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दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट बंदी पर कानूनी चुनौती: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,

दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट बंदी पर कानूनी चुनौती: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक व्यवस्था और संवैधानिक संतुलन की परीक्षा

        भारत में इंटरनेट आज केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षा, व्यापार, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, न्यायिक प्रक्रिया, पत्रकारिता और नागरिकों की अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन बन चुका है। ऐसे समय में यदि सरकार किसी क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को बंद करने का निर्णय लेती है तो उसका प्रभाव केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों लोगों के दैनिक जीवन, आजीविका और संवैधानिक अधिकारों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि इंटरनेट बंदी (Internet Shutdown) अब केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी विषय बन चुका है।

      हाल ही में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा मध्य दिल्ली और नई दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित करने के आदेश जारी किए गए। इन आदेशों को चुनौती देते हुए कानूनी सेवा संगठन सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (SFLC) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि इंटरनेट बंदी का आदेश न केवल असंवैधानिक और मनमाना है, बल्कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है।

     यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि इससे यह तय होगा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सरकार कितनी दूर तक जाकर नागरिकों के डिजिटल अधिकारों को सीमित कर सकती है और ऐसी शक्ति के प्रयोग पर न्यायपालिका किस प्रकार नियंत्रण रखेगी।

     याचिका के अनुसार गृह मंत्रालय ने 17, 20, 22 और 23 जुलाई को आदेश जारी कर जंतर-मंतर से लगभग डेढ़ किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्देश दिया। इन आदेशों के परिणामस्वरूप मोबाइल डेटा आधारित इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हुईं, जिससे स्थानीय नागरिकों, दुकानदारों, पत्रकारों, वकीलों, छात्रों और अन्य लोगों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

     याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इंटरनेट बंद करना प्रशासन को प्राप्त सबसे कठोर और असाधारण शक्तियों में से एक है। इसलिए इसका उपयोग केवल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में और स्पष्ट कानूनी आधार पर ही किया जाना चाहिए। यदि सरकार यह नहीं बताती कि कौन-सा सार्वजनिक आपातकाल उत्पन्न हुआ था अथवा इंटरनेट बंद करना क्यों अपरिहार्य था, तो ऐसा आदेश संविधान के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यवसाय करने की स्वतंत्रता तथा गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) किसी भी वैध व्यवसाय, व्यापार या पेशे को अपनाने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिसकी व्याख्या समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापक रूप से की है। आज के डिजिटल युग में इंटरनेट तक पहुंच इन अधिकारों के प्रभावी उपयोग का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है।

याचिका में विशेष रूप से यह तर्क दिया गया है कि इंटरनेट बंदी के कारण छोटे व्यापारियों की डिजिटल भुगतान व्यवस्था प्रभावित हुई, ऑनलाइन सेवाएं बाधित हुईं, समाचार संकलन में कठिनाई उत्पन्न हुई तथा अनेक लोग आवश्यक सरकारी और निजी सेवाओं का उपयोग नहीं कर सके। इसलिए इस प्रकार का व्यापक प्रतिबंध नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

भारत में दूरसंचार सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबित करने की शक्ति विधि द्वारा नियंत्रित है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार सार्वजनिक आपातकाल अथवा सार्वजनिक सुरक्षा की स्थिति में सक्षम प्राधिकारी निश्चित प्रक्रिया का पालन करते हुए सीमित अवधि के लिए दूरसंचार सेवाओं को निलंबित कर सकता है। लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। प्रत्येक आदेश का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए, उसका क्षेत्र सीमित होना चाहिए तथा उसकी आवश्यकता और अनुपातिकता का परीक्षण किया जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया था कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इंटरनेट बंदी के आदेश अनिश्चितकाल तक लागू नहीं रह सकते तथा प्रत्येक आदेश न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा। साथ ही सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लगाए गए प्रतिबंध आवश्यक, उचित और अनुपातिक हों।

इसी न्यायिक दृष्टिकोण के आधार पर वर्तमान याचिका में कहा गया है कि यदि प्रशासन केवल संभावित आशंका के आधार पर पूरे क्षेत्र की मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर देता है तो यह अनुपातिकता के सिद्धांत के विपरीत होगा। यदि किसी सीमित स्थान पर कानून-व्यवस्था की चुनौती है तो उसका समाधान लक्षित और सीमित उपायों से किया जाना चाहिए, न कि पूरे क्षेत्र के नागरिकों को इंटरनेट से वंचित करके।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। सरकार का दायित्व है कि वह एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखे और दूसरी ओर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी करे। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा की वास्तविक संभावना हो तो प्रशासन आवश्यक कदम उठा सकता है, किंतु प्रत्येक प्रतिबंध का कानूनी औचित्य सिद्ध करना भी उतना ही आवश्यक है।

आज अधिकांश व्यापार डिजिटल भुगतान पर निर्भर हैं। छोटे दुकानदार, कैब चालक, फूड डिलीवरी कर्मी, फ्रीलांसर, ऑनलाइन सेवा प्रदाता और अनेक स्वरोजगार से जुड़े लोग मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से अपनी आजीविका चलाते हैं। कुछ घंटों की इंटरनेट बंदी भी उनके लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है। इसके अतिरिक्त बैंकिंग सेवाएं, यूपीआई भुगतान, ऑनलाइन टिकट, अस्पतालों की डिजिटल सेवाएं और ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म भी प्रभावित होते हैं।

पत्रकारिता के क्षेत्र में इंटरनेट का महत्व और भी अधिक है। समाचारों का संकलन, वीडियो प्रसारण, तथ्य सत्यापन और आम जनता तक सूचना पहुंचाने का कार्य इंटरनेट के बिना लगभग असंभव हो जाता है। यदि विरोध प्रदर्शन वाले क्षेत्र में इंटरनेट बंद कर दिया जाए तो स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टिंग भी प्रभावित हो सकती है। इसी कारण प्रेस की स्वतंत्रता और इंटरनेट बंदी का प्रश्न भी इस विवाद से जुड़ जाता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि सरकार ने अपने आदेशों में यह स्पष्ट नहीं किया कि सार्वजनिक आपातकाल की वास्तविक स्थिति क्या थी। केवल सामान्य आशंका या संभावित अव्यवस्था के आधार पर व्यापक प्रतिबंध लगाना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रत्येक प्रशासनिक आदेश कारणयुक्त, पारदर्शी और न्यायसंगत होना चाहिए।

सरकार की ओर से सामान्यतः यह तर्क दिया जाता है कि इंटरनेट के माध्यम से अफवाहें तेजी से फैलती हैं, भीड़ को संगठित किया जा सकता है तथा हिंसा भड़कने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए कुछ विशेष परिस्थितियों में अस्थायी इंटरनेट बंदी आवश्यक हो सकती है। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि कई अवसरों पर सोशल मीडिया के माध्यम से गलत सूचनाओं के प्रसार ने कानून-व्यवस्था को प्रभावित किया है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या हर स्थिति में सम्पूर्ण मोबाइल इंटरनेट बंद करना ही एकमात्र उपाय है?

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रगति के इस दौर में सरकार के पास कई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए केवल विशेष वेबसाइटों या सेवाओं पर सीमित नियंत्रण, भ्रामक सामग्री के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई, सोशल मीडिया मंचों के साथ समन्वय तथा स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। यदि कम कठोर उपायों से उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है तो व्यापक इंटरनेट बंदी उचित नहीं मानी जाएगी।

विश्व स्तर पर भी इंटरनेट तक पहुंच को लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रभावी प्रयोग का महत्वपूर्ण साधन माना जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों पर भी यह विचार व्यक्त किया गया है कि इंटरनेट पर अनावश्यक और व्यापक प्रतिबंध नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रभावित करते हैं। इसलिए अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में इंटरनेट बंदी को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर यह याचिका केवल चार आदेशों की वैधता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक शक्तियों की संवैधानिक सीमाओं की भी परीक्षा है। यदि न्यायालय सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगता है और अनुपातिकता के सिद्धांत पर आदेशों की समीक्षा करता है, तो भविष्य में इंटरनेट बंदी से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि डिजिटल इंडिया अभियान के तहत सरकार स्वयं डिजिटल सेवाओं के विस्तार पर बल दे रही है। ऐसे में इंटरनेट बंदी और डिजिटल शासन के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है। नागरिकों को डिजिटल सेवाओं के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर इंटरनेट तक उनकी पहुंच बाधित न हो।

इस पूरे विवाद का अंतिम समाधान न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगा, किंतु यह स्पष्ट है कि भविष्य में इंटरनेट बंदी संबंधी प्रत्येक आदेश को अधिक पारदर्शी, कारणयुक्त और न्यायिक मानकों के अनुरूप बनाना होगा। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी में है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों का समान सम्मान किया जाए।

     अंततः यह कहा जा सकता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है। इंटरनेट आधुनिक जीवन की मूलभूत आवश्यकता बन चुका है। इसलिए किसी भी प्रकार की इंटरनेट बंदी केवल अपवादस्वरूप, सीमित अवधि के लिए, स्पष्ट कारणों के आधार पर और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप ही लागू की जानी चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित यह मामला भविष्य में भारत की डिजिटल स्वतंत्रता, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक शासन व्यवस्था की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण मामलों में से एक सिद्ध हो सकता है।