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पीलीभीत टाइगर रिजर्व में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी? तीन महीने बाद भी लागू नहीं हो सका रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध

पीलीभीत टाइगर रिजर्व में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी? तीन महीने बाद भी लागू नहीं हो सका रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध

     पीलीभीत। वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन देश के कई संरक्षित क्षेत्रों में कराया जा रहा है, लेकिन पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) में इन आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठने लगे हैं। आदेश जारी होने के लगभग तीन महीने बाद भी पीटीआर के कोर हैबिटेट से गुजरने वाले प्रमुख मार्गों पर रात के समय वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हो सकी है।

वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि रात के समय जंगल के बीच से गुजरने वाले वाहनों की आवाजाही बाघ, तेंदुआ, हाथी और अन्य वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। रात के समय ही कई वन्यजीव भोजन और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं। ऐसे में तेज रफ्तार वाहन उनकी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं।

वहीं, पड़ोसी जिले लखीमपुर खीरी स्थित दुधवा टाइगर रिजर्व में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन शुरू कर दिया गया है। वहां जंगल से गुजरने वाले मार्गों पर शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक सामान्य यातायात पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।

दुधवा में लागू हुआ आदेश, पीटीआर में इंतजार

दुधवा टाइगर रिजर्व प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को आधार बनाते हुए दुधवा-गौरीफंटा और चंदनचौकी मार्ग पर रात्रिकालीन आवागमन बंद कर दिया है। अब इन मार्गों पर केवल एंबुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों को ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है।

इसके विपरीत पीलीभीत टाइगर रिजर्व में स्थिति अलग नजर आ रही है। यहां मार्च में ही वन विभाग की ओर से आदेश जारी किया गया था कि पीटीआर के कोर क्षेत्र से गुजरने वाली सड़कों पर रात के समय यातायात रोका जाए, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।

पीटीआर क्षेत्र से गुजरने वाले पीलीभीत-माधोटांडा, पीलीभीत-पूरनपुर और माधोटांडा-खटीमा मार्गों पर रात्रिकालीन प्रतिबंध का आदेश तो है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पालन कराने में कई अड़चनें सामने आ रही हैं।

जंगल के बीच से गुजरती हैं प्रमुख सड़कें

पीलीभीत टाइगर रिजर्व का क्षेत्र वन्यजीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में बाघ, हिरण, जंगली सूअर, तेंदुआ और अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं।

पीटीआर के कई हिस्सों में जंगल के बीच से होकर सड़कें गुजरती हैं, जिनका इस्तेमाल स्थानीय लोग रोजमर्रा के आवागमन के लिए करते हैं। इनमें माधोटांडा-खटीमा मार्ग प्रमुख है।

यह मार्ग कई गांवों और क्षेत्रों को जोड़ता है, इसलिए स्थानीय लोगों के लिए इसका महत्व भी है। लेकिन इसी कारण वन्यजीव संरक्षण और जनसुविधा के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।

रात में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं वन्यजीव

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, अधिकांश वन्यजीव रात के समय अधिक सक्रिय होते हैं। बाघ और अन्य बड़े जानवर अपने क्षेत्र में घूमते हैं और कई बार सड़क पार करते हुए दिखाई देते हैं।

ऐसे समय में वाहनों की तेज आवाज, हॉर्न और हेडलाइट से वन्यजीवों के व्यवहार पर असर पड़ता है। कई बार सड़क हादसों में वन्यजीवों की मौत की घटनाएं भी सामने आती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षित क्षेत्र में केवल वन्यजीवों की मौजूदगी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके सुरक्षित आवागमन के लिए शांत वातावरण भी जरूरी है।

बैरियर लगे, लेकिन व्यवस्था कमजोर

पीटीआर के कई मार्गों पर वन विभाग ने बैरियर लगाए हैं और कर्मचारियों की तैनाती भी की गई है। आधिकारिक रूप से कहा जाता है कि रात में वाहनों को रोका जाता है।

लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार प्रतिबंध के बावजूद वाहन गुजरते रहते हैं। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि प्रभावी निगरानी नहीं होने के कारण नियमों का पालन नहीं हो पा रहा है।

विशेष रूप से माधोटांडा-खटीमा मार्ग को लेकर चिंता जताई जा रही है। यह क्षेत्र वन्यजीवों की आवाजाही वाला इलाका है, जहां कई बार बाघ समेत अन्य जानवरों की मौजूदगी देखी जाती है।

स्थानीय दबाव भी बना चुनौती

रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध लागू न होने के पीछे स्थानीय स्तर पर विरोध भी एक कारण बताया जा रहा है।

कुछ किसान नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि रात में मार्ग बंद होने से स्थानीय लोगों को परेशानी होगी और जरूरी काम प्रभावित होंगे।

हालांकि वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का तर्क है कि संरक्षित क्षेत्रों में कुछ प्रतिबंध जरूरी होते हैं। जैसे मानव जीवन की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, वैसे ही वन्यजीवों का संरक्षण भी सरकार की जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर कई बार यह स्पष्ट किया है कि संरक्षित क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना जरूरी है।

टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में सड़क, यातायात और अन्य गतिविधियों का प्रभाव वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन पर पड़ता है।

रात्रिकालीन प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य यही है कि रात के समय जंगल में अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप कम किया जा सके और वन्यजीव अपने प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रह सकें।

प्रशासन ने कही सख्ती की बात

वन विभाग का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार रात्रिकालीन प्रतिबंध लागू किया गया है। इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए जिला प्रशासन का सहयोग लिया जाएगा।

अधिकारियों के अनुसार वन क्षेत्रों से गुजरने वाले मार्गों पर रात में केवल आपातकालीन वाहनों को अनुमति दी जाएगी।

विभाग का कहना है कि नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए निगरानी बढ़ाई जाएगी और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त व्यवस्था की जाएगी।

संरक्षण और सुविधा के बीच संतुलन जरूरी

पीटीआर में रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध का मुद्दा केवल सड़क बंद करने तक सीमित नहीं है। यह वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय लोगों की जरूरतों के बीच संतुलन का सवाल भी है।

एक ओर जहां स्थानीय लोगों को आवागमन की सुविधा चाहिए, वहीं दूसरी ओर बाघ जैसे दुर्लभ वन्यजीवों की सुरक्षा भी जरूरी है।

जानकारों का मानना है कि प्रशासन को ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे आम लोगों को कम से कम परेशानी हो और वन्यजीवों के संरक्षण के उद्देश्य से भी समझौता न हो।

फिलहाल तीन महीने बाद भी पीटीआर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह पालन नहीं हो पाया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है और क्या जंगल के बीच से गुजरने वाले मार्गों पर रात का प्रतिबंध वास्तव में लागू हो पाता है। :::