओं की वैधता की जांच करना जरूरी है।

यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप या टेलीग्राम के जरिए निवेश संबंधी सलाह देकर सीधे किसी लिंक, APK या संदिग्ध एप्लीकेशन को इंस्टॉल करने के लिए कहता है, तो विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

21 करोड़ की ठगी ने बढ़ाई चिंता

इस मामले में शिकायत की गई 21.05 करोड़ रुपये से अधिक की रकम इसे बेहद गंभीर साइबर धोखाधड़ी के मामलों में शामिल करती है।

पुलिस की जांच अभी जारी है और गिरफ्तारियों के बाद मामले की कई नई परतें खुलने की संभावना है।

फर्जी कंपनी, करंट अकाउंट, विदेशी IP एड्रेस, फर्जी ट्रेडिंग वेबसाइट, APK फाइल और कई राज्यों में हुए लेनदेन ने जांच को व्यापक बना दिया है।

अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ठगी की पूरी रकम का मनी ट्रेल खोजना, संभावित अन्य आरोपियों तक पहुंचना और नेटवर्क के तकनीकी संचालन का पता लगाना है।

निष्कर्ष

ग्वालियर राज्य साइबर पुलिस की इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह दिखाया है कि साइबर अपराध अब केवल मोबाइल फोन पर होने वाली छोटी-मोटी ठगी तक सीमित नहीं रह गया है। अपराधी फर्जी कंपनियां बनाकर, बैंक खातों का नेटवर्क तैयार करके, नकली वेबसाइट और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर आर्थिक अपराध को अंजाम देने की कोशिश कर रहे हैं।

इस मामले में पुलिस के अनुसार ट्रेडिंग में भारी मुनाफे का लालच देकर लोगों को फंसाया गया और फर्जी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए निवेश का भ्रम पैदा किया गया। जांच में कानपुर में संचालित कथित फर्जी कंपनी, बैंक खातों और APK फाइल के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है।

फिलहाल तीन नए आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस पूछताछ और तकनीकी जांच के जरिए नेटवर्क की बाकी कड़ियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। आरोपियों को न्यायालय के समक्ष पेश किया जा रहा है और आगे की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होगी।

यह मामला आम निवेशकों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश देता है—ऑनलाइन ट्रेडिंग में असामान्य मुनाफे का लालच, अनजान लिंक या APK फाइल और बिना सत्यापन के किसी खाते में पैसा भेजना भारी नुकसान का कारण बन सकता है। डिजिटल दुनिया में सावधानी ही सबसे पहली सुरक्षा है।