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दुष्कर्म मामलों में बाहरी चोट का न होना आरोप को झुठलाने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

दुष्कर्म मामलों में बाहरी चोट का न होना आरोप को झुठलाने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

       इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा है कि केवल इस आधार पर कि पीड़िता के शरीर पर बाहरी चोट के निशान नहीं मिले, दुष्कर्म के आरोप को झूठा नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर यौन अपराध में शारीरिक चोट का होना आवश्यक नहीं है और परिस्थितियां कई बार ऐसी होती हैं, जहां पीड़िता प्रतिरोध नहीं कर पाती।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी दुष्कर्म के एक पुराने मामले में आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए की। हालांकि अदालत ने आरोपी की सजा को कम करते हुए उसे जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने हबीब की अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

मामला उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से जुड़ा हुआ था, जहां वर्ष 1985 में नौ वर्षीय बालिका से दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपी हबीब को दोषी पाया था और उसे आठ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

आरोपी पक्ष ने उठाए थे कई सवाल

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि मामले में कई महत्वपूर्ण कमियां थीं। आरोपी के अधिवक्ता ने कहा कि पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी।

इसके अलावा गवाहों के बयानों में कुछ विरोधाभास होने की बात भी कही गई। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना से जुड़े कपड़ों और मिट्टी जैसे भौतिक साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच नहीं कराई गई।

आरोपी पक्ष का कहना था कि जब जांच में इतनी कमियां हैं और शारीरिक चोट के प्रमाण नहीं हैं, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

बचाव पक्ष ने अदालत से आग्रह किया कि अभियोजन पक्ष की कहानी को संदेह से परे साबित नहीं माना जा सकता और आरोपी को बरी किया जाना चाहिए।

सरकार ने कहा—छोटी कमियों से पूरा मामला खत्म नहीं होता

राज्य सरकार की ओर से आरोपी की दलीलों का विरोध किया गया।

सरकार की ओर से कहा गया कि केवल जांच में कुछ कमियां रह जाने या गवाहियों में मामूली अंतर होने से पूरे अभियोजन पक्ष को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

अभियोजन ने कहा कि अदालत को पूरे मामले को समग्र रूप से देखना चाहिए। यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय है और घटनाक्रम से मेल खाती है, तो केवल छोटी-छोटी कमियों के आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।

सरकार ने यह भी कहा कि यौन अपराधों में कई बार परिस्थितियां ऐसी होती हैं जहां पीड़िता की मानसिक स्थिति, डर और दबाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा—चोट न होना सहमति का प्रमाण नहीं

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुष्कर्म के प्रत्येक मामले में पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिलना जरूरी नहीं है।

पीठ ने कहा कि कई बार पीड़िता की उम्र, डर, धमकी, सामाजिक दबाव या अपराधी के प्रभाव के कारण वह विरोध नहीं कर पाती।

ऐसी स्थिति में शरीर पर चोट का अभाव यह साबित नहीं करता कि घटना हुई ही नहीं या पीड़िता की सहमति थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों की प्रकृति अन्य अपराधों से अलग होती है। इनमें हर घटना में एक जैसी शारीरिक प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती।

विशेषकर कम उम्र की पीड़िताओं के मामलों में यह मानना गलत होगा कि विरोध या संघर्ष के निशान नहीं हैं तो अपराध नहीं हुआ।

पीड़िता की गवाही का महत्व

अदालत ने कहा कि यौन अपराधों में पीड़िता का बयान बहुत महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है।

यदि पीड़िता की गवाही स्वाभाविक, विश्वसनीय और परिस्थितियों से मेल खाती है, तो केवल बाहरी चोटों की अनुपस्थिति के आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता।

न्यायालयों ने कई बार यह माना है कि यौन अपराधों में पीड़िता को एक सामान्य गवाह की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वह घटना की सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति होती है।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि हर मामले में साक्ष्यों का मूल्यांकन तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

1985 के मामले में अदालत का दृष्टिकोण

यह मामला लगभग चार दशक पुराना था। घटना के समय पीड़िता की उम्र केवल नौ वर्ष थी।

इतने पुराने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहियों और रिकॉर्ड के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा की।

अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषी ठहराने का फैसला पूरी तरह गलत नहीं था।

पीठ ने कहा कि अभियोजन की कहानी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि मेडिकल रिपोर्ट में बाहरी चोटों का उल्लेख नहीं है।

दोषसिद्धि बरकरार, सजा में बदलाव

हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को कायम रखा। अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों के संबंध में निचली अदालत का निर्णय हस्तक्षेप योग्य नहीं है।

हालांकि अदालत ने आरोपी की सजा को लेकर नरमी दिखाई।

आठ वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बदलकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया गया।

इसका अर्थ यह हुआ कि आरोपी को उतनी ही सजा भुगतनी होगी जितनी अवधि वह पहले ही जेल में रह चुका था।

यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशीलता जरूरी

यह फैसला यौन अपराधों की सुनवाई में न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।

कई बार समाज में यह गलत धारणा बनी रहती है कि यदि किसी महिला के शरीर पर चोट नहीं है तो घटना संदिग्ध हो जाती है।

अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता को केवल शारीरिक चोटों से नहीं मापा जा सकता।

यौन हिंसा पीड़िता पर मानसिक और भावनात्मक प्रभाव भी डालती है, जो कई बार बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता।

जांच एजेंसियों के लिए भी संदेश

फैसले से जांच एजेंसियों के लिए भी संदेश है कि यौन अपराधों की जांच केवल मेडिकल रिपोर्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

घटना से जुड़े सभी पहलुओं, पीड़िता के बयान, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध प्रमाणों की गहराई से जांच जरूरी है।

यदि किसी जांच में कोई कमी रह जाती है, तो अदालत उसे ध्यान में रखती है, लेकिन हर कमी इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती कि पूरे मामले को समाप्त कर दे।

न्याय व्यवस्था का संतुलित दृष्टिकोण

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय एक बार फिर यह बताता है कि अदालतें यौन अपराधों में पीड़िता के अधिकारों और आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती हैं।

फैसले का मुख्य संदेश यही है कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में केवल बाहरी चोटों की मौजूदगी या अनुपस्थिति को अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता।

घटना की सच्चाई का निर्धारण पूरे साक्ष्य, परिस्थितियों और गवाही के मूल्यांकन से किया जाना चाहिए।

यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां आरोपी केवल इस आधार पर बचने की कोशिश करते हैं कि पीड़िता को कोई शारीरिक चोट नहीं आई। अदालत ने साफ कर दिया है कि चोट का अभाव अपराध के अभाव का प्रमाण नहीं है।