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संभल में गंगा किनारे 1000 बीघा सरकारी जमीन घोटाला:

संभल में गंगा किनारे 1000 बीघा सरकारी जमीन घोटाला: फर्जी पट्टों, अधिकारियों की मिलीभगत और 19 आरोपियों पर FIR की पूरी कहानी

      उत्तर प्रदेश के संभल जिले से सरकारी जमीन के कथित अवैध आवंटन का एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गंगा किनारे स्थित लगभग 1000 बीघा से अधिक सरकारी भूमि के फर्जी पट्टों के माध्यम से आवंटन का आरोप सामने आने के बाद प्रशासन ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच में कई अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों की भूमिका संदिग्ध मिलने पर पुलिस ने 19 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है। इनमें तत्कालीन एसडीएम, तहसीलदार, चकबंदी अधिकारी, लेखपाल, कानूनगो, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) और अन्य लोग शामिल हैं। पुलिस अब तक छह आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, जबकि शेष आरोपियों की तलाश जारी है।

सरकारी जमीन पर फर्जी पट्टों का आरोप

यह पूरा मामला संभल जिले की गुन्नौर तहसील के असदपुर, सुखैला और आसपास के गांवों से जुड़ा है। यहां गंगा नदी के किनारे स्थित झाऊ श्रेणी की सरकारी भूमि का बड़ा हिस्सा चकबंदी प्रक्रिया के अंतर्गत दर्ज था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सुखैला गांव में लगभग 1144 बीघा भूमि सरकारी स्वामित्व में थी।

आरोप है कि वर्ष 2007 के बाद इस सरकारी भूमि से संबंधित दस्तावेजों में हेरफेर की गई। फर्जी अभिलेख तैयार कर अनेक लोगों के नाम पट्टे जारी कर दिए गए। सामान्यतः सरकारी भूमि का पट्टा केवल पात्र गरीब, भूमिहीन या आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को सीमित अवधि और निर्धारित नियमों के तहत दिया जाता है, ताकि वे खेती करके अपनी आजीविका चला सकें। लेकिन इस मामले में नियमों की अनदेखी कर बड़े पैमाने पर कथित अनियमितताएं की गईं।

वर्ष 2018 में पहली बार सामने आया मामला

सरकारी भूमि के फर्जी आवंटन का मामला पहली बार वर्ष 2018 में प्रशासन के संज्ञान में आया था। उस समय जांच के दौरान कई पट्टों को अवैध पाया गया। प्रशासन ने फर्जी पट्टों को निरस्त कर दिया और तत्कालीन अधिकारियों के साथ-साथ लगभग पांच दर्जन लाभार्थियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया।

उस समय यह माना गया कि कार्रवाई के बाद मामला समाप्त हो जाएगा और सरकारी भूमि सुरक्षित रहेगी, लेकिन बाद की घटनाओं ने प्रशासन की चिंताओं को और बढ़ा दिया।

2019 में फिर हुआ विवादित आवंटन

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि वर्ष 2019 में तत्कालीन एसडीएम ओमवीर सिंह द्वारा 162 लोगों के नाम दोबारा पट्टे आवंटित कर दिए गए। यह तब हुआ जब पहले ही फर्जी पट्टों को निरस्त किया जा चुका था।

बाद में ओमवीर सिंह एक अन्य मामले में बर्खास्त भी कर दिए गए। इसके बावजूद उनके कार्यकाल में किए गए भूमि आवंटनों की वैधता पर लगातार सवाल उठते रहे।

जांच में सामने आई कई गंभीर अनियमितताएं

समय-समय पर हुई प्रशासनिक जांच में यह पाया गया कि कई पट्टों में भूमि का वास्तविक क्षेत्रफल और सरकारी अभिलेखों में दर्ज विवरण मेल नहीं खाते थे। अनेक दस्तावेजों में संशोधन, कटिंग और रिकॉर्ड में बदलाव के संकेत मिले।

इसी आधार पर वर्ष 2023 में 17 अपात्र व्यक्तियों के पट्टे रद्द कर दिए गए। हालांकि उस समय भी 145 लोगों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में बने रहे, जिससे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता महसूस की गई।

लेखपाल की जांच रिपोर्ट बनी कार्रवाई का आधार

संभल जिले में सरकारी भूमि से अवैध कब्जे हटाने के अभियान के दौरान गुन्नौर तहसील में तैनात लेखपाल स्वाति शर्मा को इस मामले की विस्तृत जांच का दायित्व सौंपा गया।

उन्होंने संबंधित अभिलेखों, राजस्व रिकॉर्ड, चकबंदी दस्तावेजों तथा अन्य सरकारी कागजात का गहन परीक्षण किया। जांच पूरी होने के बाद 4 जून को अपनी विस्तृत रिपोर्ट जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल को सौंपी।

रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि गंगा किनारे स्थित सरकारी भूमि का आवंटन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किया गया। रिपोर्ट के अनुसार कई अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं थी। साथ ही दोषियों के विरुद्ध विभागीय और कानूनी कार्रवाई की सिफारिश भी की गई।

19 लोगों के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर

जांच रिपोर्ट के आधार पर 2 जुलाई को गुन्नौर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। लेखपाल स्वाति शर्मा की शिकायत पर पुलिस ने कुल 19 लोगों को नामजद किया।

एफआईआर में तत्कालीन एसडीएम ओमवीर सिंह, तत्कालीन तहसीलदार करम सिंह, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता, पूर्व ग्राम प्रधान, सहायक चकबंदी अधिकारी, लेखपाल, कानूनगो, जिला पंचायत सदस्य तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है।

पुलिस ने आरोपियों पर सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, सरकारी भूमि के अवैध आवंटन और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

छह आरोपी गिरफ्तार

जिला पुलिस प्रमुख कृष्ण कुमार बिश्नोई के निर्देशन में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए छह प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार किए गए आरोपियों में बर्खास्त एसडीएम ओमवीर सिंह, पूर्व ग्राम प्रधान विक्रांत, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता जय भारद्वाज, पूर्व कानूनगो राजवीर सिंह, पूर्व चकबंदी लेखपाल भीमराव सिंह तथा महेंद्र सिंह शामिल हैं।

सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। पुलिस अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दे रही है।

सरकारी भूमि की सुरक्षा पर उठे सवाल

यह मामला केवल फर्जी पट्टों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी भूमि की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि सरकारी अभिलेखों में व्यापक स्तर पर बदलाव कर भूमि का आवंटन किया गया है, तो यह राजस्व प्रशासन की निगरानी प्रणाली की कमजोरी को भी दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी भूमि से जुड़े रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, नियमित ऑडिट तथा पारदर्शी निगरानी प्रणाली विकसित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं को रोका जा सके।

गरीबों के अधिकारों पर भी पड़ा प्रभाव

सरकारी पट्टा योजना का उद्देश्य वास्तव में गरीब, भूमिहीन और जरूरतमंद परिवारों को खेती योग्य भूमि उपलब्ध कराना होता है। यदि अपात्र व्यक्तियों को फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से लाभ पहुंचाया जाता है तो वास्तविक पात्र लोगों का अधिकार प्रभावित होता है।

ऐसे मामलों से सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और समाज में प्रशासन के प्रति अविश्वास पैदा होता है।

प्रशासन की आगे की रणनीति

संभल प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि पूरे प्रकरण की गहन जांच जारी रहेगी। जिन लोगों को नियमों के विरुद्ध भूमि आवंटित की गई है, उनके पट्टों की समीक्षा की जाएगी। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है तो संबंधित भूमि को पुनः सरकारी खाते में दर्ज किया जाएगा।

इसके साथ ही दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई के अलावा आपराधिक मुकदमे भी आगे बढ़ाए जाएंगे। प्रशासन का कहना है कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार के अवैध कब्जे या फर्जी आवंटन को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

निष्कर्ष

संभल का यह मामला उत्तर प्रदेश में सरकारी भूमि के प्रबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गया है। लगभग 1000 बीघा से अधिक सरकारी जमीन के कथित फर्जी आवंटन ने प्रशासनिक जवाबदेही, राजस्व अभिलेखों की सुरक्षा और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

हालांकि अब तक छह आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है और पुलिस अन्य आरोपियों की तलाश में जुटी है, लेकिन इस पूरे प्रकरण का अंतिम सच न्यायिक प्रक्रिया और विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगा। यदि जांच में सभी आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला भविष्य में सरकारी भूमि से जुड़े भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि इस घटना के बाद सरकारी भूमि के आवंटन और अभिलेखों की निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा, ताकि सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।