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गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ आपराधिक मुकदमा लंबित होने से MBBS की मूल डिग्री नहीं रोकी जा सकती

गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ आपराधिक मुकदमा लंबित होने से MBBS की मूल डिग्री नहीं रोकी जा सकती

       न्यायालय ने कहा- दोषसिद्धि से पहले किसी छात्र के करियर को अनिश्चितकाल तक नहीं रोका जा सकता, पढ़ाई और इंटर्नशिप पूरी होने के बाद प्रमाणपत्र जारी करना होगा

        गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा और छात्रों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी छात्र के खिलाफ केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर उसका मूल अंतिम MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र (Final MBBS Pass Certificate) अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को सक्षम न्यायालय द्वारा दोषी घोषित नहीं किया जाता, तब तक केवल मुकदमे का लंबित रहना उसके शैक्षणिक अधिकारों को रोकने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

न्यायमूर्ति बुद्धि हाबुंग की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई छात्र निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा कर चुका है, अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर चुका है और संबंधित नियामक संस्था से पंजीकरण भी प्राप्त कर चुका है, तो उसकी योग्यता को केवल लंबित आपराधिक कार्यवाही के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।

मामला क्या था?

यह मामला वालिया मुर्शिदा हुडा द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने गुवाहाटी हाईकोर्ट से मांग की थी कि उन्हें उनका मूल अंतिम MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश दिया जाए।

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2010 में असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ में MBBS पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। हालांकि, बाद में उनके प्रवेश से संबंधित विवाद सामने आया और इसी कारण उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ।

इसके बावजूद राज्य सरकार के आदेश के बाद उन्हें और अन्य छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने तथा पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति दी गई।

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2011 में MBBS की पढ़ाई पूरी कर ली और इसके बाद वर्ष 2012 में एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप भी सफलतापूर्वक पूरी की।

इसके बाद उन्होंने मेडिकल प्रैक्टिस के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें असम चिकित्सा पंजीकरण परिषद से अंतिम पंजीकरण भी प्राप्त हो गया।

लेकिन इसके बावजूद उन्हें उनका मूल MBBS डिग्री प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया।

लंबित आपराधिक केस बना प्रमाणपत्र रोकने का कारण

सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा प्रमाणपत्र जारी न करने का मुख्य कारण याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला था।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि मामला अभी विचाराधीन है और मुकदमा साक्ष्य के चरण में है।

मामले में कुल 42 गवाहों में से अभी तक केवल 10 गवाहों की गवाही हुई थी। यानी मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ था और अदालत द्वारा कोई दोषसिद्धि भी नहीं की गई थी।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि समान परिस्थितियों वाले अन्य छात्रों को उनके मूल प्रमाणपत्र पहले ही जारी किए जा चुके हैं।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने पूरे मामले की समीक्षा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी गई, उन्होंने MBBS पाठ्यक्रम पूरा किया, अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी की और उन्हें मेडिकल पंजीकरण भी प्रदान किया गया।

न्यायालय ने कहा कि इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि सक्षम अधिकारियों ने उनकी शैक्षणिक योग्यता और पाठ्यक्रम पूरा करने को स्वीकार किया है।

ऐसी स्थिति में केवल लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर मूल प्रमाणपत्र रोकना उचित नहीं है।

दोष सिद्ध होने से पहले सजा जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता

हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि कानून की नजर में प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसे न्यायालय द्वारा दोषी घोषित नहीं किया जाता।

यदि केवल आरोप या लंबित मुकदमे के आधार पर किसी व्यक्ति की डिग्री रोक दी जाए तो यह उसके भविष्य और पेशेवर जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

अदालत ने कहा कि शिक्षा पूरी करने के बाद प्रमाणपत्र जारी करना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे बिना उचित कानूनी आधार के अनिश्चित समय तक रोका नहीं जा सकता।

दो महीने में प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ के प्राचार्य सहित संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को उनका मूल अंतिम MBBS उत्तीर्ण प्रमाणपत्र जारी किया जाए।

यदि प्रमाणपत्र पहले ही जारी नहीं किया गया है तो उसे तत्काल जारी करने के निर्देश दिए गए।

इसके साथ ही अदालत ने संबंधित नियामक प्राधिकरण को याचिकाकर्ता के पंजीकरण संबंधी रिकॉर्ड को भी अपडेट करने का आदेश दिया।

फैसला आपराधिक मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा

हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश लंबित आपराधिक मामले को समाप्त नहीं करता।

यदि भविष्य में सक्षम न्यायालय द्वारा मामले में कोई अलग निर्णय दिया जाता है, तो उसके अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

अर्थात अदालत ने याचिकाकर्ता को वर्तमान स्थिति में उसके शैक्षणिक अधिकारों का लाभ देने का आदेश दिया, लेकिन आपराधिक मामले के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं किया।

कानूनी महत्व

यह फैसला छात्रों और पेशेवर पाठ्यक्रमों में अध्ययन करने वाले लोगों के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फैसले से यह सिद्धांत मजबूत होता है कि:

  • केवल आरोप लगना दोष सिद्ध होना नहीं है।
  • लंबित आपराधिक मुकदमा किसी व्यक्ति की पूरी शैक्षणिक योग्यता को खत्म नहीं कर सकता।
  • डिग्री और प्रमाणपत्र रोकने के लिए ठोस कानूनी आधार आवश्यक है।
  • प्रशासनिक अधिकारी किसी व्यक्ति के भविष्य को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकते।

गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह निर्णय शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।