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BNSS धारा 144 की सुप्रीम कोर्ट ने की अहम व्याख्या, व्यभिचार के प्रथम दृष्टया साक्ष्य पर पत्नी को नहीं मिलेगा अंतरिम भरण-पोषण

व्यभिचार के प्रथम दृष्टया साक्ष्य होने पर अंतरिम भरण-पोषण नहीं मिलेगा: BNSS की धारा 144 पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय

भूमिका

वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण (Maintenance) का प्रश्न सबसे संवेदनशील और विवादास्पद विषयों में से एक है। पति-पत्नी के बीच संबंध बिगड़ने के बाद अक्सर पत्नी द्वारा अपने तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 के रूप में लागू था। इसका मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्बल पत्नी, बच्चों और माता-पिता को त्वरित राहत प्रदान करना है ताकि वे मुकदमे के दौरान सम्मानजनक जीवन जी सकें।

हालांकि, कानून ने इस अधिकार को पूर्ण या निरपेक्ष नहीं माना है। यदि पत्नी ऐसे आचरण में लिप्त पाई जाती है जिसे कानून भरण-पोषण के अधिकार के प्रतिकूल मानता है, तो उसे इस लाभ से वंचित किया जा सकता है।

इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) में एक अहम निर्णय दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से पहली दृष्टि में यह प्रतीत होता है कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तो उसे अंतरिम भरण-पोषण देना आवश्यक नहीं है। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पति द्वारा लगाया गया आरोप पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर न्यायालय का प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना अनिवार्य है।


मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में पति और पत्नी का विवाह वर्ष 2014 में हुआ था। कुछ वर्षों तक दोनों साथ रहे, लेकिन बाद में उनके वैवाहिक संबंधों में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। वर्ष 2020 में पत्नी पति का घर छोड़कर अलग रहने लगी।

अलग रहने के पश्चात पत्नी ने BNSS की धारा 144 के अंतर्गत अंतरिम भरण-पोषण की मांग करते हुए न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया। उसका कहना था कि वह स्वयं का पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं है तथा पति आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद उसकी देखभाल नहीं कर रहा है।

दूसरी ओर पति ने इस आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है। उसने न्यायालय के समक्ष कुछ दस्तावेज और परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए तथा तर्क दिया कि कानून के अनुसार ऐसी पत्नी भरण-पोषण की अधिकारी नहीं हो सकती।


ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का दृष्टिकोण

ट्रायल कोर्ट ने पति की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया। उसका मत था कि व्यभिचार का प्रश्न साक्ष्य और जिरह के बाद अंतिम सुनवाई में तय होगा। इसलिए केवल इस आधार पर अंतरिम भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इसी दृष्टिकोण को अपनाया। हाईकोर्ट ने माना कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करना है। चूंकि व्यभिचार का मुद्दा अभी सिद्ध नहीं हुआ है, इसलिए पत्नी को अंतरिम राहत देने में कोई बाधा नहीं है।

इन दोनों आदेशों से असंतुष्ट होकर पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था—

क्या ऐसी स्थिति में, जब उपलब्ध रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत हो कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तब भी उसे BNSS की धारा 144 के तहत अंतरिम भरण-पोषण दिया जा सकता है?

यह प्रश्न केवल इस मामले तक सीमित नहीं था, बल्कि भविष्य में आने वाले हजारों वैवाहिक विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण था।


सुप्रीम कोर्ट की पीठ

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय करोल तथा न्यायमूर्ति एम. पंचोली की खंडपीठ ने की।

पीठ ने अंतरिम भरण-पोषण की प्रकृति, उद्देश्य और कानून में निर्धारित अपवादों का विस्तृत विश्लेषण किया।


अंतरिम भरण-पोषण कोई स्वचालित अधिकार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य मुकदमे के दौरान आर्थिक सहायता देना है, लेकिन यह सहायता प्रत्येक मामले में स्वतः नहीं दी जा सकती।

यदि कानून स्वयं किसी विशेष परिस्थिति में भरण-पोषण से वंचित करने का प्रावधान करता है, तो न्यायालय उस अपवाद की अनदेखी नहीं कर सकता।

अदालत ने कहा कि न्यायालय को प्रत्येक मामले के तथ्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह देखना होगा कि क्या अंतरिम राहत देना न्यायसंगत होगा।


केवल आरोप पर्याप्त नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पति द्वारा लगाया गया आरोप किसी पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

यदि केवल आरोपों के आधार पर अंतरिम भरण-पोषण रोक दिया जाए, तो इसका दुरुपयोग होने की संभावना बढ़ जाएगी।

इसी कारण अदालत ने कहा कि न्यायालय को रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री, दस्तावेजों, परिस्थितियों तथा अन्य साक्ष्यों का प्रारंभिक परीक्षण करना होगा।

यदि इनसे प्रथम दृष्टया व्यभिचार का संकेत मिलता है, तभी अंतरिम भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है।


प्रथम दृष्टया संतुष्टि का महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने “प्रथम दृष्टया संतुष्टि” (Prima Facie Satisfaction) के सिद्धांत पर विशेष बल दिया।

इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यभिचार पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है, बल्कि यह कि उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत हों कि प्रारंभिक स्तर पर न्यायालय को आरोप विश्वसनीय प्रतीत हों।

अंतिम निर्णय तो मुकदमे की संपूर्ण सुनवाई, जिरह और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा।

इस प्रकार अंतरिम स्तर पर न्यायालय केवल प्रारंभिक मूल्यांकन करता है।


अंतरिम आदेश भी कानून के अनुरूप होने चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेश भी न्यायिक विवेक और विधिक सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए।

अंतरिम आदेश पारित करते समय न्यायालय यह नहीं कह सकता कि चूंकि अंतिम सुनवाई बाकी है, इसलिए कानून के अपवादों की अनदेखी कर दी जाए।

यदि प्रारंभिक रिकॉर्ड किसी महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है, तो न्यायालय उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।


मामला पुनः निचली अदालत को भेजा गया

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पत्नी निश्चित रूप से व्यभिचार में रह रही है।

अदालत ने केवल इतना कहा कि निचली अदालत उपलब्ध साक्ष्यों का विधिसम्मत मूल्यांकन करे और यह तय करे कि क्या प्रथम दृष्टया व्यभिचार स्थापित होता है।

इसी उद्देश्य से मामला पुनः निचली अदालत को भेज दिया गया ताकि पति द्वारा प्रस्तुत सामग्री का गुण-दोष के आधार पर परीक्षण किया जा सके।


BNSS की धारा 144 का कानूनी ढांचा

BNSS की धारा 144 के अंतर्गत पत्नी, नाबालिग संतान, अशक्त वयस्क संतान तथा माता-पिता भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं।

इस प्रावधान का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है।

किन्तु इसी धारा में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि—

  • पत्नी व्यभिचार में रह रही हो,
  • बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से इंकार कर रही हो,
  • अथवा दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों,

तो न्यायालय भरण-पोषण का आदेश निरस्त कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी वैधानिक व्यवस्था की व्याख्या करते हुए अपना निर्णय दिया।


व्यभिचार की अवधारणा

कानून में “व्यभिचार में रहना” केवल एक बार की घटना नहीं माना जाता।

न्यायालयों ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि इसके लिए सामान्यतः निरंतर या नियमित अवैध संबंध का संकेत आवश्यक होता है।

केवल संदेह, अफवाह या अपुष्ट आरोप व्यभिचार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इसलिए प्रत्येक मामले में साक्ष्यों का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक रहेगा।


क्या पति के व्यभिचार का भी यही प्रभाव होगा?

इस निर्णय के बाद यह प्रश्न भी सामने आता है कि यदि पति स्वयं व्यभिचार में रह रहा हो तो क्या पत्नी का भरण-पोषण समाप्त हो जाएगा?

उत्तर है—नहीं।

BNSS की धारा 144 में पत्नी के व्यभिचार को भरण-पोषण से वंचित करने का आधार बनाया गया है।

यदि पति स्वयं किसी अन्य महिला के साथ रह रहा हो, तो इससे पत्नी का वैधानिक अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होता।

बल्कि कई मामलों में पति का ऐसा आचरण पत्नी के अलग रहने के उचित कारण के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है।


निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव

यह निर्णय भविष्य के भरण-पोषण संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

अब निचली अदालतें केवल यह कहकर अंतरिम भरण-पोषण नहीं देंगी कि व्यभिचार का प्रश्न अंतिम सुनवाई में तय होगा।

यदि पति पर्याप्त प्रारंभिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है और न्यायालय उनसे प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो जाता है, तो अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है।

साथ ही यह निर्णय यह भी सुनिश्चित करता है कि निराधार आरोपों के आधार पर किसी महिला को उसके अधिकार से वंचित न किया जाए।

इस प्रकार न्यायालय ने दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।


महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत

इस निर्णय से निम्नलिखित सिद्धांत स्पष्ट होते हैं—

  • अंतरिम भरण-पोषण स्वचालित अधिकार नहीं है।
  • व्यभिचार का केवल आरोप पर्याप्त नहीं होगा।
  • न्यायालय को प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्यों से संतुष्ट होना आवश्यक है।
  • अंतरिम आदेश भी विधिक सिद्धांतों के अनुरूप पारित किए जाएंगे।
  • व्यभिचार संबंधी अपवाद का लाभ तभी मिलेगा जब रिकॉर्ड पर विश्वसनीय प्रारंभिक सामग्री उपलब्ध हो।
  • अंतिम निर्णय विस्तृत साक्ष्यों और सुनवाई के बाद ही होगा।

निर्णय का व्यापक महत्व

यह निर्णय केवल एक पक्ष के हित में नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संतुलित बनाने वाला है।

एक ओर यह सुनिश्चित करता है कि वास्तविक रूप से जरूरतमंद पत्नी को शीघ्र आर्थिक सहायता मिल सके, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करता है कि यदि कानून द्वारा निर्धारित अपवाद प्रथम दृष्टया लागू होते दिखाई देते हैं, तो न्यायालय उन्हें अनदेखा नहीं करेगा।

इससे न्यायालयों में अंतरिम भरण-पोषण के मामलों के निस्तारण के लिए एक स्पष्ट मानक स्थापित होगा। साथ ही यह संदेश भी जाता है कि भरण-पोषण संबंधी अधिकार सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण साधन अवश्य हैं, किंतु उनका प्रयोग विधि द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही किया जाएगा।

निष्कर्ष

हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) का यह निर्णय BNSS की धारा 144 की व्याख्या के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन यह अधिकार कानून में निर्धारित अपवादों से परे नहीं है।

यदि उपलब्ध रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तो न्यायालय अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर सकता है। वहीं केवल आरोप लगाकर पत्नी को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों का प्रारंभिक परीक्षण कर संतुष्ट होना अनिवार्य होगा।

यह निर्णय भविष्य के वैवाहिक विवादों में निचली अदालतों को स्पष्ट दिशा देगा तथा यह सुनिश्चित करेगा कि भरण-पोषण संबंधी आदेश संवेदनशीलता, निष्पक्षता और विधिक सिद्धांतों के अनुरूप पारित किए जाएं।