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तलाक दिए बिना दूसरे के साथ पत्नी की तरह रहने वाली महिला को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता

तलाक दिए बिना दूसरे के साथ पत्नी की तरह रहने वाली महिला को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता, लेकिन संतान का अधिकार सुरक्षित: इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला

      भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार भारतीय पारिवारिक कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को संरक्षण देना है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 में समाहित किया गया है, इसी सामाजिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाई गई है। हालांकि, इस अधिकार का लाभ केवल उन्हीं व्यक्तियों को मिल सकता है जो कानून द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करते हों।

इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने पहले पति से विधिवत तलाक लिए बिना दूसरे व्यक्ति के साथ पत्नी के रूप में रहने लगती है, तो वह धारा 125 CrPC के तहत ‘पत्नी’ की कानूनी परिभाषा में नहीं आती और दूसरे व्यक्ति से भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे संबंध से जन्मी संतान का भरण-पोषण पाने का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।

यह फैसला विवाह, भरण-पोषण, वैध विवाह की अनिवार्यता तथा बच्चों के अधिकारों से जुड़े कानूनों की व्याख्या के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


क्या था पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद का है। याचिकाकर्ता संतोष कुमार ने फैमिली कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें उन्हें कथित पत्नी रन्नो देवी को प्रतिमाह 2,000 रुपये तथा उनकी नाबालिग बेटी शिवानी को 1,000 रुपये भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

फैमिली कोर्ट ने 14 अगस्त 2025 को यह आदेश पारित किया था।


महिला का दावा क्या था?

रन्नो देवी ने अपने आवेदन में कहा कि—

  • उसकी शादी 10 जून 2006 को हिंदू रीति-रिवाजों से संतोष कुमार के साथ हुई थी।
  • विवाह के समर्थन में नोटरीकृत समझौता भी प्रस्तुत किया गया।
  • विवाह के बाद दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे।
  • उनके संबंध से एक बेटी शिवानी का जन्म हुआ।
  • कुछ वर्षों बाद पति का व्यवहार बदल गया।
  • उसने भोजन देना बंद कर दिया तथा मानसिक एवं आर्थिक प्रताड़ना शुरू कर दी।
  • पुलिस में शिकायत के बाद समझौता हुआ, लेकिन बाद में पति ने साथ रखने से इनकार कर दिया।
  • संतोष राजमिस्त्री का कार्य करता है और लगभग 18 से 20 हजार रुपये मासिक कमाता है।

इसी आधार पर रन्नो ने अपने लिए 3,000 रुपये तथा बेटी के लिए 4,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी।


पति की ओर से क्या दलील दी गई?

संतोष कुमार की ओर से अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट में कहा कि—

  • रन्नो देवी की पहली शादी शारदा प्रसाद नामक व्यक्ति से हुई थी।
  • उस विवाह से दो बच्चे भी हैं।
  • पहले पति से कभी तलाक नहीं हुआ।
  • पहला पति जीवित रहते ही रन्नो संतोष के साथ रहने लगी।
  • इसलिए दूसरा विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार वैध नहीं माना जा सकता।
  • जब विवाह ही वैध नहीं है तो महिला धारा 125 CrPC के तहत पत्नी नहीं मानी जा सकती।

रिकॉर्ड में क्या सामने आया?

हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन किया तो पाया कि—

  • स्वयं रन्नो देवी ने ट्रायल कोर्ट में स्वीकार किया था कि जब वह संतोष के साथ रहने लगी थी, तब उसका पहला पति जीवित था।
  • पहले पति की मृत्यु बाद में हुई।
  • उसने पहले पति से कभी विधिक रूप से तलाक नहीं लिया।

यही तथ्य पूरे मामले का निर्णायक आधार बना।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति अचल सचदेव की एकलपीठ ने कहा कि—

यदि किसी महिला का पहला विवाह विधिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है और वह दूसरे व्यक्ति के साथ रहने लगती है, तो वह दूसरे व्यक्ति की वैध पत्नी नहीं मानी जाएगी।

ऐसी स्थिति में—

  • धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
  • क्योंकि यह धारा केवल विधिवत पत्नी या कानून द्वारा मान्यता प्राप्त संबंधों पर लागू होती है।

इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा महिला को दिया गया भरण-पोषण आदेश कानून की दृष्टि से सही नहीं था।


बेटी के अधिकार पर अदालत का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण

हालांकि अदालत ने बेटी के संबंध में बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपनाया।

फैमिली कोर्ट के समक्ष डीएनए परीक्षण कराया गया था।

डीएनए रिपोर्ट से यह सिद्ध हो गया कि—

  • संतोष कुमार ही बच्ची के जैविक पिता हैं।
  • रन्नो देवी उसकी जैविक माता हैं।

इस आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि—

संतान का अधिकार माता-पिता के वैवाहिक संबंध की वैधता पर निर्भर नहीं करता।

यदि पिता जैविक रूप से सिद्ध हो चुका है तो वह अपनी संतान के भरण-पोषण से बच नहीं सकता।


धारा 125 CrPC का उद्देश्य क्या है?

धारा 125 का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं बल्कि—

  • भूखमरी रोकना,
  • परित्यक्त महिलाओं की सहायता करना,
  • बच्चों का संरक्षण करना,
  • वृद्ध माता-पिता को आर्थिक सुरक्षा देना है।

यह एक सामाजिक कल्याण संबंधी प्रावधान है।

लेकिन इसका लाभ प्राप्त करने के लिए महिला का “पत्नी” होना आवश्यक है।


पत्नी की कानूनी परिभाषा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय न्यायालयों ने अनेक बार कहा है कि—

केवल साथ रहने भर से प्रत्येक महिला धारा 125 के अंतर्गत पत्नी नहीं बन जाती।

यदि—

  • विवाह विधिसम्मत है,
  • विवाह शून्य (Void) नहीं है,
  • पहले विवाह का विधिक अंत हो चुका है,

तभी सामान्यतः भरण-पोषण का अधिकार उत्पन्न होता है।


हिंदू विवाह अधिनियम का प्रभाव

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार—

यदि विवाह के समय पति या पत्नी का पूर्व विवाह जीवित है, तो दूसरा विवाह वैध नहीं माना जाएगा।

ऐसा विवाह धारा 11 के अंतर्गत शून्य (Void Marriage) होता है।

इसी कारण दूसरे विवाह के आधार पर पत्नी का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं होता।


क्या लिव-इन रिलेशन में हमेशा भरण-पोषण नहीं मिलता?

नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि—

यदि पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं और समाज भी उन्हें पति-पत्नी मानता है, तो कुछ परिस्थितियों में महिला को संरक्षण मिल सकता है।

लेकिन यदि यह स्पष्ट हो कि—

  • महिला पहले से विवाहित थी,
  • पहला विवाह समाप्त नहीं हुआ,
  • दूसरा संबंध कानूनन शून्य है,

तो स्थिति अलग हो जाती है।

यही अंतर इस मामले में भी सामने आया।


संतान के अधिकार क्यों सुरक्षित रखे गए?

भारतीय कानून बच्चों के अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।

न्यायालय ने कहा कि—

बच्चे को अपने माता-पिता की वैवाहिक स्थिति के कारण दंडित नहीं किया जा सकता।

यदि पिता सिद्ध हो चुका है तो—

  • शिक्षा,
  • भोजन,
  • स्वास्थ्य,
  • पालन-पोषण

की जिम्मेदारी उसी की होगी।

यही कारण है कि बेटी के पक्ष में फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा गया।


क्या यह फैसला सभी मामलों पर लागू होगा?

यह निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

यदि—

  • पहला विवाह समाप्त हो चुका हो,
  • तलाक हो चुका हो,
  • पति की मृत्यु पहले ही हो चुकी हो,

तो दूसरा विवाह वैध हो सकता है।

लेकिन यदि पहला विवाह जीवित रहते दूसरा विवाह किया गया हो, तो सामान्यतः पत्नी का दावा स्वीकार नहीं होगा।


BNSS के लागू होने के बाद क्या स्थिति बदली है?

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 को अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में स्थानांतरित किया गया है।

हालांकि भरण-पोषण का मूल सिद्धांत लगभग समान रखा गया है।

इसलिए यह निर्णय भविष्य में BNSS के अंतर्गत आने वाले मामलों में भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।


फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है—

  1. वैध विवाह के बिना पत्नी का दर्जा प्राप्त नहीं होगा।
  2. पहला विवाह समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह कानूनी मान्यता नहीं पाएगा।
  3. केवल साथ रहने से प्रत्येक स्थिति में भरण-पोषण का अधिकार नहीं बनता।
  4. बच्चों के अधिकार सर्वोपरि रहेंगे।
  5. जैविक पिता अपनी संतान के पालन-पोषण से बच नहीं सकता।

समाज पर इस निर्णय का प्रभाव

यह फैसला दो महत्वपूर्ण संदेश देता है।

पहला, विवाह संबंधों में कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। यदि पहला विवाह समाप्त नहीं हुआ है तो दूसरा वैवाहिक संबंध भविष्य में गंभीर कानूनी विवाद उत्पन्न कर सकता है।

दूसरा, बच्चों के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। माता-पिता के वैवाहिक विवाद का प्रभाव बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार पर नहीं पड़ना चाहिए।


निष्कर्ष

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून की मूल भावना को स्पष्ट करता है। अदालत ने एक ओर यह कहा कि पहले पति से विधिवत तलाक लिए बिना दूसरे व्यक्ति के साथ पत्नी की तरह रहने वाली महिला धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित किया कि ऐसे संबंध से जन्मी संतान अपने पिता से भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित नहीं होगी।

यह फैसला विवाह की वैधता, भरण-पोषण के अधिकार और बच्चों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि पारिवारिक संबंधों में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन अत्यंत आवश्यक है, जबकि बच्चों के अधिकारों की रक्षा हर परिस्थिति में सर्वोपरि रहेगी। :::