दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण योजना: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भवन ध्वस्तीकरण पर लगाई रोक, प्रभावित लोगों को मिली बड़ी राहत
दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण योजना के तहत प्रस्तावित भवनों के ध्वस्तीकरण को लेकर चल रहे विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रभावित भवन स्वामियों को बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायालय ने संबंधित संपत्तियों के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अगली सुनवाई तक किसी भी भवन के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोर्ट के इस आदेश से उन लोगों को राहत मिली है, जिनके मकान या संपत्तियां मार्ग चौड़ीकरण योजना के दायरे में आ रही थीं।
न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने अलिमुन्निशा की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। याचिका में नगर निगम वाराणसी के जोनल अधिकारी/सहायक नगर आयुक्त द्वारा जारी किए गए उस नोटिस को चुनौती दी गई थी, जिसके माध्यम से भवन को जर्जर बताते हुए उसे ध्वस्त करने की कार्रवाई की तैयारी की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि नगर निगम द्वारा जारी नोटिस कानून की निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि भवन को जर्जर घोषित करने से पहले उनकी आपत्तियों पर उचित विचार नहीं किया गया और न ही अंतिम निर्णय की जानकारी विधिवत रूप से दी गई। ऐसे में सीधे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना न्यायसंगत और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
ध्वस्तीकरण नोटिस को दी गई थी चुनौती
मामले में याचिकाकर्ता ने नगर निगम वाराणसी द्वारा 26 मई 2026 को उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा-331 के तहत जारी नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस नोटिस में संबंधित भवन को जर्जर और असुरक्षित बताते हुए उसे हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि किसी भी संपत्ति को गिराने से पहले कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। भवन स्वामी को सुनवाई का अवसर देना, आपत्तियों पर विचार करना और सक्षम अधिकारी द्वारा कारणयुक्त अंतिम आदेश पारित करना जरूरी है। लेकिन इस मामले में इन आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा किए बिना कार्रवाई की तैयारी की गई।
अदालत को बताया गया कि पहले भी नगर निगम द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया था कि एक संयुक्त समिति गठित कर मामले की जांच की जाए। समिति को प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने और उनकी आपत्तियों पर विचार करने के बाद निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था।
संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर उठे सवाल
मामले में आगे यह तथ्य सामने आया कि संयुक्त समिति की रिपोर्ट में भवन को जर्जर पाया गया और उसे ध्वस्त किए जाने की सिफारिश की गई। इसके आधार पर नगर निगम ने नया नोटिस जारी कर दिया।
हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि केवल समिति की रिपोर्ट के आधार पर किसी भवन को गिराया नहीं जा सकता। जब तक प्रभावित व्यक्ति को रिपोर्ट पर आपत्ति रखने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता, तब तक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता काजी मुहम्मद अकरम ने अदालत में दलील दी कि प्रशासनिक कार्रवाई में निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन जरूरी है। उन्होंने कहा कि बिना अंतिम आदेश की विधिवत जानकारी दिए और बिना कानूनी औपचारिकताएं पूरी किए किसी नागरिक की संपत्ति को नष्ट नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने दिया यथास्थिति बनाए रखने का आदेश
खंडपीठ ने दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलों को सुनने के बाद मामले में अंतरिम राहत प्रदान की। अदालत ने आदेश दिया कि विवादित भवन के संबंध में यथास्थिति बनाए रखी जाए। साथ ही यह भी निर्देश दिया गया कि 26 मई 2026 के नोटिस के आधार पर किसी भी प्रकार की ध्वस्तीकरण कार्रवाई नहीं की जाएगी।
अदालत ने राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी गई है।
मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है। तब तक संबंधित भवनों पर प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
संपत्ति अधिकार और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच संतुलन
हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक भवन तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण परियोजना से प्रभावित अन्य संपत्ति मालिकों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सड़क चौड़ीकरण और विकास योजनाएं सार्वजनिक हित से जुड़ी होती हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है।
किसी भी विकास परियोजना के लिए सरकार और स्थानीय निकायों को कानून के दायरे में रहकर काम करना होता है। यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति प्रभावित होती है तो उसे अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। अदालतों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक निर्णय मनमाने तरीके से नहीं लिए जा सकते।
इस मामले में भी हाईकोर्ट ने यही सुनिश्चित किया है कि अंतिम निर्णय होने तक किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति में न पहुंचाया जाए, जहां बाद में न्यायिक राहत मिलने के बावजूद नुकसान की भरपाई कठिन हो जाए।
दालमंडी मार्ग चौड़ीकरण योजना पर असर
वाराणसी में दालमंडी क्षेत्र लंबे समय से यातायात व्यवस्था और शहरी विकास योजनाओं के कारण चर्चा में रहा है। मार्ग चौड़ीकरण योजना का उद्देश्य क्षेत्र में आवागमन को बेहतर बनाना और यातायात दबाव को कम करना बताया जाता है।
हालांकि, ऐसी योजनाओं के दौरान कई बार पुराने भवनों, दुकानों और आवासीय संपत्तियों के प्रभावित होने की स्थिति बनती है। इससे स्थानीय लोगों के सामने विस्थापन और संपत्ति सुरक्षा जैसे सवाल खड़े होते हैं।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद अब नगर निगम और राज्य सरकार को अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष रखना होगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि आगे की कार्रवाई किस प्रकार कानून के अनुसार की जानी चाहिए।
प्रभावित भवन स्वामियों को मिली अस्थायी राहत
फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश से प्रभावित परिवारों को राहत मिली है। उन्हें अब उम्मीद है कि उनकी आपत्तियों और दस्तावेजों पर निष्पक्ष तरीके से विचार किया जाएगा।
अदालत का यह आदेश यह संदेश भी देता है कि विकास कार्यों के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अब सभी की नजरें 20 जुलाई 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां राज्य सरकार और नगर निगम अपना जवाब दाखिल करेंगे और मामले की आगे की दिशा तय होगी।