लखनऊ अग्निकांड: जिस इमारत ने ली 15 जानें, उसे 2016 में गिराने का दिया गया था आदेश, फिर क्यों हो गया निरस्त?
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। तीन मंजिला इमारत में लगी आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया और इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के बाद अब इमारत के निर्माण, नक्शे, स्वीकृति और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इमारत में इतना बड़ा हादसा हुआ, उसे लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के चलते ध्वस्त करने का आदेश दिया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह आदेश दो महीने से भी कम समय में निरस्त कर दिया गया था।
राज्य सरकार की ओर से जारी बयान के बाद अब इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। सरकार ने कहा है कि इमारत से जुड़े पुराने दस्तावेजों और लखनऊ विकास प्राधिकरण की कार्रवाई की जांच की जा रही है।
अवैध निर्माण के आरोप में हुई थी कार्रवाई
सरकारी बयान के अनुसार अलीगंज सेक्टर-डी स्थित इस इमारत के खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई शुरू की गई थी।
जांच के दौरान सामने आया था कि इमारत में स्वीकृत नक्शे के विपरीत निर्माण किया गया था। इसके बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने संबंधित मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया।
एलडीए की ओर से की गई जांच के बाद 10 मई 2016 को अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया गया था।
इस आदेश का मतलब था कि इमारत के उस हिस्से को गिराया जाना था, जिसे नियमों के खिलाफ बनाया गया था।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला दिया।
दो महीने के अंदर कैसे बदल गया फैसला?
रिकॉर्ड के अनुसार 10 मई 2016 को जारी ध्वस्तीकरण आदेश को 5 जुलाई 2016 को निरस्त कर दिया गया।
यानी जिस इमारत को अवैध मानते हुए गिराने का आदेश दिया गया था, उसी इमारत के खिलाफ कार्रवाई रोक दी गई।
अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में ध्वस्तीकरण आदेश वापस लिया गया।
क्या किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई या किसी दबाव में फैसला बदला गया? यह जांच का विषय बन गया है।
वर्ष 1980 में हुआ था आवंटन
अधिकारियों के अनुसार यह इमारत अलीगंज के सेक्टर-डी में स्थित है।
इस संपत्ति का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1980 में इसे लॉटरी प्रणाली के माध्यम से विजय कुमार को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित किया गया था।
11 जुलाई 1980 को आवंटन की प्रक्रिया पूरी हुई थी और उसी वर्ष 4 नवंबर को कब्जा सौंप दिया गया था।
उस समय यह संपत्ति निर्धारित नियमों के अनुसार आवंटित की गई थी।
कई बार बदला स्वामित्व
दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2005 में यह संपत्ति विक्रय विलेख के माध्यम से विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुई।
इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दंपति ने यह संपत्ति वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दी।
इस तरह समय के साथ इमारत का स्वामित्व कई हाथों में बदलता रहा।
प्रशासन अब यह भी जांच कर रहा है कि अलग-अलग समय पर संपत्ति के उपयोग और निर्माण में क्या बदलाव हुए।
2014 में आवासीय उपयोग के लिए मिला था नक्शा
जानकारी के अनुसार लगभग 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का नक्शा 20 अगस्त 2014 को स्वतः मानचित्र योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
इसका अर्थ था कि इमारत को आवासीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति थी।
लेकिन बाद में निर्माण में अनियमितता की शिकायतें सामने आईं।
एलडीए ने जांच की तो पाया कि इमारत में स्वीकृत नक्शे से अलग निर्माण किया गया है।
इसके बाद वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज किया गया।
जांच के बाद जारी हुआ था ध्वस्तीकरण आदेश
मामले की जांच के बाद 10 मई 2016 को एलडीए ने अनधिकृत निर्माण हटाने के लिए ध्वस्तीकरण आदेश जारी किया।
नियमों के अनुसार इस आदेश के बाद अवैध हिस्से को हटाया जाना था।
लेकिन करीब दो महीने बाद 5 जुलाई 2016 को यह आदेश निरस्त कर दिया गया।
यही फैसला अब सबसे बड़ा जांच का केंद्र बन गया है।
लोगों का सवाल है कि अगर निर्माण में कमी थी तो कार्रवाई क्यों रोक दी गई?
अग्निकांड ने खोली व्यवस्था की पोल
सोमवार को इसी इमारत में लगी आग ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को बचने का मौका तक नहीं मिला।
कई लोग इमारत के अंदर फंस गए और दम घुटने तथा झुलसने से उनकी मौत हो गई।
हादसे के बाद राहत और बचाव दल मौके पर पहुंचा और काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया।
लेकिन तब तक कई परिवार उजड़ चुके थे।
15 लोगों की मौत, कई घायल
इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जबकि नौ लोग घायल हुए।
घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।
मृतकों में कई ऐसे लोग थे जो रोजमर्रा के काम के लिए इमारत में मौजूद थे।
हादसे के बाद पूरे इलाके में शोक का माहौल है।
चार लोग गिरफ्तार
पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
गिरफ्तार किए गए लोगों में राम कृष्ण उपाध्याय, वीरेन्द्र प्रसाद शुक्ला, तुषार कृष्ण जायसवाल और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आग लगने के पीछे लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी या कोई अन्य कारण तो नहीं था।
मालिकों और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
इस घटना के बाद केवल इमारत मालिक ही नहीं बल्कि संबंधित विभागों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
क्योंकि अगर किसी इमारत के खिलाफ अवैध निर्माण की कार्रवाई शुरू हुई थी और उसे गिराने का आदेश भी हुआ था, तो फिर वह आदेश वापस क्यों लिया गया?
क्या निरीक्षण में कोई कमी रह गई?
क्या दस्तावेजों की सही जांच हुई थी?
इन सभी सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
सुरक्षा नियमों की अनदेखी बनी बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बहुमंजिला इमारत में आग से बचाव के लिए सुरक्षा व्यवस्था बेहद जरूरी होती है।
फायर सेफ्टी उपकरण, आपातकालीन रास्ते, बिजली व्यवस्था और निर्माण मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है।
अगर इनमें लापरवाही होती है तो छोटी घटना भी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है।
लखनऊ की यह घटना इसी खतरे की गंभीर याद दिलाती है।
निष्कर्ष
अलीगंज की इस इमारत में हुआ अग्निकांड केवल एक हादसा नहीं बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
जिस इमारत को वर्षों पहले अवैध निर्माण के कारण गिराने का आदेश दिया गया था, वही इमारत आज 15 लोगों की मौत का कारण बन गई।
अब जांच का उद्देश्य केवल दोष तय करना नहीं बल्कि उन सभी कारणों को सामने लाना होना चाहिए जिनकी वजह से यह स्थिति बनी।
अगर समय रहते 2016 के आदेश पर कार्रवाई होती, तो शायद कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
यह घटना प्रशासन, विकास प्राधिकरण और भवन सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि नियमों की अनदेखी का परिणाम कितना भयावह हो सकता है।