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पार्श्वनाथ ग्रुप के अटके प्रोजेक्ट्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,

पार्श्वनाथ ग्रुप के अटके प्रोजेक्ट्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 3000 घर खरीदारों को राहत नहीं मिली तो संपत्ति फ्रीज करने की चेतावनी

     देश की शीर्ष अदालत ने रियल एस्टेट कंपनी पार्श्वनाथ ग्रुप से जुड़े लंबे समय से अटके आवासीय प्रोजेक्ट्स और हजारों घर खरीदारों की परेशानी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि यदि करीब 3000 प्रभावित घर खरीदारों की समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं किया गया, तो कंपनी की संपत्तियों को फ्रीज करने जैसे कठोर कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने बिल्डर को इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की नाराजगी केवल परियोजनाओं में देरी तक सीमित नहीं रही। बेंच ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग-अलग कंपनियों या नामों के इस्तेमाल से घर खरीदारों के सामने जिम्मेदारी तय करने की स्थिति जटिल हो रही है। अदालत ने संकेत दिया कि अगर कंपनी अपने स्तर पर समाधान नहीं निकालती है, तो न्यायालय को परियोजनाओं को अपने नियंत्रण में लेकर उनकी निगरानी के लिए अलग व्यवस्था करनी पड़ सकती है।

यह घटनाक्रम उन हजारों परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने वर्षों पहले अपना पैसा घर खरीदने के लिए लगाया था, लेकिन या तो उन्हें अभी तक फ्लैट नहीं मिला या फिर उनका पैसा लंबे समय से फंसा हुआ है।

3000 घर खरीदारों की समस्या बनी सबसे बड़ी चिंता

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान पार्श्वनाथ ग्रुप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टीम पेश हुई। कंपनी की ओर से अदालत के सामने यह दावा किया गया कि जिन घर खरीदारों को अपना पैसा वापस चाहिए, उन्हें उनकी निवेश की गई रकम ब्याज सहित लौटाने का प्रस्ताव दिया जा रहा है।

हालांकि, घर खरीदारों की ओर से पेश वकील ने इस दावे पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि समस्या केवल कुछ व्यक्तिगत खरीदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग 3000 घर खरीदार अभी भी अलग-अलग परियोजनाओं में फंसे हुए हैं। खरीदारों की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि अलग-अलग परियोजनाओं के लिए अलग-अलग कंपनियां बनाने की व्यवस्था के कारण वास्तविक जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो रहा है।

यही बिंदु सुनवाई के दौरान अदालत की चिंता का प्रमुख कारण बना।

27 हजार फ्लैट बनाने का दावा

पार्श्वनाथ ग्रुप ने अदालत के सामने अपने प्रोजेक्ट्स की स्थिति बताते हुए कहा कि विभिन्न परियोजनाओं में लगभग 27 हजार फ्लैट बनाए जाने थे। कंपनी के अनुसार इनमें करीब 24 हजार फ्लैट बिक चुके हैं और लगभग 21 हजार फ्लैटों का कब्जा खरीदारों को दिया जा चुका है।

कंपनी के इस आंकड़े का उद्देश्य अदालत को यह बताना था कि उसके अधिकांश प्रोजेक्ट्स में काम पूरा हो चुका है और बड़ी संख्या में खरीदारों को उनके घर मिल चुके हैं।

लेकिन अदालत के सामने मौजूदा विवाद उन हजारों खरीदारों का है जिन्हें अभी भी राहत नहीं मिल पाई है। न्यायालय के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि जब लंबे समय से परियोजनाएं लंबित हैं, तब बचे हुए खरीदारों को उनका घर या पैसा आखिर कब मिलेगा।

रियल एस्टेट विवादों में अक्सर यही समस्या सामने आती है। किसी कंपनी की कुल परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा पूरा हो जाने के बावजूद कुछ प्रोजेक्ट वर्षों तक अटके रह सकते हैं। इन परियोजनाओं में पैसा लगाने वाले खरीदारों के लिए समय बीतने के साथ समस्या और गंभीर होती जाती है।

अदालत ने बिल्डर के रवैये पर जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ ग्रुप के काम करने के तरीके पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के लिए अलग-अलग नामों और कंपनियों की संरचना के बीच खरीदारों की वास्तविक शिकायतों का समाधान कैसे होगा।

अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ कि वह मामले को केवल सामान्य उपभोक्ता विवाद की तरह नहीं देख रही है। न्यायालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वर्षों से लंबित मामलों का कोई व्यावहारिक और अंतिम समाधान निकले।

अदालत ने संकेत दिया कि यदि निर्धारित समय में समाधान नहीं निकाला गया, तो वह कंपनी की संपत्तियों को फ्रीज करने का आदेश दे सकती है। इसके साथ ही परियोजनाओं का निर्माण पूरा कराने और खरीदारों को फ्लैट सौंपने की प्रक्रिया की निगरानी के लिए घर खरीदारों की एक समिति गठित करने का विकल्प भी सामने रखा गया।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अदालत केवल आदेश पारित करके मामले को छोड़ने के बजाय उसके वास्तविक क्रियान्वयन की निगरानी करने के लिए भी तैयार है।

दो सप्ताह की समयसीमा

सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ ग्रुप को दो सप्ताह का समय दिया है। इस अवधि में कंपनी को करीब 3000 प्रभावित घर खरीदारों की शिकायतों का समाधान करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

यह समयसीमा कंपनी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि इस अवधि में खरीदारों के हित में कोई प्रभावी समाधान नहीं निकलता है, तो अदालत अपने पहले से ज्यादा कठोर विकल्पों पर विचार कर सकती है।

अदालत के सामने मुख्य रूप से दो तरह की परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं। पहली स्थिति में कंपनी खरीदारों के साथ समझौता करके उनकी समस्या का समाधान कर सकती है। जिन लोगों को फ्लैट चाहिए, उनके लिए निर्माण पूरा करने और कब्जा देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। वहीं जिन खरीदारों ने परियोजना से बाहर निकलने का विकल्प चुना है, उन्हें उनकी रकम ब्याज सहित वापस करने की व्यवस्था की जा सकती है।

दूसरी स्थिति तब पैदा होगी जब कंपनी का प्रस्ताव सभी प्रभावित खरीदारों की समस्याओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया जाता है। ऐसी स्थिति में अदालत किसी उच्चस्तरीय समिति या निगरानी तंत्र का गठन कर सकती है।

खातों को अनफ्रीज करने से इनकार

सुनवाई के दौरान अदालत ने पार्श्वनाथ ग्रुप के किसी भी खाते को अनफ्रीज करने से इनकार कर दिया। यह आदेश कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उसकी वित्तीय गतिविधियों पर न्यायिक निगरानी का संकेत मिलता है।

अदालत का रुख यह है कि जब तक घर खरीदारों की समस्याओं के समाधान की स्पष्ट व्यवस्था सामने नहीं आती, तब तक कंपनी को राहत देना उचित नहीं होगा।

रियल एस्टेट मामलों में बैंक खातों और संपत्तियों पर रोक लगाने का उद्देश्य आम तौर पर यह सुनिश्चित करना होता है कि उपलब्ध संपत्तियों और धन का इस्तेमाल प्रभावित पक्षों के हितों की रक्षा के लिए किया जा सके। हालांकि, किसी कंपनी की संपत्ति फ्रीज करना एक गंभीर कदम होता है और अदालत आमतौर पर परिस्थितियों, पक्षकारों के दावों तथा उपलब्ध रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर ही ऐसा कदम उठाती है।

इस मामले में अदालत ने अभी जिस तरह की चेतावनी दी है, उससे कंपनी को यह स्पष्ट संदेश मिला है कि खरीदारों की शिकायतों के समाधान में और देरी को हल्के में नहीं लिया जाएगा।

चार राज्यों के रेरा से मांगी जानकारी

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के रेरा से भी महत्वपूर्ण जानकारी मांगी है। अदालत ने संबंधित रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे बिल्डर पर बकाया रकम का विवरण देते हुए हलफनामा दाखिल करें।

इसका उद्देश्य संभवतः अदालत के सामने पार्श्वनाथ ग्रुप की वित्तीय और परियोजना संबंधी स्थिति की स्पष्ट तस्वीर रखना है।

रेरा की ओर से मिलने वाली जानकारी से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग राज्यों में पार्श्वनाथ ग्रुप की किन परियोजनाओं से कितने खरीदार प्रभावित हैं, किस स्तर पर निर्माण रुका हुआ है और कंपनी पर किस प्रकार की देनदारियां मौजूद हैं।

यह जानकारी आगे अदालत के लिए किसी भी निगरानी तंत्र या समिति के काम को तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

घर खरीदारों के लिए मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में रियल एस्टेट क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या लंबे समय तक चलने वाली परियोजनाओं की रही है। किसी व्यक्ति के लिए घर केवल एक निवेश नहीं होता। वह अक्सर जीवन की सबसे बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धताओं में से एक होता है।

कई खरीदार फ्लैट खरीदने के लिए बैंक से होम लोन लेते हैं। बिल्डर को किस्तों में भुगतान करते रहते हैं और दूसरी तरफ बैंक की EMI भी चुकाते हैं। यदि वर्षों तक घर का कब्जा नहीं मिलता, तो खरीदार को दोहरी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

एक ओर उसका पैसा परियोजना में फंसा रहता है और दूसरी ओर उसे किराये के मकान में रहना पड़ सकता है। यदि उसने घर खरीदने के लिए कर्ज लिया है तो EMI की जिम्मेदारी भी बनी रहती है।

इसी कारण सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि बिल्डर की ओर से लंबे समय तक कब्जा न देना केवल सामान्य कारोबारी देरी नहीं माना जा सकता। उपभोक्ता को उचित परिस्थितियों में रिफंड और मुआवजा जैसे उपाय मिल सकते हैं।

पार्श्वनाथ से जुड़े एक अन्य मामले में भी उपभोक्ता मंच ने लंबे विलंब को सेवा में कमी माना था और खरीदार को रकम वापस करने के साथ ब्याज तथा मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी की लागत के लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का पुराना रुख भी खरीदारों के पक्ष में रहा है

रियल एस्टेट मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि बिल्डर और घर खरीदार के बीच समझौते की शर्तें हमेशा अंतिम नहीं मानी जा सकतीं, खासकर तब जब वे अत्यधिक एकतरफा हों।

फरवरी 2026 में पार्श्वनाथ डेवलपर्स से जुड़े एक अन्य मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने विलंबित आवासीय परियोजना में उचित मुआवजे के सिद्धांत को स्वीकार किया। अदालत ने माना कि लंबे विलंब, कब्जे से वंचित रहने और खरीदार को हुई परेशानी को देखते हुए केवल बिल्डर द्वारा तय की गई मामूली क्षतिपूर्ति तक उपभोक्ता को सीमित नहीं किया जा सकता।

इससे यह व्यापक न्यायिक दृष्टिकोण सामने आता है कि घर खरीदारों के अधिकारों की रक्षा केवल अनुबंध की औपचारिक शर्तों के आधार पर नहीं की जा सकती। यदि अनुबंध एकतरफा है या बिल्डर की देरी से खरीदार को गंभीर नुकसान हुआ है, तो उपयुक्त मंच वास्तविक और न्यायसंगत राहत दे सकता है।

कंपनी के सामने अब क्या विकल्प हैं?

पार्श्वनाथ ग्रुप के सामने फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण चुनौती 3000 प्रभावित खरीदारों की शिकायतों का समाधान करना है। कंपनी को यह स्पष्ट करना होगा कि कौन से खरीदार फ्लैट लेना चाहते हैं और कौन अपना पैसा वापस चाहते हैं।

जिन परियोजनाओं में निर्माण पूरा होने की संभावना है, वहां निर्माण की समयसीमा, वित्तीय स्रोत और कब्जा देने की योजना स्पष्ट करनी होगी। दूसरी ओर, जिन खरीदारों ने रिफंड की मांग की है, उनके लिए भुगतान की वास्तविक क्षमता और समयसीमा अदालत के सामने विश्वसनीय रूप से रखनी होगी।

सिर्फ प्रस्ताव देना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत अब प्रस्ताव के क्रियान्वयन को भी देख सकती है।

यही कारण है कि अगले दो सप्ताह की अवधि इस विवाद में निर्णायक हो सकती है।

अगर समाधान नहीं हुआ तो समिति की भूमिका क्या होगी?

अदालत ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर घर खरीदारों की एक समिति बनाई जा सकती है। इसका उद्देश्य निर्माण और फ्लैटों की डिलीवरी की प्रक्रिया की निगरानी करना हो सकता है।

ऐसी व्यवस्था में परियोजना की वास्तविक स्थिति, उपलब्ध धन, निर्माण की जरूरत, ठेकेदारों की भूमिका और खरीदारों के हित जैसे मुद्दे अधिक व्यवस्थित तरीके से देखे जा सकते हैं।

यदि अदालत किसी उच्चस्तरीय समिति का गठन करती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल लंबित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए किस प्रकार किया जाए।

यह मॉडल उन मामलों में महत्वपूर्ण हो सकता है जहां केवल बिल्डर को समय देने से समस्या का समाधान नहीं हो रहा हो।

खरीदारों की नजर अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर

लगभग 3000 प्रभावित घर खरीदारों के लिए अब अगली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण होगी। उन्हें यह देखना होगा कि कंपनी अदालत के सामने क्या ठोस योजना रखती है और क्या वह वास्तव में सभी प्रभावित खरीदारों को संतोषजनक समाधान देने की स्थिति में है।

यदि कंपनी अपने वादे के मुताबिक भुगतान शुरू करती है या लंबित परियोजनाओं को पूरा करने की ठोस योजना पेश करती है, तो विवाद का एक हिस्सा समाधान की दिशा में बढ़ सकता है।

लेकिन यदि प्रस्ताव केवल कागजी साबित होता है या बड़ी संख्या में खरीदार फिर भी समाधान से बाहर रह जाते हैं, तो अदालत द्वारा कठोर कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है।

निष्कर्ष

पार्श्वनाथ ग्रुप से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर देश के रियल एस्टेट क्षेत्र में घर खरीदारों की सुरक्षा और बिल्डरों की जवाबदेही के सवाल को सामने ला दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से संपत्तियों को फ्रीज करने और घर खरीदारों की समिति बनाने की चेतावनी यह दर्शाती है कि लंबे समय तक लंबित रहने वाले आवासीय विवादों में अदालत अब केवल कागजी आश्वासनों पर निर्भर रहने के बजाय व्यावहारिक समाधान पर जोर दे रही है।

कंपनी के अनुसार हजारों फ्लैटों का निर्माण पूरा हो चुका है और बड़ी संख्या में खरीदारों को कब्जा भी दिया जा चुका है। इसके बावजूद करीब 3000 खरीदारों का मामला अभी अदालत की निगरानी में है। इन खरीदारों के लिए यह केवल एक कारोबारी विवाद नहीं बल्कि वर्षों की बचत, कर्ज, EMI और अपने घर की प्रतीक्षा से जुड़ा मामला है।

अब पार्श्वनाथ ग्रुप के सामने दो सप्ताह की समयसीमा है। यदि इस अवधि में प्रभावित खरीदारों के लिए स्वीकार्य समाधान सामने आता है, तो मामला आगे बातचीत और क्रियान्वयन की दिशा में जा सकता है। लेकिन यदि समाधान नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा संपत्तियों को फ्रीज करने और परियोजनाओं की निगरानी अपने हाथ में लेने जैसे कठोर कदमों की राह खुल सकती है।

अंततः इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अदालत का फोकस अब केवल यह तय करने पर नहीं है कि किसकी गलती है, बल्कि इस पर है कि वर्षों से फंसे घर खरीदारों को उनका घर या उनका पैसा वास्तविक रूप से कब और कैसे मिलेगा।