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तलाकशुदा पत्नी पर एसिड फेंकने की कोशिश के मामले में अदालत का अहम फैसला

एसिड अटैक की कोशिश में चोट जरूरी नहीं, अपराध कोशिश के साथ ही पूरा: अदालत

तलाकशुदा पत्नी पर एसिड फेंकने की कोशिश के मामले में अदालत का अहम फैसला, बचाव पक्ष की दलीलें खारिज

          किसी महिला पर एसिड फेंकने की कोशिश की गई हो और वह अपनी सूझबूझ से खुद को बचाने में सफल हो जाए, तो इसका यह मतलब नहीं कि अपराध हुआ ही नहीं। अदालत ने साफ किया है कि किसी गंभीर अपराध में आरोपी की कोशिश को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उसके परिणामस्वरूप पीड़िता को शारीरिक चोट नहीं आई।

एक मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने एक व्यक्ति को अपनी तलाकशुदा पत्नी पर एसिड फेंकने की कोशिश करने और उसे आपराधिक धमकी देने का दोषी ठहराया। अदालत ने बचाव पक्ष की उस दलील को कानूनी रूप से गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि महिला को कोई चोट नहीं लगी, इसलिए एसिड अटैक का अपराध साबित नहीं होता।

अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि आपराधिक कानून केवल उस स्थिति में सक्रिय नहीं होता, जब अपराध का अंतिम परिणाम सामने आ जाए। कई अपराधों में कानून आरोपी की मंशा और उसके द्वारा किए गए ऐसे प्रत्यक्ष कृत्य को भी गंभीरता से देखता है, जो अपराध को अंजाम देने की दिशा में उठाया गया स्पष्ट कदम हो।

मामला अगस्त 2022 का है

यह घटना अगस्त 2022 की बताई गई है। मामले में पीड़िता विनीता और आरोपी सानोज यादव का वैवाहिक संबंध पहले ही समाप्त हो चुका था। दोनों वर्ष 2020 से अलग रह रहे थे।

अभियोजन के अनुसार घटना वाले दिन सानोज यादव नशे की हालत में विनीता के माता-पिता के घर के बाहर पहुंचा। आरोप था कि उसके पास एक तरल पदार्थ था और उसने विनीता की ओर उसे फेंकने की कोशिश की।

विनीता ने स्थिति को भांपते हुए तुरंत गेट बंद कर दिया और अंदर से कुंडी लगा ली। इस कारण आरोपी द्वारा फेंका गया तरल पदार्थ उसके शरीर या चेहरे पर पड़ने के बजाय फर्श पर जा गिरा।

बाद में जांच के दौरान उस तरल पदार्थ की पुष्टि एसिड के रूप में हुई।

यानी घटना का परिणाम वह नहीं हुआ, जिसकी आशंका थी, लेकिन आरोपी की कथित कार्रवाई वहीं खत्म नहीं हो गई। अभियोजन ने इसे महिला को गंभीर नुकसान पहुंचाने की स्पष्ट कोशिश के रूप में पेश किया और अदालत ने भी साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी माना।

अगर एसिड शरीर पर नहीं पड़ा तो क्या अपराध नहीं हुआ?

इस मामले में बचाव पक्ष की सबसे महत्वपूर्ण दलील यही थी कि महिला को किसी प्रकार की शारीरिक चोट नहीं आई। इसलिए उसके अनुसार आरोपी के खिलाफ एसिड अटैक का आरोप कायम नहीं रह सकता।

अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

जज हरगुरविंदर सिंह जग्गी ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध को केवल उसके अंतिम परिणाम से नहीं देखा जा सकता। यदि आरोपी ने अपराध करने की दिशा में आवश्यक और प्रत्यक्ष कदम उठा दिया है, तो केवल इस वजह से उसे लाभ नहीं दिया जा सकता कि पीड़ित व्यक्ति आखिरी क्षण में खुद को बचाने में सफल रहा।

इस मामले में विनीता का समय रहते गेट बंद कर लेना निर्णायक साबित हुआ। उनकी सतर्कता के कारण एसिड उनके शरीर तक नहीं पहुंच पाया।

अदालत ने इसी तथ्य को महिला की सूझबूझ और तत्परता के रूप में देखा। दूसरे शब्दों में, महिला के सुरक्षित बच निकलने को आरोपी के पक्ष में नहीं माना जा सकता।

कोशिश और परिणाम के बीच का अंतर अदालत ने समझाया

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अपराध की कोशिश और अपराध के अंतिम परिणाम को अलग-अलग समझना जरूरी है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने के इरादे से ऐसा कदम उठाता है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति अचानक बच जाता है। केवल इसलिए आरोपी यह नहीं कह सकता कि चूंकि नुकसान नहीं हुआ, इसलिए उसकी कार्रवाई अपराध नहीं थी।

अदालत ने इसी सिद्धांत को इस मामले में लागू किया।

यदि आरोपी ने एसिड फेंकने के उद्देश्य से तरल पदार्थ महिला की ओर फेंका और परिस्थितियां ऐसी रहीं कि महिला खुद को बचाने में सफल हो गई, तो उसका बच जाना आरोपी के कृत्य को मिटा नहीं देता।

यही वजह है कि अदालत ने बचाव पक्ष की चोट न लगने वाली दलील को अस्वीकार कर दिया।

एसिड अटैक को अदालत ने बताया जेंडर-बेस्ड हिंसा का बर्बर रूप

अदालत ने मामले को केवल एक सामान्य आपराधिक घटना के रूप में नहीं देखा। जज ने एसिड अटैक को महिलाओं के खिलाफ होने वाली जेंडर-बेस्ड हिंसा का बेहद बर्बर रूप बताया।

अदालत के अनुसार, एसिड हमला केवल शरीर को नुकसान पहुंचाने का प्रयास नहीं होता। इसके पीछे पीड़ित की पहचान और उसके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाने की मंशा भी हो सकती है।

चेहरे पर एसिड पड़ने के बाद व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कई पीड़ितों के लिए इसका असर पूरी जिंदगी बना रहता है।

अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि एसिड अटैक पीड़ित के चेहरे और शरीर को ही नहीं बदलता, बल्कि उसके आत्मविश्वास, सामाजिक जीवन और सामान्य जीवन जीने की क्षमता पर भी गहरा असर डाल सकता है।

यही कारण है कि अदालत ने एसिड हिंसा के प्रभाव को व्यापक नजरिए से देखा।

महिला की सूझबूझ ने टाल दिया बड़ा खतरा

इस मामले में विनीता की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण रही। जैसे ही उन्हें खतरे का अंदेशा हुआ, उन्होंने गेट बंद कर दिया और अंदर से कुंडी लगा ली।

कुछ ही सेकंड की यह कार्रवाई उन्हें संभावित गंभीर चोट से बचाने में सफल रही।

अगर गेट बंद करने में थोड़ी भी देर होती या तरल पदार्थ सीधे उनके चेहरे पर पड़ जाता, तो परिणाम पूरी तरह अलग हो सकता था।

अदालत ने महिला की इस सूझबूझ की सराहना की। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता के बच जाने से आरोपी की कथित कोशिश कम गंभीर नहीं हो जाती।

कानून का उद्देश्य केवल उन मामलों में हस्तक्षेप करना नहीं है, जहां नुकसान हो चुका हो। गंभीर अपराधों की रोकथाम के लिए कोशिश के चरण को भी महत्व दिया जाता है।

घटना से दो दिन पहले की शिकायत बनी अहम सबूत

मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। विनीता ने घटना से दो दिन पहले लिखित शिकायत दर्ज कराई थी।

बचाव पक्ष ने यह दावा करने की कोशिश की कि धमकियों और घटनाओं से जुड़ी कहानी बाद में तैयार की गई थी। यानी घटना के बाद आरोपी को फंसाने के लिए आरोप गढ़े गए।

लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

जज ने घटना से पहले दी गई शिकायत को महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने घटना से पहले ही लिखित रूप में धमकी या खतरे की जानकारी दे दी थी, तो बाद में उसी आधार पर यह कहना कठिन हो जाता है कि पूरी कहानी घटना के बाद मनगढ़ंत तरीके से तैयार की गई।

इस पूर्व शिकायत ने अभियोजन के मामले को महत्वपूर्ण समर्थन दिया।

पुलिस अधिकारी की पहचान संबंधी दलील भी नहीं चली

बचाव पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाया। उसकी ओर से कहा गया कि आरोपी को पकड़ने वाले PCR अधिकारी ने अदालत में उसकी पहचान नहीं की।

बचाव पक्ष के अनुसार, यह कमी आरोपी को संदेह का लाभ देने के लिए पर्याप्त थी।

लेकिन अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया।

जज ने कहा कि पुलिस अधिकारी अपने काम के दौरान बड़ी संख्या में संदिग्धों और आरोपियों से निपटते हैं। किसी व्यक्ति को बाद में अदालत में पहचानने में याददाश्त की कमी होना अपने आप में ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे पूरे अभियोजन के मामले को अविश्वसनीय मान लिया जाए।

अदालत ने इसे मानवीय स्मृति से जुड़ी सामान्य कमी के रूप में देखा और मामले में मौजूद अन्य साक्ष्यों के साथ पूरे घटनाक्रम का मूल्यांकन किया।

यहां अदालत ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण अपनाया—किसी एक गवाह की पहचान संबंधी कमी को पूरे मामले के बाकी साक्ष्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

बच्चों की जरूरतें पूरी करना अच्छे संबंधों का प्रमाण नहीं

आरोपी की ओर से एक और दलील दी गई कि वह बच्चों की जरूरतों में मदद करता था। वह बच्चों के ऑटो का किराया देता था और उनकी स्कूल संबंधी जरूरतों को पूरा करता था।

बचाव पक्ष ने इन बातों को इस रूप में पेश किया कि आरोपी और उसकी पूर्व पत्नी के बीच संबंध खराब नहीं थे। इसलिए उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों पर संदेह किया जाना चाहिए।

अदालत इस तर्क से भी सहमत नहीं हुई।

जज ने कहा कि पति-पत्नी के संबंधों में, विशेष रूप से जब बच्चे भी जुड़े हों, कई बार माता-पिता बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आपसी लेन-देन या संपर्क बनाए रखते हैं।

इस प्रकार की जिम्मेदारियां अपने आप में यह साबित नहीं करतीं कि दोनों के बीच व्यक्तिगत संबंध अच्छे थे।

अदालत ने माना कि बच्चों की स्कूल संबंधी जरूरतें पूरी करना और उनका खर्च उठाना एक अलग सामाजिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारी हो सकती है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि महिला और आरोपी के बीच कोई विवाद या तनाव नहीं था।

एसिड हिंसा का असर सिर्फ चेहरे तक सीमित नहीं

अदालत ने एसिड अटैक के व्यापक प्रभाव पर भी टिप्पणी की।

ऐसी घटनाओं में चोट दिखाई देती है, लेकिन पीड़ित की परेशानी केवल दिखाई देने वाली चोटों तक सीमित नहीं होती। चेहरे या शरीर पर स्थायी निशान, इलाज का लंबा दौर, सामाजिक व्यवहार में बदलाव और मानसिक तनाव जीवन को पूरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।

कई पीड़ितों को लोगों के सवालों, घूरने और सामाजिक दूरी का सामना करना पड़ता है। सामान्य गतिविधियों में लौटना भी उनके लिए कठिन हो सकता है।

अदालत ने इस मानसिक पीड़ा को भी गंभीरता से लिया और कहा कि ऐसे हमले व्यक्ति को लंबे समय तक भावनात्मक और मानसिक यातना में धकेल सकते हैं।

यही कारण है कि एसिड अटैक को केवल कुछ क्षणों की हिंसक घटना मानना पर्याप्त नहीं है। उसका असर घटना के बाद भी लंबे समय तक जारी रह सकता है।

अदालत ने आपराधिक धमकी के आरोप को भी माना साबित

एसिड फेंकने की कोशिश के अलावा अदालत ने सानोज यादव को आपराधिक धमकी देने का भी दोषी ठहराया।

इससे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है। अदालत के सामने केवल एक ऐसी घटना नहीं थी, जिसमें आरोपी ने कथित तौर पर कोई तरल पदार्थ फेंका, बल्कि अभियोजन ने उससे जुड़े धमकी के पहलू को भी स्थापित करने की कोशिश की थी।

घटना से पहले दी गई लिखित शिकायत और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने अभियोजन के मामले को मजबूती दी।

अदालत ने सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने के बाद आरोपी को दोषी करार दिया।

इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी गंभीर अपराध की कोशिश को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पीड़ित व्यक्ति अंतिम क्षण में खुद को बचाने में सफल रहा।

यदि किसी महिला ने समय रहते दरवाजा बंद कर लिया, पीछे हट गई या किसी अन्य तरीके से खुद को बचा लिया, तो उसका सुरक्षित रहना कानून की नजर में आरोपी के लिए स्वतः राहत का आधार नहीं बन जाता।

बल्कि कई मामलों में यही तथ्य दिखाता है कि पीड़ित ने तत्काल खतरे को पहचानकर अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाया।

इस मामले में भी विनीता का गेट बंद करना उनके लिए सुरक्षा कवच बन गया। लेकिन अदालत ने इस घटना को केवल इस आधार पर खत्म नहीं माना कि एसिड उनके चेहरे पर नहीं पड़ा।

महिला सुरक्षा के संदर्भ में भी अहम फैसला

एसिड अटैक भारत में महिलाओं के खिलाफ गंभीर हिंसा के रूप में देखा जाता है। ऐसे हमलों के पीछे व्यक्तिगत विवाद, प्रेम संबंध, वैवाहिक विवाद, बदला या अस्वीकार किए जाने जैसी अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।

लेकिन कारण चाहे जो हो, किसी व्यक्ति के चेहरे या शरीर पर एसिड फेंकना उसकी जिंदगी पर गहरा असर डाल सकता है।

इस मामले में अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक व्यवस्था को हिंसा के संभावित परिणामों के साथ-साथ आरोपी की मंशा और उसके द्वारा किए गए प्रत्यक्ष कृत्य पर भी ध्यान देना चाहिए।

अगर कानून केवल वास्तविक चोट होने के बाद ही कार्रवाई करे, तो कई गंभीर हमलों के मामलों में आरोपी यह कहकर बचने की कोशिश कर सकते हैं कि उनका निशाना चूक गया या पीड़ित किसी तरह बच गया।

इसी वजह से आपराधिक कानून में ‘प्रयास’ यानी attempt का सिद्धांत महत्वपूर्ण है।

‘बच गईं’ का मतलब ‘अपराध नहीं हुआ’ नहीं

इस पूरे मामले को एक वाक्य में समझें तो अदालत का संदेश स्पष्ट है—पीड़िता का बच जाना आरोपी को निर्दोष नहीं बना देता।

विनीता को कोई शारीरिक चोट नहीं लगी, क्योंकि उन्होंने खतरे को समय रहते पहचान लिया और घर का गेट बंद कर लिया। लेकिन अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने एसिड फेंकने की कोशिश की थी और अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषी माना।

अदालत ने यह भी माना कि ऐसे अपराधों का प्रभाव उस समय से कहीं आगे तक जाता है, जब घटना होती है। पीड़ित को मानसिक आघात, सामाजिक दबाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए अदालत ने एसिड हिंसा को गंभीर जेंडर-बेस्ड हिंसा के रूप में देखा।

निष्कर्ष

यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है, जहां अपराधी अपने लक्ष्य को नुकसान पहुंचाने में इसलिए सफल नहीं हो पाया क्योंकि पीड़ित ने समय रहते खुद को बचा लिया।

कानून की नजर में परिणाम महत्वपूर्ण है, लेकिन हर मामले में वही एकमात्र कसौटी नहीं है। आरोपी की मंशा, उसके द्वारा उठाया गया प्रत्यक्ष कदम, घटना की परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

विनीता के मामले में गेट बंद करने की उनकी सूझबूझ ने उन्हें संभावित गंभीर चोट से बचा लिया। लेकिन अदालत ने इस सुरक्षा को आरोपी के पक्ष में जाने वाला तथ्य नहीं माना।

अदालत ने साफ कर दिया कि किसी महिला पर एसिड फेंकने का प्रयास अपने आप में गंभीर आपराधिक कृत्य है। शरीर पर एसिड के निशान न बन पाना उस कोशिश को खत्म नहीं करता।

इस फैसले की सबसे अहम बात यही है कि अपराध का परिणाम टल जाना और अपराध की कोशिश का होना—दो अलग बातें हैं। पीड़िता सुरक्षित बच गई, यह राहत की बात है; लेकिन इससे आरोपी की कथित आपराधिक मंशा और उसके द्वारा उठाया गया कदम कानून की नजर में समाप्त नहीं हो जाता।

इसी दृष्टिकोण के साथ अदालत ने सानोज यादव को एसिड फेंकने की कोशिश और आपराधिक धमकी के लिए दोषी ठहराया और यह स्पष्ट संदेश दिया कि गंभीर हिंसा को केवल इसलिए हल्का नहीं माना जा सकता कि पीड़ित आखिरी क्षण में खुद को बचाने में सफल रहा।