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भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्ष को झटका और राहत दोनों,

भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्ष को झटका और राहत दोनों, नमाज पर अंतरिम व्यवस्था, मंदिर घोषित करने के हाईकोर्ट के फैसले पर रोक से इनकार

       मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े बहुचर्चित और दशकों पुराने विवाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिसमें भोजशाला परिसर को मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार दिया गया था और शुक्रवार की नमाज की पूर्व व्यवस्था समाप्त कर दी गई थी।

हालांकि, अदालत ने मुस्लिम पक्ष की धार्मिक भावनाओं को भी ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अंतिम निर्णय होने तक प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच भोजशाला परिसर के निकट किसी खुली जगह पर नमाज अदा करने की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को भी स्पष्ट निर्देश दिया कि न्यायालय की अनुमति के बिना विवादित परिसर में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए एक वैकल्पिक व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। इस प्रकार अदालत ने दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई सुनवाई?

14 जुलाई को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्णय को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई की।

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने अदालत के समक्ष यह दलील दी कि हाई कोर्ट के फैसले से पहले वर्षों से प्रत्येक शुक्रवार को भोजशाला परिसर में जुमे की नमाज अदा की जाती रही है। इसलिए अंतिम निर्णय होने तक पूर्व की व्यवस्था बहाल की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपरा को अचानक समाप्त कर देना उचित नहीं है और इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की इस मांग को स्वीकार नहीं किया कि हाई कोर्ट के निर्णय पर तत्काल रोक लगाई जाए या पहले जैसी स्थिति (Status Quo Ante) बहाल कर दी जाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस चरण पर ऐसा कोई अंतरिम आदेश पारित करना उचित नहीं होगा जिससे हाई कोर्ट के निर्णय का प्रभाव समाप्त हो जाए।

हालांकि न्यायालय ने यह भी माना कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द दोनों महत्वपूर्ण हैं। इसलिए अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए भोजशाला परिसर के समीप किसी खुली जगह पर नमाज अदा करने की अस्थायी व्यवस्था की जाए।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यह केवल अंतरिम व्यवस्था है और इससे किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकार या दावे प्रभावित नहीं होंगे।

नमाज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि यह व्यवस्था अंतिम निर्णय आने तक ही लागू रहेगी और इसे किसी भी पक्ष के अधिकारों की स्वीकृति या अस्वीकृति नहीं माना जाएगा।

इस निर्देश का उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करना है।

ASI को मिला महत्वपूर्ण निर्देश

सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने आशंका व्यक्त की कि विवादित परिसर में कोई निर्माण अथवा संरचनात्मक परिवर्तन किया जा सकता है, जिससे विवाद की प्रकृति बदल सकती है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को स्पष्ट निर्देश दिया कि न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विवादित स्थल की वर्तमान स्थिति सुरक्षित रहेगी और अंतिम निर्णय आने तक किसी भी प्रकार का स्थायी बदलाव नहीं किया जा सकेगा।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?

15 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद भोजशाला परिसर को मंदिर मानते हुए महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था।

हाई कोर्ट ने कहा था कि—

– हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा करने का अधिकार प्राप्त है।
– ASI ही इस स्मारक का संरक्षण करेगा।
– वर्ष 2003 में ASI द्वारा जारी वह आदेश निरस्त किया जाता है जिसके अंतर्गत मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार नमाज की अनुमति दी गई थी।
– यदि मुस्लिम समुदाय धार जिले में नई मस्जिद के लिए भूमि आवंटन का आवेदन करता है तो मध्य प्रदेश सरकार उस पर विचार करे।

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक साक्ष्यों और विभिन्न अभिलेखों का उल्लेख करते हुए कहा था कि भोजशाला मूलतः देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर रही है।

भोजशाला क्या है?

धार जिले में स्थित भोजशाला भारत के सबसे चर्चित ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों में से एक है।

इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण परमार वंश के महान शासक राजा भोज के समय हुआ था। राजा भोज कला, साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।

हिंदू मान्यता के अनुसार यह देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर है, जहां विद्या और ज्ञान की देवी की पूजा होती थी।

वहीं मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह 11वीं सदी की कमाल मौला मस्जिद है और सदियों से यहां नमाज अदा की जाती रही है।

इसी कारण यह स्थल लंबे समय से धार्मिक और कानूनी विवाद का केंद्र बना हुआ है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

भोजशाला को लेकर विवाद नया नहीं है।

ब्रिटिश काल से ही इस स्थान के धार्मिक स्वरूप को लेकर मतभेद रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भी दोनों समुदाय अपने-अपने अधिकारों का दावा करते रहे।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनाई गईं।

2003 में ASI ने एक व्यवस्था लागू की जिसके अनुसार—

– हिंदू समुदाय को प्रतिदिन पूजा की अनुमति थी।
– मुस्लिम समुदाय को केवल शुक्रवार को दोपहर के समय नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई।

यह व्यवस्था लगभग दो दशकों तक लागू रही।

लेकिन बाद में इस व्यवस्था को विभिन्न पक्षों ने अदालत में चुनौती दी।

ASI सर्वे का महत्व

भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए सर्वेक्षण की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सर्वे के दौरान परिसर में अनेक ऐसे अवशेष मिलने का दावा किया गया जिन्हें हिंदू मंदिर स्थापत्य से जोड़कर देखा गया।

रिपोर्ट में स्तंभों, शिलालेखों, मूर्तिकला, नक्काशी और वास्तुशिल्प के अनेक तत्वों का उल्लेख किया गया।

हालांकि मुस्लिम पक्ष ने ASI की रिपोर्ट पर कई प्रश्न उठाए और उसकी निष्पक्षता पर भी आपत्ति दर्ज कराई।

यही कारण है कि यह रिपोर्ट भी न्यायिक विवाद का प्रमुख हिस्सा बनी हुई है।

दोनों पक्षों की प्रमुख दलीलें

हिंदू पक्ष

हिंदू पक्ष का कहना है—

– भोजशाला मूल रूप से देवी सरस्वती का मंदिर है।
– यहां सदियों से हिंदू धार्मिक परंपराएं जुड़ी रही हैं।
– ASI के सर्वे और ऐतिहासिक साक्ष्य मंदिर होने की पुष्टि करते हैं।
– इसलिए हिंदुओं को निर्बाध पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।

मुस्लिम पक्ष

मुस्लिम पक्ष का कहना है—

– यह कमाल मौला मस्जिद है।
– वर्षों से यहां जुमे की नमाज होती रही है।
– 2003 की व्यवस्था संतुलित थी।
– उसे समाप्त करना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

संवैधानिक पहलू

यह विवाद केवल संपत्ति या धार्मिक स्थल का नहीं बल्कि संविधान के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों से जुड़ा हुआ है।

इनमें प्रमुख हैं—

– अनुच्छेद 25 — धर्म की स्वतंत्रता।
– अनुच्छेद 26 — धार्मिक संस्थाओं के अधिकार।
– अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार।
– अनुच्छेद 21 — गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार।

सुप्रीम कोर्ट को अंतिम निर्णय में इन सभी संवैधानिक अधिकारों तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।

Places of Worship Act का प्रश्न

भोजशाला विवाद में समय-समय पर Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 का भी उल्लेख किया जाता है।

हालांकि इस कानून की व्याख्या और भोजशाला पर इसकी लागू होने की सीमा भी न्यायिक बहस का विषय रही है।

अंतिम सुनवाई में इस पहलू पर भी विस्तार से विचार किए जाने की संभावना है।

सामाजिक और प्रशासनिक महत्व

भोजशाला विवाद केवल कानूनी मामला नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है।

हर वर्ष वसंत पंचमी और शुक्रवार के अवसर पर यहां सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए जाते हैं।

राज्य प्रशासन अतिरिक्त पुलिस बल, बैरिकेडिंग और निगरानी की व्यवस्था करता है ताकि किसी प्रकार की अप्रिय घटना न हो।

सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश भी सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है।

मामले की अगली सुनवाई लगभग तीन सप्ताह बाद होगी।

उस दौरान—

– सभी पक्ष अपने विस्तृत जवाब दाखिल करेंगे।
– हाई कोर्ट के निर्णय की वैधता पर बहस होगी।
– ऐतिहासिक, पुरातात्विक और कानूनी साक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा होगी।
– इसके बाद सुप्रीम कोर्ट अंतरिम व्यवस्था जारी रख सकता है या उसमें बदलाव कर सकता है।

अंतिम निर्णय आने तक हाई कोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा।

निष्कर्ष

भोजशाला विवाद भारत के सबसे पुराने और संवेदनशील धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों में से एक है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा अंतरिम आदेश से स्पष्ट है कि न्यायालय फिलहाल हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है। मुस्लिम पक्ष को भोजशाला परिसर के भीतर नमाज की अनुमति नहीं मिली, जो उनके लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, अदालत ने वैकल्पिक स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने का निर्देश देकर धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है।

इसके साथ ही ASI को बिना न्यायालय की अनुमति किसी भी प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन न करने का निर्देश देकर अदालत ने विवादित स्थल की वर्तमान स्थिति सुरक्षित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

अब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर रहेगी, जहां इस ऐतिहासिक, धार्मिक और संवैधानिक महत्व के मामले में आगे की कानूनी दिशा तय होगी।