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मेरठ में ललिता गौतम हत्याकांड: प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और एसएसपी के थप्पड़ विवाद से गरमाई सियासत,

मेरठ में ललिता गौतम हत्याकांड: प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और एसएसपी के थप्पड़ विवाद से गरमाई सियासत, चंद्रशेखर ने सरकार को दिया 10 दिन का अल्टीमेटम

        उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में अनुसूचित जाति की छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यशैली, दलित अधिकारों और राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन गया है। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) पर प्रदर्शनकारियों को थप्पड़ मारने के आरोपों ने पूरे प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है।

घटना के बाद विभिन्न राजनीतिक दल सक्रिय हो गए हैं। आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर सरकार और प्रशासन को दस दिन का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं तो 20 जुलाई को लखनऊ में बड़ा आंदोलन किया जाएगा और संसद के मानसून सत्र में भी यह मामला उठाया जाएगा।

क्या है पूरा मामला?

मेरठ के रोहटा थाना क्षेत्र के थिरोठ गांव की रहने वाली अनुसूचित जाति की छात्रा ललिता गौतम का 15 मई को कथित रूप से अपहरण कर लिया गया था। परिवार का आरोप है कि गांव के रहने वाले अंकुश जाट ने उसका अपहरण कर हत्या कर दी। दो दिन बाद, 17 मई को ललिता का शव उकसिया गांव के जंगल से बरामद हुआ।

इस सनसनीखेज वारदात के बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी अंकुश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जांच के दौरान पुलिस ने साक्ष्य छिपाने के आरोप में अंकुश के भाई अंकित तथा खेत के मालिक को भी आरोपी बनाया। बाद में दोनों आरोपियों को अदालत से जमानत मिल गई। इनमें से अंकित पीएसी का जवान बताया जा रहा है।

पीड़ित परिवार का आरोप है कि मुख्य आरोपी के भाई के सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं की गई। इसी मांग को लेकर परिवार और समाज के लोग लगातार प्रदर्शन कर रहे थे।

कलेक्ट्रेट प्रदर्शन के दौरान हुआ विवाद

पीड़ित परिवार और उनके समर्थकों ने कलेक्ट्रेट पर धरना-प्रदर्शन करते हुए पीएसी जवान अंकित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज किया।

इसी दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एसएसपी अविनाश पांडेय प्रदर्शनकारियों को थप्पड़ मारते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह वीडियो तेजी से वायरल हुआ और देखते ही देखते राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।

एसएसपी के इस कथित व्यवहार पर कई सवाल उठाए गए। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ पुलिस ने अनुचित बल प्रयोग किया।

चंद्रशेखर आज़ाद की एंट्री से तेज हुई राजनीति

घटना के बाद आज़ाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद मेरठ पहुंचे। हालांकि पुलिस ने उन्हें और पूर्व डीजीपी प्रेम प्रकाश को सिवाया टोल पर रोक दिया। इसके बावजूद वहां पहले से मौजूद कार्यकर्ताओं ने धरना शुरू कर दिया।

बाद में प्रशासन ने पीड़ित परिवार को सिवाया टोल पर लाकर चंद्रशेखर से मुलाकात कराई। लगभग आधे घंटे तक चली बातचीत में उन्होंने परिवार की समस्याएं सुनीं और न्याय दिलाने का भरोसा दिया।

मुलाकात के बाद चंद्रशेखर ने प्रशासन और सरकार को दस दिन का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई नहीं हुई तो बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा।

“थप्पड़ संविधान में नहीं लिखा” – चंद्रशेखर

एसएसपी द्वारा प्रदर्शनकारियों को थप्पड़ मारने के वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि लोकतंत्र में पुलिस को कानून के अनुसार काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि पहले भी कई बार सड़क जाम हुए और मुकदमे दर्ज किए गए, लेकिन किसी अधिकारी ने लोगों को थप्पड़ नहीं मारे। उनका आरोप था कि इस बार अनुसूचित जाति के लोग प्रदर्शन कर रहे थे, इसलिए उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया।

उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और किसी भी अधिकारी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।

चंद्रशेखर की प्रमुख मांगें

पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद चंद्रशेखर आज़ाद ने सरकार के सामने कई मांगें रखीं। उन्होंने कहा कि—

  • 11 मई को परिवार द्वारा खतरे की सूचना दिए जाने के बावजूद कार्रवाई न करने वाले तत्कालीन थाना प्रभारी रोहटा के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
  • पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कराई जाए।
  • पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए।
  • आंदोलन के दौरान गिरफ्तार लोगों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप वापस लेकर उन्हें रिहा किया जाए।
  • संबंधित अधिकारियों को अपनी कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करना चाहिए।
  • यदि दस दिन में कार्रवाई नहीं हुई तो 20 जुलाई को लखनऊ में बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि संसद के मानसून सत्र में भी इस मामले को प्रमुखता से उठाया जाएगा।

कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को किया गया नजरबंद

घटना के बाद कांग्रेस ने भी पीड़ित परिवार से मिलने का निर्णय लिया। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय द्वारा 30 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल गठित किया गया था, जिसमें पूर्व विधायक, जिलाध्यक्ष, महानगर अध्यक्ष तथा अन्य वरिष्ठ नेता शामिल थे।

हालांकि पुलिस ने प्रतिनिधिमंडल को गांव जाने से पहले ही उनके घरों में नजरबंद कर दिया। कांग्रेस नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए।

कांग्रेस का कहना है कि विपक्षी नेताओं को पीड़ित परिवार से मिलने से रोकना सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

आम आदमी पार्टी भी हुई सक्रिय

आम आदमी पार्टी ने भी इस मामले में सक्रियता दिखाई। पार्टी के प्रदेश प्रभारी संजय सिंह ने 26 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल गठित किया, जिसे पीड़ित परिवार से मिलने के लिए भेजने की घोषणा की गई।

इससे स्पष्ट है कि यह मामला अब प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

एसएसपी के कथित थप्पड़ वाले वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई। एक वर्ग ने पुलिस की कार्रवाई को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे पुलिस की शक्ति का अनुचित प्रयोग करार दिया।

वीडियो पर हजारों लोगों ने प्रतिक्रिया दी और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी अपने-अपने विचार सार्वजनिक किए।

एसएसपी की टिप्पणी भी बनी चर्चा का विषय

सोशल मीडिया पर हो रही आलोचना के बीच एसएसपी अविनाश पांडेय की एक टिप्पणी भी चर्चा में आ गई। उन्होंने कहा कि जो लोग उनके समर्थन में हैं वे एक पेड़ लगाएं और जो विरोध कर रहे हैं वे दो पेड़ लगाएं।

इस टिप्पणी पर भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। चंद्रशेखर ने जवाब देते हुए कहा कि वे सौ पेड़ लगाने को तैयार हैं, लेकिन यदि इसी प्रकार जनता के साथ व्यवहार होता रहा तो उन पेड़ों की छांव में बैठने वाला कौन बचेगा।

यह बयान भी सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया।

दलित राजनीति के केंद्र में आया मामला

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अनुसूचित जाति की छात्रा की हत्या और उसके बाद हुए घटनाक्रम ने दलित राजनीति को नया मुद्दा दे दिया है। विपक्ष इस प्रकरण को कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जोड़कर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहा है।

दूसरी ओर सरकार और प्रशासन पर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने तथा पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देने का दबाव बढ़ गया है।

पुलिस प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

पुलिस के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर हत्या के मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच पूरी करनी है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियों के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है।

यदि वायरल वीडियो को लेकर विभागीय जांच होती है तो पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी जांच के दायरे में आ सकती है।

क्या सीबीआई जांच होगी?

चंद्रशेखर सहित कई संगठनों ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

सामान्यतः किसी मामले की सीबीआई जांच राज्य सरकार की अनुशंसा या न्यायालय के आदेश पर होती है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार का रुख महत्वपूर्ण रहेगा।

आने वाले दिनों पर सबकी नजर

चंद्रशेखर द्वारा दिए गए दस दिन के अल्टीमेटम के बाद अब सभी की निगाहें प्रशासन और राज्य सरकार की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता है तो 20 जुलाई को प्रस्तावित आंदोलन राजनीतिक रूप से बड़ा रूप ले सकता है।

संसद के मानसून सत्र में भी यह मामला उठने की संभावना जताई जा रही है, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है।

निष्कर्ष

मेरठ का ललिता गौतम हत्याकांड अब केवल एक हत्या की जांच तक सीमित नहीं है। यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली, दलित अधिकारों, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ गया है। प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, एसएसपी के कथित थप्पड़, विपक्षी नेताओं की सक्रियता और सीबीआई जांच की मांग ने इसे प्रदेश के सबसे चर्चित मामलों में शामिल कर दिया है।

अब देखना होगा कि प्रशासन पीड़ित परिवार की मांगों पर क्या निर्णय लेता है, वायरल वीडियो पर क्या कार्रवाई होती है और क्या सरकार इस पूरे विवाद को शांत करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाती है। आने वाले दिन इस प्रकरण की दिशा और प्रदेश की राजनीति, दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।