बेहद शर्मनाक! मेरठ की घटना, पुलिस की जवाबदेही और कानून के शासन की अनिवार्यता
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और अधिवक्ता दोनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा अपराधों की निष्पक्ष जांच करना है। वहीं अधिवक्ता न्यायपालिका और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य करते हैं तथा प्रत्येक नागरिक को न्याय दिलाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। जब इन दोनों संस्थाओं के बीच किसी प्रकार का विवाद सामने आता है, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र और जनता के विश्वास पर भी पड़ता है।
हाल के दिनों में मेरठ में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पाण्डेय के कथित व्यवहार से संबंधित एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो के सामने आने के बाद विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने घटना पर चिंता व्यक्त की है, वहीं दूसरी ओर यह मांग भी उठ रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यही उचित तरीका है कि किसी घटना का निर्णय अफवाहों, अधूरी जानकारी या भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि प्रमाणों और निष्पक्ष जांच के आधार पर किया जाए।
यदि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अपने अधिकारों की सीमा से बाहर जाकर किसी अधिवक्ता या सामान्य नागरिक के साथ दुर्व्यवहार, अभद्रता या मारपीट की गई है, तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का मामला नहीं बल्कि कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। कानून सभी के लिए समान है। चाहे कोई आम नागरिक हो, अधिवक्ता हो, सरकारी कर्मचारी हो या वरिष्ठ अधिकारी—सभी संविधान और कानून के अधीन हैं। किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ बिना कानूनी प्रक्रिया के अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, तो यह केवल उस व्यक्ति के अधिकारों का प्रश्न नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों की भी परीक्षा होती है।
पुलिस बल को विशेष अधिकार इसलिए दिए जाते हैं ताकि वह अपराधियों पर नियंत्रण रख सके, समाज में शांति बनाए रख सके और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। इन अधिकारों का उद्देश्य कभी भी शक्ति का प्रदर्शन करना या किसी को अपमानित करना नहीं होता। लोकतंत्र में शक्ति के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। यदि कहीं अधिकारों का दुरुपयोग होता है तो उसकी जांच और आवश्यक कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है।
इसी प्रकार अधिवक्ताओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि न्याय व्यवस्था के अधिकारी (Officer of the Court) भी माने जाते हैं। न्यायालयों में निष्पक्ष सुनवाई, विधिक सहायता तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की रक्षा में अधिवक्ताओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि किसी अधिवक्ता के साथ कथित रूप से अनुचित व्यवहार हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों की बात सुनना और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करना भी उतना ही जरूरी है।
सोशल मीडिया के इस दौर में किसी घटना का वीडियो कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। लेकिन कई बार वीडियो अधूरा होता है, उसका संदर्भ स्पष्ट नहीं होता या उसके पहले और बाद की परिस्थितियां सामने नहीं आ पातीं। इसलिए केवल वायरल वीडियो के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जा सकता। जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे वीडियो की सत्यता, घटनाक्रम, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण करें। निष्पक्ष जांच ही किसी भी विवाद का सबसे विश्वसनीय समाधान है।
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि किसी अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया, अनुचित बल प्रयोग किया या किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया, तो उसके विरुद्ध विधि के अनुसार विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि जांच में यह पाया जाता है कि वायरल दावे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थे या घटना का वास्तविक स्वरूप अलग था, तो वह भी स्पष्ट रूप से जनता के सामने लाया जाना चाहिए। न्याय का अर्थ केवल दोषियों को दंड देना नहीं बल्कि निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करना भी है।
पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध न्याय व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक हैं। दोनों ही संस्थाएं अंततः कानून के शासन को मजबूत करने के उद्देश्य से कार्य करती हैं। यदि इनके बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसका समाधान संवाद, कानूनी प्रक्रिया और संस्थागत मर्यादाओं के भीतर ही होना चाहिए। किसी भी प्रकार की हिंसा, अभद्रता या शक्ति प्रदर्शन लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि पुलिस को अपने अधिकारों का प्रयोग कानून के दायरे में रहकर करना चाहिए तथा किसी भी प्रकार की मनमानी स्वीकार्य नहीं है। न्यायालयों ने समय-समय पर यह भी कहा है कि पुलिस सुधार, पारदर्शिता, मानवाधिकारों का सम्मान तथा जवाबदेही लोकतांत्रिक शासन की मूल आवश्यकताएं हैं। इसी प्रकार अधिवक्ताओं से भी अपेक्षा की जाती है कि वे कानून की गरिमा बनाए रखें तथा अपने आचरण से न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को मजबूत करें।
ऐसी घटनाएं यह भी संकेत देती हैं कि पुलिस प्रशिक्षण में मानवाधिकार, संवैधानिक मूल्यों, संवाद कौशल तथा तनावपूर्ण परिस्थितियों के शांतिपूर्ण समाधान पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। आधुनिक पुलिसिंग केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं है बल्कि जनता का विश्वास जीतने पर भी आधारित है। जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा जब पुलिस निष्पक्ष, पारदर्शी और संवेदनशील व्यवहार करेगी।
इसी प्रकार बार एसोसिएशन, न्यायपालिका और प्रशासन के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था भी आवश्यक है ताकि छोटे-छोटे विवाद बड़े टकराव का रूप न लें। यदि किसी घटना को लेकर शिकायत है तो उसका समाधान विधिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए, न कि भावनात्मक प्रतिक्रियाओं या सार्वजनिक टकराव के माध्यम से।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संस्थाओं की मजबूती और नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। जब जनता को यह विश्वास होता है कि किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच होगी और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून उसके विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई करेगा, तभी संविधान की भावना मजबूत होती है। कानून का शासन केवल एक सिद्धांत नहीं बल्कि लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है।
मेरठ की इस कथित घटना के संदर्भ में भी यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच कराएं। यदि किसी भी स्तर पर कानून का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई हो। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो तथ्यों को भी पारदर्शी ढंग से सार्वजनिक किया जाए। इससे न केवल न्याय होगा बल्कि अफवाहों और भ्रम की स्थिति भी समाप्त होगी।
यह भी याद रखना चाहिए कि किसी एक व्यक्ति का कथित आचरण पूरे पुलिस विभाग या पूरे अधिवक्ता समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता। दोनों संस्थाओं में बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारी और अधिवक्ता कार्यरत हैं जो पूरी ईमानदारी, निष्ठा और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप अपना दायित्व निभा रहे हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे तंत्र पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि यदि कहीं गलती हुई है तो उसे स्वीकार किया जाए, उसकी निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
अंततः लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि यहां कानून किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि संविधान का शासन स्थापित करता है। वर्दी का सम्मान तभी सुरक्षित रहता है जब उसका प्रयोग कानून की सीमाओं के भीतर किया जाए। अधिवक्ताओं का सम्मान तभी बना रहता है जब वे न्याय व्यवस्था की गरिमा को सर्वोच्च रखें। और जनता का विश्वास तभी मजबूत होता है जब सभी संस्थाएं पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के सिद्धांतों का पालन करें।
मेरठ की इस चर्चित घटना से जुड़ी सभी परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच होना समय की मांग है। यदि किसी भी अधिकारी या व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन किया गया है, तो उसके विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। यही संविधान की भावना है, यही लोकतंत्र की शक्ति है और यही न्यायपूर्ण समाज की पहचान भी है। कानून का शासन, जवाबदेही और निष्पक्ष न्याय—इन्हीं तीन स्तंभों पर एक सशक्त लोकतंत्र का निर्माण होता है।