NEET UG 2026: 522 अंक का दावा, 95 अंक का परिणाम — बीड के छात्र सोहम गावते की याचिका से उठे परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल
प्रस्तावना
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) देश की सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं में से एक है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी डॉक्टर बनने का सपना लेकर इस परीक्षा में शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और परिणामों की शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। वर्ष 2026 की नीट परीक्षा पहले ही पेपर लीक विवाद के कारण चर्चा में रही। 3 मई 2026 को आयोजित परीक्षा रद्द होने के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने 21 जून 2026 को पुनर्परीक्षा आयोजित की। इसी पुनर्परीक्षा के परिणाम को लेकर महाराष्ट्र के बीड जिले के छात्र सोहम नितिन गावते ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
छात्र का दावा है कि उसकी ओएमआर (OMR) शीट और एनटीए द्वारा जारी आधिकारिक उत्तर-कुंजी (Answer Key) के अनुसार उसके 522 अंक बनने चाहिए थे, जबकि एजेंसी ने उसे केवल 95 अंक प्रदान किए। इस कथित अंतर के बाद छात्र ने पहले एनटीए से स्पष्टीकरण मांगा और उत्तर न मिलने पर बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ में रिट याचिका दायर कर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। यह मामला केवल एक विद्यार्थी के परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया तथा विद्यार्थियों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी बन गया है।
पूरा मामला क्या है?
याचिका के अनुसार सोहम नितिन गावते ने 21 जून 2026 को आयोजित नीट यूजी पुनर्परीक्षा में भाग लिया। परीक्षा के बाद एनटीए ने 14 जुलाई को अभ्यर्थियों की ओएमआर रिस्पॉन्स शीट जारी की तथा 16 जुलाई को आधिकारिक उत्तर-कुंजी प्रकाशित की।
छात्र ने अपनी ओएमआर शीट का उत्तर-कुंजी से मिलान किया। उसके अनुसार उसने कुल 148 प्रश्नों के उत्तर दिए, जिनमें 136 उत्तर सही तथा 12 उत्तर गलत थे। नीट की निर्धारित अंक प्रणाली के अनुसार सही उत्तर पर 4 अंक तथा गलत उत्तर पर 1 अंक की निगेटिव मार्किंग लागू होती है।
इस आधार पर छात्र का दावा है कि उसके अंक इस प्रकार बनते हैं—
- सही उत्तर: 136 × 4 = 544 अंक
- गलत उत्तर: 12 × 1 = 12 अंक कटौती
- कुल प्राप्तांक: 544 – 12 = 532 अंक
हालांकि याचिका में 522 अंक का दावा किया गया है। यह अंतर संभवतः याचिका में उल्लिखित गणना, प्रश्नों की संख्या अथवा अन्य तकनीकी आधार से संबंधित हो सकता है। लेकिन मुख्य विवाद यही है कि छात्र के अनुसार उसके वास्तविक अंक 500 से अधिक होने चाहिए थे, जबकि एनटीए ने स्कोरकार्ड में केवल 95 अंक दर्शाए।
शैक्षणिक रिकॉर्ड भी बना याचिका का आधार
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि सोहम गावते का शैक्षणिक रिकॉर्ड अच्छा रहा है।
- कक्षा 10 में 94.6 प्रतिशत अंक
- कक्षा 12 (विज्ञान) में 74.17 प्रतिशत अंक
याचिकाकर्ता का कहना है कि उसका पूर्व शैक्षणिक प्रदर्शन भी इस बात का संकेत देता है कि 95 अंक जैसा परिणाम उसके वास्तविक प्रदर्शन से मेल नहीं खाता।
हालांकि केवल पिछले शैक्षणिक रिकॉर्ड के आधार पर परीक्षा परिणाम की शुद्धता सिद्ध नहीं की जा सकती, लेकिन याचिका में इसे परिस्थितिजन्य तथ्य (Circumstantial Fact) के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
ओएमआर शीट और उत्तर-कुंजी का महत्व
नीट जैसी परीक्षाओं में ओएमआर शीट अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है।
ओएमआर शीट में अभ्यर्थी द्वारा चुने गए उत्तर दर्ज रहते हैं। परीक्षा के बाद एनटीए प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी रिस्पॉन्स शीट उपलब्ध कराती है ताकि वह आधिकारिक उत्तर-कुंजी के साथ उसका मिलान कर सके।
यदि किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसके परिणाम में त्रुटि है तो यही ओएमआर शीट सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बनती है।
सोहम गावते का कहना है कि उसने इसी प्रक्रिया के तहत अपनी रिस्पॉन्स शीट का मिलान किया और पाया कि उसके अंक स्कोरकार्ड से बिल्कुल अलग बन रहे हैं।
यदि यह दावा सही पाया जाता है तो यह मूल्यांकन प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि का संकेत हो सकता है।
एनटीए को भेजे गए ईमेल
याचिका के अनुसार छात्र ने अदालत जाने से पहले एनटीए को अपनी शिकायत भेजी।
उसने—
- 17 जुलाई 2026
- 18 जुलाई 2026
को ईमेल के माध्यम से एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगा।
साथ ही उसने—
- उत्तर पुस्तिका का सत्यापन
- परिणाम में संशोधन
- सही स्कोरकार्ड जारी करने
का अनुरोध किया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि एनटीए की ओर से इन ईमेल का कोई उत्तर नहीं दिया गया।
यही कारण था कि छात्र ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया।
हाईकोर्ट में क्या मांग की गई है?
सोहम गावते ने अपने अधिवक्ताओं सुदर्शन सालुंके तथा महेंद्र गांधले के माध्यम से बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ में रिट याचिका दायर की।
याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें की गई हैं—
- छात्र की उत्तर पुस्तिका का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए।
- ओएमआर शीट का पुनर्मूल्यांकन कराया जाए।
- वास्तविक अंकों के आधार पर संशोधित स्कोरकार्ड जारी किया जाए।
- यदि तकनीकी त्रुटि पाई जाती है तो छात्र को उसके वास्तविक अंक प्रदान किए जाएं।
- भविष्य में ऐसी त्रुटियों की पुनरावृत्ति रोकने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
मामले की सुनवाई 23 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध की गई।
पेपर लीक विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है जब नीट 2026 पहले से ही विवादों के केंद्र में रही।
3 मई 2026 को आयोजित मूल परीक्षा पर पेपर लीक के गंभीर आरोप लगे थे।
इसके बाद—
- परीक्षा रद्द की गई।
- पुनर्परीक्षा का निर्णय लिया गया।
- 21 जून 2026 को दोबारा परीक्षा आयोजित हुई।
- 16 जुलाई 2026 को परिणाम घोषित किए गए।
ऐसे माहौल में किसी विद्यार्थी द्वारा मूल्यांकन संबंधी गंभीर त्रुटि का आरोप लगाना स्वाभाविक रूप से व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
क्या ओएमआर में तकनीकी त्रुटि संभव है?
आधुनिक परीक्षाओं में ओएमआर शीट का मूल्यांकन कंप्यूटर आधारित स्कैनिंग प्रणाली से किया जाता है।
हालांकि अधिकांश मामलों में यह प्रक्रिया अत्यंत सटीक होती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में त्रुटियां संभव हो सकती हैं—
- स्कैनिंग त्रुटि
- गलत डेटा मैपिंग
- रोल नंबर अथवा टेस्ट बुकलेट कोड की समस्या
- सर्वर पर डेटा अपलोड में गड़बड़ी
- तकनीकी सॉफ्टवेयर त्रुटि
- मानव त्रुटि
इसी कारण कई परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को ओएमआर शीट देखने और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है।
क्या न्यायालय पुनर्मूल्यांकन का आदेश दे सकता है?
भारतीय न्यायालय सामान्यतः विशेषज्ञ संस्थाओं के शैक्षणिक निर्णयों में सीमित हस्तक्षेप करते हैं।
लेकिन यदि—
- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो,
- मूल्यांकन प्रक्रिया में स्पष्ट त्रुटि दिखाई दे,
- तकनीकी गलती का प्रथम दृष्टया प्रमाण मौजूद हो,
- या प्रशासनिक मनमानी प्रतीत हो,
तो उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हस्तक्षेप कर सकता है।
यदि याचिकाकर्ता अपनी ओएमआर शीट और उत्तर-कुंजी के आधार पर प्रथम दृष्टया यह सिद्ध कर देता है कि उसके अंकों में असाधारण अंतर है, तो न्यायालय उत्तर पुस्तिका के सत्यापन का निर्देश दे सकता है।
हालांकि अंतिम निर्णय उपलब्ध अभिलेखों, एनटीए के उत्तर तथा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
एनटीए की संभावित दलीलें
मामले की सुनवाई के दौरान एनटीए निम्नलिखित पक्ष रख सकता है—
- परिणाम पूरी तरह कंप्यूटर आधारित प्रक्रिया से तैयार किए गए।
- स्कोर आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार सही है।
- याचिकाकर्ता की गणना में त्रुटि हो सकती है।
- उत्तर-कुंजी की गलत व्याख्या की गई हो।
- ओएमआर शीट की पढ़ाई में अभ्यर्थी से गलती हुई हो।
यदि एजेंसी अपने रिकॉर्ड के आधार पर परिणाम को सही सिद्ध कर देती है तो याचिका खारिज भी हो सकती है।
विद्यार्थियों के अधिकार
प्रत्येक अभ्यर्थी को यह अधिकार प्राप्त है कि—
- उसे पारदर्शी मूल्यांकन मिले।
- उसकी ओएमआर शीट उपलब्ध कराई जाए।
- उत्तर-कुंजी देखने का अवसर मिले।
- निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आपत्ति दर्ज कर सके।
- प्रशासनिक त्रुटि होने पर उसका सुधार किया जाए।
ये अधिकार निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की आधारशिला हैं।
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की आवश्यकता
ऐसे विवाद यह संकेत देते हैं कि केवल परीक्षा आयोजित करना पर्याप्त नहीं है।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कुछ सुधार आवश्यक हो सकते हैं—
- परिणाम जारी होने से पहले डिजिटल सत्यापन।
- ओएमआर स्कैनिंग की दोहरी जांच।
- ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली।
- समयबद्ध ईमेल उत्तर।
- स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट।
- त्रुटि पाए जाने पर शीघ्र संशोधित परिणाम जारी करने की व्यवस्था।
इन उपायों से विद्यार्थियों का विश्वास मजबूत किया जा सकता है।
समाज और विद्यार्थियों पर प्रभाव
नीट केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा अवसर है।
यदि किसी छात्र को वास्तविक प्रदर्शन से कम अंक मिलते हैं तो—
- मेडिकल कॉलेज में प्रवेश प्रभावित हो सकता है।
- मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
- एक वर्ष का शैक्षणिक नुकसान हो सकता है।
- परिवार आर्थिक एवं भावनात्मक कठिनाइयों का सामना कर सकता है।
इसी कारण परिणामों की शुद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
न्यायिक प्रक्रिया का महत्व
न्यायालय का उद्देश्य किसी परीक्षा एजेंसी के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप करना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक अभ्यर्थी के साथ विधि के अनुसार निष्पक्ष व्यवहार हो।
यदि किसी विद्यार्थी की शिकायत वास्तविक है तो उसे उचित राहत मिलनी चाहिए, और यदि शिकायत निराधार है तो परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी बनी रहनी चाहिए।
इस प्रकार न्यायालय दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र के बीड जिले के छात्र सोहम नितिन गावते द्वारा दायर याचिका ने नीट यूजी 2026 की मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। छात्र का दावा है कि उसकी ओएमआर शीट और आधिकारिक उत्तर-कुंजी के अनुसार उसके अंक 500 से अधिक बनने चाहिए थे, जबकि स्कोरकार्ड में केवल 95 अंक दर्शाए गए। दूसरी ओर, अंतिम सत्य का निर्धारण न्यायालय में प्रस्तुत अभिलेखों, एनटीए के आधिकारिक उत्तर और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।
यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, तकनीकी शुद्धता और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना और सभी तथ्यों के सामने आने की प्रतीक्षा करना ही उचित होगा। यदि जांच में त्रुटि सिद्ध होती है तो उसका शीघ्र सुधार होना चाहिए, और यदि परिणाम सही पाया जाता है तो उससे भी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता मजबूत होगी। अंततः निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था ही विद्यार्थियों के विश्वास तथा शिक्षा प्रणाली की साख का सबसे मजबूत आधार है।