एससी/एसटी आरक्षित सीटों में रोटेशन की मांग खारिज, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- बदलाव का अधिकार संसद के पास
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों में रोटेशन व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षित सीटों की व्यवस्था में बदलाव करना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि संसद का अधिकार क्षेत्र है। हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि सामाजिक और राजनीतिक न्याय के उद्देश्यों को और प्रभावी बनाने के लिए आरक्षित सीटों में रोटेशन की व्यवस्था एक उपयोगी कदम हो सकती है।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की अवकाशकालीन पीठ ने यह फैसला सुलतानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता जगदीश सिंह की ओर से दाखिल याचिका पर सुनाया। याचिका में लंबे समय से एक ही विधानसभा क्षेत्र के एससी के लिए आरक्षित रहने को लेकर सवाल उठाए गए थे और मांग की गई थी कि विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में भी पंचायतों तथा नगर निकायों की तरह आरक्षण का रोटेशन लागू किया जाए।
करीब छह दशक से आरक्षित है कादीपुर सीट
याची की ओर से अदालत को बताया गया कि सुलतानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट लगभग छह दशक से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित चली आ रही है। लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने के कारण सामान्य वर्ग के मतदाताओं और चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले संभावित उम्मीदवारों को राजनीतिक भागीदारी का समान अवसर नहीं मिल पा रहा है।
याचिका में तर्क दिया गया कि लोकतंत्र में हर वर्ग को प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना चाहिए। यदि कोई क्षेत्र लगातार कई दशकों तक आरक्षित रहता है तो वहां के सामान्य वर्ग के उम्मीदवार चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। वहीं दूसरे क्षेत्रों में आरक्षण का लाभ नहीं पहुंच पाता। इसलिए आरक्षण व्यवस्था को समय-समय पर बदलने की आवश्यकता है।
याची ने कहा कि जिस तरह ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत और नगर निकायों में आरक्षित सीटों का निर्धारण रोटेशन के आधार पर किया जाता है, उसी प्रकार विधानसभा और लोकसभा सीटों पर भी यही व्यवस्था होनी चाहिए।
डिलिमिटेशन एक्ट की धारा को भी दी गई चुनौती
याचिका में परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(ब) को भी चुनौती दी गई थी। इस प्रावधान के तहत ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों को एससी और एसटी के लिए आरक्षित किया जाता है, जहां इन समुदायों की आबादी का अनुपात अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक होता है।
याची का कहना था कि केवल जनसंख्या के आधार पर किसी क्षेत्र को लगातार आरक्षित बनाए रखना उचित नहीं है। इससे राजनीतिक अवसरों का संतुलन प्रभावित होता है। आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देना है, न कि किसी एक क्षेत्र को स्थायी रूप से आरक्षित बना देना।
याचिका में यह भी कहा गया कि संविधान में आरक्षण का उद्देश्य कमजोर वर्गों को सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना है। इसलिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे अधिक से अधिक क्षेत्रों में एससी/एसटी समुदाय के लोगों को प्रतिनिधित्व मिल सके और लोकतांत्रिक समानता बनी रहे।
कोर्ट ने माना- रोटेशन हो सकता है प्रभावी उपाय
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि आरक्षित सीटों का रोटेशन सामाजिक और राजनीतिक न्याय को मजबूत करने वाला कदम हो सकता है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अधिक अवसर मिल सकते हैं।
अदालत ने माना कि पंचायतों और स्थानीय निकायों में रोटेशन व्यवस्था लागू है और इसका उद्देश्य भी यही है कि आरक्षण का लाभ सीमित क्षेत्रों तक न रहे। विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में भी ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 संसद तथा राज्य विधानसभाओं में एससी/एसटी आरक्षण का प्रावधान करते हैं। इन अनुच्छेदों में आरक्षण की मूल व्यवस्था तो दी गई है, लेकिन सीटों के रोटेशन या आरक्षण लागू करने की विस्तृत प्रक्रिया तय नहीं की गई है।
न्यायालय नहीं दे सकता कानून बनाने का निर्देश
खंडपीठ ने कहा कि किसी नीति में बदलाव करना या नया कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय कानून की व्याख्या कर सकता है, लेकिन वह संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा कि यदि संसद उचित समझती है तो वह आरक्षित सीटों में रोटेशन व्यवस्था को लेकर कानून बना सकती है। फिलहाल मौजूदा संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के आधार पर न्यायालय इस मामले में कोई आदेश जारी नहीं कर सकता।
इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
आरक्षण व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल
भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए संसद और विधानसभाओं में सीटों का आरक्षण सामाजिक न्याय के उद्देश्य से किया गया है। संविधान निर्माताओं ने माना था कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिए बिना समान अवसर की व्यवस्था पूरी नहीं हो सकती।
संविधान के अनुच्छेद 330 के तहत लोकसभा में और अनुच्छेद 332 के तहत राज्य विधानसभाओं में एससी/एसटी के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
समय-समय पर परिसीमन आयोग द्वारा जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया जाता है। लेकिन कई क्षेत्रों में लंबे समय तक आरक्षण जारी रहने से यह सवाल उठता रहा है कि क्या आरक्षण का लाभ अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंचना चाहिए।
रोटेशन व्यवस्था लागू करने की मांग क्यों उठती रही है
स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण रोटेशन के आधार पर किया जाता है। इसका अर्थ है कि एक चुनाव में कोई सीट जिस वर्ग के लिए आरक्षित होती है, अगले चुनाव में वह सीट किसी अन्य वर्ग के लिए आरक्षित हो सकती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह होता है कि किसी एक क्षेत्र के लोग लंबे समय तक एक ही प्रकार के आरक्षण में बंधे न रहें और अलग-अलग समुदायों को प्रतिनिधित्व का अवसर मिले।
इसी आधार पर विधानसभा और लोकसभा सीटों में भी रोटेशन की मांग समय-समय पर उठती रही है।
हालांकि संसद में इस विषय पर व्यापक चर्चा और संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव की आवश्यकता होगी।
फैसले का व्यापक प्रभाव
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका आरक्षण नीति के मूल ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती। आरक्षण की प्रक्रिया, सीमा और तरीके में परिवर्तन करना विधायिका का काम है।
फैसले से उन लोगों को झटका लगा है जो विधानसभा और लोकसभा सीटों में आरक्षण रोटेशन की मांग कर रहे थे, लेकिन अदालत ने अपने आदेश में यह संकेत जरूर दिया कि रोटेशन जैसी व्यवस्था सामाजिक न्याय के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
अब यह विषय संसद और नीति निर्माताओं के स्तर पर विचार का विषय रहेगा कि क्या लोकसभा और विधानसभा सीटों के आरक्षण में भी भविष्य में रोटेशन व्यवस्था लागू की जाए या नहीं।