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बिजली चोरी के 17–19 साल पुराने मामलों में कोर्ट का सख्त रुख: जेई और एसडीओ के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी,

बिजली चोरी के 17–19 साल पुराने मामलों में कोर्ट का सख्त रुख: जेई और एसडीओ के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी, गवाही न देने पर न्यायालय की कड़ी कार्रवाई

मैनपुरी। न्याय व्यवस्था का मूल उद्देश्य समयबद्ध और निष्पक्ष न्याय प्रदान करना है। लेकिन जब किसी मुकदमे के महत्वपूर्ण गवाह बार-बार अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं होते, तो न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है बल्कि वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने से न्याय का उद्देश्य भी कमजोर पड़ जाता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में बिजली चोरी के दो पुराने मामलों की सुनवाई के दौरान स्पेशल जज (ईसी एक्ट) कोर्ट ने इसी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विद्युत विभाग के अधिकारियों के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बार-बार समन और वारंट जारी होने के बावजूद यदि सरकारी अधिकारी न्यायालय में उपस्थित नहीं होते हैं, तो उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह आदेश उन मामलों में पारित किया गया है जो वर्ष 2007 और 2009 से लंबित हैं और उच्च न्यायालय के एक्शन प्लान के अंतर्गत शीघ्र निस्तारण की श्रेणी में शामिल हैं।

न्यायालय का सख्त संदेश

मंगलवार दोपहर लगभग तीन बजे स्पेशल जज (ईसी एक्ट) कोर्ट ने दोनों अधिकारियों के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट जारी करते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि वारंट की तत्काल तामील कराई जाए तथा अगली सुनवाई की तिथि पर दोनों अधिकारियों को न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।

न्यायालय ने माना कि लगातार अनुपस्थिति के कारण मुकदमों की सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। दोनों मामलों में संबंधित जेई ही मुख्य अभियोजन गवाह हैं और उनके बिना अभियोजन पक्ष के साक्ष्य पूरे नहीं हो सकते।

पहला मामला: वर्ष 2007 की बिजली चोरी

पहला मामला 6 जून 2007 का है। अभियोजन के अनुसार तत्कालीन जूनियर इंजीनियर (जेई) रविंद्र प्रताप सिंह अपनी विभागीय टीम के साथ थाना बरनाहल क्षेत्र के ग्राम डालूपुर बरनाल में बिजली चेकिंग अभियान चला रहे थे।

निरीक्षण के दौरान टीम ने पाया कि गांव निवासी सुनील कुमार बिना किसी वैध विद्युत कनेक्शन के सीधे बिजली का उपयोग कर रहा था। आरोप है कि वह नलकूप के माध्यम से संचालित आटा चक्की को अवैध रूप से बिजली सप्लाई देकर चला रहा था।

जांच के दौरान मौके से अवैध केबल भी बरामद की गई। विभाग ने इसे बिजली चोरी मानते हुए संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया तथा विवेचना पूरी होने के बाद आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया।

मामला अदालत में विचाराधीन रहा, लेकिन जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ी, मुख्य गवाह रविंद्र प्रताप सिंह न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए। कई अवसर दिए जाने के बावजूद उनकी गवाही नहीं हो सकी।

बताया गया कि उनका स्थानांतरण मैनपुरी से फर्रुखाबाद जिले के कम्पील विद्युत उपकेंद्र में हो चुका है। स्थानांतरण के बावजूद उन्हें अदालत में उपस्थित होकर गवाही देना आवश्यक था, क्योंकि वे इस मामले के मुख्य प्रत्यक्षदर्शी और शिकायतकर्ता अधिकारी हैं।

दूसरा मामला: वर्ष 2009 का प्रकरण

दूसरा मामला 13 अक्टूबर 2009 का है।

इस मामले में तत्कालीन जेई विनोद कुमार ने थाना एलाऊ क्षेत्र में निरीक्षण के दौरान पाया कि निवासी आसाराम बिना अधिकृत बिजली कनेक्शन के एलटी लाइन से सीधे तार जोड़कर बिजली का उपयोग कर रहा था।

अभियोजन के अनुसार उसी बिजली से आटा चक्की का संचालन किया जा रहा था। विभाग ने इसे बिजली चोरी मानते हुए आवश्यक कार्रवाई की तथा मामला न्यायालय में भेजा गया।

आरोप पत्र दाखिल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई और गवाही का चरण आया। लेकिन इस मामले में भी संबंधित अधिकारी विनोद कुमार लगातार अदालत में उपस्थित नहीं हुए।

बाद में उनका प्रमोशन होकर वे आगरा में उपखंड अधिकारी (एसडीओ) के पद पर तैनात हो गए। पदोन्नति और स्थानांतरण के बावजूद न्यायालय में गवाही देने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती, क्योंकि वे इस मुकदमे के प्रमुख साक्षी हैं।

सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को दी जानकारी

शासकीय अधिवक्ता देवेंद्र सिंह कटारिया ने न्यायालय को अवगत कराया कि दोनों अधिकारी अब मैनपुरी में तैनात नहीं हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि दोनों मुकदमे उच्च न्यायालय के एक्शन प्लान के अंतर्गत लंबित पुराने मामलों की सूची में शामिल हैं, जिनका शीघ्र निस्तारण किया जाना आवश्यक है।

सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद संबंधित अधिकारी उपस्थित नहीं हुए, जिससे मुकदमों की सुनवाई लगातार प्रभावित हो रही है।

क्यों महत्वपूर्ण होती है सरकारी गवाह की गवाही?

किसी भी आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष को अपने आरोप सिद्ध करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं।

बिजली चोरी के मामलों में जांच करने वाला अधिकारी, निरीक्षण टीम का प्रभारी तथा शिकायतकर्ता अधिकारी सबसे महत्वपूर्ण गवाह माना जाता है।

उसी के बयान के आधार पर अदालत यह तय करती है कि—

  • निरीक्षण वास्तव में हुआ था या नहीं।
  • बिजली चोरी कैसे पकड़ी गई।
  • मौके पर क्या स्थिति थी।
  • कौन-कौन से उपकरण या केबल बरामद हुए।
  • निरीक्षण रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई।
  • आरोपी की भूमिका क्या थी।

यदि मुख्य गवाह ही अदालत में उपस्थित न हो तो अभियोजन की पूरी कहानी अधूरी रह जाती है।

वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने का कारण

देश की अदालतों में लाखों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं।

इन लंबित मामलों के पीछे कई कारण बताए जाते हैं—

  • गवाहों का उपस्थित न होना।
  • बार-बार स्थगन।
  • सरकारी अधिकारियों का स्थानांतरण।
  • समन की समय पर तामील न होना।
  • अभियोजन की धीमी प्रक्रिया।
  • दस्तावेजों का समय पर उपलब्ध न होना।

इन दोनों मामलों में भी सबसे बड़ा कारण मुख्य अधिकारियों का लगातार अनुपस्थित रहना बताया गया।

गैर-जमानती वारंट क्या होता है?

गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant) अदालत द्वारा तब जारी किया जाता है जब किसी व्यक्ति को कई बार बुलाने के बावजूद वह न्यायालय में उपस्थित नहीं होता।

इस वारंट के बाद पुलिस संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार कर अदालत में प्रस्तुत कर सकती है।

हालांकि इसका उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है।

विशेष परिस्थितियों में अदालत संबंधित व्यक्ति को राहत भी दे सकती है, लेकिन पहले उसे न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है।

क्या सरकारी अधिकारी भी वारंट के दायरे में आते हैं?

हाँ।

यदि कोई सरकारी अधिकारी किसी मुकदमे में गवाह है और अदालत द्वारा बार-बार बुलाए जाने के बावजूद उपस्थित नहीं होता, तो उसके विरुद्ध भी वही प्रक्रिया अपनाई जा सकती है जो किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध अपनाई जाती है।

सरकारी सेवा में होना न्यायालय के आदेशों की अवहेलना का अधिकार नहीं देता।

उच्च न्यायालय के एक्शन प्लान का उद्देश्य

उच्च न्यायालय समय-समय पर अधीनस्थ न्यायालयों को पुराने मामलों का शीघ्र निस्तारण करने के निर्देश देता है।

इसी उद्देश्य से पुराने मुकदमों की विशेष सूची तैयार की जाती है, जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का प्रयास किया जाता है।

इन मामलों में अनावश्यक स्थगन, गवाहों की अनुपस्थिति और अन्य देरी को गंभीरता से लिया जाता है।

मैनपुरी के दोनों बिजली चोरी के मामले भी इसी श्रेणी में शामिल बताए गए हैं।

बिजली चोरी एक गंभीर अपराध

बिजली चोरी केवल विभाग को आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाती बल्कि पूरे विद्युत वितरण तंत्र को प्रभावित करती है।

अवैध कनेक्शन के कारण—

  • बिजली की लाइन पर अतिरिक्त भार पड़ता है।
  • ट्रांसफार्मर खराब होने की संभावना बढ़ती है।
  • लाइन लॉस बढ़ता है।
  • ईमानदारी से बिल भरने वाले उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष बोझ बढ़ता है।
  • दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसी कारण बिजली चोरी के मामलों में विशेष अदालतों के माध्यम से सुनवाई की व्यवस्था की गई है।

स्थानांतरण के बाद भी समाप्त नहीं होती जिम्मेदारी

सरकारी कर्मचारियों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।

लेकिन यदि कोई अधिकारी किसी पुराने मुकदमे में गवाह है, तो उसका स्थानांतरण उसकी कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं करता।

उसे संबंधित न्यायालय द्वारा बुलाए जाने पर उपस्थित होकर अपना बयान देना अनिवार्य होता है।

न्यायिक प्रक्रिया में गवाह की भूमिका

भारतीय न्याय व्यवस्था में गवाहों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

दस्तावेजों के साथ-साथ प्रत्यक्षदर्शी या जांच अधिकारी के बयान से ही अदालत घटना की सत्यता का मूल्यांकन करती है।

यदि गवाह समय पर उपस्थित हों तो मुकदमे तेजी से आगे बढ़ते हैं, जबकि उनकी अनुपस्थिति वर्षों तक सुनवाई रोक सकती है।

अदालत का संदेश

मैनपुरी की स्पेशल कोर्ट का यह आदेश केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उन सभी सरकारी अधिकारियों और गवाहों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो न्यायालय के समन को गंभीरता से नहीं लेते।

अदालत ने यह संकेत दिया है कि यदि बार-बार अवसर देने के बाद भी गवाह उपस्थित नहीं होते हैं, तो न्यायालय कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

आगे क्या होगा?

अब पुलिस दोनों अधिकारियों के विरुद्ध जारी गैर-जमानती वारंट की तामील करेगी।

इसके बाद उन्हें निर्धारित तिथि पर अदालत में प्रस्तुत किया जाएगा। यदि वे न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज कराते हैं, तो दोनों मामलों में अभियोजन साक्ष्य की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और मुकदमों के अंतिम निस्तारण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।

यदि फिर भी आवश्यक सहयोग नहीं मिलता, तो न्यायालय उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।

निष्कर्ष

मैनपुरी के 17 से 19 वर्ष पुराने बिजली चोरी के मामलों में स्पेशल जज (ईसी एक्ट) कोर्ट द्वारा जेई और एसडीओ के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट जारी किया जाना न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को दर्शाता है। वर्षों से लंबित मुकदमों में गवाहों की अनुपस्थिति न्याय वितरण में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रही है। अदालत का यह कदम स्पष्ट करता है कि चाहे कोई व्यक्ति आम नागरिक हो या सरकारी अधिकारी, न्यायालय के आदेशों का पालन सभी के लिए समान रूप से अनिवार्य है।

यदि इस प्रकार की कार्रवाई नियमित रूप से प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो पुराने मामलों के शीघ्र निस्तारण में निश्चित रूप से सहायता मिलेगी तथा न्याय व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।