IndianLawNotes.com

सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति एंट्री और वीडियोग्राफी पर रोक बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति एंट्री और वीडियोग्राफी पर रोक बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार; CJP के ‘School Theek Karo’ अभियान को झटका

      सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटो-वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट से एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश तथा बिना अनुमति फोटो और वीडियो बनाने पर लगाई गई पाबंदी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने बृहस्पतिवार को प्रिया मिश्रा की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि वह इस मामले पर विचार करने की इच्छुक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद फिलहाल राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों से संबंधित वे प्रशासनिक आदेश प्रभावी बने रहेंगे, जिनमें स्कूल परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियोग्राफी के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था की गई है।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि याचिका में केवल पत्रकारों के प्रवेश का सवाल नहीं था, बल्कि यूट्यूबर, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर, सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों तथा अन्य बाहरी व्यक्तियों के स्कूल परिसरों में प्रवेश और वहां रिकॉर्डिंग करने के अधिकार को भी चुनौती के दायरे में रखा गया था।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों के संबंध में अगस्त 2026 में ऐसे प्रशासनिक आदेश सामने आए थे, जिनमें स्कूल परिसरों में बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया गया।

राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से जारी आदेश में सरकारी स्कूलों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को लेकर प्रधानाचार्य की अनुमति को आवश्यक बनाया गया था। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में अयोध्या के बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, यूट्यूबर और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के बिना अनुमति प्रवेश तथा वीडियोग्राफी पर रोक लगाने संबंधी आदेश जारी किया गया था।

इन आदेशों को लेकर सवाल उठे कि क्या सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान होने के कारण पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं या आम नागरिकों के लिए पूरी तरह बंद किए जा सकते हैं? इसी सवाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी।

याचिका में राजस्थान के 16 अगस्त 2026 और उत्तर प्रदेश के 19 अगस्त 2026 के आदेशों को चुनौती दी गई थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई से ही इनकार कर दिया।

इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रशासनिक आदेशों को संवैधानिक रूप से सही घोषित कर दिया है। अदालत का आदेश मुख्य रूप से इस बात से जुड़ा है कि उसने इस याचिका पर विचार करने से इनकार किया। इसलिए इस फैसले को प्रशासनिक आदेशों पर अंतिम संवैधानिक मुहर के रूप में समझना उचित नहीं होगा।

अब सरकारी स्कूल में जाने के लिए क्या अनुमति जरूरी होगी?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद संबंधित प्रशासनिक आदेश फिलहाल प्रभावी रहेंगे। इसका व्यावहारिक असर यह है कि किसी सरकारी स्कूल में बाहरी व्यक्ति के रूप में प्रवेश करने से पहले संबंधित अधिकारी या प्रधानाचार्य से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।

खासकर ऐसे मामलों में जहां कोई व्यक्ति स्कूल में जाकर फोटो, वीडियो, इंटरव्यू या सोशल मीडिया के लिए सामग्री तैयार करना चाहता है, वहां पहले से अनुमति लेना जरूरी माना जाएगा।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में स्कूल का दरवाजा बाहरी लोगों के लिए पूरी तरह बंद हो गया है। स्कूल प्रशासन की अनुमति के आधार पर प्रवेश संभव रहेगा। असली बदलाव बिना अनुमति प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर नियंत्रण का है।

पत्रकारों और यूट्यूबर के लिए क्या बदलेगा?

आज के दौर में पत्रकारिता का स्वरूप काफी बदल चुका है। पहले किसी समाचार संस्थान का पत्रकार स्कूल या सरकारी कार्यालय में रिपोर्टिंग के लिए जाता था। अब मोबाइल फोन के माध्यम से स्वतंत्र पत्रकार, यूट्यूबर, सोशल मीडिया क्रिएटर और सिविल सोसाइटी के लोग भी मौके पर जाकर रिपोर्ट तैयार करते हैं।

सरकारी स्कूलों से जुड़े मामलों में यह गतिविधि और भी संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि स्कूल परिसर में बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद होते हैं।

किसी स्कूल की स्थिति दिखाने के लिए वीडियो बनाना एक बात है, लेकिन उस वीडियो में बच्चों के चेहरे, उनकी आवाज, व्यक्तिगत जानकारी या उनकी निजी परिस्थितियां रिकॉर्ड हो जाना अलग मामला है।

यही कारण है कि प्रशासन बच्चों की सुरक्षा और निजता को नियमों के पीछे प्रमुख आधार बता रहा है।

सरकार ने क्यों लगाए ऐसे प्रतिबंध?

सरकारी स्तर पर ऐसे प्रतिबंधों के पीछे सबसे बड़ा तर्क बच्चों की सुरक्षा है।

स्कूल कोई सामान्य सार्वजनिक स्थान नहीं है। यहां बड़ी संख्या में नाबालिग बच्चे रहते हैं और पढ़ाई करते हैं। यदि कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश कर सके और मोबाइल से वीडियो बनाकर उसे इंटरनेट पर डाल सके, तो इससे बच्चों की निजता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

मान लीजिए किसी स्कूल में कोई बच्चा किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या के कारण परेशान है। यदि उसका वीडियो बना दिया जाए और सोशल मीडिया पर डाल दिया जाए, तो उसकी पहचान सार्वजनिक हो सकती है। इससे बच्चे को मानसिक परेशानी और सामाजिक नुकसान दोनों हो सकते हैं।

इसी तरह स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तस्वीरें या वीडियो बिना उचित अनुमति के इंटरनेट पर प्रसारित होने से उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

सरकार का तर्क है कि ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए स्कूल परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश और रिकॉर्डिंग को नियंत्रित करना आवश्यक है।

बच्चों की निजता और गरिमा का सवाल

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चों की निजता है।

भारत में बच्चों की तस्वीर या वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करने का मुद्दा लगातार संवेदनशील होता जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक बार कोई वीडियो वायरल होने के बाद उसे पूरी तरह हटाना मुश्किल हो सकता है।

स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा इस बात को समझने की स्थिति में भी नहीं होता कि उसका वीडियो कहां इस्तेमाल होगा और कितने लोगों तक पहुंचेगा।

किसी बच्चे के खराब परिणाम, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक विवाद, शारीरिक स्थिति या किसी अन्य व्यक्तिगत परिस्थिति को कैमरे में रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर डालना उसकी गरिमा को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए स्कूल प्रशासन के लिए यह जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है कि बच्चों से संबंधित फोटो और वीडियो के इस्तेमाल को नियंत्रित किया जाए।

लेकिन पारदर्शिता का सवाल भी महत्वपूर्ण

दूसरी तरफ इस मामले का दूसरा पहलू सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता से जुड़ा है।

सरकारी स्कूल जनता के पैसे से संचालित होते हैं। वहां सरकार की ओर से शिक्षक नियुक्त किए जाते हैं, बच्चों को सुविधाएं दी जाती हैं और सरकारी योजनाओं का संचालन होता है। ऐसे में यदि किसी स्कूल में गंभीर अनियमितता की शिकायत हो, तो उसकी जांच और रिपोर्टिंग का रास्ता खुला रहना भी जरूरी है।

उदाहरण के लिए यदि किसी स्कूल में बच्चों को भोजन नहीं मिल रहा है, भवन की स्थिति खराब है, शिक्षक लगातार अनुपस्थित हैं या सरकारी योजना में गड़बड़ी का आरोप है, तो पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता उस मामले को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

यहीं से पारदर्शिता और बच्चों की निजता के बीच संतुलन की जरूरत सामने आती है।

क्या इसका मतलब स्कूलों में भ्रष्टाचार या लापरवाही की रिपोर्टिंग बंद हो जाएगी?

ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई से इनकार किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकारी स्कूलों में होने वाली किसी भी कथित अनियमितता की जानकारी सामने नहीं लाई जा सकती।

यदि किसी स्कूल में गंभीर शिकायत है, तो उसके लिए प्रशासनिक शिकायत, विभागीय जांच, सूचना के अधिकार सहित अन्य कानूनी और वैधानिक रास्ते उपलब्ध हो सकते हैं।

पत्रकार भी संबंधित अधिकारियों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अनुमति लेकर स्कूल का दौरा कर सकते हैं।

इसलिए इस आदेश को स्कूलों में होने वाली किसी भी गतिविधि को सार्वजनिक जांच से बाहर करने वाला आदेश मानना सही नहीं होगा।

‘School Theek Karo’ अभियान को क्यों लगा झटका?

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश द्वारा चलाए जा रहे ‘School Theek Karo’ अभियान के संदर्भ में सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करने और स्कूल व्यवस्था में सुधार की मांग करने वाली गतिविधियों को लेकर बहस चल रही है।

ऐसे अभियानों में सरकारी स्कूलों की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता, भवन, शौचालय, पेयजल, बच्चों की उपस्थिति और अन्य सुविधाओं को सामने लाने के लिए फोटो और वीडियो का इस्तेमाल किया जाता है।

यदि स्कूल परिसर में बिना अनुमति रिकॉर्डिंग पर रोक रहती है तो स्वतंत्र रूप से स्कूलों की स्थिति रिकॉर्ड करने वाले लोगों के लिए काम करना निश्चित रूप से मुश्किल हो सकता है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को ऐसे अभियानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार किया है; अदालत ने ‘School Theek Karo’ अभियान के पक्ष या विपक्ष में कोई विस्तृत फैसला नहीं दिया है।

ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भी सवाल

मामले में केवल फोटो और वीडियो ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। स्कूलों में ऑडियो रिकॉर्डिंग को लेकर भी व्यावहारिक सवाल पैदा होते हैं।

यदि कोई व्यक्ति स्कूल में किसी शिक्षक, कर्मचारी या अधिकारी का इंटरव्यू लेना चाहता है तो सामान्य रूप से अनुमति का प्रश्न सामने आएगा। इसी तरह बिना जानकारी के ऑडियो रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक करना अलग कानूनी और तथ्यात्मक सवाल पैदा कर सकता है।

इसलिए स्कूल प्रशासन की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की रिकॉर्डिंग करने से पहले संबंधित नियमों को समझना आवश्यक होगा।

लाइव स्ट्रीमिंग पर भी असर

आज सोशल मीडिया पर घटनाओं की लाइव स्ट्रीमिंग आम हो चुकी है। किसी सरकारी स्कूल में प्रवेश करके वहां की स्थिति को लाइव दिखाना पहले की तुलना में काफी आसान है।

लेकिन लाइव स्ट्रीमिंग में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें किसी बच्चे का चेहरा, नाम, आवाज या निजी बातचीत अनजाने में सार्वजनिक हो सकती है।

एक बार लाइव प्रसारण शुरू होने के बाद स्कूल प्रशासन के लिए यह नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है कि कैमरे में क्या रिकॉर्ड हो रहा है।

इसी कारण स्कूल परिसरों में लाइव स्ट्रीमिंग को अनुमति से जोड़ना बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से प्रशासनिक रूप से समझ में आने वाला कदम हो सकता है।

क्या सरकारी स्कूल पूरी तरह सार्वजनिक स्थान हैं?

यह प्रश्न इस पूरे विवाद की जड़ में है।

सरकारी स्कूल सरकारी संस्थान हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय वहां जाकर स्वतंत्र रूप से फोटो या वीडियो बना सकता है।

स्कूल एक नियंत्रित शैक्षणिक वातावरण है। वहां बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन की होती है।

दूसरी तरफ सरकारी संस्था होने के कारण पारदर्शिता और जवाबदेही भी महत्वपूर्ण है।

इसलिए सबसे व्यावहारिक रास्ता शायद पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित प्रवेश और स्पष्ट अनुमति प्रक्रिया हो सकती है।

यदि किसी पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता को स्कूल में रिपोर्टिंग करनी है तो उसे अनुमति के लिए आवेदन करना चाहिए और प्रशासन को भी उस आवेदन पर अनावश्यक देरी किए बिना निर्णय करना चाहिए।

असली चुनौती संतुलन बनाने की है

सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की अनियंत्रित आवाजाही रोकना और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। लेकिन इसी के साथ सरकारी स्कूलों में पारदर्शिता भी बनी रहनी चाहिए।

यदि किसी व्यक्ति को स्कूल में किसी गंभीर समस्या की जानकारी मिलती है और वह उसकी जांच या रिपोर्टिंग करना चाहता है, तो उसके लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए।

अनुमति व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए कि किसी गंभीर शिकायत को सामने लाने वाला व्यक्ति महीनों तक अनुमति का इंतजार करता रहे।

दूसरी तरफ बच्चों की तस्वीरों और व्यक्तिगत जानकारी को बिना उचित कारण सोशल मीडिया पर प्रसारित करने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती।

यानी समस्या प्रतिबंध लगाने या हटाने से ज्यादा संतुलित व्यवस्था बनाने की है।

सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश के संबंधित प्रशासनिक आदेश फिलहाल अपनी जगह बने रहेंगे।

इसका मतलब है कि सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटो, वीडियो, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग से पहले अनुमति लेने की व्यवस्था को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।

वहीं, इस फैसले से भविष्य में इस मुद्दे पर कानूनी बहस पूरी तरह समाप्त हो गई है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को किसी आदेश से मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन होने का दावा है तो वह उचित कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।

अभिभावकों के लिए क्या मायने रखता है?

अभिभावकों के नजरिए से देखा जाए तो बच्चों की तस्वीर और वीडियो की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

कई बार स्कूल कार्यक्रमों, खेल प्रतियोगिताओं या अन्य गतिविधियों के दौरान मोबाइल से फोटो और वीडियो बनाए जाते हैं। यदि इन्हें सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर डालना हो तो बच्चों की निजता और संबंधित नियमों का ध्यान रखना जरूरी है।

विशेषकर ऐसे बच्चों के मामले में जिनकी व्यक्तिगत पहचान या पारिवारिक परिस्थितियां संवेदनशील हों, अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है।

निष्कर्ष

सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर रोक का मामला केवल पत्रकारों या यूट्यूबर के अधिकारों तक सीमित नहीं है। इसके साथ बच्चों की सुरक्षा, निजता, गरिमा, सरकारी संस्थानों की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़े हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान और उत्तर प्रदेश के संबंधित आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। इसलिए फिलहाल बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश और फोटो-वीडियो सहित रिकॉर्डिंग की गतिविधियों पर लगी पाबंदियां लागू रहेंगी।

हालांकि, इस घटनाक्रम को यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सरकारी स्कूल अब पूरी तरह सार्वजनिक निगरानी से बाहर हो गए हैं। स्कूलों में होने वाली अनियमितताओं की शिकायत और जांच के लिए कानूनी एवं प्रशासनिक रास्ते मौजूद हैं।

आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि बच्चों की निजता और सुरक्षा की रक्षा करते हुए सरकारी स्कूलों में पारदर्शिता और जवाबदेही को किस तरह कायम रखा जाता है।

एक ओर बच्चों की तस्वीर और निजी जानकारी को अनधिकृत रूप से सार्वजनिक होने से रोकना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सामने लाने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के लिए उचित और पारदर्शी अनुमति व्यवस्था भी जरूरी है।

यही संतुलन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।