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12 जून 1975 का ऐतिहासिक फैसला और आपातकाल की ओर बढ़ते कदम: कैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक निर्णय ने बदल दिया भारतीय लोकतंत्र का इतिहास

12 जून 1975 का ऐतिहासिक फैसला और आपातकाल की ओर बढ़ते कदम: कैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक निर्णय ने बदल दिया भारतीय लोकतंत्र का इतिहास

      भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं जो केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास की दिशा बदलने वाले पड़ाव बन जाती हैं। 12 जून 1975 ऐसी ही एक ऐतिहासिक तारीख है। इसी दिन Allahabad High Court के न्यायमूर्ति Jagmohanlal Sinha ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की राजनीतिक स्थिति को गहरे संकट में डाल दिया।

यह केवल एक चुनाव याचिका पर दिया गया न्यायिक निर्णय नहीं था, बल्कि ऐसा घटनाक्रम था जिसने अगले 13 दिनों में देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। इसी फैसले के बाद घटनाओं की एक तेज श्रृंखला शुरू हुई, जिसका अंत 25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल (Emergency) लागू होने के रूप में हुआ।

आज, उस ऐतिहासिक फैसले के 51 वर्ष पूरे होने पर यह समझना आवश्यक है कि आखिर अदालत ने क्या कहा था, इंदिरा गांधी का चुनाव क्यों रद्द हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने क्या राहत दी, और आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं कि देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।


1971 का चुनाव: विवाद की शुरुआत

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 1971 के लोकसभा चुनाव से हुई।

उस समय रायबरेली संसदीय सीट से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव लड़ रही थीं। उनके सामने समाजवादी नेता Raj Narain थे।

चुनाव परिणाम में इंदिरा गांधी ने बड़ी जीत हासिल की। लेकिन राज नारायण ने अपनी हार स्वीकार नहीं की और इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल कर दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव जीतने के लिए इंदिरा गांधी ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, सरकारी कर्मचारियों की सहायता ली और चुनावी लाभ प्राप्त किया।

यह मामला भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी मुकदमों में बदल गया।


चार वर्षों तक चली सुनवाई

यह मुकदमा लगभग चार वर्षों तक चला।

मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी स्वयं अदालत में उपस्थित हुईं और गवाही दी।

वह भारत के इतिहास में अदालत में गवाही देने वाली पहली प्रधानमंत्री बनीं।

करीब पांच घंटे तक उनसे जिरह हुई और विभिन्न आरोपों पर सवाल पूछे गए।

इसके बाद पूरा देश अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करने लगा।


12 जून 1975: इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्ट रूम नंबर 15 में देश की निगाहें टिकी हुई थीं।

न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने 238 पृष्ठों का विस्तृत फैसला सुनाया।

अदालत ने राज नारायण द्वारा लगाए गए 14 आरोपों में से 12 आरोपों को खारिज कर दिया।

लेकिन दो आरोपों को सही माना गया।

यही दो आरोप आगे चलकर पूरे राजनीतिक संकट का कारण बने।


पहला आरोप: यशपाल कपूर की भूमिका

अदालत ने पाया कि इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे Yashpal Kapoor ने सरकारी पद से औपचारिक रूप से इस्तीफा प्रभावी होने से पहले ही चुनाव एजेंट के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया था।

उस समय वह अभी भी सरकारी कर्मचारी माने जा रहे थे।

जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुसार किसी सरकारी कर्मचारी का चुनाव अभियान में इस प्रकार शामिल होना अवैध था।


दूसरा आरोप: सरकारी मशीनरी का उपयोग

अदालत ने यह भी माना कि उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की।

न्यायालय के अनुसार यह सरकारी संसाधनों का चुनावी उपयोग था।

इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन माना गया।


अदालत ने क्या फैसला दिया?

इन दोनों आरोपों को सिद्ध मानते हुए अदालत ने इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया।

साथ ही उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया।

हालांकि अदालत ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए 20 दिन का समय भी दिया।

यह भारतीय इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी।

पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का निर्वाचन न्यायालय द्वारा रद्द किया गया था।


देश में राजनीतिक भूचाल

फैसले के तुरंत बाद पूरे देश में राजनीतिक हलचल शुरू हो गई।

विपक्षी दलों ने कहा कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है तो इंदिरा गांधी को नैतिक आधार पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

वहीं कांग्रेस ने इसे राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखा।


13 जून 1975: इस्तीफे की मांग

फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला।

इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी।

दूसरी ओर कांग्रेस संगठन पूरी ताकत से उनके समर्थन में उतर आया।

हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री Bansi Lal बड़ी संख्या में समर्थकों को दिल्ली लाने लगे।

दिल्ली में इंदिरा गांधी के समर्थन में प्रदर्शन होने लगे।

कुछ स्थानों पर न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा के पुतले भी जलाए गए।


14 से 19 जून: संघर्ष का नया दौर

इस अवधि में राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ता गया।

इंदिरा गांधी अपने समर्थकों को संबोधित करती रहीं और उन्होंने आरोप लगाया कि देश और विदेश की कुछ शक्तियां उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।

मामला अब कानूनी विवाद से आगे बढ़कर राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुका था।


20 जून 1975: बोट क्लब की विशाल रैली

20 जून को दिल्ली के बोट क्लब मैदान में कांग्रेस ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।

इंदिरा गांधी ने विशाल जनसभा को संबोधित किया।

उनके साथ उनके पुत्र Sanjay Gandhi और बहू Sonia Gandhi भी मौजूद थीं।

उन्होंने कहा कि वह जीवन की अंतिम सांस तक देश की सेवा करती रहेंगी।


कांग्रेस के भीतर बढ़ती चिंता

इसी दौरान कांग्रेस के भीतर भी चर्चा शुरू हो गई।

कई वरिष्ठ नेताओं को आशंका थी कि यदि सुप्रीम कोर्ट भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है तो गंभीर संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।

कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि इंदिरा गांधी अस्थायी रूप से पद छोड़ सकती हैं।

लेकिन यह सुझाव स्वीकार नहीं किया गया।


23 जून: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति V. R. Krishna Iyer के समक्ष हुई।

पूरा देश इस आदेश का इंतजार कर रहा था।


24 जून 1975: आधी राहत, आधा संकट

न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने इंदिरा गांधी को पूर्ण राहत नहीं दी।

उन्होंने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति दी, लेकिन सांसद के रूप में मतदान करने और वेतन प्राप्त करने पर रोक लगा दी।

यह आदेश न तो पूरी जीत था और न ही पूरी हार।

राजनीतिक संकट अभी भी समाप्त नहीं हुआ था।


जगजीवन राम को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा

संकट बढ़ने के साथ कांग्रेस के भीतर वैकल्पिक नेतृत्व पर भी चर्चा होने लगी।

कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि मामले का अंतिम निर्णय आने तक Jagjivan Ram को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है।

लेकिन इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं थीं।

उन्हें आशंका थी कि यदि उन्होंने पद छोड़ा तो सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी।


25 जून 1975: विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन

25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल विपक्षी रैली आयोजित हुई।

इस रैली का नेतृत्व Jayaprakash Narayan ने किया।

उन्होंने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग दोहराई।

साथ ही 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा की।

जेपी ने प्रशासन, पुलिस और सेना से संविधान के प्रति निष्ठा बनाए रखने की अपील भी की।


आपातकाल की तैयारी

इसी दिन प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति पर विचार-विमर्श किया।

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री Siddhartha Shankar Ray ने आपातकाल संबंधी कानूनी मसौदे की तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राष्ट्रपति Fakhruddin Ali Ahmed को संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लागू करने की सिफारिश भेजी गई।


25 जून 1975 की रात: आपातकाल लागू

25 जून की रात राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए।

देश में “आंतरिक अशांति” (Internal Disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर दिया गया।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद संवैधानिक निर्णयों में से एक माना जाता है।


26 जून 1975: देश ने नई सुबह देखी

26 जून की सुबह देशवासियों को पता चला कि देश में आपातकाल लागू हो चुका है।

रातों-रात विपक्ष के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

जयप्रकाश नारायण, Morarji Desai सहित अनेक नेताओं को हिरासत में लिया गया।

हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को Maintenance of Internal Security Act (MISA) के तहत बिना मुकदमे जेल भेज दिया गया।


आपातकाल के दौरान क्या हुआ?

आपातकाल के दौरान—

  • प्रेस सेंसरशिप लागू हुई।
  • नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए।
  • राजनीतिक विरोध को सीमित किया गया।
  • विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं।
  • प्रशासनिक अनुशासन और नियंत्रण को बढ़ावा दिया गया।

सरकार ने इसे देश में स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक कदम बताया।

वहीं आलोचकों ने इसे भारतीय लोकतंत्र पर सबसे बड़ा आघात कहा।


इतिहास में 12 जून 1975 का महत्व

12 जून 1975 का इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक व्यवस्था का एक ऐतिहासिक उदाहरण माना जाता है।

इस निर्णय ने यह सिद्ध किया कि कानून की नजर में देश का सबसे शक्तिशाली पद भी न्यायिक समीक्षा से ऊपर नहीं है।

हालांकि इस फैसले के बाद जो राजनीतिक घटनाक्रम शुरू हुआ, उसने देश को आपातकाल जैसे असाधारण दौर में पहुंचा दिया।

इसलिए 12 जून 1975 केवल एक न्यायिक निर्णय की तारीख नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका, कार्यपालिका और संवैधानिक राजनीति के संबंधों को समझने की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है। यह दिन आज भी इस बात की याद दिलाता है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती कितनी महत्वपूर्ण होती है।