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क्या विवाह के बाद परपुरुष से संबंध रखने वाली पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार मिल सकता है? छत्तीसगढ़ हाई

क्या विवाह के बाद परपुरुष से संबंध रखने वाली पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार मिल सकता है? छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले की कानूनी पड़ताल

      भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है। इस रिश्ते की नींव विश्वास, निष्ठा और पारस्परिक सम्मान पर टिकी होती है। जब यह विश्वास टूटता है तो केवल वैवाहिक संबंध ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि उससे जुड़े कानूनी अधिकार और दायित्व भी सवालों के घेरे में आ जाते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक फैसले ने इसी विषय पर देशभर में चर्चा छेड़ दी है। अदालत ने एक मामले में स्पष्ट किया कि यदि पत्नी विवाह के बाद किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचार (living in adultery) कर रही है और यह न्यायालय के समक्ष विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध हो जाता है, तो उसे पति से भरण-पोषण (Maintenance) प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा।

यह निर्णय केवल एक परिवार के विवाद का निपटारा नहीं है, बल्कि भारतीय कानून में भरण-पोषण के अधिकार और उसकी सीमाओं को भी स्पष्ट करता है। हालांकि, यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि ऐसा निष्कर्ष हर मामले में स्वतः लागू नहीं होता। प्रत्येक विवाद में अदालत उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और कानून के आधार पर अलग-अलग निर्णय देती है।

विवाह के कुछ ही महीनों बाद शुरू हुआ विवाद

मामला छत्तीसगढ़ के जशपुर की रहने वाली एक महिला और रायपुर के एक युवक से जुड़ा था। दोनों का विवाह 19 अप्रैल 2018 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ। विवाह के शुरुआती दिनों के बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ने लगे। दोनों के बीच अक्सर झगड़े होने लगे और लगभग आठ महीने के भीतर ही दोनों अलग रहने लगे।

पति-पत्नी के अलग होने के बाद विवाद न्यायालय तक पहुंच गया। पत्नी ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर प्रताड़ना के आरोप लगाए और मासिक भरण-पोषण की मांग की। उसने दावा किया कि पति उस पर हमेशा चरित्र को लेकर संदेह करता था और मोबाइल पर किसी से बात करने पर मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उत्पीड़न से परेशान होकर उसने आत्महत्या का प्रयास किया था, लेकिन गांव वालों ने समय रहते उसे बचा लिया।

पति ने लगाए विवाहेतर संबंधों के आरोप

दूसरी ओर पति ने अदालत के समक्ष दावा किया कि पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से विवाहेतर संबंध था। पति ने अपने पक्ष में डिजिटल साक्ष्य, बातचीत की रिकॉर्डिंग और अन्य दस्तावेज न्यायालय में प्रस्तुत किए। उसका कहना था कि पत्नी अपनी इच्छा से किसी अन्य पुरुष के संपर्क में थी और उसी कारण वैवाहिक संबंध टूटे।

इन साक्ष्यों के आधार पर पति ने यह भी तर्क दिया कि भारतीय कानून के अनुसार यदि पत्नी व्यभिचारपूर्ण जीवन जी रही है तो उसे भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।

डिजिटल साक्ष्य पर उठे गंभीर सवाल

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल साक्ष्य रहा। पत्नी की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि पति द्वारा प्रस्तुत ऑडियो रिकॉर्डिंग और उसकी लिखित प्रतिलिपि वास्तविक नहीं है। महिला ने आरोप लगाया कि आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की सहायता से उसकी आवाज की नकली रिकॉर्डिंग तैयार की गई है।

यह तर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि आज के समय में एआई आधारित तकनीक से किसी की आवाज जैसी सुनाई देने वाली रिकॉर्डिंग तैयार करना संभव हो चुका है। इसलिए अदालत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि प्रस्तुत डिजिटल साक्ष्य वास्तविक हैं या उनके साथ छेड़छाड़ की गई है।

अदालत ने कराया वैज्ञानिक परीक्षण

महिला के आरोपों को देखते हुए अदालत ने केवल रिकॉर्डिंग पर भरोसा करने के बजाय उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच पर भी ध्यान दिया। अदालत ने रिकॉर्ड, दस्तावेज, गवाहों और अन्य परिस्थितियों का भी मूल्यांकन किया।

न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि किसी व्यक्ति को केवल आरोपों या अप्रमाणित डिजिटल सामग्री के आधार पर दोषी न ठहराया जाए। डिजिटल युग में यह सावधानी न्यायिक प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

मामला अंततः छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचा, जहां एकलपीठ ने निचली अदालत के रिकॉर्ड, साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तार से अध्ययन किया।

अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य पत्नी के विवाहेतर संबंधों की ओर संकेत करते हैं और निचली अदालत द्वारा निकाला गया निष्कर्ष गलत नहीं है। इसके बाद हाई कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पत्नी “living in adultery” की स्थिति में है और यह तथ्य विश्वसनीय साक्ष्यों से सिद्ध हो जाता है, तो कानून के अनुसार वह पति से भरण-पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं रहती।

कानून क्या कहता है?

भारतीय कानून में भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर जीवनसाथी को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है। लेकिन इसके साथ कुछ कानूनी शर्तें भी जुड़ी हुई हैं।

दंड प्रक्रिया संहिता की पुरानी धारा 125 (जिसके समकक्ष प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में हैं) में स्पष्ट किया गया था कि यदि पत्नी व्यभिचारपूर्ण जीवन जी रही हो तो वह भरण-पोषण पाने की पात्र नहीं होगी।

इसी प्रकार हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत भी स्थायी भरण-पोषण से जुड़े मामलों में अदालत पक्षकारों के आचरण सहित सभी परिस्थितियों पर विचार कर सकती है।

क्या केवल आरोप लगाने से भरण-पोषण बंद हो जाएगा?

बिल्कुल नहीं।

भारतीय न्यायालय केवल आरोपों के आधार पर किसी पत्नी का भरण-पोषण समाप्त नहीं करते। पति को अदालत के समक्ष ऐसे विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं जिनसे यह सिद्ध हो सके कि पत्नी वास्तव में विवाहेतर संबंध में रह रही है।

यदि आरोप सिद्ध नहीं होते तो पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार केवल संदेह के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

“Living in adultery” का अर्थ

कानून में “Living in adultery” का अर्थ केवल एक बार किसी व्यक्ति से संबंध होने का आरोप नहीं है। सामान्यतः इसका आशय लगातार या स्थायी रूप से विवाहेतर संबंध में रहने से लगाया जाता है।

हर मामले में अदालत परिस्थितियों, साक्ष्यों और तथ्यों का अलग-अलग मूल्यांकन करती है। इसलिए किसी एक फैसले को हर मामले पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

डिजिटल साक्ष्य का बढ़ता महत्व

आज अधिकांश पारिवारिक विवादों में मोबाइल फोन, चैट, ई-मेल, सोशल मीडिया संदेश, कॉल रिकॉर्ड और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण साक्ष्य बन चुके हैं।

लेकिन साथ ही डीपफेक और एआई तकनीक के कारण इनकी सत्यता की जांच भी पहले से अधिक आवश्यक हो गई है। अदालतें अब ऐसे साक्ष्यों को बिना जांच स्वीकार नहीं करतीं बल्कि उनकी प्रामाणिकता का परीक्षण भी कराती हैं।

पति और पत्नी दोनों के अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण

भारतीय कानून केवल पत्नी के अधिकारों की ही रक्षा नहीं करता बल्कि पति के अधिकारों की भी सुरक्षा करता है।

यदि पत्नी वास्तव में प्रताड़ित हो रही है तो उसे कानून सुरक्षा और भरण-पोषण का अधिकार देता है। वहीं यदि पति यह सिद्ध कर देता है कि पत्नी कानून में वर्णित अपवादों के अंतर्गत आती है, तो अदालत उसके पक्ष में भी निर्णय दे सकती है।

इस प्रकार न्यायालय का उद्देश्य किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं बल्कि न्याय करना होता है।

इस फैसले का व्यापक प्रभाव

इस निर्णय के बाद यह संदेश गया है कि वैवाहिक विवादों में अदालत केवल भावनात्मक आरोपों के आधार पर निर्णय नहीं देती। प्रत्येक पक्ष को अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं।

साथ ही यह फैसला डिजिटल साक्ष्यों की जांच, एआई आधारित फर्जी रिकॉर्डिंग की आशंका और वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय पारिवारिक कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को दोहराता है कि भरण-पोषण का अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। यदि कानून में निर्धारित अपवाद सिद्ध हो जाते हैं, तो अदालत भरण-पोषण देने से इनकार कर सकती है। हालांकि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करता है और किसी एक निर्णय को सभी मामलों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि केवल विवाहेतर संबंध का आरोप पर्याप्त नहीं होता। अदालत तभी ऐसा निष्कर्ष निकालती है जब उपलब्ध साक्ष्य विश्वसनीय, कानूनी रूप से स्वीकार्य और पर्याप्त हों। इसलिए ऐसे मामलों में न्यायालय का अंतिम निर्णय ही कानूनी रूप से निर्णायक माना जाता है।

इस निर्णय ने एक ओर कानून में निहित संतुलन को स्पष्ट किया है, वहीं दूसरी ओर यह भी संदेश दिया है कि वैवाहिक विवादों में सत्य, प्रमाण और न्यायिक प्रक्रिया ही अंतिम आधार हैं। किसी भी पक्ष को केवल आरोपों या भावनाओं के आधार पर न तो दोषी माना जा सकता है और न ही कानूनी अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।