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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI के तहत सीधे नहीं मिलेगी CCTV फुटेज,

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RTI के तहत सीधे नहीं मिलेगी CCTV फुटेज, लखनऊ पीठ ने बताया कानूनी रास्ता

        सूचना के अधिकार यानी RTI के जरिए सरकारी विभागों से जानकारी हासिल करने का अधिकार नागरिकों को मिला हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर तरह की सूचना बिना किसी कानूनी अपवाद के आवेदक को उपलब्ध करा दी जाएगी। इसी महत्वपूर्ण सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल RTI आवेदन दाखिल कर किसी घटना या स्थान की पूरी CCTV फुटेज सीधे हासिल करने का अधिकार नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अब्देश कुमार चौधरी की पीठ ने शोभित कश्यप की ओर से दाखिल रिट याचिका का निस्तारण करते हुए यह बात कही। अदालत के समक्ष मुख्य सवाल CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग और सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिलने वाली छूट से जुड़ा था।

हाईकोर्ट के रुख के अनुसार CCTV फुटेज सामान्य दस्तावेज या साधारण सूचना की तरह नहीं देखी जा सकती। इसमें ऐसे लोगों की तस्वीरें, उनकी गतिविधियां, आवाजाही और दूसरी संवेदनशील जानकारियां शामिल हो सकती हैं, जिनका सार्वजनिक किया जाना उनकी निजता या सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न पैदा कर सकता है।

हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि CCTV फुटेज कभी हासिल नहीं की जा सकती। अदालत ने यह रास्ता खुला रखा है कि यदि किसी व्यक्ति का किसी घटना से संबंध है और वह सक्षम न्यायालय या अधिकृत आयोग के सामने उचित शिकायत या कार्यवाही शुरू करता है, तो संबंधित फोरम आवश्यकता के अनुसार CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और बाद में साक्ष्य के तौर पर मंगाने का आदेश दे सकता है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला शोभित कश्यप की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने 20 मार्च 2025 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दाखिल किया था। इस आवेदन में उन्होंने संबंधित घटना या स्थान की संपूर्ण CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता की ओर से केवल फुटेज की मांग ही नहीं की गई थी, बल्कि सूचना उपलब्ध न कराने वाले संबंधित जन सूचना अधिकारी यानी PIO के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की गई थी।

उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने और मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा दिए जाने की मांग भी की थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि CCTV फुटेज किसी घटना की वास्तविक स्थिति सामने लाने में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। ऐसे में उसे संरक्षित रखना और आवश्यक होने पर उपलब्ध कराना नागरिक के हित में है।

लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आया कि क्या कोई व्यक्ति केवल RTI आवेदन के जरिए किसी स्थान की पूरी CCTV रिकॉर्डिंग मांग सकता है?

यही वह बिंदु था जिस पर हाईकोर्ट को कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी।

CCTV फुटेज को सामान्य सूचना क्यों नहीं माना गया?

RTI कानून सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए बनाया गया है। आम तौर पर नागरिक सरकारी रिकॉर्ड, दस्तावेज, आदेश, रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध सूचनाएं मांग सकते हैं। लेकिन कानून में कुछ सूचनाओं को सार्वजनिक करने से छूट भी दी गई है।

CCTV फुटेज की प्रकृति सामान्य सरकारी दस्तावेज से अलग होती है।

किसी कैमरे में केवल उस व्यक्ति की गतिविधि रिकॉर्ड नहीं होती जिसने सूचना मांगी है। उसके साथ उसी समय वहां मौजूद दर्जनों अन्य लोगों की तस्वीरें भी रिकॉर्ड हो सकती हैं। फुटेज में किसी व्यक्ति का चेहरा, उसकी आवाजाही, वाहन, पहचान संबंधी संकेत और दूसरी व्यक्तिगत गतिविधियां दिखाई दे सकती हैं।

ऐसे में यदि पूरी रिकॉर्डिंग किसी एक RTI आवेदक को दे दी जाती है, तो उसमें मौजूद दूसरे लोगों की निजता और सुरक्षा का सवाल पैदा हो सकता है।

यही कारण है कि अदालत के सामने CCTV फुटेज को लेकर सामान्य RTI सूचना और संवेदनशील रिकॉर्ड के बीच अंतर का प्रश्न आया।

राज्य सूचना आयोग ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सूचना आयोग की ओर से भी अदालत के सामने अपना पक्ष रखा गया।

आयोग ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(g) का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ ऐसी सूचनाएं जिनके सार्वजनिक किए जाने से किसी व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा हो सकता है, उन्हें सूचना उपलब्ध कराने के सामान्य अधिकार से छूट प्राप्त है।

आयोग का तर्क था कि CCTV रिकॉर्डिंग में ऐसे दृश्य या जानकारियां हो सकती हैं जिनके सार्वजनिक होने से वहां मौजूद किसी व्यक्ति की सुरक्षा या निजता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए CCTV फुटेज को सीधे RTI आवेदक को सौंपना उचित नहीं माना गया।

लेकिन आयोग की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि इसका मतलब फुटेज को हमेशा के लिए छिपा देना नहीं है। यदि किसी सक्षम अदालत या अधिकृत आयोग को किसी मामले की जांच के लिए फुटेज की जरूरत हो, तो संबंधित विभाग या पुलिस को उसे उपलब्ध कराने के लिए कहा जा सकता है।

यही अंतर इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है।

धारा 8(1)(g) का क्या महत्व है?

सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिकों को सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच देता है, लेकिन कानून में कुछ अपवाद भी निर्धारित किए गए हैं।

धारा 8(1)(g) उन परिस्थितियों से जुड़ी है जहां सूचना देने से किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है या कानून लागू करने वाली एजेंसी के लिए सूचना के स्रोत की पहचान उजागर हो सकती है।

CCTV फुटेज के संदर्भ में यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि रिकॉर्डिंग में केवल आवेदक से संबंधित जानकारी नहीं होती। कैमरे के सामने आने वाला हर व्यक्ति उस फुटेज का हिस्सा बन सकता है।

इसलिए पूरी रिकॉर्डिंग को बिना किसी छंटाई या सुरक्षा उपाय के किसी निजी व्यक्ति को सौंपना कई परिस्थितियों में समस्या पैदा कर सकता है।

क्या हाईकोर्ट ने कहा कि CCTV फुटेज कभी नहीं मिलेगी?

नहीं।

यह इस फैसले को समझने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हाईकोर्ट का रुख यह नहीं है कि CCTV फुटेज को किसी भी परिस्थिति में हासिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने मूल रूप से यह स्पष्ट किया कि केवल RTI आवेदन के आधार पर पूरी CCTV फुटेज सीधे मांगना अलग बात है और किसी कानूनी कार्यवाही में CCTV फुटेज को साक्ष्य के रूप में मंगाना अलग।

यदि किसी व्यक्ति के साथ कोई घटना हुई है और उस घटना का रिकॉर्ड CCTV कैमरे में मौजूद होने की संभावना है, तो संबंधित व्यक्ति सक्षम अदालत, आयोग या अन्य अधिकृत फोरम के सामने शिकायत या कार्यवाही शुरू कर सकता है।

ऐसी स्थिति में संबंधित फोरम CCTV रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के निर्देश दे सकता है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विभाग, संस्था या पुलिस से फुटेज मंगाई जा सकती है।

इसलिए किसी व्यक्ति को CCTV फुटेज की जरूरत हो तो केवल RTI पर निर्भर रहने के बजाय मामले की प्रकृति के अनुसार उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए CCTV फुटेज को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।

उनकी दलील का मूल आधार यह था कि यदि किसी घटना का महत्वपूर्ण हिस्सा CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हुआ है, तो उस रिकॉर्ड को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उसे साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

यह तर्क विशेष रूप से उन मामलों में महत्वपूर्ण हो सकता है जहां किसी सरकारी कार्यालय, पुलिस स्टेशन, बैंक, अस्पताल, स्कूल या अन्य सार्वजनिक स्थान पर कोई विवाद या घटना हुई हो।

लेकिन CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और उसे किसी RTI आवेदक को उपलब्ध कराने के सवाल अलग-अलग कानूनी मुद्दे हैं।

यही अंतर हाईकोर्ट के सामने भी महत्वपूर्ण रहा।

25 हजार रुपये के जुर्माने की मांग क्यों की गई थी?

याचिकाकर्ता ने सूचना उपलब्ध न कराने वाले संबंधित जन सूचना अधिकारी के खिलाफ RTI कानून के तहत अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने की मांग की थी।

इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजे की मांग भी की गई थी।

RTI कानून में निर्धारित परिस्थितियों में जन सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाया जा सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर कि मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई, हर मामले में स्वतः जुर्माना नहीं लगाया जाता।

यह देखना जरूरी होता है कि सूचना क्यों रोकी गई, क्या कानून के तहत उसे रोकने का आधार मौजूद था और क्या अधिकारी ने अपने कर्तव्य में जानबूझकर या अनुचित तरीके से लापरवाही की।

इस मामले में CCTV फुटेज को सूचना के अधिकार के सामान्य दायरे से अलग संवेदनशील सूचना के रूप में देखने का प्रश्न प्रमुख रहा।

हाईकोर्ट ने याचिका का कैसे निस्तारण किया?

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अब तक किसी सक्षम अदालत या आयोग के समक्ष ऐसी शिकायत दाखिल नहीं की थी, जिसके आधार पर CCTV फुटेज को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखने या मंगाने का आदेश दिया जा सके।

उन्होंने मुख्य रूप से RTI के माध्यम से फुटेज हासिल करने का प्रयास किया था।

ऐसी स्थिति में अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए यह रास्ता बताया कि यदि याचिकाकर्ता सक्षम फोरम के समक्ष उचित शिकायत या कार्यवाही शुरू करता है, तो संबंधित फोरम मामले की आवश्यकता के अनुसार CCTV फुटेज मंगाने या उसे संरक्षित रखने पर विचार कर सकता है।

यानी अदालत ने शिकायतकर्ता के लिए कानूनी रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया, बल्कि CCTV हासिल करने की प्रक्रिया को उचित न्यायिक या वैधानिक कार्यवाही से जोड़ दिया।

आम आदमी के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?

इस फैसले का असर उन लोगों पर पड़ सकता है जो किसी सरकारी कार्यालय या सार्वजनिक स्थान पर हुई घटना का CCTV रिकॉर्ड RTI के जरिए सीधे हासिल करना चाहते हैं।

मान लीजिए किसी व्यक्ति का किसी सरकारी कार्यालय में विवाद हो गया। वहां लगे कैमरे में पूरी घटना रिकॉर्ड हो गई। संबंधित व्यक्ति RTI लगाकर पूरे दिन की CCTV फुटेज मांगता है।

ऐसे मामले में उसे यह समझना होगा कि पूरी रिकॉर्डिंग में केवल उसी की घटना नहीं, बल्कि वहां आने-जाने वाले अन्य लोगों की गतिविधियां भी रिकॉर्ड हो सकती हैं।

इसलिए पूरी फुटेज सीधे उपलब्ध कराने पर निजता और सुरक्षा से जुड़े सवाल उठ सकते हैं।

यदि वही व्यक्ति किसी घटना को लेकर पुलिस शिकायत, न्यायालयी कार्यवाही या किसी सक्षम आयोग के सामने मामला ले जाता है, तो CCTV फुटेज को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखने और मंगाने का रास्ता अधिक प्रभावी हो सकता है।

CCTV फुटेज जल्दी सुरक्षित कराना क्यों जरूरी है?

CCTV रिकॉर्ड हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रहता। कई जगहों पर कैमरों की रिकॉर्डिंग सीमित अवधि तक ही रखी जाती है। पुरानी रिकॉर्डिंग नई रिकॉर्डिंग के साथ अपने आप ओवरराइट हो सकती है।

इसी वजह से यदि किसी घटना का CCTV रिकॉर्ड महत्वपूर्ण है तो संबंधित व्यक्ति को समय रहते उसके संरक्षण की मांग करनी चाहिए।

किसी शिकायत, FIR, न्यायिक कार्यवाही या सक्षम प्राधिकरण के समक्ष आवेदन में यह उल्लेख किया जा सकता है कि संबंधित स्थान की CCTV फुटेज को सुरक्षित रखा जाए, ताकि जांच या सुनवाई के दौरान आवश्यकता पड़ने पर उसे प्रस्तुत किया जा सके।

यह तरीका केवल RTI के जरिए पूरी फुटेज मांगने की तुलना में कई परिस्थितियों में अधिक व्यावहारिक हो सकता है।

क्या CCTV फुटेज अदालत में साक्ष्य बन सकती है?

किसी मामले में CCTV फुटेज महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य हो सकती है, लेकिन उसकी स्वीकार्यता और प्रमाणिकता मामले के तथ्यों तथा लागू साक्ष्य कानून पर निर्भर करेगी।

सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं होता कि कैमरे में घटना रिकॉर्ड हुई थी। यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि रिकॉर्डिंग कहां से प्राप्त हुई, वह सुरक्षित रही या नहीं, उसमें छेड़छाड़ तो नहीं हुई और उसे उचित तरीके से न्यायालय के सामने कैसे पेश किया गया।

इसीलिए किसी विवाद में CCTV फुटेज उपलब्ध होने की जानकारी मिलने पर उसे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो जाता है।

RTI और न्यायिक प्रक्रिया में अंतर समझना जरूरी

इस मामले से एक बड़ा सबक यह निकलता है कि RTI हर प्रकार के सबूत को सीधे हासिल करने का माध्यम नहीं है।

RTI का उद्देश्य सरकारी रिकॉर्ड और उपलब्ध सूचना में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। वहीं अदालत में किसी घटना को साबित करने के लिए दस्तावेज, CCTV रिकॉर्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत पेश किए जा सकते हैं।

यदि किसी व्यक्ति को किसी घटना की CCTV फुटेज चाहिए, तो उसे पहले यह तय करना होगा कि उसका उद्देश्य क्या है।

यदि उद्देश्य केवल सरकारी व्यवस्था से संबंधित सामान्य जानकारी हासिल करना है, तो RTI उपयोगी हो सकती है। लेकिन यदि CCTV फुटेज किसी विवाद, अपराध या न्यायिक मामले का संभावित साक्ष्य है, तो सक्षम प्राधिकरण या अदालत के सामने उसे सुरक्षित कराने और मंगाने की प्रक्रिया ज्यादा उपयुक्त हो सकती है।

सरकारी संस्थानों में CCTV लगाने का उद्देश्य भी यही है

आज लगभग हर महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय, बैंक, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक संस्थानों में CCTV कैमरे लगाए जाते हैं।

इनका उद्देश्य सुरक्षा बढ़ाना, घटनाओं की निगरानी करना और आवश्यकता पड़ने पर रिकॉर्ड उपलब्ध कराना है।

लेकिन कैमरे लगने का यह अर्थ नहीं कि वहां रिकॉर्ड होने वाली हर गतिविधि किसी भी व्यक्ति को मांगने पर उपलब्ध करा दी जाएगी।

CCTV सिस्टम में हजारों लोगों की गतिविधियां रिकॉर्ड हो सकती हैं। इसलिए उसके इस्तेमाल के लिए सुरक्षा और निजता से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी है।

फैसले के बाद सबसे महत्वपूर्ण संदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो RTI के माध्यम से CCTV फुटेज हासिल करने की कोशिश करते हैं।

फैसले से यह समझना जरूरी है कि RTI के तहत CCTV फुटेज की मांग करना और न्यायिक प्रक्रिया के जरिए CCTV फुटेज को साक्ष्य के रूप में हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं।

केवल RTI आवेदन देकर किसी स्थान की पूरी CCTV रिकॉर्डिंग सीधे प्राप्त करना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब उसमें अन्य लोगों की संवेदनशील जानकारी भी शामिल हो।

दूसरी ओर यदि किसी व्यक्ति का वास्तविक विवाद या शिकायत है और CCTV फुटेज उस मामले के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, तो वह सक्षम अदालत या अधिकृत आयोग के सामने उचित कार्यवाही शुरू कर सकता है। संबंधित फोरम आवश्यकता के अनुसार रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और बाद में मंगाने का आदेश दे सकता है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला RTI कानून और CCTV फुटेज के बीच मौजूद कानूनी अंतर को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने एक तरफ लोगों की सूचना पाने की जरूरत को देखा, वहीं दूसरी तरफ CCTV रिकॉर्डिंग में मौजूद अन्य व्यक्तियों की निजता और सुरक्षा के सवाल को भी महत्व दिया।

इस व्यवस्था का सीधा संदेश यही है कि CCTV फुटेज को केवल RTI के जरिए हासिल करने की कोशिश करने के बजाय, यदि वह किसी घटना का महत्वपूर्ण साक्ष्य है तो सक्षम न्यायालय या अधिकृत आयोग के सामने उचित कानूनी कार्यवाही अपनाई जा सकती है।

खास बात यह है कि अदालत ने CCTV फुटेज के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। बल्कि उसकी उपलब्धता को उचित कानूनी प्रक्रिया से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया है कि किसी संवेदनशील रिकॉर्ड को सीधे किसी व्यक्ति को सौंपने और उसे न्यायिक जांच के लिए सुरक्षित रखने में अंतर है।

डिजिटल दौर में जब सरकारी और निजी संस्थानों में CCTV कैमरों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, ऐसे फैसले आने वाले समय में निजता, सुरक्षा, पारदर्शिता और साक्ष्य के अधिकार के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।