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पासपोर्ट धारकों के लिए बड़ी राहत: आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से पासपोर्ट रिन्यू करने से इनकार नहीं किया जा सकता

पासपोर्ट धारकों के लिए बड़ी राहत: आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से पासपोर्ट रिन्यू करने से इनकार नहीं किया जा सकता – आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

        भारत में पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह नागरिक की पहचान, स्वतंत्रता और विदेश यात्रा के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में पासपोर्ट के जारी होने या उसके नवीनीकरण (Renewal) को लेकर समय-समय पर न्यायालयों द्वारा महत्वपूर्ण निर्णय दिए जाते रहे हैं। हाल ही में Andhra Pradesh High Court ने एक ऐसा महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो देशभर के लाखों पासपोर्ट धारकों और पासपोर्ट के लिए आवेदन करने वाले लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से उसके पासपोर्ट को जारी करने या नवीनीकरण करने से इनकार नहीं किया जा सकता। जब तक किसी मामले में सक्षम न्यायालय द्वारा संज्ञान (Cognizance) नहीं लिया जाता, तब तक उसे पासपोर्ट कानून के तहत लंबित न्यायिक कार्यवाही नहीं माना जाएगा।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक 16 वर्षीय नाबालिग द्वारा दायर याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। पासपोर्ट आवेदन की प्रक्रिया के दौरान पुलिस सत्यापन (Police Verification) किया गया, जिसमें यह सामने आया कि याचिकाकर्ता का नाम एक आपराधिक मामले में शामिल है।

पुलिस रिपोर्ट में नाम आने के आधार पर क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी ने याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण मांगा और अंततः पासपोर्ट के नवीनीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत ने मांगी पूरी जानकारी

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Justice Subba Reddy Satti ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी द्वारा लिए गए निर्णय की पूरी जानकारी मांगी।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामले में अभी तक पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट (Final Report/Charge Sheet) अदालत में प्रस्तुत नहीं की थी। इतना ही नहीं, संबंधित न्यायालय ने भी उस मामले में अभी तक संज्ञान नहीं लिया था।

आंध्र प्रदेश सरकार ने अदालत को क्या बताया?

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित आपराधिक मामले की जांच अभी पूर्ण नहीं हुई है। पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई है और न्यायालय ने मामले में अभी तक कोई संज्ञान नहीं लिया है।

इस महत्वपूर्ण तथ्य ने पूरे विवाद की दिशा बदल दी, क्योंकि पासपोर्ट अधिनियम के तहत “लंबित न्यायिक कार्यवाही” का प्रश्न तभी उठता है जब मामला वास्तव में न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हो।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति सुब्बा रेड्डी सट्टी ने कहा कि—

“किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना और न्यायालय में उसके विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।”

अदालत ने कहा कि जब तक किसी मामले में न्यायालय द्वारा संज्ञान नहीं लिया जाता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति के खिलाफ न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही लंबित है।

इसलिए केवल एफआईआर दर्ज होने या पुलिस जांच चलने के आधार पर पासपोर्ट जारी करने या नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता।

पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f) की व्याख्या

अदालत ने Passports Act, 1967 की धारा 6(2)(f) का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य उन मामलों को कवर करना है जिनमें किसी व्यक्ति के खिलाफ वास्तव में न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही लंबित हो।

यदि केवल एफआईआर दर्ज है, जांच जारी है या पुलिस ने अभी तक आरोपपत्र प्रस्तुत नहीं किया है, तो ऐसी स्थिति को धारा 6(2)(f) के अंतर्गत लंबित न्यायिक कार्यवाही नहीं माना जा सकता।

निर्दोषता के सिद्धांत पर अदालत का जोर

अदालत ने आपराधिक न्यायशास्त्र के एक मूलभूत सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि—

“जब तक किसी व्यक्ति का अपराध विधि द्वारा सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है।”

भारत की न्याय व्यवस्था “Presumption of Innocence” अर्थात निर्दोषता की धारणा पर आधारित है। इसलिए किसी व्यक्ति को केवल आरोप लगने भर से दोषी नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने कहा कि यदि केवल एफआईआर या जांच के आधार पर पासपोर्ट रोका जाने लगे तो इससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होगा।

विदेश यात्रा का अधिकार भी है महत्वपूर्ण

फैसले में अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें विदेश यात्रा के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) का हिस्सा माना गया है।

अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

अदालत ने कहा कि विदेश यात्रा करने का अधिकार भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसे अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।

पुराने फैसलों का भी लिया गया सहारा

न्यायमूर्ति सट्टी ने पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक सक्षम न्यायालय किसी मामले में संज्ञान नहीं लेता, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उस व्यक्ति के खिलाफ न्यायालय में कोई लंबित आपराधिक कार्यवाही है।

अतः केवल पुलिस जांच या एफआईआर को पासपोर्ट जारी करने में बाधा नहीं बनाया जा सकता।

पासपोर्ट अधिकारी को क्या निर्देश दिए गए?

मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के आवेदन पर पुनर्विचार करे और Passports Rules, 1980 तथा पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार विधिसम्मत निर्णय ले।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामला दर्ज होने के आधार पर आवेदन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस फैसले का देशभर में क्या प्रभाव पड़ेगा?

यह निर्णय उन हजारों लोगों के लिए राहत लेकर आया है जिनके खिलाफ किसी कारणवश एफआईआर दर्ज है या जिनके मामले जांच के स्तर पर हैं।

इस फैसले के बाद निम्नलिखित सिद्धांत और अधिक स्पष्ट हो गए हैं—

  1. केवल एफआईआर दर्ज होना पासपोर्ट रिन्यूअल रोकने का आधार नहीं है।
  2. पुलिस जांच लंबित होने मात्र से पासपोर्ट आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
  3. न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए बिना मामले को लंबित न्यायिक कार्यवाही नहीं माना जाएगा।
  4. प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए।
  5. विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।
  6. पासपोर्ट अधिकारियों को कानून की सही व्याख्या करते हुए निर्णय लेना होगा।

निष्कर्ष

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला नागरिक स्वतंत्रता, प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल आपराधिक मामला दर्ज होने के आधार पर किसी नागरिक को उसके पासपोर्ट संबंधी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। जब तक न्यायालय मामले में संज्ञान लेकर कार्यवाही प्रारंभ नहीं करता, तब तक उसे पासपोर्ट अधिनियम के तहत लंबित न्यायिक कार्यवाही नहीं माना जाएगा।

यह निर्णय न केवल पासपोर्ट धारकों के लिए राहतकारी है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा को केवल आरोपों के आधार पर प्रभावित न किया जाए।