गाजियाबाद में अवैध कोचिंग सेंटरों का जाल: मान्यता प्राप्त केवल 45, हजारों संस्थानों में पढ़ रहे बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
शिक्षा को बेहतर भविष्य की सीढ़ी माना जाता है, लेकिन जब यही शिक्षा व्यवस्था नियमों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के बीच चलने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में कोचिंग संस्थानों की स्थिति ने इसी चिंता को सामने ला दिया है। जिले में हजारों की संख्या में कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं, लेकिन जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय के रिकॉर्ड में पंजीकृत कोचिंग संस्थानों की संख्या महज 45 बताई जा रही है।
यह स्थिति सीधे तौर पर उन हजारों छात्रों की सुरक्षा से जुड़ी है, जो रोजाना प्रतियोगी परीक्षाओं, बोर्ड परीक्षाओं और अन्य शैक्षणिक तैयारियों के लिए इन संस्थानों में जाते हैं। सवाल यह है कि जिन जगहों पर बच्चे घंटों बैठकर पढ़ाई करते हैं, क्या वहां उनकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं?
शिक्षा विभाग की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के पॉश इलाकों से लेकर गली-मोहल्लों और छोटे कस्बों तक बड़ी संख्या में कोचिंग सेंटर बिना पंजीकरण के चल रहे हैं।
बोर्ड लगाकर खुल रहे हैं कोचिंग सेंटर
गाजियाबाद में कई जगहों पर छोटे-बड़े कोचिंग सेंटर केवल एक बोर्ड लगाकर शुरू कर दिए जाते हैं। कई संस्थान बिना किसी सरकारी अनुमति, सुरक्षा जांच या मानकों को पूरा किए छात्रों को प्रवेश दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियम अधिनियम-2002 के अनुसार कोचिंग संस्थानों का पंजीकरण जरूरी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में संस्थान नियमों को नजरअंदाज कर संचालित हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, जिन संस्थानों में 50 से अधिक छात्र पढ़ते हैं, उन्हें कोचिंग संस्थान की श्रेणी में माना जाता है और उन्हें निर्धारित नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।
लेकिन हकीकत यह है कि कई जगहों पर एक कमरे, बेसमेंट या छोटी बिल्डिंग में बड़ी संख्या में छात्रों को बैठाकर कक्षाएं संचालित की जा रही हैं।
बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा
कोचिंग सेंटरों में पढ़ने वाले छात्र अक्सर नाबालिग भी होते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल अभिभावकों की नहीं, बल्कि संस्थान और प्रशासन की भी होती है।
नियमों के अनुसार कोचिंग संस्थानों में कई सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी है। इनमें भवन की स्थिति, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन निकास, फायर एनओसी और अन्य आवश्यक अनुमतियां शामिल हैं।
लेकिन कई अवैध संस्थानों में न तो फायर सुरक्षा के इंतजाम होते हैं और न ही आपात स्थिति में छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था।
छोटी जगहों में अधिक छात्रों को बैठाना, संकरे रास्ते, बंद कमरे और सुरक्षा उपकरणों की कमी किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है।
मुनाफे के लिए नियमों की अनदेखी
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कोचिंग उद्योग को बड़ा व्यवसाय बना दिया है। सरकारी नौकरी, मेडिकल, इंजीनियरिंग, बैंकिंग और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्थानों में बड़ी संख्या में छात्र दाखिला लेते हैं।
कई संचालक इस मांग का फायदा उठाकर बिना जरूरी सुविधाओं के कोचिंग सेंटर शुरू कर देते हैं। उनका उद्देश्य छात्रों को बेहतर शिक्षा देने के बजाय अधिक से अधिक फीस जुटाना बन जाता है।
ऐसे संस्थानों में न तो पर्याप्त जगह होती है और न ही छात्रों की संख्या के हिसाब से संसाधन उपलब्ध होते हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
हादसों के बाद भी नहीं बदली स्थिति
देश में कई ऐसे हादसे सामने आ चुके हैं, जिनमें कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हैं।
जुलाई 2024 में दिल्ली में एक कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में पानी भरने से तीन छात्रों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद देशभर में कोचिंग संस्थानों की जांच और पंजीकरण को लेकर बहस तेज हुई थी।
उस समय प्रशासन ने अभियान चलाकर अवैध कोचिंग सेंटरों पर कार्रवाई की बात कही थी। लेकिन गाजियाबाद की स्थिति बताती है कि जमीनी स्तर पर सुधार की रफ्तार बेहद धीमी है।
करीब दो वर्षों में केवल कुछ नए संस्थान ही पंजीकृत हो पाए, जबकि नए कोचिंग सेंटर लगातार खुलते रहे।
हाल ही में लखनऊ के अलीगंज इलाके में हुई आग की घटना ने भी सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता को उजागर किया। ऐसे हादसों के बाद भी यदि कोचिंग संस्थानों की नियमित जांच नहीं होती तो यह प्रशासनिक लापरवाही का संकेत माना जाएगा।
शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल
कोचिंग संस्थानों की निगरानी की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है। जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय में पंजीकरण की व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि संस्थानों की जांच हो सके और छात्रों को सुरक्षित माहौल मिल सके।
लेकिन जब हजारों संस्थान बिना पंजीकरण के चल रहे हों और रिकॉर्ड में केवल कुछ दर्ज संस्थान ही दिखाई दें तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
केवल कार्रवाई की योजना बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है कि नियमित निरीक्षण हो, नियम तोड़ने वाले संस्थानों पर सख्त कार्रवाई हो और अभिभावकों को भी जागरूक किया जाए।
अभिभावकों की जिम्मेदारी भी जरूरी
बच्चों को कोचिंग भेजने से पहले अभिभावकों को केवल परिणाम और फीस पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था भी देखनी चाहिए।
यह जांचना जरूरी है कि:
- क्या कोचिंग सेंटर पंजीकृत है?
- क्या भवन सुरक्षित है?
- क्या फायर सुरक्षा की व्यवस्था है?
- क्या आपातकालीन निकास मौजूद है?
- क्या छात्रों की संख्या के अनुसार पर्याप्त जगह है?
कई बार बड़े नाम और विज्ञापन देखकर अभिभावक संस्थान चुन लेते हैं, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था की जांच नहीं करते।
छात्रों की संख्या बढ़ी, सुविधाएं नहीं
गाजियाबाद जैसे बड़े शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से कोचिंग सेंटरों की मांग भी बढ़ी है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब छात्रों की बढ़ती संख्या के अनुपात में सुविधाएं विकसित नहीं होतीं।
कई संस्थान छोटे स्थानों में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को बैठाकर कक्षाएं संचालित करते हैं। इससे न केवल पढ़ाई का माहौल प्रभावित होता है बल्कि किसी आपात स्थिति में खतरा भी बढ़ जाता है।
सख्त व्यवस्था की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि कोचिंग संस्थानों के लिए स्पष्ट निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए। हर संस्थान का नियमित निरीक्षण होना चाहिए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक दंड के साथ-साथ संस्थान बंद करने की कार्रवाई भी होनी चाहिए।
इसके अलावा छात्रों और अभिभावकों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे वे किसी भी संस्थान की मान्यता और सुरक्षा स्थिति की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकें।
निष्कर्ष
गाजियाबाद में हजारों कोचिंग सेंटरों के बीच केवल 45 संस्थानों का पंजीकृत होना एक गंभीर चिंता का विषय है। यह केवल शिक्षा व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि हजारों बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
बच्चों को बेहतर भविष्य देने के नाम पर यदि उनकी सुरक्षा से समझौता किया जाता है तो यह व्यवस्था की बड़ी विफलता होगी।
जरूरत है कि शिक्षा विभाग, प्रशासन और कोचिंग संचालक मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ सुरक्षित वातावरण भी मिले।
क्योंकि किसी भी परीक्षा में सफलता से पहले जरूरी है कि छात्र सुरक्षित रहें।