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वेश्यालय में ग्राहक बनकर जाना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया मुकदमा,

वेश्यालय में ग्राहक बनकर जाना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया मुकदमा, जानिए अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम की धाराओं का पूरा कानूनी विश्लेषण

प्रस्तावना

        किसी व्यक्ति का वेश्यालय में ग्राहक के रूप में जाना अपने आप में ऐसा कृत्य नहीं है, जिसके आधार पर उसके खिलाफ अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत आपराधिक मुकदमा चला दिया जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश में इसी कानूनी प्रश्न पर विचार करते हुए एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला और उसके आधार पर शुरू हुई पूरी कार्यवाही रद्द कर दी।

जस्टिस गौतम चौधरी की पीठ ने 11 अगस्त को दिए गए आदेश में यह स्पष्ट किया कि कानून की धाराओं को उनके वास्तविक उद्देश्य और आवश्यक तत्वों के आधार पर पढ़ना होगा। केवल इसलिए किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि वह किसी ऐसे स्थान पर मौजूद था जहां वेश्यावृत्ति से संबंधित गतिविधियां चल रही थीं। अभियोजन को यह दिखाना होगा कि आरोपी ने वास्तव में उस अपराध में वह भूमिका निभाई है, जिसे संबंधित धारा अपराध मानती है।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस की छापेमारी के दौरान किसी स्थान से पकड़े गए सभी व्यक्तियों को एक ही नजर से देखने के बजाय उनकी व्यक्तिगत भूमिका की जांच करने की आवश्यकता पर यह आदेश जोर देता है।

मामला क्या था?

यह मामला दिसंबर 2023 में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का बताया गया है। पुलिस ने एक मकान पर छापेमारी की थी। छापेमारी के दौरान पुलिस ने कुल 16 लोगों को मौके से पकड़ा।

इन लोगों में शामिल एक युवक के खिलाफ अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। उसके खिलाफ विशेष रूप से धारा 3, 4, 5 और 7 के प्रावधान लगाए गए थे।

पुलिस की कार्रवाई के बाद मामले में जांच हुई और आरोपपत्र भी दाखिल किया गया। इसके बाद आरोपी युवक ने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

उसकी ओर से मूल तर्क यह था कि वह वहां वेश्यालय चलाने, उसका प्रबंधन करने, किसी महिला को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराने या किसी अन्य व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने जैसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं था। वह केवल ग्राहक के रूप में वहां गया था।

यही प्रश्न हाईकोर्ट के सामने मुख्य रूप से विचारणीय बना कि क्या केवल ग्राहक के रूप में वेश्यालय में मौजूद होने के आधार पर इस अधिनियम की धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है?

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार करते हुए आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को उचित नहीं माना।

कोर्ट का मूल दृष्टिकोण यह था कि किसी आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति को आरोपी बनाने के लिए केवल उसकी उपस्थिति पर्याप्त नहीं होती। अभियोजन को यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी का आचरण संबंधित अपराध की कानूनी परिभाषा और उस धारा के आवश्यक तत्वों को पूरा करता है।

यदि कोई व्यक्ति केवल ग्राहक के रूप में वेश्यालय में जाता है और वहां किसी महिला की यौन सेवा के बदले निजी रूप से धन देता है, तो मात्र इस आधार पर उसे ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता जिसने वेश्यावृत्ति का संचालन किया, किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराया या उसके लिए दलाली अथवा उकसावे का काम किया।

यही अंतर इस मामले में निर्णायक साबित हुआ।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 का उद्देश्य क्या है?

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 का मूल उद्देश्य वेश्यावृत्ति के नाम पर होने वाले शोषण, मानव तस्करी और उससे जुड़े संगठित या आपराधिक कृत्यों पर रोक लगाना है।

इस कानून में केवल वेश्यावृत्ति शब्द को देखकर प्रत्येक व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता। कानून अलग-अलग प्रकार की गतिविधियों के लिए अलग-अलग अपराध निर्धारित करता है।

उदाहरण के लिए, किसी वेश्यालय को चलाना एक अलग प्रकार का अपराध है। किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराना या उसके लिए प्रेरित करना अलग अपराध हो सकता है। इसी तरह कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक स्थानों या निर्धारित क्षेत्रों के संबंध में भी कानून प्रतिबंध लगाता है।

इसलिए किसी आरोपी के खिलाफ धारा लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप वास्तव में उस धारा की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं या नहीं।

धारा 3 किससे संबंधित है?

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम की धारा 3 मुख्य रूप से वेश्यालय को चलाने या उसका प्रबंधन करने से संबंधित है।

इस प्रावधान का निशाना सामान्यतः वह व्यक्ति होता है जो किसी स्थान को वेश्यालय के रूप में संचालित करता है या उसके संचालन में ऐसी भूमिका निभाता है जिसे कानून अपराध के रूप में देखता है।

इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि उस स्थान पर मौजूद प्रत्येक व्यक्ति वेश्यालय चलाने वाला व्यक्ति बन जाएगा।

यदि कोई व्यक्ति केवल ग्राहक के रूप में किसी स्थान पर पहुंचा है और उसके खिलाफ वेश्यालय के संचालन या प्रबंधन में भागीदारी का कोई ठोस आरोप नहीं है, तो केवल उसकी उपस्थिति से धारा 3 के अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं हो जाते।

यही कारण है कि आरोपी की वास्तविक भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

धारा 5 क्यों महत्वपूर्ण है?

धारा 5 किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराने, उसके लिए प्रेरित करने, ले जाने या उससे संबंधित कुछ अन्य गतिविधियों से जुड़ी है।

यह धारा विशेष रूप से उन परिस्थितियों पर ध्यान देती है जहां कोई व्यक्ति स्वयं किसी दूसरे व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए इस्तेमाल करने या उपलब्ध कराने की भूमिका निभाता है।

ऐसे मामले में अभियोजन को यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी ने संबंधित महिला या व्यक्ति के साथ ऐसी गतिविधि की, जो धारा 5 के दायरे में आती है।

सिर्फ किसी महिला से यौन सेवा लेना और उसके बदले पैसे देना तथा किसी महिला को वेश्यावृत्ति में धकेलना या उपलब्ध कराना—दोनों कानूनी रूप से एक ही बात नहीं हैं।

हाईकोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यही है कि कानून में मौजूद अपराध के आवश्यक तत्वों को आरोपी की वास्तविक भूमिका से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

धारा 7 का क्या मतलब है?

अधिनियम की धारा 7 कुछ निर्धारित स्थानों और परिस्थितियों में वेश्यावृत्ति से संबंधित गतिविधियों को नियंत्रित करती है।

इस धारा का उद्देश्य ऐसे स्थानों के संबंध में कानून द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को लागू करना है जहां वेश्यावृत्ति से संबंधित गतिविधियां कानून के अनुसार प्रतिबंधित या दंडनीय हो सकती हैं।

लेकिन यहां भी केवल उपस्थिति को अपराध का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अभियोजन को यह बताना होगा कि आरोपी का आचरण धारा 7 में निर्धारित कानूनी परिस्थितियों के भीतर आता है।

यानी पुलिस द्वारा किसी स्थान पर छापा मारकर वहां मौजूद लोगों को पकड़ लेना अपने आप में प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ समान आपराधिक दायित्व स्थापित नहीं करता।

ग्राहक और वेश्यावृत्ति कराने वाले व्यक्ति में कानूनी अंतर

इस फैसले को समझने के लिए ग्राहक और वेश्यावृत्ति का संचालन या उससे संबंधित गतिविधि करने वाले व्यक्ति के बीच अंतर समझना जरूरी है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी स्थान पर जाता है और वहां किसी महिला से निजी यौन सेवा प्राप्त करने के बदले पैसे देता है। दूसरी ओर कोई व्यक्ति ऐसा है जो महिलाओं को ग्राहकों तक पहुंचाता है, उन्हें वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराता है, ग्राहकों से सौदे करवाता है या वेश्यालय का संचालन करता है।

दोनों की भूमिका समान नहीं है।

कानून जिस गतिविधि को अपराध घोषित करता है, उसमें आरोपी की भूमिका का होना जरूरी है। आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति को केवल संदेह या स्थान पर मौजूद होने के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यही सिद्धांत इस मामले में आरोपी के पक्ष में गया।

क्या इसका अर्थ यह है कि ग्राहक कभी अपराधी नहीं हो सकता?

इस फैसले को इस रूप में समझना सही नहीं होगा कि वेश्यालय में जाने वाला हर ग्राहक हर परिस्थिति में कानून से बाहर है।

किसी व्यक्ति के खिलाफ यदि अलग और विशिष्ट आपराधिक कृत्य के तथ्य मौजूद हैं, तो स्थिति अलग हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी मामले में आरोपी ने किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपलब्ध कराने, तस्करी, दलाली, प्रबंधन या कानून के किसी अन्य प्रतिबंधित कार्य में सक्रिय भूमिका निभाई है, तो उस पर संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं।

इसलिए हाईकोर्ट का आदेश एक विशेष कानूनी स्थिति से जुड़ा है—जहां आरोप मूलतः इस आधार पर लगाए गए थे कि व्यक्ति ग्राहक के रूप में वहां मौजूद था और उसके खिलाफ संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते थे।

इस अंतर को समझना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि फैसले का अर्थ यह नहीं है कि वेश्यावृत्ति से जुड़े प्रत्येक प्रकार के आचरण को कानूनन मान्यता मिल गई है।

पुलिस की छापेमारी में पकड़े गए सभी लोगों की भूमिका अलग-अलग क्यों देखनी चाहिए?

अक्सर छापेमारी के दौरान पुलिस किसी स्थान से कई लोगों को हिरासत में लेती है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी कानूनी आवश्यकता यह होती है कि प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका अलग-अलग निर्धारित की जाए।

किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल इसलिए वही धाराएं लगा देना कि वह उसी स्थान पर मौजूद था, जहां से अन्य आरोपी पकड़े गए हैं, आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा।

एक व्यक्ति मकान का मालिक हो सकता है, दूसरा संचालक, तीसरा दलाल, चौथा कर्मचारी और पांचवां केवल ग्राहक। इन सभी की भूमिका अलग है।

इसलिए प्रत्येक आरोपी के खिलाफ आरोप भी उसके व्यक्तिगत कृत्य के आधार पर होने चाहिए।

आरोपपत्र दाखिल होने के बाद भी हाईकोर्ट से राहत क्यों मिली?

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पुलिस ने जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल कर दिया था। इसके बावजूद आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और उसे राहत मिली।

इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि केवल आरोपपत्र दाखिल हो जाने से आपराधिक कार्यवाही स्वतः वैध नहीं हो जाती।

यदि आरोपपत्र में लगाए गए आरोप, एफआईआर और उपलब्ध सामग्री को उनके सर्वोत्तम रूप में स्वीकार करने के बाद भी किसी अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते, तो हाईकोर्ट अपनी संवैधानिक और अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करके कार्यवाही को समाप्त कर सकता है।

हालांकि ऐसी शक्ति का इस्तेमाल प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होता है।

हाईकोर्ट का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह फैसला कई कारणों से महत्वपूर्ण है।

पहला, यह आपराधिक कानून में व्यक्तिगत भूमिका और व्यक्तिगत दायित्व के सिद्धांत को सामने रखता है।

दूसरा, यह बताता है कि किसी कानून की धारा को केवल उसके नाम या व्यापक उद्देश्य के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता। उसके प्रत्येक आवश्यक तत्व को देखना होगा।

तीसरा, यह पुलिस कार्रवाई में भी सावधानी की आवश्यकता को रेखांकित करता है। किसी स्थान पर छापेमारी के दौरान पकड़े गए हर व्यक्ति की भूमिका समान नहीं मानी जा सकती।

चौथा, यह उन मामलों में उपयोगी कानूनी दृष्टिकोण प्रदान करता है जहां किसी आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप और संबंधित धारा के वास्तविक तत्वों में अंतर हो।

क्या यह फैसला वेश्यावृत्ति को कानूनी घोषित करता है?

नहीं।

यह सबसे महत्वपूर्ण बात है जिसे इस फैसले को पढ़ते समय ध्यान में रखना चाहिए।

हाईकोर्ट ने वेश्यावृत्ति को व्यापक रूप से वैध घोषित नहीं किया है। न ही यह कहा गया है कि वेश्यावृत्ति से संबंधित हर गतिविधि कानूनन अपराधमुक्त है।

अदालत ने केवल यह जांच की कि जिस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, उसके बताए गए कृत्य संबंधित धाराओं के तहत अपराध बनाते हैं या नहीं।

अदालत का निर्णय कानून के प्रावधानों और आरोपी की कथित भूमिका के बीच संबंध पर आधारित है।

इसलिए इस फैसले को “वेश्यालय जाना पूरी तरह कानूनी है” जैसे व्यापक अर्थ में देखना उचित नहीं होगा।

आपराधिक कानून में आरोप के आवश्यक तत्व क्यों जरूरी हैं?

आपराधिक न्याय व्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित करने के लिए कानून द्वारा निर्धारित आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।

किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल यह आरोप पर्याप्त नहीं कि वह किसी संदिग्ध स्थान पर मौजूद था।

यदि धारा 3 लगाई गई है तो अभियोजन को धारा 3 से संबंधित आवश्यक तथ्य दिखाने होंगे। यदि धारा 5 लगाई गई है तो उस धारा में वर्णित भूमिका का आरोप और उसके समर्थन में सामग्री होनी चाहिए। इसी तरह धारा 7 के लिए उसके लागू होने की आवश्यक परिस्थितियां मौजूद होनी चाहिए।

यही कारण है कि अदालतें कई बार एफआईआर या आरोपपत्र को इस आधार पर रद्द करती हैं कि लगाए गए आरोपों को सही मान लेने के बाद भी अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।

इस फैसले से आम नागरिकों के लिए क्या संदेश है?

इस आदेश से एक महत्वपूर्ण संदेश यह निकलता है कि आपराधिक मामले में केवल किसी घटना से जुड़ा होना और कानून में परिभाषित अपराध करना दो अलग-अलग बातें हैं।

पुलिस को किसी व्यक्ति की भूमिका की जांच करनी होती है और अभियोजन को अदालत के सामने उस भूमिका को कानून की संबंधित धारा से जोड़ना होता है।

यदि ऐसा संबंध स्थापित नहीं होता, तो आरोपी को लंबी आपराधिक कार्यवाही का सामना कराने का कोई कानूनी आधार नहीं बच सकता।

हालांकि प्रत्येक मामले में तथ्य अलग होते हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति को इस फैसले को अपने मामले पर स्वतः लागू मानने के बजाय एफआईआर, आरोपपत्र और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानूनी सलाह लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश आपराधिक कानून के उस महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने लाता है कि आरोप की गंभीरता से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आरोप संबंधित कानूनी प्रावधान के आवश्यक तत्वों को पूरा करता है या नहीं।

गाजियाबाद के दिसंबर 2023 के मामले में पुलिस की छापेमारी के बाद जिस व्यक्ति पर अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था, उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अदालत ने उसकी भूमिका और लगाए गए प्रावधानों के बीच कानूनी संबंध की जांच की और पाया कि केवल ग्राहक के रूप में वेश्यालय में जाने के आधार पर संबंधित धाराओं में उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं था।

इसके बाद हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ दाखिल आरोपपत्र और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

इस फैसले का वास्तविक महत्व इसी बात में है कि अदालत ने कानून को व्यापक नैतिक धारणा के आधार पर नहीं, बल्कि उसके स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों और आरोपी की वास्तविक भूमिका के आधार पर परखा।

इससे एक बार फिर यह सिद्धांत सामने आता है कि आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति को केवल उसकी मौजूदगी, संदेह या किसी स्थान से जुड़े होने के आधार पर आरोपी नहीं बनाया जा सकता; अभियोजन को यह दिखाना होता है कि उसके विशिष्ट कृत्य से कानून में परिभाषित अपराध के आवश्यक तत्व पूरे होते हैं।

यही आपराधिक न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत दायित्व और निष्पक्ष सुनवाई की बुनियादी आवश्यकता है।

महत्वपूर्ण नोट: यह लेख उपलब्ध मामले के तथ्यों और बताए गए हाईकोर्ट आदेश के आधार पर कानूनी विश्लेषण है। किसी वास्तविक मुकदमे में एफआईआर, आरोपपत्र, केस डायरी और लागू कानून के वर्तमान प्रावधानों का अलग से परीक्षण आवश्यक होता है।