अतिक्रमण हटाओ अभियान के विरोध में वकीलों की हड़ताल को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बताया अवैध, अवमानना की कार्रवाई का नोटिस
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में स्थानीय अधिवक्ताओं द्वारा की गई आठ दिवसीय हड़ताल को गंभीरता से लेते हुए इसे अवैध और अनुचित करार दिया है। न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ताओं को न्यायिक कार्य से बहिष्कार करने या हड़ताल पर जाने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर न्याय पाने के लिए अदालत आने वाले आम नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ता है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ और लखनऊ बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए तथा उनके आचरण की शिकायत बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को क्यों न भेजी जाए।
यह मामला लखनऊ जिला न्यायालय परिसर के बाहर 17 मई को हुई घटना से जुड़ा है, जिसमें अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब प्रशासन ने हाईकोर्ट के निर्देश के अनुपालन में चकबस्त चौराहे के पास जिला न्यायालय क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू किया।
प्रशासन की कार्रवाई का कुछ स्थानीय लोगों और अधिवक्ताओं ने विरोध किया। विरोध के कारण अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया प्रभावित हुई और प्रशासन 72 चिन्हित अतिक्रमणों में से केवल 14 अतिक्रमण ही हटा सका।
इसके बाद दोनों बार एसोसिएशनों ने 18 मई से 26 मई तक न्यायिक कार्य से पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया। अधिवक्ताओं के इस निर्णय के कारण अदालतों में कामकाज प्रभावित हुआ और बड़ी संख्या में वादकारियों को परेशानी उठानी पड़ी।
वीडियो सामने आने पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान जिला जज की रिपोर्ट और कुछ वीडियो रिकॉर्डिंग अदालत के सामने प्रस्तुत की गईं। इन वीडियो में कथित तौर पर एक अधिवक्ता अन्य वकीलों को प्लास्टिक की लाठियां बांटते हुए दिखाई दे रहा था। वीडियो में प्रशासन और पुलिस के खिलाफ आक्रोशपूर्ण नारे भी लगाए जाने की बात सामने आई।
हाईकोर्ट ने इन घटनाओं को गंभीर मानते हुए कहा कि न्यायपालिका से जुड़े लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के शासन और न्याय व्यवस्था की गरिमा बनाए रखें। यदि अधिवक्ता ही न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करेंगे तो इससे आम जनता का विश्वास प्रभावित होगा।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी मांग या विरोध के लिए लोकतांत्रिक तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन अदालतों का बहिष्कार करना और न्यायिक कार्य को रोकना उचित नहीं माना जा सकता।
हड़ताल के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिवक्ताओं को हड़ताल या अदालतों के बहिष्कार का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वकील न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनकी जिम्मेदारी अन्य नागरिकों की तुलना में अधिक होती है। वकीलों द्वारा अदालतों का काम रोकना न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देकर अदालतों के बहिष्कार को उचित नहीं ठहराया जा सकता। विरोध का अधिकार है, लेकिन ऐसा विरोध नहीं होना चाहिए जिससे न्याय पाने के इच्छुक लोगों को नुकसान हो।
गरीब वादकारियों को हुई परेशानी
हाईकोर्ट ने हड़ताल के प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालयों में आने वाले कई लोग दूर-दराज क्षेत्रों से आते हैं। इनमें बड़ी संख्या गरीब और जरूरतमंद लोगों की होती है, जो अपने मामलों की सुनवाई के लिए अदालतों पर निर्भर रहते हैं।
अदालत बंद होने या न्यायिक कार्य प्रभावित होने से ऐसे लोगों को आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे न्याय व्यवस्था को मजबूत करें, न कि उसे बाधित करें।
बार एसोसिएशन की कार्रवाई को भी किया गया रिकॉर्ड
हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि सेंट्रल बार एसोसिएशन ने कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की है।
एसोसिएशन ने कथित रूप से लाठियां बांटने वाले अधिवक्ता तथा एक अन्य अधिवक्ता, जिस पर प्रशासनिक न्यायाधीश के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप था, को पांच वर्ष के लिए एसोसिएशन की सदस्यता से निष्कासित कर दिया है।
हाईकोर्ट ने इस कदम को रिकॉर्ड पर लिया और तत्काल कठोर कार्रवाई करने के बजाय संबंधित पदाधिकारियों और तीन अधिवक्ताओं को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।
अवमानना कार्यवाही पर जवाब मांगा
अदालत ने बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों और संबंधित अधिवक्ताओं को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट यह तय करेगा कि उनके आचरण के लिए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए या नहीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। अधिवक्ता समुदाय न्याय व्यवस्था का अभिन्न अंग है, इसलिए उनसे अनुशासन और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।
न्याय व्यवस्था और अधिवक्ता आंदोलन के बीच संतुलन का सवाल
यह मामला केवल एक हड़ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि अधिवक्ताओं के विरोध के अधिकार और न्यायिक व्यवस्था की निरंतरता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अधिवक्ता समाज लंबे समय से अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन करता रहा है, लेकिन न्यायालयों का रुख लगातार यह रहा है कि विरोध का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे आम जनता को न्याय से वंचित होना पड़े।
हाईकोर्ट का यह आदेश एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि अदालतें केवल विवाद निपटाने का स्थान नहीं हैं, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का माध्यम भी हैं। इसलिए न्यायिक कार्य को बाधित करने वाली गतिविधियों को गंभीरता से देखा जाएगा।
इस मामले में आगे की सुनवाई के बाद यह स्पष्ट होगा कि संबंधित पदाधिकारियों और अधिवक्ताओं के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई आगे बढ़ती है या नहीं।