इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला: शादी का वादा टूटना हर बार दुष्कर्म नहीं, सहमति से बने संबंधों पर कोर्ट ने कही बड़ी बात
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्क लोगों के बीच लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध बने हों और बाद में किसी कारणवश शादी नहीं हो पाती, तो हर स्थिति में इसे दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून की नजर में यह देखना जरूरी है कि क्या संबंध बनाते समय आरोपी का इरादा शुरू से ही धोखा देने का था या नहीं।
हाई कोर्ट ने कानपुर नगर के एक युवक के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मुकदमे को रद्द करते हुए कहा कि शादी का वादा पूरा न होना और झूठा शादी का वादा करके किसी की सहमति लेना — दोनों अलग-अलग कानूनी परिस्थितियां हैं। अदालत ने कहा कि केवल रिश्ते के टूट जाने या विवाह न हो पाने के आधार पर आपराधिक मामला चलाना उचित नहीं है। प्रत्येक मामले की जांच उसके तथ्यों, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए।
फेसबुक से शुरू हुई दोस्ती बदली प्रेम संबंध में
यह मामला कानपुर नगर के गुजैनी थाना क्षेत्र से जुड़ा था। शिकायतकर्ता युवती ने मार्च 2024 में पुलिस के पास एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि उसकी पहचान आरोपी युवक से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के माध्यम से हुई थी।
शुरुआत में दोनों के बीच बातचीत हुई और धीरे-धीरे यह दोस्ती प्रेम संबंध में बदल गई। दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और दोनों ने एक-दूसरे के साथ समय बिताना शुरू किया। युवती का आरोप था कि युवक ने उससे शादी करने का भरोसा दिलाया और इसी विश्वास के आधार पर दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध बने।
पीड़िता के अनुसार, कुछ समय बाद युवक ने शादी करने से इनकार कर दिया और दूसरी युवती से विवाह कर लिया। इसके बाद युवती ने आरोप लगाया कि उसे शादी का झूठा भरोसा देकर संबंध बनाए गए और इसी आधार पर उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
अदालत के सामने आया पूरा मामला
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एफआईआर, पीड़िता के बयान और अन्य दस्तावेजों का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि मामले में कई महत्वपूर्ण पहलू ऐसे थे जिन पर विचार करना जरूरी था।
अदालत ने गौर किया कि पीड़िता अपने बयान में यह स्वीकार कर चुकी थी कि दोनों के बीच बने संबंध सहमति से बने थे। वह बालिग थी और अपने फैसले लेने में सक्षम थी।
कोर्ट ने यह भी देखा कि एफआईआर में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था कि पहली बार संबंध कब, कहां और किस परिस्थिति में बने। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में यह तथ्य महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या शुरुआत से ही आरोपी ने झूठा वादा किया था या बाद की परिस्थितियों में रिश्ता खत्म हुआ।
शादी का वादा और झूठा वादा — दोनों में अंतर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हर प्रेम संबंध का अंत विवाह में हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार परिस्थितियां बदल जाती हैं, परिवारों की सहमति नहीं बनती, व्यक्तिगत कारण सामने आ जाते हैं या अन्य वजहों से शादी नहीं हो पाती।
लेकिन यदि कोई व्यक्ति शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखता और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा करता है, तो स्थिति अलग होगी। ऐसे मामलों में कानून के तहत अपराध बन सकता है।
अदालत ने कहा कि किसी वादे का बाद में पूरा न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वादा शुरू से ही झूठा था।
शिकायत दर्ज कराने के समय पर भी कोर्ट की नजर
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि शिकायत उस समय दर्ज कराई गई जब युवती को आरोपी युवक के विवाह कार्यक्रम की जानकारी मिली।
कोर्ट ने इस पहलू को भी मामले की परिस्थितियों का हिस्सा माना। अदालत ने कहा कि केवल बाद की नाराजगी या रिश्ते के टूटने के कारण आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
आपराधिक मामलों में आरोपी के इरादे और घटना की वास्तविक परिस्थितियों को साबित करना आवश्यक होता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के आरोप में यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने शुरुआत से ही पीड़िता को धोखा देने की मंशा से शादी का झूठा वादा किया था।
यदि आरोपी का इरादा शुरुआत में विवाह करने का था, लेकिन बाद में किसी कारण से विवाह नहीं हो पाया, तो केवल इस आधार पर संबंध को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। कानून का उद्देश्य वास्तविक अपराधों पर कार्रवाई करना है, न कि हर टूटे हुए रिश्ते को अपराध में बदल देना।
हाई कोर्ट ने रद्द की पूरी आपराधिक कार्यवाही
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपी युवक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत से संबंध बनाए थे। इसलिए मुकदमे को आगे चलाना न्याय के हित में नहीं होगा।
फैसले का कानूनी महत्व
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला प्रेम संबंधों, सहमति और आपराधिक कानून के बीच संतुलन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस फैसले से यह संदेश जाता है कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि अपराध के सभी आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।
वहीं, यह भी स्पष्ट है कि यदि किसी महिला को झूठे वादे के आधार पर संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया हो और आरोपी की शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत साबित हो, तो कानून पीड़िता की सुरक्षा के लिए मौजूद है।
न्यायालय ने इस फैसले के माध्यम से यह रेखांकित किया कि कानून का इस्तेमाल निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए। न तो वास्तविक अपराधों को नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति को केवल रिश्ते के टूटने के कारण अपराधी ठहराया जा सकता है।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण के रूप में देखा जाएगा।