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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में बने शारीरिक संबंध सहमति से माने जाएंगे,

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में बने शारीरिक संबंध सहमति से माने जाएंगे, बाद में शादी से इनकार करना हर मामले में बलात्कार नहीं

       भारत में लिव-इन रिलेशनशिप, सहमति, विवाह का वादा और बलात्कार जैसे संवेदनशील कानूनी मुद्दों पर समय-समय पर न्यायालयों ने महत्वपूर्ण व्याख्याएं की हैं। इन्हीं सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बने हैं, तो सामान्यतः यह माना जाएगा कि वे संबंध आपसी सहमति से बने थे। केवल इसलिए कि बाद में पुरुष ने शादी करने से इनकार कर दिया, उसे स्वतः बलात्कार नहीं कहा जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों के आधार पर तय होगा। यदि शुरुआत से ही शादी का वादा धोखे से किया गया हो और उसका उद्देश्य केवल शारीरिक संबंध बनाना हो, तो परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। लेकिन जहां दोनों वयस्क लंबे समय तक साथ रहते हैं, संबंध निभाते हैं और भविष्य में विवाह की संभावना पर विचार करते हैं, वहां बाद में विवाह न होने मात्र से भारतीय दंड कानून के तहत बलात्कार का अपराध स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला छत्तीसगढ़ की रहने वाली लगभग 40 वर्षीय महिला से जुड़ा था, जो भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक के पद पर कार्यरत थी।

महिला ने अदालत को बताया कि वर्ष 2019 में वह आईआईएम रायपुर से एमबीए कर रही थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई। दोनों के बीच मित्रता हुई जो धीरे-धीरे प्रेम संबंध में बदल गई।

महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे विवाह करने का आश्वासन दिया था। इसी विश्वास में उसने आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाए और दोनों लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे।

उसके अनुसार एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने विवाह की बात टालनी शुरू कर दी।

बाद में आरोपी ने कहा कि उसके माता-पिता इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि—

महिला उम्र में उससे बड़ी थी।

वह तलाकशुदा थी।

दोनों अलग-अलग धर्म से थे और महिला ईसाई थी।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए।

इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध, उस समय लागू प्रावधानों के संदर्भ में) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

निचली अदालत ने आरोपी को क्यों किया बरी?

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन किया और पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।

निचली अदालत ने माना कि— दोनों वयस्क थे।

दोनों लंबे समय तक साथ रहे।

संबंध स्वेच्छा से बनाए गए थे।

उपलब्ध साक्ष्य बलात्कार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। इसी आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया। महिला ने इस आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने किन तथ्यों पर विशेष ध्यान दिया? अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई महत्वपूर्ण तथ्यों का विस्तृत विश्लेषण किया।

1. लंबे समय तक साथ रहना

कोर्ट ने पाया कि दोनों लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। यह कोई क्षणिक या एक-दो मुलाकातों वाला संबंध नहीं था। दोनों ने स्वेच्छा से साथ रहने का निर्णय लिया था।

2. विवाह की संभावना पर सहमति महिला ने स्वयं स्वीकार किया कि दोनों परिवारों की सहमति से विवाह करना चाहते थे। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि प्रत्येक शारीरिक संबंध केवल विवाह के तत्काल वादे पर आधारित था।

3. महिला आयोग में समझौते की बातचीत जिरह के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि वह महिला आयोग के समक्ष लगभग 30 लाख रुपये लेकर विवाद समाप्त करने के लिए तैयार थी। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि आरोपी ने समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था। हालांकि बाद में समझौता नहीं हुआ और चेक का भुगतान रोक दिया गया। अदालत ने इस तथ्य को भी मामले के समग्र मूल्यांकन का हिस्सा माना।

4. भाई की गवाही

महिला के भाई ने भी अदालत में कहा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उसी प्रेम संबंध के कारण शारीरिक संबंध विकसित हुए।

इस गवाही ने भी अभियोजन के उस तर्क को कमजोर किया कि संबंध केवल धोखे से स्थापित किए गए थे।

मेडिकल साक्ष्य ने क्या बताया?

हाईकोर्ट ने महिला का मेडिकल परीक्षण करने वाले डॉक्टर की गवाही का भी विस्तार से अध्ययन किया।

डॉक्टर ने अदालत को बताया— महिला ने मेडिकल परीक्षण के दौरान जबरन यौन संबंध की शिकायत नहीं की। उसने अप्राकृतिक यौन संबंध के संबंध में भी कोई स्पष्ट शिकायत दर्ज नहीं कराई। परीक्षण में ऐसी कोई चोट नहीं मिली जो जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध की पुष्टि करती हो। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि केवल चोट का न होना हर मामले में बलात्कार का निर्णायक प्रमाण नहीं होता, लेकिन इस मामले में अन्य परिस्थितियों के साथ मेडिकल साक्ष्य भी आरोपी के पक्ष में गए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित करते हुए कहा कि— यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो सामान्यतः यह माना जाएगा कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध आपसी सहमति से थे। ऐसी स्थिति में केवल इसलिए कि बाद में विवाह नहीं हो पाया या किसी कारण से संबंध टूट गया, पुरुष को स्वतः बलात्कार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने कहा कि— लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले दो वयस्क अपने निर्णयों के परिणामों को समझते हैं। वे अपनी इच्छा से संबंध स्थापित करते हैं। ऐसे मामलों में अदालतों को केवल विवाह न होने के आधार पर बलात्कार का निष्कर्ष निकालने में सावधानी बरतनी चाहिए।

महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सामाजिक बदलावों का भी उल्लेख किया।

पीठ ने कहा कि आज महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हो रही हैं।

ऐसी परिस्थितियों में अदालतों को पुराने या संकीर्ण दृष्टिकोण से मामलों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

इसके बजाय न्यायालय को देखना चाहिए—

संबंध कितने समय तक चला।

दोनों पक्षों का व्यवहार कैसा था।

क्या दोनों स्वेच्छा से साथ रह रहे थे?

क्या दोनों भविष्य के बारे में समान समझ रखते थे?

इन सभी तथ्यों के आधार पर यह तय किया जाना चाहिए कि सहमति वास्तव में मौजूद थी या नहीं।

क्या हर शादी का वादा टूटना बलात्कार है?

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी संदेश यही है कि— नहीं।

हर वह मामला जिसमें शादी का वादा पूरा नहीं हुआ, उसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता।

भारतीय न्यायालय लगातार यह सिद्धांत दोहराते रहे हैं कि— यदि शुरुआत से ही आरोपी का विवाह करने का कोई इरादा नहीं था और उसने केवल धोखे से महिला की सहमति प्राप्त की, तब मामला अलग हो सकता है।लेकिन यदि— दोनों के बीच वास्तविक प्रेम संबंध था।दोनों लंबे समय तक साथ रहे। विवाह की संभावना पर ईमानदारी से विचार किया गया। बाद में परिस्थितियां बदल गईं। तो मात्र विवाह न होना बलात्कार सिद्ध नहीं करता।

सहमति और धोखे में क्या अंतर है?

भारतीय आपराधिक कानून में सहमति का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।

यदि महिला ने स्वतंत्र इच्छा से संबंध बनाए हैं और उसे संबंध की प्रकृति का पूरा ज्ञान था, तो इसे सामान्यतः वैध सहमति माना जाता है।

लेकिन यदि—

झूठी पहचान अपनाई गई हो।

विवाह का वादा केवल छल का माध्यम हो।

शुरू से ही विवाह करने की कोई मंशा न हो।

तो ऐसी सहमति कानून की दृष्टि में वास्तविक सहमति नहीं मानी जा सकती।

इसी अंतर को प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर न्यायालय तय करता है। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर न्यायालयों का दृष्टिकोण पिछले कई वर्षों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप को सामाजिक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया है।

हालांकि अदालतों ने यह भी कहा है कि— लिव-इन संबंध विवाह के समान नहीं हैं।

लेकिन यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रहते हैं, तो यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है। ऐसे संबंधों में उत्पन्न विवादों का समाधान प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

इस फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्पष्ट करता है—

1. सहमति का मूल्यांकन पूरे संबंध के संदर्भ में होगा

केवल एक घटना नहीं बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति देखी जाएगी।

2. लंबे लिव-इन संबंध का विशेष महत्व

यदि संबंध लंबे समय तक चला है तो यह माना जाएगा कि दोनों ने स्वेच्छा से संबंध बनाए।

3. विवाह न होना स्वतः अपराध नहीं

सिर्फ शादी टूट जाना या विवाह से इनकार करना बलात्कार का प्रमाण नहीं है।

4. प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होंगे

कोर्ट ने यह नहीं कहा कि हर लिव-इन मामला समान होगा।

यदि धोखा, छल या प्रारंभ से ही बेईमान मंशा सिद्ध हो जाए तो परिणाम अलग हो सकते हैं।

समाज के लिए क्या संदेश?

यह फैसला समाज को यह संदेश देता है कि वयस्कों द्वारा बनाए गए व्यक्तिगत संबंधों का मूल्यांकन केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं बल्कि कानूनी सिद्धांतों के आधार पर किया जाएगा।

साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि आपराधिक कानून का उपयोग हर असफल प्रेम संबंध या टूटे विवाह प्रस्ताव के मामले में नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, यह निर्णय उन मामलों को प्रभावित नहीं करता जहां वास्तव में किसी महिला की सहमति धोखे, छल या झूठे वादे के माध्यम से प्राप्त की गई हो।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय लिव-इन रिलेशनशिप, सहमति और विवाह के वादे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। अदालत ने कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक स्वेच्छा से लिव-इन संबंध में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में उन्हें सहमति से बना संबंध माना जाएगा। केवल बाद में विवाह न होना या पुरुष द्वारा शादी से इनकार कर देना स्वतः बलात्कार का अपराध सिद्ध नहीं करता।

हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होगा। यदि यह साबित हो जाए कि शुरू से ही विवाह का वादा केवल धोखा देने और शारीरिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए यह फैसला कोई सार्वभौमिक छूट नहीं देता, बल्कि न्यायालयों को यह दिशा देता है कि वे संबंध की अवधि, दोनों पक्षों के आचरण, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करें।

यह निर्णय सहमति की कानूनी अवधारणा को और स्पष्ट करता है तथा यह रेखांकित करता है कि आपराधिक कानून का प्रयोग केवल संबंध टूटने या विवाह न होने के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और वास्तविक तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।