ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना को हाई कोर्ट से बड़ी राहत: पेड़ों की कटाई पर अवमानना याचिका खारिज, विकास और पर्यावरण के संतुलन पर अदालत की अहम टिप्पणी
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना से जुड़े बहुचर्चित मामले में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को बड़ी राहत देते हुए पर्यावरणविदों की ओर से दायर अवमानना याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परियोजना के तहत की जा रही पेड़ों की कटाई किसी भी न्यायिक आदेश का उल्लंघन नहीं है और वर्तमान समय में इस परियोजना पर कोई अंतरिम रोक प्रभावी नहीं है।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि एनएचएआई ने न्यायालय के किसी आदेश की अवहेलना की है। इसलिए अवमानना की कार्यवाही का कोई आधार नहीं बनता। अदालत के इस फैसले के बाद लंबे समय से कानूनी विवादों में घिरी ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता लगभग पूरी तरह साफ हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना उत्तराखंड की महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं में शामिल है। यह मार्ग चारधाम यात्रा, देहरादून, ऋषिकेश और आसपास के क्षेत्रों के बीच यातायात को अधिक सुगम बनाने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है। लंबे समय से इस मार्ग पर बढ़ते ट्रैफिक, जाम और सड़क दुर्घटनाओं की समस्या को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण आवश्यक माना गया।
हालांकि परियोजना का एक हिस्सा ऐसे वन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसे हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। इसी कारण परियोजना शुरू होने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई सामाजिक संगठनों और पर्यावरणविदों ने चिंता व्यक्त की थी।
अवमानना याचिका में क्या लगाए गए थे आरोप?
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े याचिकाकर्ताओं का कहना था कि परियोजना के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है, जबकि पहले न्यायालय ने इस विषय पर अंतरिम आदेश दिए थे। उनका आरोप था कि एनएचएआई ने न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी करते हुए पेड़ों की कटाई शुरू कर दी, जो अदालत की अवमानना के दायरे में आता है।
इसी आधार पर हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर परियोजना पर कार्रवाई रोकने और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूरे मामले का रिकॉर्ड देखा। अदालत ने पाया कि पहले दायर जनहित याचिका का निस्तारण पहले ही किया जा चुका है और उस समय परियोजना पर कोई स्थायी रोक नहीं लगाई गई थी।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में पेड़ों की कटाई पर जो अंतरिम रोक लगाई गई थी, उसकी अवधि बाद में आगे नहीं बढ़ाई गई। इसलिए वह आदेश स्वतः समाप्त हो गया था।
अदालत ने कहा कि जब कोई प्रभावी अंतरिम आदेश मौजूद ही नहीं था, तब उसके उल्लंघन का प्रश्न भी नहीं उठता। ऐसे में एनएचएआई के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही नहीं की जा सकती।
पहले भी हो चुकी थी सुनवाई
इस विवाद से जुड़ी जनहित याचिका पर नौ जनवरी 2026 को हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था। उस समय अदालत ने कहा था कि हाथी कॉरिडोर से जुड़ा मूल विवाद पहले ही उच्चतम न्यायालय द्वारा तय किया जा चुका है।
इसके बाद मार्च 2026 में स्पष्टीकरण याचिका दाखिल की गई, जिसमें यह जानने का प्रयास किया गया कि क्या पेड़ों की कटाई पर पहले लगाए गए प्रतिबंध अब भी लागू हैं। उस समय भी हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि अंतरिम आदेश की अवधि आगे नहीं बढ़ाई गई थी। इसलिए परियोजना पर कोई प्रभावी न्यायिक रोक नहीं थी।
अब अवमानना याचिका पर आए फैसले ने भी उसी कानूनी स्थिति की पुष्टि कर दी है।
4,639 पेड़ों को हटाने की योजना
इस परियोजना के लिए कुल 4,639 पेड़ों को हटाने के लिए चिह्नित किया गया है। इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों के हटने को लेकर पर्यावरणविदों ने लगातार चिंता जताई है।
हालांकि एनएचएआई का कहना है कि सभी पेड़ों को काटा नहीं जाएगा। प्राधिकरण ने अदालत को बताया कि लगभग 754 पेड़ों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित स्थानों पर प्रत्यारोपित किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि उचित तकनीक अपनाई जाए तो कई बड़े पेड़ों को भी जड़ों सहित दूसरी जगह स्थानांतरित कर सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे पर्यावरणीय नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था
परियोजना का सबसे संवेदनशील पहलू हाथी कॉरिडोर है। यह क्षेत्र हाथियों सहित अनेक वन्यजीवों की आवाजाही का प्राकृतिक मार्ग माना जाता है।
एनएचएआई ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। इसके लिए कई विशेष उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
परियोजना के तहत हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए एलीफेंट अंडरपास बनाए जाएंगे, ताकि उन्हें सड़क पार करने में किसी प्रकार का खतरा न हो। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक हरी झाड़ियों की सुरक्षा पट्टी विकसित की जाएगी, जिससे वन्यजीव सीधे सड़क पर न पहुंच सकें।
सड़क पर विशेष वन्यजीव चेतावनी संकेतक भी लगाए जाएंगे, ताकि वाहन चालक संवेदनशील क्षेत्र में सावधानी से वाहन चला सकें।
विशेषज्ञ संस्थानों की सलाह से तैयार हुई योजना
एनएचएआई ने न्यायालय को बताया कि परियोजना की पर्यावरणीय योजना किसी एक विभाग ने तैयार नहीं की है। इसके लिए वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया और भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों की सलाह ली गई है।
इन संस्थानों ने वन्यजीव संरक्षण, हाथियों के प्राकृतिक मार्ग, पर्यावरणीय प्रभाव और सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विस्तृत सुझाव दिए हैं। इन्हीं सुझावों के आधार पर सुरक्षा उपायों का प्रारूप तैयार किया गया।
प्राधिकरण ने यह भी बताया कि परियोजना के लिए आवश्यक सभी वैधानिक और पर्यावरणीय अनुमतियां पहले ही प्राप्त की जा चुकी हैं।
विकास बनाम पर्यावरण की बहस
यह मामला केवल एक सड़क परियोजना तक सीमित नहीं रहा। इसने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर व्यापक बहस भी छेड़ी।
एक पक्ष का तर्क है कि तेजी से बढ़ते यातायात और सड़क दुर्घटनाओं को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण जरूरी है। इससे चारधाम यात्रा, पर्यटन, व्यापार और स्थानीय लोगों को सीधा लाभ मिलेगा।
दूसरी ओर पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वन क्षेत्र में निर्माण कार्य का असर जैव विविधता तथा वन्यजीवों पर पड़ सकता है। उनका मानना है कि विकास कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण के उपायों का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
परियोजना के पूरे होने से क्या होंगे लाभ?
विशेषज्ञों का मानना है कि फोरलेन सड़क बनने के बाद ऋषिकेश और देहरादून के बीच यात्रा का समय कम होगा। सड़क पर जाम की समस्या घटेगी और भारी वाहनों का आवागमन अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।
चारधाम यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालुओं को भी बेहतर सड़क सुविधा मिलेगी। इसके अलावा पर्यटन उद्योग, स्थानीय व्यापार और आपातकालीन सेवाओं को भी लाभ मिलने की संभावना है।
कानूनी बाधा हुई समाप्त
अवमानना याचिका खारिज होने के बाद परियोजना के सामने मौजूद प्रमुख कानूनी अड़चन समाप्त हो गई है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि पर्यावरणीय शर्तों का पालन आवश्यक नहीं रहेगा।
एनएचएआई को अब भी उन सभी शर्तों का पालन करना होगा, जिनके आधार पर परियोजना को अनुमति दी गई है। यदि भविष्य में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोप सामने आते हैं तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
आगे की राह
अब उम्मीद की जा रही है कि परियोजना का निर्माण कार्य और तेजी से आगे बढ़ेगा। साथ ही वन विभाग और अन्य विशेषज्ञ संस्थान समय-समय पर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की निगरानी भी करेंगे।
स्थानीय लोगों की भी अपेक्षा है कि सड़क निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों और पर्यावरणीय शर्तों का पूरी तरह पालन किया जाए, ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
निष्कर्ष
उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह फैसला ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि एनएचएआई ने किसी न्यायिक आदेश की अवमानना नहीं की और परियोजना पर वर्तमान में कोई प्रभावी रोक नहीं है। इसके साथ ही अदालत के निर्णय ने यह भी संकेत दिया कि विकास परियोजनाओं को कानूनी रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है, बशर्ते वे निर्धारित पर्यावरणीय नियमों और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करें।
अब सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि परियोजना के निर्माण के दौरान पेड़ों के प्रत्यारोपण, हाथी कॉरिडोर की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वादों को किस प्रकार जमीन पर लागू किया जाता है। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन सफलतापूर्वक स्थापित किया जाता है, तो यह परियोजना भविष्य की आधारभूत संरचना योजनाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।