हाईकोर्ट के आदेश से पंचायतों में मचा सियासी घमासान, 565 ग्राम प्रधानों की कुर्सी पर संकट; चुनाव की उम्मीद में दावेदार सक्रिय
प्रशासक बनकर काम कर रहे प्रधानों की बढ़ी बेचैनी, 13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण आदेश के बाद उत्तर प्रदेश की पंचायतों में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ग्राम पंचायतों में चल रही प्रशासक व्यवस्था को लेकर आए न्यायालय के फैसले ने जहां वर्तमान प्रधानों की चिंता बढ़ा दी है, वहीं लंबे समय से चुनाव की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों में नई उम्मीद जगा दी है।
प्रदेश की 565 ग्राम पंचायतों के प्रधान, जो फिलहाल प्रशासक के रूप में काम कर रहे हैं, अब असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें डर है कि यदि हाईकोर्ट का आदेश लागू हुआ तो उनकी प्रशासक वाली भूमिका समाप्त हो सकती है। दूसरी ओर प्रधान पद के दावेदारों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और गांवों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
पंचायती राज विभाग भी अब हाईकोर्ट के अगले आदेश का इंतजार कर रहा है। सभी की निगाहें 13 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जिसमें सरकार को अपना पक्ष रखना है।
26 मई को खत्म हुआ था 576 पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल
दरअसल, प्रदेश की कई ग्राम पंचायतों में निर्वाचित प्रधानों का कार्यकाल पूरा हो गया था। इनमें से 576 ग्राम पंचायतों के प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हुआ था।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद शासन की ओर से व्यवस्था बनाए रखने के लिए निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में काम करने की अनुमति दे दी गई थी।
प्रशासक बनाए जाने के बाद प्रधानों को पुराने और पहले से स्वीकृत कार्यों को पूरा कराने की अनुमति दी गई थी, लेकिन नए कार्य शुरू करने के लिए उन्हें जिलाधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया था।
इस व्यवस्था के चलते प्रधान अपने पद पर तो बने रहे, लेकिन उनके अधिकार सीमित कर दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने प्रशासक नियुक्ति पर उठाए सवाल
मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था को असंवैधानिक बताया है।
अदालत ने सरकार से त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की योजना भी मांगी है। हाईकोर्ट के इस रुख के बाद पंचायतों में राजनीतिक माहौल बदल गया है।
न्यायालय के आदेश के बाद अब सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वर्तमान प्रधान प्रशासक के रूप में काम करते रहेंगे या फिर सरकार को नई व्यवस्था करनी होगी।
565 प्रधान बने हुए हैं प्रशासक
576 पंचायतों में से सभी जगह प्रधान प्रशासक नहीं हैं। जानकारी के अनुसार 11 पंचायतों में ग्राम प्रधानों की मृत्यु हो जाने के कारण वहां अलग व्यवस्था लागू की गई थी।
इन 11 पंचायतों में सहायक विकास अधिकारी (एडीओ) को जिम्मेदारी दी गई है।
वहीं बाकी 565 ग्राम पंचायतों में निवर्तमान प्रधान ही प्रशासक की भूमिका निभा रहे हैं।
अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद इन्हीं प्रधानों की स्थिति सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली है।
प्रधानों की बढ़ी बेचैनी
हाईकोर्ट के आदेश के बाद गांवों की राजनीति में अचानक तेजी आ गई है।
जो प्रधान अब तक प्रशासक के रूप में पंचायत का काम संभाल रहे थे, वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनकी नजरें अब सरकार के अगले कदम और अदालत की अगली सुनवाई पर हैं।
गांवों में प्रधानों के बीच चर्चा का मुख्य विषय यही है कि यदि चुनाव जल्द घोषित होते हैं तो राजनीतिक समीकरण कैसे बदलेंगे।
कई वर्तमान प्रधान दोबारा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि नए उम्मीदवारों ने भी अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
प्रधान पद के दावेदार हुए सक्रिय
हाईकोर्ट के आदेश के बाद संभावित उम्मीदवारों की सक्रियता अचानक बढ़ गई है।
कई गांवों में लोग मतदाताओं से संपर्क करने लगे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी बढ़ गई है और गांव की समस्याओं को लेकर वे लोगों के बीच पहुंचने लगे हैं।
लंबे समय से पंचायत चुनाव का इंतजार कर रहे उम्मीदवारों को अब उम्मीद है कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद चुनाव प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है।
हालांकि अभी तक चुनाव कार्यक्रम को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
प्रशासकों ने नहीं मांगी नए कार्यों की अनुमति
प्रशासक के रूप में काम कर रहे प्रधानों को नए कार्य कराने के लिए जिलाधिकारी से अनुमति लेने का निर्देश दिया गया था।
लेकिन अभी तक किसी भी प्रशासक ने नए कार्यों के लिए अनुमति मांगने का आवेदन नहीं दिया है।
न पंचायती राज विभाग को कोई नया प्रस्ताव मिला है और न ही जिलाधिकारी स्तर पर किसी नए काम की अनुमति मांगी गई है।
इससे यह भी संकेत मिल रहा है कि प्रशासक खुद भी इस व्यवस्था को लेकर असमंजस में थे।
पंचायती राज विभाग कर रहा आदेश का इंतजार
एडीपीआरओ विमल कुमार ने बताया कि अभी तक हाईकोर्ट का आदेश मुख्यालय स्तर पर प्राप्त नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा कि जैसे ही आदेश की आधिकारिक प्रति मिलेगी, उसी के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि न्यायालय के आदेश और शासन के निर्देशों के आधार पर ही पंचायतों में आगे की व्यवस्था तय होगी।
जुलाई में खत्म होना है ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल
ग्राम पंचायतों के साथ-साथ अब ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों के कार्यकाल को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
आगामी जुलाई माह में इन पदों का कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है।
ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।
यदि चुनाव समय पर कराए जाते हैं तो ग्राम पंचायत से लेकर जिला स्तर तक नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं।
संगठन ने हाईकोर्ट के फैसले का किया स्वागत
राष्ट्रीय अधिकार संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रितिक चाहल ने हाईकोर्ट के आदेश का स्वागत किया है।
उन्होंने बताया कि संगठन के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद राठौर की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
उनके अनुसार अदालत ने पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था को संविधान की भावना के विपरीत माना है।
उन्होंने कहा कि यह फैसला लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला है, क्योंकि पंचायतें स्थानीय स्वशासन की महत्वपूर्ण इकाई हैं।
13 जुलाई की सुनवाई पर सबकी नजर
अब इस पूरे मामले में अगली सुनवाई 13 जुलाई को होनी है।
इस दिन सरकार को हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना है। सरकार की ओर से पंचायत चुनाव और प्रशासक व्यवस्था को लेकर क्या पक्ष रखा जाता है, इस पर सभी की निगाहें रहेंगी।
यदि अदालत चुनाव प्रक्रिया को लेकर सख्त रुख अपनाती है तो पंचायत चुनाव की तैयारियां जल्द शुरू हो सकती हैं।
फिलहाल गांवों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ चुकी है। वर्तमान प्रधान अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश में हैं, जबकि नए दावेदार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
आने वाले दिनों में पंचायतों की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह 13 जुलाई की सुनवाई और सरकार के फैसले से तय होगा।