इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती: पुनर्विवाह के बाद भी पत्नी को गुजारा भत्ता क्यों? फैमिली कोर्ट से मांगा स्पष्टीकरण
प्रस्तावना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए झांसी के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट से जवाब तलब किया है। मामला उस आदेश से जुड़ा है जिसमें पत्नी के तलाक के बाद पुनर्विवाह कर लेने के बावजूद उसे पहले पति से प्रति माह 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने पूछा है कि जब रिकॉर्ड पर पत्नी के दूसरे विवाह का स्पष्ट उल्लेख मौजूद था, तब ऐसा आदेश किस कानूनी आधार पर पारित किया गया।
यह मामला केवल एक पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि गुजारा भत्ता संबंधी कानूनों की सही व्याख्या और न्यायालयों की जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ है। यदि किसी महिला ने तलाक के बाद पुनर्विवाह कर लिया है, तो क्या वह पहले पति से भरण-पोषण पाने की हकदार रहती है? यही प्रश्न इस मामले के केंद्र में है।
क्या है पूरा मामला?
पति और पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद लंबे समय से चल रहा था। झांसी के फैमिली कोर्ट ने 30 जुलाई 2025 को दोनों के बीच तलाक की डिक्री पारित कर दी। इस निर्णय से असंतुष्ट पति ने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर दी।
इसी बीच तलाक के लगभग एक महीने बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया। पति के अनुसार, पत्नी ने स्वयं अपने शपथपत्र में पुनर्विवाह की जानकारी दी थी। इसके बावजूद भरण-पोषण के लंबित मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 10 हजार रुपये तथा पुत्र को 5 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया।
पति ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह अपने पुत्र के भरण-पोषण का पूरा दायित्व निभाने के लिए तैयार है और भुगतान भी कर रहा है, लेकिन पुनर्विवाह कर चुकी पत्नी को पहले पति से गुजारा भत्ता देना कानून के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने पाया कि पति ने फैमिली कोर्ट के समक्ष दाखिल अपनी आपत्ति में पत्नी के पुनर्विवाह का स्पष्ट उल्लेख किया था। इतना ही नहीं, रिकॉर्ड में यह तथ्य भी मौजूद था कि पत्नी ने स्वयं पुनर्विवाह स्वीकार किया है।
इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया। इसी कारण हाईकोर्ट ने झांसी के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट से व्यक्तिगत स्पष्टीकरण मांगा है।
हाईकोर्ट ने पूछा है कि जब पुनर्विवाह का तथ्य न्यायालय के रिकॉर्ड पर उपलब्ध था, तब आदेश पारित करते समय उस पर विचार क्यों नहीं किया गया।
गुजारा भत्ता संबंधी कानून क्या कहता है?
हालांकि अब देश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू हो चुकी है, लेकिन यह मामला उस समय लंबित था जब दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 लागू थी।
धारा 125 का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर पत्नी, बच्चों और माता-पिता को भरण-पोषण उपलब्ध कराना है ताकि वे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर न हों।
लेकिन इस धारा में “पत्नी” की परिभाषा भी स्पष्ट की गई है। इसमें तलाकशुदा महिला भी शामिल होती है, बशर्ते उसने दोबारा विवाह न किया हो।
अर्थात यदि तलाक के बाद महिला पुनर्विवाह कर लेती है, तो सामान्य परिस्थितियों में पहले पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
पुनर्विवाह के बाद क्यों समाप्त हो जाता है गुजारा भत्ता?
भारतीय कानून का मूल सिद्धांत यह है कि विवाह के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे के भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी होते हैं।
जब तलाक हो जाता है तो यदि पत्नी स्वयं अपना पालन-पोषण नहीं कर सकती, तब पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का दायित्व सौंपा जाता है।
लेकिन जैसे ही महिला दूसरा विवाह कर लेती है, उसके भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी नए पति पर आ जाती है। इसलिए पुराने पति पर यह दायित्व जारी नहीं रह सकता।
यही कारण है कि पुनर्विवाह के बाद सामान्यतः पहले पति से भरण-पोषण का अधिकार समाप्त माना जाता है।
क्या बच्चे का गुजारा भत्ता प्रभावित होता है?
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट में पति ने स्पष्ट कहा कि वह अपने पुत्र के भरण-पोषण की राशि देने को तैयार है।
कानून भी यही व्यवस्था करता है कि बच्चे का भरण-पोषण माता के पुनर्विवाह से प्रभावित नहीं होता।
यदि बच्चा पहले पति का है, तो पिता का उसके प्रति दायित्व बना रहता है। इसलिए बच्चे के भरण-पोषण और पत्नी के भरण-पोषण को अलग-अलग देखा जाता है।
इसी कारण इस मामले में पति ने केवल पत्नी को दिए गए गुजारा भत्ते का विरोध किया, पुत्र के भरण-पोषण का नहीं।
क्या फैमिली कोर्ट से गलती हुई?
हाईकोर्ट ने अभी इस प्रश्न पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है कि फैमिली कोर्ट का आदेश पूरी तरह गलत था या नहीं।
फिलहाल न्यायालय ने केवल संबंधित न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगा है।
यदि रिकॉर्ड पर पुनर्विवाह का तथ्य मौजूद था और उसके बावजूद आदेश पारित हुआ, तो यह न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि मानी जा सकती है।
यही कारण है कि हाईकोर्ट ने सीधे स्पष्टीकरण मांगते हुए मामले को गंभीरता से लिया है।
न्यायिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण संदेश
यह आदेश न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही की भावना को भी मजबूत करता है।
सामान्यतः उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के आदेशों की समीक्षा करता है, लेकिन जब रिकॉर्ड पर उपलब्ध महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है, तब संबंधित न्यायिक अधिकारी से भी स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।
इससे यह संदेश जाता है कि न्यायिक आदेश तथ्यों और कानून के अनुरूप होने चाहिए तथा प्रत्येक महत्वपूर्ण तथ्य पर विचार किया जाना आवश्यक है।
पत्नी को नोटिस, अगली सुनवाई 21 जुलाई
हाईकोर्ट ने मामले में पत्नी को भी नोटिस जारी किया है ताकि वह अपना पक्ष रख सके।
संभव है कि पत्नी की ओर से यह तर्क दिया जाए कि गुजारा भत्ता किन परिस्थितियों में दिया गया या आदेश पारित होने के समय कौन-कौन से तथ्य न्यायालय के समक्ष थे।
मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है। उसी दौरान फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश का स्पष्टीकरण भी रिकॉर्ड पर आएगा और उसके बाद हाईकोर्ट आगे की कार्रवाई पर निर्णय करेगा।
इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व
यह मामला हजारों लंबित भरण-पोषण मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अक्सर तलाक, पुनर्विवाह और गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है।
यदि हाईकोर्ट इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करता है, तो भविष्य में अधीनस्थ न्यायालयों को ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या करने में सहायता मिलेगी।
साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी न हो और प्रत्येक आदेश विधि के अनुरूप पारित किया जाए।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह कार्यवाही केवल एक भरण-पोषण विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यों की महत्ता और कानून के सही अनुप्रयोग का उदाहरण भी है। यदि कोई महिला तलाक के बाद पुनर्विवाह कर चुकी है, तो सामान्य परिस्थितियों में पहले पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, जबकि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व पूर्व पति पर बना रह सकता है।
अब सभी की निगाहें 21 जुलाई की सुनवाई पर हैं, जब फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करेंगे और हाईकोर्ट इस मामले में आगे की कानूनी दिशा तय करेगा। यह निर्णय भविष्य में भरण-पोषण संबंधी मामलों की सुनवाई और न्यायिक जवाबदेही दोनों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।