हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ITBP कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी बदली, कहा- सज़ा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में सज़ा का निर्धारण करते समय समानता और समानुपातिकता (Doctrine of Proportionality) के सिद्धांतों को ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट ने इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के एक कॉन्स्टेबल को सीनियर अधिकारी की पत्नी के साथ आपसी सहमति से संबंध बनाने के मामले में दी गई नौकरी से बर्खास्तगी की सज़ा को बहुत कठोर माना और उसे बदलकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) में बदल दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी का आचरण गलत और अनुशासन के खिलाफ हो सकता है, लेकिन सज़ा इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि वह मामले की पूरी परिस्थितियों की अनदेखी कर दे। कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जब उसी मामले से जुड़े सीनियर अधिकारी को अपेक्षाकृत कम सज़ा मिली हो, तो जूनियर कर्मचारी को नौकरी से निकाल देना समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
यह फैसला हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) में तैनात एक कॉन्स्टेबल से जुड़ा था। अपीलकर्ता कॉन्स्टेबल की तैनाती लेह में थी, जहां वह असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के सिक्योरिटी असिस्टेंट के रूप में काम कर रहा था।
तैनाती के दौरान कॉन्स्टेबल और असिस्टेंट कमांडेंट की पत्नी के बीच संबंध बन गए। इस मामले में अधिकारी की पत्नी की शिकायत के बाद कॉन्स्टेबल के खिलाफ ITBP Act, 1992 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई।
विभागीय जांच में कॉन्स्टेबल को अच्छे अनुशासन और व्यवस्था के खिलाफ आचरण का दोषी पाया गया। इसके बाद समरी फोर्स कोर्ट ने जून 2010 में उसे सेवा से बर्खास्त करने का आदेश दिया।
कॉन्स्टेबल ने हाईकोर्ट में अपनी याचिका के माध्यम से आरोपों को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल यह कहा कि उसके खिलाफ दी गई सज़ा बहुत कठोर है और परिस्थितियों को देखते हुए इसमें कमी की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने माना कि न्यायिक समीक्षा सीमित होती है
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप सीमित होता है। अदालत सामान्य रूप से विभागीय जांच के निष्कर्षों में दखल नहीं देती, लेकिन यदि सज़ा अपराध की गंभीरता की तुलना में अत्यधिक हो तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
बेंच ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सज़ा तय करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार मनमाने तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सज़ा ऐसी होनी चाहिए जो किए गए कदाचार के अनुपात में हो।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समानुपातिकता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि किसी कर्मचारी को ऐसी सज़ा न मिले जो मामले की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए अनुचित या अत्यधिक कठोर हो।
सीनियर अधिकारी की भूमिका पर कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस मामले में हाईकोर्ट ने उस पहलू को भी देखा जो इस विवाद को अलग बनाता था। कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि असिस्टेंट कमांडेंट अविनाश सिंह के खिलाफ भी अलग से अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी।
आरोप था कि अधिकारी ने अपनी पत्नी को कॉन्स्टेबल के साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया और उस घटना को अपने लैपटॉप पर रिकॉर्ड किया।
जांच में अधिकारी के खिलाफ सभी आरोप साबित नहीं हुए, लेकिन लैपटॉप पर रिकॉर्डिंग करने का आरोप साबित हुआ। इसके बाद अधिकारी को केवल पेंशन संबंधी लाभों के उद्देश्य से उसकी दो साल की पिछली सेवा जब्त करने की सज़ा दी गई।
हाईकोर्ट ने इस अंतर को गंभीरता से देखा। कोर्ट ने कहा कि यदि सीनियर अधिकारी, जो पूरे मामले में महत्वपूर्ण भूमिका में था, उसे केवल सीमित सज़ा दी गई, तो जूनियर कर्मचारी को सीधे नौकरी से निकाल देना उचित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने रिकॉर्डिंग वाले पहलू को माना अहम
डिवीजन बेंच ने कहा कि मामले में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सीनियर अधिकारी को घटना की जानकारी थी और इसके बावजूद उसने अपीलकर्ता को अपने अधीन बनाए रखा।
कोर्ट ने यह भी देखा कि अधिकारी की पत्नी के बयान दोनों कार्यवाहियों में काफी हद तक समान थे। उसने आरोप लगाया था कि उसके पति ने ही उसे मजबूर किया और घटनाओं को रिकॉर्ड किया।
बेंच ने कहा कि यदि कोई अधिकारी अपने पद का गलत इस्तेमाल करता है और ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, तो पूरे मामले को केवल जूनियर कर्मचारी के आचरण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि सशस्त्र बलों में अनुशासन का विशेष महत्व होता है और किसी भी प्रकार का अनैतिक या अनुशासनहीन आचरण स्वीकार नहीं किया जा सकता, लेकिन न्याय करते समय सभी परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है।
“सिर्फ कॉन्स्टेबल को कठोर सज़ा देना उचित नहीं”
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब सीनियर अधिकारी को अपने लैपटॉप की मदद से रिकॉर्डिंग करने और गलत आचरण के लिए दोषी पाया जा चुका है, तो ऐसी स्थिति में केवल कॉन्स्टेबल को नौकरी से निकालने जैसी कठोर सज़ा देना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने माना कि कॉन्स्टेबल का आचरण गंभीर था और इससे बल की गरिमा प्रभावित हुई, लेकिन सज़ा तय करते समय यह भी देखना होगा कि घटना किन परिस्थितियों में हुई।
अदालत ने कहा कि अनुशासन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन अनुशासन के नाम पर ऐसी सज़ा नहीं दी जा सकती जो न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हो।
बर्खास्तगी की जगह अनिवार्य सेवानिवृत्ति
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कॉन्स्टेबल को दी गई सेवा से बर्खास्तगी की सज़ा को बदल दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि कॉन्स्टेबल को बर्खास्त नहीं माना जाएगा बल्कि उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाएगी। साथ ही उसे नियमों के अनुसार संबंधित लाभ देने के निर्देश दिए गए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला गलत आचरण को सही ठहराने के लिए नहीं है, बल्कि केवल सज़ा की मात्रा को न्यायसंगत बनाने के लिए है।
फैसले का महत्व
यह फैसला सरकारी सेवाओं और विशेष रूप से अनुशासित बलों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने दोहराया है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में भी निष्पक्षता और समानता जरूरी है।
किसी कर्मचारी का दोष साबित होने के बाद भी सज़ा तय करते समय यह देखना होगा कि क्या वह अपराध की गंभीरता के अनुरूप है या नहीं।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि कानून के तहत हर कर्मचारी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और सज़ा का उद्देश्य सुधार और न्याय होना चाहिए, केवल कठोर दंड देना नहीं।